कहानी: ऊँट की करवट (चंद्र मोहन भण्डारी)

चंद्र मोहन भण्डारी
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       पार्क की बेंच पर पड़े मधुकर को झपकी आ गई थी। आँख खुली तो कुछ देर उसे समझ न आया कि वह कहाँ था और क्या कर रहा था? उसने उठकर बैठने की कोशिश की पर उसकी दाहिनी जांघ पर दर्द महसूस हुआ और और तभी अचानक सारी दृश्यावली सम्मुख आ गई। उसे याद आ गया कि वह वहाँ कैसे आया और सारा माजरा क्या था? उसने जांघ को धीमे से सहलाया और हिलाकर जानने की कोशिश की कि चोट कितनी गहरी हो सकती है। यह जानकर उसने राहत महसूस की कि चोट मामूली थी। यह भी याद आ गया किस तरह भीड़ से बचकर भागता वह दौड़ने लगा था और फिर गीली जमीन पर पैर फिसलने के कारण वह गिरा, और फिर शायद उसे हलकी मूर्छा आ गई थी। उसके बाद का कुछ याद न था कि कैसे वह बेंच तक पहुँचा। शायद दो-तीन लोगों की सहायता से वह बेंच तक आकर लेट गया था बस यही धुंधली सी याद – और फिर उसे झपकी आ गई।

अपनी छोटी उम्र में उसने बहुत कुछ जान लिया था केवल किताबी जानकारी नहीं, सीधे यथार्थ के बीहड़ का अनुभव, जिसमें आशा, आकांक्षा, के साथ निराशा, निरर्थकता का मिला-जुला भाव था। वह अपने को दृढ़ इच्छाशक्ति वाला इंसान समझता था पर अब जब वह पीछे मुड़कर देखता है तो लगता है जैसे उसे कोई अदृश्य शक्ति संचालित करती रही हो लगभग एक रोबोट की तरह। धीरे-धीरे पिछले आठ साल उसकी आँखों के सामने जैसे फ्लेशबैक में तिर आए: इंसानों के वे हुजूम, चुनावी दंगल के घमासान, बेहिसाब नारेबाजी और फिकरेबाजी, लफ्फाजी, बयानबाजी, चाटुकारिता के नित-नवीन पैंतरे, इंसान की जुगाड़ू फितरत का अनवरत चलता अभियान, और लोकतंत्र के नाम पर सारे अलोकतांत्रिक काम जिसे वह अ-लोकिक (यानि अलोकतांत्रिक) कहा करता था। अलौकिक और अ-लोकिक – वाह एक मात्रा भर का अंतर और सब कुछ उलट-पुलट। यह सब और भी बहुत कुछ – कभी नहीं थी उसकी चाहत; कभी नहीं था पहले यह परिदृश्य उसके अवचेतन या संभवत: अचेतन में भी। तब फिर यह सब उसके जीवन से जुड़ा कैसे, उसके दैनिक कार्यक्रमों का हिस्सा बना कैसे? यह तभी हो सकता है जब या तो वह रोबोट हो जिसका संचालन उस सोफ्टवेयर के द्वारा हो जो उसकी जिंदगी को कंट्रोल करता रहा है। दूसरी बात यह हो सकती है कि यह उसकी अंतर्मन में छिपी दबी अतृप्त इच्छाओं का ही  प्रारूप हो जिसे वह बाहरी तौर पर अस्वीकार करता रहा हो; यह हिपोक्रेसी है या दोगलापन, वही सब कुछ जिनसे वह नफरत करने का दावा करता आया है। ऐसा लगा जैसे अपने अंतर्मन की इन सच्चाइयों ने उसे निर्वस्त्र कर दिया हो।

