नववर्ष: दो कविताएँ

सुव्रत दे

संपादक, हिन्दी ज्योति, सम्बलपुर, उड़ीसा - 768001
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सुव्रत दे
सबसे अच्छा साल रहे

हवा बहकी-बहकी रहे
खुशबू महकी-महकी रहे
हर कोई खुशहाल रहे
आनेवाला साल
सबसे अच्छा साल रहे।

कहीं आग की न लपेट रहे
घृणा की न कहीं चपेट रहे
कहीं न घिनौनी चाल रहे
आनेवाला साल
सबसे अच्छा साल रहे।

कहीं दंगा न फसाद रहे
मजहब का न कोई विवाद रहे
दहशतज़दा कोई न फ़िलहाल रहे
आनेवाला साल
सबसे अच्छा साल रहे।

कहीं रिश्वत न चोरी रहे
कमजोर पर न सीनाजोरी रहे
न्याय नीति का सुर-ताल रहे
आनेवाला साल
सबसे अच्छा साल रहे।

अहंकार की न छाया हो
भेदभाव की न माया रहे
धरती फिर कहीं न लाल रहे
आनेवाला साल
सबसे अच्छा साल रहे।

कोई भूखा न बेहाल रहे
कोई नंगा न फटेहाल रहे
कहीं धरना न हड़ताल रहे
आनेवाला साल 
सबसे अच्छा साल रहे।

कहीं बिटिया न जलती रहे
प्यार मोहब्बत में पलती रहे
मायके जैसा ससुराल रहे
आनेवाला साल
सबसे अच्छा साल रहे।

कहीं कोई न दुश्वारी रहे
आँगन में महकती फुलवारी रहे
खुशी से मस्त सबकी चाल रहे
आनेवाला साल
सबसे अच्छा साल रहे।
***


फिर आया है नया साल

नया साल फिर आया है
धरती के हर नगर-नगर
हर देश के डगर-डगर,
हर सागर के लहर-लहर
दिशा-दिशा हर्ष छाया है
नया साल फिर आया है।

नया साल फिर आया है
नदी के कल-कल में
झरणों के छल-छल में
पंछियों के कोलाहल में
फिर नया संघर्ष लाया है
नया साल फिर आया है।

नया साल फिर आया है
अवनी के कण-कण में
यौवन के प्रतिक्षण में
जीवन के प्रति रण में
फिर एक नया निष्कर्ष छाया है
नया साल फिर आया है।

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