संवाद और अहिंसा

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

- कन्हैया त्रिपाठी

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी, भारत गणराज्य के माननीय राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्व निभा चुके हैं और सेतु सम्पादक मंडल से संबद्ध हैं।

जैसी दुनिया हम चाहते हैं, क्या वैसी ही आप भी चाहते हैं? ऐसा एक स्वयं से सवाल करें। इस सवाल का जवाब ढूढें। इसे एक बार नहीं, हज़ार बार सोचें, और इसका ज़वाब हासिल करने की कोशिश करें। आपको सबसे अधिक बार एक ज़वाब मिलेगा की आप एक सहिष्णु, समतामूलक, परोपकारी और अहिंसक मानवीय सभ्यता से ओतप्रोत समाज की कल्पना किए, और वही ज़वाब आपको बार-बार मिला। आपके भीतर इस विषय पर सोच विचार करते हुए, जो भावनाएं, जागृत हुईं, वह करुणामय थीं। ईश्वरीय और समष्टिगत थीं। आपने जैसी कल्पना की वह अद्वितीय थी, और उसे आप अपनी जीवन शैली में शामिल करने के लिए भी ज्यादा उत्सुक हुए, ऐसी मनोदशा जब भी किसी मनुष्य के भीतर जागृत होती है तो उसके दार्शनिक और सांस्कृतिक आधार होते हैं। 
पूरे विश्व से अनेकों लोगों ने यदि ऐसा ही सोचा, तो फिर हिंसा और द्वैध के लिए स्थान बचता ही नहीं। इन सबके बावजूद हम इतनी ज्यादा संघर्ष की कहानियां लिख चुके हैं। हम इतने सारे युद्ध लड़ चुके हैं। हम इतने हिंसक फिर कैसे होते गए? यदि हमारी सांस्कृतिक और दार्शनिक समृद्धता इतनी अधिक थी, फिर हम इतने संघर्षों के इतिहास के साथ जीने के लिए विवश क्यों हैं? ऐसा सवाल एक अन्य आलेख में भी उठाया गया। ऐसा सवाल पुनः हमारे समक्ष प्रकट हो रहा है। किन्तु क्या आप जानते हैं कि ऐसे सवाल करना भी आवश्यक है। सवालों से भागे हुए लोग कभी भी अपने लोग, समाज, राष्ट्र, धरती, आकाश, सागर और इस ब्रह्माण्ड में अस्तित्व में किसी भी व्यवस्था, प्राणी, या फिर प्रत्यक्ष या परोक्ष जो भी विद्यमान है, उसका भला नहीं कर सकते। प्रश्नों से लोगों को भागते हुए देखा है, और प्रश्नों के उत्तर देने और प्रश्नों के श्रवण की क्षमता जहाँ विकसित नहीं होती, वहां के लोगों का दुर्भाग्य आगे-आगे अपना रास्ता बना लेता है। यह केवल उस समय की पीढ़ी का दुर्भाग्य नहीं होता। बल्कि ऐसे परिक्षेत्र का दुर्भाग्य पीढ़ियों तक चलता है। प्रश्न की परंपरा भारत में रही है। उत्तर की भी। प्रश्न और उत्तर से ही हम इतने विकसित हुए हैं। प्रश्न की परंपरा हमें सनातन रूप में मिली है। उत्तर की भी। सभी युगों में प्रश्नोत्तर हमारे शंकाओं का समाधान करते रहे हैं। इसे हम सनातन परंपरा में संवाद-संस्कृति ख सकते हैं। हमारे धर्म-ग्रंथों और हमारी पूरी की पूरी सभ्यता का यदि हम अवलोकन करें तो हमारा जीवन ही प्रश्नोत्तर और समाधान पर आधारित हैं। कटु विचार, मलीन विचार, लालच और चालाकी यह हिंसा की जड़ें रही हैं। युद्धिष्ठिर यक्ष संवाद पढ़ें। सत्य का उस संवाद में उदघाटन होता है। जीवन-शैली और जीवन-यात्रा के लिए उस संवाद से पथ मिलते हैं। वैसा संवाद विरले मिलता है। इस संवाद में सहनशीलता है। शीलता के अभाव से हिंसा जन्म लेती है। ऐसे अनेकों कथाओं का आस्वाद हम अपने उपनिषदों, वेदों, पुरानों और अनेकों धर्मग्रंथों से प्राप्तकर क्या सीख लेते हैं, यह ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। हमारे यहाँ तो जातक कथाएं और पंचतंत्र की कथाएं भी ऐसी अनेकों शिल्प के साथ मौजूद हैं, जिनसे हम सीखते हैं। 