वह फिर जा पहुँचा यादों की घुमावदार गलियों में; बी. ए. की परीक्षा के समय से ही उसे लगने लगा था  कि सामान्य पढ़ाई का युग समाप्तप्राय था और अब समय आ गया था कि घर की बिगड़ी हालत को सुधारने की जिम्मेदारी लेने का। कई सालों से चली आ रही पिता की बीमारी, फसलों की बरबादी, बढ़ता कर्ज का दबाव- इसके बावजूद उस पर माता-पिता की ओर से कोई विशेष दबाव नहीं था कुछ काम करने का; लेकिन उसे लगा उसका भी कोई फर्ज है और उसके जिम्मेदारी लेने का समय आ पहुँचा है। उसने परीक्षा के तुरंत बाद अखबारों में नौकरी के विज्ञापन देखने शुरू  कर दिये और सौभाग्यवश उसे अधिक भटकना नहीं पड़ा। पास के ही कस्बे  प्रेमनगर में एक होटल में मैनेजर के सहायक के रूप में। पगार ठीक थी और घर के पास होने का सुख था जहाँ जरूरत होने पर दो-तीन घंटे में पहुँच सकता था। काम भी बहुत मुश्किल नहीं था कमरों के रख-रखाव, आरक्षण और मेहमानों की सुविधाओं का ख्याल रखना –  मुश्किल न होते भी निरंतर चौकस रहने की जरूरत। कुछ हफ्तों में ही उसने काम सीख लिया था और उसकी लगन, दक्षता और व्यवहार से होटल का मालिक और मैनेजर दोनों संतुष्ट थे। दरअसल मैनेजर होटल मालिक का ही बेटा था इसलिये धीरे-धीरे उसका सारा कार्यभार मधुकर पर आता गया।

मधुकर इस नौकरी से खुश न होते भी  नाखुश नहीं था यह सोचकर कि आजकल उससे कहीं ज्यादा शिक्षित युवा भी नौकरी की तलाश में भटक रहे थे। कई बार तो विज्ञान या इंजीनियरिंग की डिग्री प्राप्त लोग भी बेरोजगार भटकते दीख जाते। विज्ञानेतर विषयों में हालात और भी खराब थे। सब मिलाकर वह अपने को भाग्यश‍ाली मानता कि बिना बहुत ज्यादा चप्पल घिसे अपने घर के निकट ही उसे आजीविका का सहारा मिल गया। यों कभी उसकी चाहत भी शिक्षा के क्षेत्र में कुछ आगे बढ़ने की हुआ करती थी। बी ए में राजनीति विज्ञान उसका पसंदीदा विषय था और एम ए के बाद अगर सब ठीक रहता तब वह पी एच डी की सोच सकता था। लेकिन कम ही लोगों के सपने सच होते हैं। जो भी हो मधुकर में सहज ज्ञान प्रचुरता से था और परिस्थिति से समन्वयात्मक समझौता करने में वह निपुण था। समझौता और समन्वय का अंतर उसकी अपनी सोच थी जो सपने और यथार्थ के बीच की जमीन को तलाशने का प्रयास करती थी। उसे नौकरी चाहिये थी जो उसे मिली लेकिन अपने अवकाश के वक्त का वह मालिक था और उसका एक बड़ा हिस्सा वह दिया करता किताबें पढ़ने और थोड़ा बहुत लेखन में। आज भले ही नौकरी के लिये उसे समझौता करना पड़ा, पर अपनी रुचि और स्वभाव से अंदर कहीं गहरे में वह एक विचारशील इंसान और एक जिज्ञासु था।

विरोधी स्थितियों के बीच आवश्यक तालमेल बैठाना उसके स्वभाव का हिस्सा बन गया था।

लेकिन जिंदगी में बहुत कुछ अप्रत्याशित भी हुआ करता है। तब वह सोच नहीं सकता था कि राजनीति के बीहड़ यथार्थ और वैचारिक परिपक्वता के बीच तालमेल बैठाना उतना आसान भी न था। उसे याद आया कैसे होटल के नियमित कस्टमर्स में एक इंसान उसके करीब आता गया जो उसकी जिंदगी की दिशा और दशा बदलने में जिम्मेदार बना। महेश भाई वहाँ अक्सर रुका करते थे और उनके साथ कुछ फुरसत के पलों में बातचीत हो जाया करती। उनका गाँव प्रेमनगर से कुछ दूरी पर था जहाँ आना-जाना लगा रहता, और यह होटल उनके लिये जैसे एक पड़ाव की तरह  हो गया था। महेश भाई को मधुकर का स्वभाव, उसकी कार्यशैली और सामान्य ज्ञान पसंद आने लगे। उनका अपना छोटा सा बिजनेस था पर धीरे-धीरे राजनीति की ओर उनका रुझान बढ़ता गया। अपने ही नगर के बड़े व्यापारी और प्रगतिशील लोकतांत्रिक पार्टी (पी एल पी) के सक्रिय सदस्य, नरेश दयाल उर्फ नरेश भाई से उनका अच्छा परिचय था। जब पार्टी ने नरेश दयाल को विधानसभा का चुनाव लड़ने को  कहा तब वे मना न कर सके। राजनीति के दंगल में उनका प्रवेश मित्र और सखा महेश भाई के बिना अधूरा ही रहता, लिहाजा उनके सलाहकार-मैनेजर के रूप में महेश भाई का भी अनौपचारिक प्रवेश संभव हो गया। विधान सभा का पाँच साल का कार्यकाल पूरा होते-होते नरेश भाई  पार्टी में अपनी अच्छी साख बना चुके थे। मुख्य विपक्षी दल की भूमिका में उनकी पार्टी ने अच्छा काम किया और अक्सर ज्वलंत मुद्दों पर सरकार की घेराबंदी करने में उनका योगदान चर्चा का विषय बन गया।

