ग़ज़लें: अभय शुक्ला

ग़ज़ल 1

हर सुकूँ, हर ख़ुशी मयस्सर है,
दिल में जाने ये कौन सा डर है।

और क्या चाहिए भला मुझको?
चार दीवार हैं, मेरा सर है।

ख़्वाब टूटे हैं इससे टकरा कर,
ये मेरी आँख है या पत्थर है।

मेरी दुश्मन बनी रहो जानाँ,
मेरी दीवानगी तो बद्तर है।

दूर जो हँस रहा है वादों पर,
ग़ौर से देखिए मुक़द्दर है।
***


ग़ज़ल 2

माज़ी  मुझे कुछ कह रहा है कान में,
बच्चे मिले थे खेलते मैदान में।

हमने हिफ़ाज़त की मगर इतनी करी,
रिश्ता बदल डाला किसी ज़िंदान में।

वो ज़ात का आशिक़ था सो उस पर मिली,
इक लड़की की तस्वीर बस सामान में।

हम को किसी की हाए अब जा कर लगी,
हम को किसी ने पा लिया वरदान में।

ख़ुश था नहीं पर कितना ख़ुश दिखता था वो,
कुछ और ही इमकान थे इमकान में।

हर सुब्ह का मंज़र यही की धूप से,
बढ़ती नदामत की तपिश दालान में।

जिनका किनारा था भँवर में मैं, वो सब,
मुझसे किनारा कर गए तूफ़ान में।

ता उम्र मैं इक रोशनी के साए में,
बुझता रहा कमरे के रोशनदान में।
***


ग़ज़ल 3

बुझने की आरज़ू को जलाता रहा हूँ मैं।
समझा के दिल को काम चलाता रहा हूँ मैं।

ख़ुश्बू के सब निशान मिटाता रहा हूँ मैं,
सारे चमन को आग लगाता रहा हूँ मैं।

दिल में रखा नज़र से नुमायाँ नहीं किया,
ज़ख़्मों का यह रिवाज निभाता रहा हूँ मैं।

इक आदमी का मुझको बदन दे दिया गया,
उस आदमी का बोझ उठाता रहा हूँ मैं।

रोटी के इंतिज़ार में भूखे ग़रीब को,
सपने दिखा के काम चलाता रहा हूँ मैं।

मालूम तुमको आज चला है मगर ये दिल,
कब से बिना धुएँ के जलाता रहा हूँ मैं।

रातों सुला सुला के तुम्हें दूर आप से,
उम्रे शबे फ़िराक़ बढ़ाता रहा हूँ मैं।

अपने पराए, भेद किसी में नहीं किया,
सब को बराबरी से रुलाता रहा हूँ मैं।
***


ग़ज़ल 4

तुम्हारे बाद भी घर का ख़याल रक्खा है,
कि हम ने पाँव में काँटा सँभाल रक्खा है।

तुम्हारे माथे पे मेरा उरूज है और ये,
तुम्हारे होंट पे मेरा ज़वाल रक्खा है।

मुझे तो कोई नया फ़ैसला नहीं करना,
तो मैं ने किस लिए सिक्का उछाल रक्खा है?

मुझे उसूल अहम थे, उसे मरासिम था,
सो आज दोंनो के हिस्से मलाल रक्खा है।

कहीं निवाले ज़ियादा हैं आदमी कम हैं,
कहीं पे भूख ने रोना निकाल रक्खा है।

हमारा नाम दिया तुम ने अपने बेटे को,
नसीब हम सा न हो, यह ख़याल रक्खा है?

सवाल पूछ, मेरे ज़ख़्म पर, बिना जाने,
जो हाथ रक्खा है तुम ने, कमाल रक्खा है।

तुम्हारे हिज्र के नक़्शो निशाँ हैं चेहरे पर,
तुम्हारी गोद में इक पूरा साल रक्खा है।

तुम और हम हैं किसी दालो ज़ाल के जैसे,
कि जिन के बीच में इक 'डाल' डाल रक्खा है।

तुम्हें भी दुख हैं, नयी बात नहीं है इस में,
दुख ऐसा पत्ता है जो डाल डाल रक्खा है।

तुम्हारे चेहरे पे रंग आ गए हैं बस सुन कर,
कि मैं ने जेब में भर कर गुलाल रक्खा है।

उमीद मुझ से क्या? मैं तो उसे नहीं समझा,
पिता वो, जिस ने मुझे कब से पाल रक्खा है।
***

दिल्ली विश्वविद्यालय के दीन दयाल उपाध्याय महाविद्यालय में बी. कॉम. (ऑनर्स)  अंतिम (तीसरे) वर्ष के छात्र। भोपाल, इन्दौर, दिल्ली व हैदराबाद आदि नगरों के भिन्न भिन्न मंचों पर प्रस्तुति। साहित्य संबंधी प्रतियोगिताओं में प्रतिभागिता। मध्य प्रदेश उर्दू अकादमी द्वारा आयोजित राज्य स्तरीय त्वरित शायरी लेखन के विजेता।
निवास: भोपाल (मध्य प्रदेश)
चलभाष: +91 798 786 0730

3 comments :

  1. उम्दा ग़ज़लें

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  2. बहुत ही उम्दा और बेहतरीन रचनाएं हैं।
    इस दौर को अपने रंग में रंगने, दीवाना निकला है।।

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