कहानी: नाबालिग

दिनेश पाठक 'शशि'
"देखा आपने, आज फिर उसने वही हरकत दोहराई थी।" बिस्तर पर लेटते हुए पत्नी ने शिकायती लहजे में कहा तो मैं चौंक पड़ा।

इस शहर और इस कालोनी में आए हुए अभी मात्र चार महीने ही हुए हैं मुझे, और पत्नी की यह दूसरी बार शिकायत सुन मन में झुंझलाहट-सी होने लगी।

नया-नया दफ्तर, नया-नया काम और नया-नया शहर, कालोनी और पड़ोस। ऐसी स्थिति में दिन-भर तो दफ्तर के काम को ठीक से समझने और करने में ही ऊर्जा नष्ट हो जाती है। ऊपर से नई-नई जगह और ये रोज-रोज का शिकायत का सिलसिला। मुझे लगा कि इस तरह तो चक्की के दो पाटों के बीच मैं अकेला पिसकर रह जाऊँगा। या फिर यही हाल रहा तो रोजाना समझौता कराते-कराते एक दिन पागलखाने जाना पड़ेगा मुझे।

थोड़ी नाराजगी जताते हुए मैंने पत्नी की गोरी बांह पर सरकते अपने हाथ को नियंत्रित किया और करवट बदल मुँह दूसरी ओर फेर लिया, "तुम भी कमाल करती हो, पूजा! दिन-भर का थका-हारा लौटता हूँ। खाना खा-पीकर थोड़ा आराम करने लगो, तो तुम शिकायत के पुलिंदे खोलना शुरू कर देती हो। भला तुम नहीं समझा सकती बच्चों को! काॅलोनी में आए जुम्मा-जुम्मा अभी आठ दिन नहीं हुए और तुम हो कि ये दूसरी बार शिकायत ले बैठी हो। आखिर कैसे चलेगा यह सब? बच्चों को डाँट-डपटकर रखो; नहीं तो सब कहेंगे- बड़े असभ्य लोग आकर बस गए हैं। रोज झगड़ा करते हैं।"

"क्या कहते हो जी, अपना बच्चा गलती करे तो उसे डाँट-डपटकर रखा भी जाए। अब दूसरे के बच्चे को किस तरह डाँटा जाए?"

‘दूसरे का बच्चा’, वाक्य सुनकर मेरी चेतना लौटी हो जैसे। पत्नी की ओर मुँह करके, करवट बदलते हुए, मैंने प्रश्न वाचक मुद्रा में देखा, "दूसरे का बच्चा! क्या मतलब? मैं अपने बच्चों को डाँट-डपटकर रखने की बात कह रहा हूँ और तुम हो कि दूसरे के बच्चों की बात करने लगीं। क्या किया दूसरों के बच्चों ने?"

"आपको तो कुछ  याद रहे तब न!" मेरा इतना लम्बा भाषण सुन पत्नी खिसियाकर रोष में बोली- "तीन दिन पहले ही तो बताई थी अरुण की हरकत। आज फिर उसने आकाश के आते ही अपना बैट....."

बताते-बताते पत्नी का गला रुँध गया। अपना दाहिना हाथ मेरी बाँह पर रखते हुए उसने निरीहता से मेरी ओर देखा।

मुझे लगा निश्चित ही पत्नी का अहं आहत हुआ है, अन्यथा उसे छोटी-मोटी बातों पर किसी से लड़ने-झगड़ने की कतई आदत नहीं है। अपनी तर्जनी अंगुली से पत्नी का चेहरा ऊपर उठाने का उपक्रम करते हुए मैंने समझाया-

"जाने दो, पूजा, तुम क्यों अपना तनाव बढ़ाती हो। बच्चे तो खेल में लड़ते-झगड़ते रहते ही हैं। हम बड़े लोग क्यों कटुता लाएँ अपने मन में?"