अगला चुनाव निकट था और इस बार आशा की जा रही थी कि उनकी पार्टी का दो अन्य दलों से गठबंधन सत्ता पक्ष को अच्छी टक्कर देने में सफल होगा। नरेश दयाल और महेश भाई दोनों का काम काफी फैल चुका था और अगर उनका गठबंधन सरकार बना सकने की स्थिति में आया तब उन्हें निश्चित रूप से एक कर्मठ, मेहनती और व्यवहार कुशल सहायक की जरूरत होगी। और महेश भाई को मधुकर में वे सारी खूबियाँ नजर आई जिसकी उन्हें तलाश थी। सवाल था कि क्या मधुकर इसके लिये राजी हो सकेगा? लेकिन उसको राजी करना उतना मुश्किल नहीं हुआ जितना सोचा गया था। वजह बिलकुल साफ थी आज करोड़ों की संख्या में बेरोजगार युवा के पास विकल्प बहुत सीमित हैं भले ही उसमें योग्यता हो। मधुकर स्वप्निल भावलोक और बीहड़ यथार्थ के बीच एक मध्यम मार्ग तलाश रहा था और यह मानकर कि राजनीति में भी स्वस्थ एवं सार्थक चिंतन लेकर चला जा सकता है बशर्ते राह कुछ मु्श्किल होगी, उसने अपनी सहमति दे दी।

उसे राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर शर्मा का कथन आज भी याद था जो वे लोकतंत्र पर अपने लेक्चर के दौरान कहा करते: ‘लोकतंत्र ऐसे ऊँट की तरह है जिसकी दर्जनों करवटें हैं और कोई यह नही बता सकता कि वह किस करवट बैठेगा ? यह लोकतंत्र की कमी है और कुछ मामलों में अच्छाई भी। लोकतांत्रिक निकाय में बहुत सारी कमियाँ हैं जिनका फायदा जुगाड़ू लोगों द्वारा उठाया जाना लाजिमी है। पर कुछ कमियों के  बावजूद इसका कोई बेहतर विकल्प नहीं है।‘
                                 
                                                      
*2*

इस तरह नेता नरेश दयाल की चुनावी टीम में महेश भाई के साथ एक और नाम आ जुड़ा, मधुकर का। शुरू में उसका काम आसान था नेताजी की दैनिक कार्यवाही का ब्योरा रखना और उन्हें सूचित करते रहना। समय के साथ उसमें अन्य काम भी आ जुड़े। चुनावी सभा का संचालन, खासकर नुक्कड़ सभाएँ उसे आयोजित करनी होतीं। शुरू में उसे कुछ अटपटा सा लगा करता पर इंसान धीरे-धीरे हर सांचे में ढल ही जाता है और मधुकर भी कुछ हद तक उस रंग में रंग गया। वह पहली नुक्कड़ सभा याद है उसे जो पूरी तरह उसको ही आयोजित करनी पड़ी थी महेश बाबू की अनुपस्थिति में। नेताजी के आने तक लोगों को व्यस्त रखना एक चुनौती सी थी खासकर तब जब यह पता चला कि ट्रैफिक जाम की वजह से उन्हें पहुँचने में एक घंटा लग जायगा। मधुकर के लिये यह परीक्षा की घड़ी थी और उसने अपना सारा प्रयास वहाँ पर एकत्रित युवावर्ग (जो अपेक्षाकृत अधिक संख्या में थे) पर अपना ध्यान फोकस कर सारी रूपरेखा बना ली। लोकतंत्र, चुनावी दंगल, युवा संकल्प– इनपर फोकस कर उसने डिबेट में अपनी दक्षता का सफल उपयोग किया: ‘मित्रो, लोकतंत्र एक ऊँट की तरह है वह किस करवट बैठेगा इसे बता पाना उतना ही मुश्किल है जितना यह बताना कि आज से दो महीने बाद मौसम कैसा होगा. मौसम का ऊँट हो या लोकतंत्र का, दोनों का सही पूर्वानुमान लगभग असंभव है और यही उनकी खासियत भी है।’ और फिर तो उसने अपनी लय पकड़ ली लगभग यह भूलकर कि यह चुनावी सभा थी राजनीति शास्त्र पर डिबेट नहीं।

