काव्य: स्कॉट टॉमस आउटलार (अनुवाद: बिंदिया विश्वकर्मा)

Scott Thomas Outlar
इकत्तालीस: उल्लूक का अभिवादन 

क्या बताना चाहता है उल्लूक 
बगीचे के चीड़ वृक्षों से
मुझे, 
जब मैं बैठा हूँ अकेला 
चाँद - तारों की छाँव तले? 
यही कि जीवन वैसा ही हैं 
जैसा हम उसे बनाते हैं। 
कि अनुभूति वास्तविकता को 
आकार देती है।
कि चेतनशील रहना किसी भी 
लक्ष्य तक आधी दूरी तय कर देगा। 
परन्तु अन्त में, कर्म आवश्यक है
प्रभावकारी ढंग से यह समझाने के लिए 
कि प्रेम और युद्ध हर एक का 
अपना स्थान है, 
कि दया आकर्षक है, 
कि सम्मान उत्तेजक है। 
कि हमारे पूर्वजों की विरासत 
हमारे रक्त में गा रही है,  
कि सत्य की शक्ति को कभी हराया नहीं जा सकता 
कि स्वतन्त्रता सतत् झरती है 
उन हृदयों में, जो इसकी 
भारी जिम्मेदारी उठाने के लिए तत्पर है। 
कि अत्याचार के भीतर ही 
छिपा है उसके विनाश का बीज। 
ईश्वरीय स्पंदन हर किसी को 
आराम देगा जो भी उसे 
निरन्तर महसूस करना चाहते हैं। 
जागृत अवस्था पुनरूत्थान को 
उजागर करती है। 
कि जागने और जागृत होने के 
मध्य एक गहरी खाई है, 
कि नियति और स्वेच्छा एक बेहतरीन 
संगम हैं। 
कि धन का अर्थ चंद चांदी 
के सिक्के इकट्ठे करने से कहीं बढ़कर है। 
कि स्वप्न पूर्वाभास करा देते हैं
आने वाली घटनाओं का। 
कि विश्वास नए आयाम खोलने की कुंजी है। 
कि दिव्य साक्षात्कार भविष्यवाणी 
भी है और वचन तथा आश्वासन 
भी है, मुक्ति का।
***
बिंदिया विश्वकर्मा


नीले देवदार

खुले मैदानों में घूमते हुए, 
मैंने, एकबार, अपने भाग्य से कुछ पूछा, 
तो उसने कहा कि 
लेट जाओ घास पर,
और पत्तों की चादर बना लो। 
उसने सुझाया कि जिस मौसम में 
आसमान सर्द होने लगे, तो 
आग जलाना। 
वह बोला कि उम्र बस एक संख्या है, 
जब तक यह तुम्हें मार नहीं डालती।
उसने कहा कि पेड़ तुम्हें हमेशा प्यार करेंगे। 
पर वे अकेले तुम्हें तूफ़ान से नहीं बचा 
पाएँगे। 
कहा कि गुनहगारों की रुह को 
बचाते वक्त फ़कीर भी बेईमान हो जाएँगे। 
उसने कहा कि समय की घड़ियाँ तो बस 
नज़र का धोखा हैं। 
तो जब लगे कि तुम धीमे पड़ गए हो, 
जोड़ लेना चंद घड़ियाँ उस वक्त में।   
और उसने कहा कि एक के बाद एक 
तुम्हें चुनते रहना पड़ेगा, 
बस इस दौरान जीना मत भूलना।
***


इस वक्त और बाद में

मेरी अस्थियों को 
ज़मीन में दफ़ना देना वहाँ 
जहाँ कभी ऊँचे पेड़ खड़े थे 
सभ्यता के शुरु होने से पहले।  
जब वक्त आएगा 
तो मेरी नग्न देह को मिट्टी में नहला देना, 
कोई सन्दूक, कोई डिब्बा, कोई 
सरहद नहीं, बस ज़मीन का स्पर्श और दुलार 
मेरी कब्र पर नाचना, गाना 
और मेरे जनाजे को हँसी खुशी से 
भर देना। 
पर जब तक वो दिन आता है 
हमारी आँखों में खुशी के आँसू हों, 
हमारी ज़बान से अमन और शांति की 
दुआएँ निकलें।  
हमारे होठों से प्यार के बोल फूटें
और हमारी जिन्दगी हर उस लम्हें का 
लुत्फ़ उठाते हुए गुज़रे जो हमें 
बख्शा गया है। 
***


ज्वलंत अभिलाषा

जीवन का एकमात्र कष्ट 
जिसकी मैं कल्पना कर पाता हूँ  
वह है, मेरी आत्मा के भीतर धड़कते हुए 
प्रकाश के उपहार को व्यर्थ कर देना। 
कविता एक भाषा ही तो है, 
जो अधूरी अभिव्यक्ति है 
उन अव्यक्त भावनाओं की 
जो साकार रूप लेने के लिए लालायित 
रहती हैं।
और इसीलिए मैं भली-भाँति जानता हूँ 
कि लिखा हुआ शब्द बस एक कड़ी है 
कर्म के विशाल पहिए में, 
इस पहिए को हमेशा दूर-द्रष्टा और चौकन्ना 
रहकर ही आगे बढ़ाया जा सकता है।  
बिल्कुल ज़रूरी नहीं है दिवार में 
टक्कर मारना, 
जबकि आस-पास और रास्ते खुले हों, 
जिन पर आसानी से चला जा सकता है, 
वे सबक साथ लेकर 
जो ज़िन्दगी पहले सिखा चुकी है। 
सतत् निरन्तर, प्रगतिशील, 
विकासोन्मुख 
आगे बढ़ते रहने में ही छिपा है 
रहस्य, 
धरती पर ही स्वर्ग के द्वार खोलने का। 
मन, शरीर और आत्मा 
त्रिआयामी दृष्टि का सृजन करते हैं। 
जब इन तीनों की दृष्टि केन्द्रित हो 
जाती है उस प्रारब्ध पर, 
जो भाग्य और स्वेच्छा के 
एकीकार और समरसता 
की समुचित लय से संतुलित 
हो, अंततः अवतरित होता है। 
और, यह कोई प्रार्थना नहीं, 
अपितु ईश्वर का गुणगान है। 
यह स्वप्न नहीं, 
अपितु जागरण है। 
यह परिस्थिति नहीं, 
अपितु प्राधिकार है। 
यह चयन नहीं, 
अपितु स्वीकृति है।

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