"बात ऐसी नहीं है, जो आप समझ रहे हैं। बच्चों की लड़ाई और खेल में, मैं दखल नहीं देती, पर जब पानी सिर से ऊपर पहुँचने लगे तब? अब देखिए न, अपने बंगले में तो किसी बच्चे को झाँकने भी नहीं देती मिसेज खन्ना- ‘फुलवारी तोड़ देंगे बच्चे, पैरों से गन्दा कर देंगे बच्चे, मजाल है जो बाहर का एक भी बच्चा झाँक जाए उनके यहाँ। पर उनका लाड़ला काॅलोनी के सारे बच्चों के साथ हमारे लाॅन में दिनभर धमा-चैकड़ी मचाता है, जैसे फूल-फुलवारी कुछ भी न लगी हो हमारे यहाँ। कल ही एक बच्चे ने रजनीगंधा के दो पौधे तोड़ डाले और परसों तो दो गमलों की डहेलिया बरबाद कर डाली थीं। इतने पर भी हमने कुछ नहीं कहा- चलो और आ जायेंगे पौधे। पड़ोस में नये-नये आये हैं, झगड़ा नहीं होना चाहिए। पर ये क्या, उनका लाड़ला पूरे मोहल्ले के बच्चों के साथ दिनभर तो यहाँ खेलता रहा पर जैसे ही स्कूल से आकर आकाश ने खेलना चाहा, पूरी टीम के साथ अपना खेलने का सामान समेटकर वह अपने घर चलता बना। आकाश अपना-सा मुँह लिये देखता ही रह गया। अपने पास भी अगर बैट-विकेट आदि होते तो क्यों खिसियाना-सा देखता रह जाता वह? इसलिए कहती हूँ कि बाजार जाकर इसके लिए भी क्रिकेट का एक सेट लाकर दे दो।"

"ठीक है, भई, तुम कहती हो तो ला दूँगा।" पत्नी का मन रखते हुए मैंने तर्क देना चाहा- "लेकिन पूजा, ऐसा भी तो किया जा सकता है कि अरुण के पढ़ने के समय आकाश भी पढ़ लिया करे और जब उसका खेलने का समय हो तो उसी समय आकाश भी खेल लिया करे।"

पत्नी की आँखों में झाँकते हुए मैंने प्रतिक्रिया पढ़ने का प्रयास किया।

"किया जा सकता है। किया क्यों नहीं जा सकता? आकाश को भी उसी के स्कूल मंे दाखिल दिला दो। बस, दोनों का स्कूल जाने-आने का एक समय हो जायेगा।" पत्नी ने तनिक रोष प्रकट किया- "बताओ, आकाश लौटता है शाम को चार बजे स्कूल से और अरुण लौट आता है दो बजे ही। दो बजे लौटकर वह पढ़ भी लेता है और खेल भी लेता है। आकाश जब तक हाथ-मुँह धोकर, स्कूल ड्रेस उतारकर, खेलने के लिए आता है तब तक अरुण सामान समेटकर चल देता है।"

पत्नी की मनःस्थिति मैं समझ रहा था पर पब्लिक स्कूल के नाम पर लूट मचाते उस मँहगे स्कूल में दाखिला दिलाकर, हर महीने जेब खाली करने से अच्छा, एक बार क्रिकेट सेट लाकर दे देना लगा मुझे। रोज-रोज की चिख-चिखबाजी से तो कम से कम मुक्ति मिलेगी, और फिर हमारे बेटे के मन में भी हीन-भावना नहीं आयेगी। वह भी अपने खेलने के सामान पर हाथ फिराकर गर्व महसूस कर सकेगा कि उसके पास भी अपना खेलने का सामान है। साथ ही वह भी जब चाहेगा, खेलेगा और जब नहीं चाहेगा अपनी मर्जी से सामान समेटकर रख सकेगा।

मेरा दंभ सिर उठाने लगा था और उसी झोंक में, मैं बड़बड़ाये जा रहा था, "क्या पब्लिक स्कूल में पढ़ने वाले ही अपनी मन-मर्जी से खेल सकते हैं? हमारा बेटा क्या कम है किसी से पढ़ाई में? या किसी और बात में?"