उसने लोकतंत्र का संक्षिप्त इतिहास बतलाया और दुनिया के सबसे ताकतवर लोकतंत्र यानि अमेरिका के संविधान की आधारशिला वाली बातें बतलाईं। और बड़ी खूबी से सबसे बड़े और सबसे ताकतवर लोकतंत्र को समकक्ष रख तुलनात्मक विवेचन भी कर दिया। भारत और अमेरिकी लोकतंत्र का ऐसा विशद और संतुलित वर्णन उपस्थित जन को भा गया जिसमें ज्यादातर युवा ही थे। उसकी बातों से युवा मंत्र-मुग्ध से हो गये थे तभी नेताजी के पहुँचने की बात पता चली अन्यथा वह यह भूल चुका था कि वह टाइम पास करने के लिये बोल रहा था। नेताजी ने जब मंत्रमुग्ध दर्शक देखे तो वह जान गये की महेशभाई का मधुकर पर विश्वास कितना सही था। उनको एक कुशल सहायक मिल गया था जो उनके और महेश के लिये संतोष की बात थी।

महेश भाई और नेताजी की नजरों में मधुकर अपनी साख बना चुका था लेकिन यह उसे बाद में अनुभव हुआ कि यह साख बन जाना उचित नहीं था यह देखते हुए कि बीहड़ यथार्थ से समझौता कर सकने की उसकी सीमा बहुत दूर तक खींच पाना शायद संभव न था। एक दिन महेश भाई ने बातों-बातों में समझाया: ‘देखो मधुकर तुम एक अच्छे वक्ता हो और तुम्हारी भाषा की दक्षता तुम्हारे सामान्य ज्ञान  के साथ मिलकर श्रोता को बांध सकने की क्षमता रखते हैं। मुझे खुशी है कि तुम पर मेरा विश्वास कारगर रहा। पर एक बात तुम्हें ध्यान रखनी होगी कि ये चुनावी सभा के वक्तव्य है क्लासरूम लेक्चर्स नहीं। तुम जिनके लिये काम कर रहे हो अपने नरेश दयाल जी – नेता जी, उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर भी फोकस करना जरूरी होगा बल्कि वही तुम्हारा मुख्य विषय होगा।’

यह समझौता उसे करना ही था और उसने किया भी और वह धीरे-धीरे नेताजी की टीम का अभिन्न अंग बनता गया। उसकी पगार भी काफी अच्छी हो गई थी और जो सुविधा उसे मिलने लगी उसकी कल्पना भी वह कुछ समय पहले तक नहीं कर सकता था। चुनाव प्रक्रिया पूरी हुई और उनके सम्मिलित प्रयास रंग लेकर आये। गठबंधन की सरकार बनी और नेताजी को शिक्षा राज्य मंत्री का पदभार मिला। नेताजी अब मंत्रीजी बन चुके थे और वह उनका विशेष कार्यकारी सहायक; आगे चलकर उसे जन-संपर्क सहायक कहा जाने लगा। सब मिलाकर उसका अपना रुतबा भी बढ़ा और आर्थिक स्थिति भी। मुख्य सहायक महेश भाई ही बने रहे।

पर इन सबके बावजूद कहीं कुछ था जो मधुकर को खटक रहा था। मंत्रीजी से मिलने वाले लोग हर तरह के थे उनके अपने चुनाव क्षेत्र के प्रभावशाली लोग, पार्टी की मुहल्ला समितियों के अध्यक्ष, सचिव, कालेजों के प्रधानाचार्य, कुलपति; यह स्वाभाविक था और ज्यादातर मामलों में उसका काम था आगन्तुकों के मिलने का समय तय करना और मीटिग के दौरान मुख्य बातों का रिकार्ड रखना आदि। इनमें कोई अड़चन नहीं थी। पर धीरे-धीरे उसे लगने लगा था कि कुछ ऐसा था जो सामान्य से परे था। उसने निकट से जाना कि सामान्य सी लगती बातों में भी कितने दांव-पेंच लगाये जाते रहे हैं।

