काव्य: सुरजीत मान जलईया सिंह


अब के छुट्टी गाँव जाने वाला हूँ।
अब के उससे मिलकर आने वाला हूँ।
जिसने पहली बार किया था फोन मुझे।
जिसने पहली बार कहा था कौन मुझे?
जो मेरे शानों पर सर रखकर रोई थी।
जो मेरी होकर के मुझ में खोई थी।
जिसने मेरी कसमें मुझसे खायीं थीं।
जिसकी साँसें मुझमें कहीं समायी थीं?
जिसके बच्चे बिल्कुल मेरे जैसे हैं।
जिस के सारे रिश्ते मेरे जैसे हैं।
मैं गाँव में रहता हूँ समझाया था।
जिसने मुझको यह कह कर ठुकराया था।
मेरे रोने पर भी जो न पिघली थी।
मेरे अन्दर से जो रिस-रिस निकली थी।
जब था मेरा वक्त बुरा वह चली गयी।
मैं था खुद से जीत गया वह छली गयी।
अब प्लेनों में हर दिन उड़ता जाता हूँ।
अब शहरों से शहरों तक में जाता हूँ।
अब वह मील के पत्थर जैसी बैठी है।
अपनी किस्मत से भी रूठी बैठी है।
अब पूछूंगा उससे उसके बारे में।
चौखट पर बैठे बच्चों के बारे में।
इतना सा बस उससे कहकर आना है।
तुम बिन ही मैंने जीवन को जाना है।
अब के उसके लब भी न खुल पायेंगे।
अब के उसका चेहरा पढ़कर आना है।

1 comment :

  1. सेतु मण्डल का हृदय से आभार

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