बड़बड़ाते हुए मैं स्कूटर तक पहुँच गया। पूजा को भी मैंने साथ चलने के लिए तैयार कर लिया था ताकि दोनों मिलकर एक अच्छा-सा क्रिकेट का किट खरीद सकें, बल्कि अरुण के किट से भी अच्छा खरीदने की होड़ अन्दर ही अन्दर हमें उकसा रही थी।

आकाश को यह बात नहीं बताई थी हमने, खेल का सेट लाकर हम आकाश को सरप्राइज देना चाहते थे। कितना खुश होगा हमारा बेटा, जब खेल का पूरा किट अपने सामने देखेगा। बेटे की प्रसन्नता से चमकते चेहरे की कल्पना से ही हमारे चेहरे पर भी एक अजीब उमंग परिलक्षित होने लगी।

पूजा तैयार होकर पास आ गई तो मैंने स्कूटर के ऊपर से कपड़ा उतारकर, स्टैपनी के पीछे रखे कपड़े को निकाला और स्कूटर की सीटों को साफ करने के बाद कपड़ा उसी स्थान पर वापस रख दिया। फिर स्कूटर को स्टैण्ड से उतारकर दरवाजे की ओर मोड़कर किक लगा दी।

"अब देखते हैं कैसे खेलता है अरुण अकेला अपने समान से। आकाश से बोल देना, सारे बच्चों को बुलाकर अपने सामान से खिला लिया करे और अगर अरुण आए तो आकाश भी अपना सामान समेटकर रख दे। ‘जैसे को तैसा’ न बनो तो आजकल बेबकूफ समझते हैं लोग दूसरों को तो।"

हम पति-पत्नी ने गर्व से सीना फुलाए क्रिकेट के सामान को लटकाकर लाते हुए दूर से ही आकाश को आवाज दी। हम दोनों के हाथों में क्रिकेट का सामान देख आकाश दौड़कर हमारे पास आ गया। क्रिकेट का सामान देख उसकी आँखों में चमक आ गई, "किसका सामान है, पापा, यह?"

आकाश ने भोलेपन से पूछा तो पूजा ने गर्व से उसके सिर पर हाथ फिराते हुए गाल पर चुंबन ले लिया, "तुम्हारा ही है, और किसका?"

सुनकर वह प्रसन्न हो उठा और अपने दोनों हाथों का घेरा बना अपनी माँ से लिपट गया। उसने बैट, पैड, बॉल और विकेट आदि को देखते हुए अपने एक-एक सामान पर हाथ फिराकर देखा। हम दोनों के प्रति कृतज्ञता का भाव और मन की प्रसन्नता उसकी आँखों में स्पष्ट झलक रही थी।

बैट पर हाथ फिराते-फिराते अचानक उसे कुछ याद आया हो जैसे। बैट पर सरकता उसका हाथ वहीं रुक गया और सारे सामान को एक तरफ खिसकाकर वह उदास-सा हो गया, "पापा, आप ये सामान वापस कर आइये।"

"क्या! क्या कहा? वापस कर आइये!"

हम दोनों ही एक साथ चौक उठे, "बेटे, सबसे अच्छा किट लाये हैं चुनकर हम लोग। पता भी है कितने का है? बता तो क्या कमी नजर आई तुझे इसमें?" पत्नी कुछ ज्यादा ही उत्तेजित हो गई।

"उंहुँ, मैं खराब कब बता रहा हूँ, मम्मी! ये तो बहुत अच्छा किट है।" ललचाई दृष्टि से बैट पर हाथ फिराते हुए आकाश बोला।

"तो फिर क्या बात है? क्यों वापस करा रहा है?"

"बात ये है मम्मी कि इससे अरुण बुरा मानेगा। वह समझेगा मैं घमंडी हूँ इसलिए अपना बैट-बाल मँगा लिया। पड़ोस में रहते हुए भी अलग-अलग ... और फिर दोस्ती में ऐसा नहीं होना चाहिए न, पापा?"

उसका भोलेपन से कहा गया वाक्य मेरे दिल में भीतर तक समा गया, हमें लगा कि हम दोनों अचानक कितने इम्मेच्योर हो चुके हैं।

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।