उसके पास आने वालों में एक नया ग्रुप भी शामिल होने लगा जिनमें वे आदर्शवादी युवा थे और उसकी ही तरह समझौता और समन्वय के बीच संतुलन करने वाली उसकी बातों से सहमत थे। वे वैचारिकी अभियान नाम से एक युवा मंच का संचालन किया करते और दो बार मधुकर को भी लोकतंत्र के विकास जैसे विषय पर विचार साझा करने के लिये आमंत्रित किया था। यहाँ तक सब ठीक चल रहा था लेकिन धीरे-धीरे उसे अनुभव हुआ कि उसके अपने कार्यक्षेत्र में समझौता अधिक और समन्वय कम होने लगा था। नेताजी के बारे में सुनने को मिलीं बातों को उसने शुरू में यह सोचकर नजरअंदाज किया कि राजनीति में इस तरह की बातें, आरोप-प्रत्यारोप सामान्य हैं। पर धीरे-धीरे यह साफ होता गया कि नेताजी का दामन उतना पाक-साफ नहीं था जितना वह अब तक समझता आया था। आयकर विभाग की रेड कई बार हुई। पहले लगा कि केन्द्र की सत्तारूढ़ पार्टी ने बदले की भावना से किया था। यह कुछ  हद तक सही हो सकता है कि अगर उनकी पार्टी ने केन्द्र की सत्तारूढ़ पार्टी का विरोध उतना मुखर न किया गया होता तब शायद रेड से बच जाते पर यह भी सच है कि बिना आग के धुआँ भी नहीं हो सकता। आय से अधिक संपत्ति वाली बातें तो थी ही यह भी पता चला कि उनके और उनके पुत्रों के नाम कई बेनामी सम्पत्तियाँ थी जिनका संचालन आर्थिक अपराध के अलावा नैतिक स्तर पर भी अपराध की श्रेणी में रखा जा सकता था। मधुकर के राजनीति और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के संबंध में विचार जो भी हों वह नेताजी से जुड़ा होने की वजह से अपने को असहज महसूस करने लगा था।

मधुकर पर वैसे तो कोई सीधा आक्षेप नहीं था जिस से विचलित होना आवश्यक होता  लेकिन दुविधा दो स्तर पर थी – पहला, वह स्वयं अपने सिद्धांतों से समझौता करता लग रहा था जो उसे कहीं खटकता था। दूसरा वह युवा वर्ग जिसे उसने एक सही स्वस्थ एवं संतुलित लोकतांत्रिक विकास प्रक्रिया की ओर प्रेरित किया उनके सामने अब वह उस ऊँचे स्थान पर खड़ा होने में समर्थ नहीं था भले ही उसकी कोई अपनी गलती इसमें न रही हो। वैसे  उसकी गलती कुछ नहीं थी ऐसा भी नहीं कहा जा सकता। जिन वैचारिक प्रक्रियाओं एवं आदर्शों की ओर वह अपने युवा मित्रों को प्रेरित करना चाहता था और प्रयासशील भी था उसके सैद्धांतिक पक्ष और जिनके लिये वह काम कर रहा था उनकी जमीनी हकीकत में अंतर इतना बढ़ चुका था कि वह एक दुविधा की जिंदगी जीने के लिये मजबूर हो चुका था।