प्रश्नों से भागती पीढ़ी अपने अस्तित्व और अपने भीतर के अंधकार से संघर्ष करती है। पाश्चात्य सभ्यता में भी प्रश्नों और संवादों की अनेकों गाथाएँ हैं। हाँ, एक बात जरूर है वहां पर कि वे तात्कालिक हैं। यह तात्कालिकता भी हिंसा की वजहें बन जाती हैं। अब यह तात्कालिकता तेजी से घर कर गयी है। यह पहले भी थी, पश्चिम में। अब ज्यादा बढ़ गयी है और उसकी बयार भारत और पूरब के देशों में बढ़ रही है। यह तात्कालिकता प्रकृति विरोधी है, सभ्यता विरोधी है। तकनीकी का विकास हमारी तात्कालिकता को उत्प्रेरित करती है। कहना गलत न होगा कि आधुनिकता, ऐश्वर्यपूर्ण जीवनशैली और तात्कालिक लाभ के लिए जोखिम उठा लेने की प्रवृत्ति ने हमें संवाद से धीरे-धीरे अलग कर दिया। परिवार के बीच संवाद अब नहीं होते। तकनीकी ने उन्हें अपनी गिरफ्त में ले लिया है। अब कलह की वजह टेक्नोलोजी बनती जा रही है। यह और बढ़ेगी। यह और वीभत्स होगी। यह और आक्रामक होगी और इसकी धुंध में हमारी सभ्यता संवाद-शून्यता को और गहरे प्रभावित करेगी। यह कैसा युग आ गया है? यदि ऐसा युग छठी सदी में या उससे पूर्व होता तो हमारे यहाँ से भगवन बुद्ध का उपदेश जापान और अन्य एशिया के देशों में न जा पाता। यदि ऐसा ही समय होता तो हमारे शंकराचार्य इतना बड़ा उद्यम धर्मोपदेश का न कर पते और हम परिस्कृत सोच के न बन पाते। किसी ने बचाया है। बचाने के पीछे संवाद है। प्रश्न श्रवण की शक्ति है। प्रश्नोंनुकूल अपनी मनः स्थिति बनाने की शक्ति है। यह अनुकूलता ही नहीं बची है, जो हिंसा की वजह है।
शंकराचार्य- मंडन मिश्र और उनकी धर्मपत्नी के बीच संवाद की कथा लोकप्रिय है। वह संवाद केवल संवाद न थे। अपितु सही अर्थों में तो संवाद-शास्त्रार्थ थे। अब शास्त्रार्थ भी नहीं होता। झगडे होते हैं। मिडिया चैनलों पर आक्रोशपूर्ण वाद-विवाद होते हैं। इनमें न लय है न मधुरता और न ही अपनापन। तो क्या संवाद अब मृत्यु की ओर बढ़ रहे हैं? हालांकि यह अतिरेक लग सकता है लेकिन मशीन-जनित मनुष्य की बुद्धि तो ऐसी ही सभ्यता के लिए आग्रही है और उसके संसर्ग में राह कर जीवन तो नहीं प्राप्त कर सकता। हमारे गुरु-शिष्य संवाद के ऐसे किस्से हैं, ऐसे आख्यान हैं, जिनसे कई पीढ़ियाँ शिक्षा लेती हैं। यह एक सतत शिक्षा योजना का नमूना रहा है। अब हम सतत विकास लक्ष्य हासिल करने के लिए शिक्षा को एक विषय के रूप में शामिल किए हैं। पहले सतत ज्ञान से लोग शिक्षित होते थे। यह ज्ञान आत्मचिंतन और मनन के माध्यम से प्राप्त होते थे। मशीनें हमारे ज्ञान का केंद्र नहीं थीं जो प्रोग्रामिंग के आधार पर परिणाम देती हैं। हमारे ज्ञान, विधान और संधान शास्त्रोक्त थे। चिंतनपरक थे। आध्यात्म और दर्शन पर आधारित थे। पश्चिम के जिन महान चिंतकों को हम आज पढ़ते हैं और जिन्हें मानव-सभ्यता के उत्थान में सहयोगी समझा जाता है वे भी महान दार्शनिक और चिंतक थे। वे संवाद करते थे-प्रकृति से, लोक से, आमजन से, निर्वात से भी।
