काव्य: दो नज़्में

फ़िरदौस ख़ान

कवयित्री, कथाकार व पत्रकार। दूरदर्शन केन्द्र समाचार-पत्रों से सम्बंधित रही हैं, आकाशवाणी व न्यूज़ चैनल के लिए एंकरिंग भी की है। पत्र-पत्रिकाओं और समाचार व फ़ीचर्स एजेंसी के लिए लेखन करती हैं। फ़हम अल क़ुरआन लिखा है और सूफ़ीवाद पर 'गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत' शीर्षक से एक पुस्तक प्रकाशित हो चुकी है।

फ़िरदौस ख़ान
जाड़ों की सहर…

कितनी दिलकश होती है
जाड़ों की
कोहरे से ढकी सहर
जब
सुर्ख़ गुलाबों की
नरम पंखुरियों पर
ओस की बूंदें
इतराती हैं
और फिर
किसी के
लम्स का अहसास
रूह की गहराई में
उतर जाता है
रग-रग में
समा जाता है
जाड़े बीतते रहते हैं
मौसम-दर-मौसम
वक़्त की, परतों की तरह
मगर
अहसास की वो शिद्दत
क़ायम रहती है
दूसरे पहर की
गुनगुनी धूप की तरह...
***


जाड़ों की गुलाबी शाम...

जाड़ों की
एक गुलाबी शाम को
जब
मग़रिब की तरफ़
सरकता सूरज
दूर उफ़्क़ पर जाकर
कहीं खो जाता है
तो
सितारों के बेल-बूंटों से जड़ा
दुपट्टा ओढ़कर
रात आंगन में
उतर आती है
और फिर
जिस्म को छूकर गुज़रा
हवा का
इक सर्द झोंका
कितने बीते दिनों की
याद दिला जाता है
किताबों में रखे
सूखे गुलाबों की तरह...
***

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