उस दिन की बात वह भुला नहीं पाता जब स्थानीय अखबार में नेताजी के कुछ नये कारनामों की चर्चा थी और इसी संदर्भ में विपक्ष की ओर से एक मीटिंग आयोजित हुई जिसमें नेताजी के काले कारनामों का जिक्र था। मीटिंग के बाद यह निर्णय लिया गया कि नेताजी  सामने आकर सफाई दें या इस्तीफा दें। जबतक उग्र भीड़ उनके कार्यालय तक पहुँचती वे पिछले दरवाजे से खिसक लिये। वहाँ महेश भाई भी नदारद थे और सब मिलाकर मधुकर को ही उग्र भीड़ का सामना करना पड़ा। जो भीड़ का नेतृत्व कर रहे था उनमें कुछ युवा वे भी थे जो उस से प्रेरणा लेते रहे थे पर आज उनकी आँखों में भी आदर की जगह व्यंग्य मिश्रित आक्रोश दिखाई दे रहा था। वैसे जिनको वह निकट से जानता था वे अपेक्षाकृत संयत थे और कुछ हद तक उसकी स्थिति को समझ रहे पर कुछ अन्य युवा अधिक उग्र होकर सामने आ गये:
- आप नेताजी के जन-संपर्क सहायक हैं इसलिये आपका दायित्व बनता है इसपर आप कुछ स्पष्टीकरण दें। क्या ये आरोप सही हैं?
यह विकट स्थिति थी और उसके अपने लिये परीक्षा की घड़ी; उसने जल्दी ही अपने को संयत किया और कहा:
- जो ज्ञापन आप दे रहे हैं उसे और आपकी मुख्य मांगों को मैं नेताजी तक पहुँचा दूंगा।
- आपने सवाल का जवाब नहीं दिया। क्या ये आरोप सही हैं?
- सही या गलत तो न्यायिक प्रक्रिया से ही पता चल सकता है मेरे या आपके कहने भर से नहीं। मैं आपको यकीन दिलाता हूं कि मैं उनको यह ज्ञापन सोंप दूंगा और आपके जनाक्रोश की झलक भी उन तक पहुँचा दूंगा।
उनमें से एक ने कहा:
- आपने वैचारिकी अभियान के अपने भाषण में जिन लोकतांत्रिक आदर्शों का जिक्र किया था उनकी कोई झलक आपको नेताजी के कामों में दिखाई देती है?
- वे मेरे अपने विचार थे और मैं नहीं कह सकता उनकी झलक हमारे अधिकतर राजनैतिक लोगों में दिखाई देती है। इनमें नेताजी भी शामिल हैं।

सब मिलाकर उनके उग्र प्रदर्शन को अधिक उग्र होने से रोकने में वह सफल रहा और समझौता व समन्वय की अपनी पुरानी सोच का प्रयोग करने में भी कुछ हद तक सफल रहा। जब वह भीड़ लौट रही थी तब जाते-जाते किसी ने शायद उसको सुनाते हुए कहा: 
‘इनकी बातें और विचार लोकतंत्र के आदर्शों को बिम्बित करते हैं फिर ये कैसे एक अनैतिक व भ्रष्ट नेता का साथ निभा रहे हैं? क्या यह हिपोक्रिसी नहीं?’

बात सच थी और कड़वी भी, और वह कड़वाहट अब उसके मन को अस्थिर करने लगी थी। उसका मन धीरे-धीरे वहाँ से उचटने लगा था और वह वापस होटल की नौकरी के बारे में गंभीरता से सोचने लगा था। मुख्य बात यह सोचने की थी कि महेशभाई और नेताजी से वह क्या कहेगा?

इसी उधेड़बुन में एक दिन वह नगर के बाहरी भाग में स्थित पार्क में चला गया। सामान्यतया वहाँ शांति रहा करती थी पर उस दिन अपेक्षाकृत अधिक लोग दिखाईं दे रहे थे। उसने चाहा कि सुनसान जगह ढ़ूंढ कर कुछ देर बैठा जाय। तभी सामने से 15-20 लोगों का एक झुंड दिखाई दिया जो उसकी ओर ही आ रहा था और कुछ आवाजें आ रही थीं,  ‘अरे यही है नेता का चमचा, यही है पकड़ लो।‘ वह कुछ सहम सा गया और तेजी से दूसरी ओर बढ़ने का प्रयास करने लगा ताकि इन लोगों से दूरी बनाई जा सके। तेजी से कदम उसने बढ़ाये पर वहाँ कीचड़ और पानी था और उसका पैर फिसल जाने से वह गिर पड़ा। उसे हल्की मूर्छा सी आ गई और उसके बाद का हाल हम शुरू में बता चुके हैं।

इस घटना के बाद उसने यह नौकरी छोड़ने का निश्चय कर लिया और करीब पंद्रह दिन बाद अपना त्याग-पत्र भी दे दिया। घर वापस लौटते समय ट्रेन में वह हल्का और सहज महसूस कर रहा था क्योंकि यह तो होना ही था। लोकतंत्र के ऊँट की अपनी ही उपमा पर वह मुसकराया। इस ऊँट की सैकड़ों करवटों में एक आज उसने देखी जब ऊँट अपने सवार को झटके से गिराकर एक खास करवट बैठ गया। वैसे उसने यह भी माना कि सारी गलती ऊँट की ही थी यह नहीं कह सकते; उसे  भी तो ऊँट की सवारी करना बिलकुल नहीं आता। मामला 50-50 का रहा, आधी गलती ऊँट की और आधी सवार की।

उस दिन उसने कसम खाई कि राजनीति विज्ञान से भले ही उसका वास्ता रहेगा पर सक्रिय राजनीति से बिल्कुल नहीं।

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