जॉन मिल्टन की रचना पैराडाइज लॉस्ट पढ़ें। क्या आपको पता है कि ‘पैराडाइज़ लॉस्ट' (Paradise Lost) का मतलब क्या होता है? इसका अर्थ है- गुम हुई जन्नत। इस महाकाव्य में स्वर्ग से शैतान और एक इंसान के निकाले जाने का ज़िक्र है। यह थी संवाद की कला। हमारे रचनाधर्मी लोग अभी भी अनेकों तरीके से संवाद कर रहे हैं। वे अपने हिस्से का समाज बन रहे हैं। वे चाहते हैं कि हमारी सभ्यता बोले, और बोलती रहे। जिन देशों की सभ्यताएं विलुप्त हीन, उसकी वजहें आप जानकार हैरान राह जाएंगे। वहां संवाद का अभाव था। वहां युद्ध हुए। शांति अपना दम तोड़ दी। कोई तानाशाह हुआ तो उसकी वजह थी कि वह संवाद करना नहीं चाहता था। वह अपने हुक्म से सभ्यता को हांकना चाहता था। इसी वजह से हम बीसवीं सदी में दो भयानक युद्ध की त्रासदी देखे हैं। किसी भी मनुष्य बिरादरी में समान संवाद हो तो वहां परमाणु बम की क्या आवश्यकता है? हमारे संवाद हमें बचाते हैं। हमारी बोल जो सत्य और प्रेम की बोल हो, उससे किसी का अहित संभव ही नहीं है। छल से भी प्रेमरस के अधीन करके कूटनीतिक चालें चली जाती हैं, मैं उनकी बात नहीं कर रहा। सत्य जिसे गाँधी जी ईश्वर मानते थे वैसा वाला सत्य और उसके ही डोर का प्रेम जो त्यागमय हो उससे तो अहिंसा की ही कल्पना कर सकते हैं। यह भी संवाद से ही संभव है। झूठ का संवाद हिंसा की ओर जाता है और सत्य के साथ संवाद प्रेम और करुणामयी मनुष्य निर्मित करता है जिसके सांचे में तैयार मनुष्य सबके भले, सबके कल्याण के बारे में विचार करते हैं।
संवाद की यह अलौकिक देन ईश्वर की है। इससे ईश्वरीय गुणों का प्रतिपादन हम मनुष्यों का धर्म है। अमूर्त को मूर्त हमारे शब्द बनाते हैं। इनके महत्व को जो समाप्त करके अपनी क्रूरता को स्थापित करना चाहते हैं, वे निश्चय ही हिंसक सभ्यता के वाहक हैं। अहिंसा तो हमारे व्यव्हार की कसौटी है। शब्द और संवाद उस कसौटी पर सबसे समृद्ध बुद्धि और विवेक के स्वामी मनुष्य को नई संवेदना से जीने का माध्यम हैं फिर इनके बीच में अवरोध के लिए जो कारक हैं, उस पर अंकुश कौन लगाएगा? यह तो हमें ही करना पड़ेगा। लेकिन कबीरदास जी ने संवाद को भी अनुशासित रखने को कहा है-ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोय। औरन को शीतल करे औरहुँ शीतल होय।
अतिमहत्त्वाकंक्षा और अतिरिक्त जुटाने की होड़ ने जो हमसे छीनने की कोशिश की है, उस पर यदि संवेदनशील होकर विचार नहीं करेंगे और प्रश्नोत्तर जीवन-शैली और संवाद की विरासत को बचाएंगे नहीं, तो हो सकता है हमसे बहुत कुछ छूट जाय।

पता: यूजीसी-एचआरडीसी, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर-470003 (मध्य प्रदेश),
चलभाष: +91 981 875 9757, ईमेल: hindswaraj2009@gmail.com

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