क्रांति के विस्मृत नायक और कवि: पंडित जगतराम हरियानवी

अजय कुमार ‘अजेय’

जन्म: जनवरी 1987, मेरठ (उत्तर प्रदेश), भारत 
इंदिरा गांधी मुक्त विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग में शोधरत।
प्रशासनिक कार्यों के साथ लेखन का शौक। हिंदी ग़ज़ल के क्षेत्र में विशेष रुचि। कई पत्रिकाओं में शोध व आलेख प्रकाशित।

अजय कुमार ‘अजेय’


आजादी का अमृत महोत्सव
क्रांति के विस्मृत नायक और कवि - पंडित जगतराम हरियानवी

23 जून 1757 को प्लासी के युद्ध से शुरू हुआ आजादी का विद्रोह अपने विभिन्न चरणों से गुजरता हुआ पहली बार संपूर्ण भारत-भूमि पर 1857 के संग्राम के रूप में लड़ा जाता है। 1857 के इसी महासमर को हम भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम कहकर याद करते हैं। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद समस्त भारत निरंतर संघर्षरत रहा और अंततः 15 अगस्त 1947 को भारत ने परतंत्रता की बेड़ियों से खुद को आजाद कर लिया। स्वतंत्रता-प्राप्ति के लिये, लगभग 190 वर्षों तक किये गये इस यज्ञ की अग्निवेदी में न जाने कितने ही वीरों-वीरांगनाओं ने अपने प्राणों की आहुति दी। इनमें से कितने ही योद्धा व क्रांतिकारी विस्मृति में कहीं लुप्त हो गये। ऐसे क्रांतिकारियों की सूची बनाने लगें तो ऐसे सैकड़ों-हजारों नाम निकलकर आ सकते हैं। आजादी के इन भूले-बिसरे दीवानों में एक नाम पंडित जगतराम हरियानवी का भी है। ये हिन्दी साहित्य के द्विवेदी युग के क्रांतिकारी एवं कवि हैं। पण्डित जगतराम का जन्म पंजाब के जिला होशियारपुर के हरियाना ग्राम (Hariana Village) में हुआ था। वे सदैव निर्द्वन्द्व और प्रसन्न रहते थे।
 
पंडित जगतराम हरियानवी
ये उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिये अमेरिका गये थे और वहाँ इनकी घनिष्ठता गदर आंदोलन के नेता लाला हरदयाल से हो गई। कुछ समय तक ये अमेरिका में ही क्रियाशील रहे लेकिन मातृभूमि  प्रति इनका प्रेम इनके हृदय को सदा उद्वेलित करता रहा और बाद में "उनके विचार बदल गये। सुदूर अमेरिका में बैठ कर भारत की सेवा उन्हें समीचीन प्रतीत नहीं हुई। उन्होंने भारत में रह कर भारत की सेवा करने का निश्चय किया...।"1  पंडित जगतराम हरियानवी अमेरिका से भारत लौट तो आये किंतु परिस्थितियाँ यहाँ पर बद से भी बदतर हो चुकी थीं। देश की दुर्दशा पर कोई भी टिप्पणी करना, अपनी जान पर आफत मोल लेने के बराबर था लेकिन भला जगतराम कहाँ रुकने वाले थे। वे निरंतर क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय रहे। इसका परिणाम यह हुआ कि वे भी पुलिस की नज़रों में चढ़ गये।

"सन् 1914 में पुलिस ने लाहौर षड्यंत्र केस नाम का एक मामला पंजाब के कई नवयुवकों पर चलाया था। इनमें पंडित जगतराम भी थे। एक दिन वह किसी कार्यवश पेशावर जा रहे थे और रावलपिंडी में गिरफ्तार कर लिए गए।"2  बस फिर क्या होना था, जैसे सभी क्रांतिकारियों को फाँसी की सजा पहले से ही नियत रहती थी, सो पंडित जगतराम को भी फाँसी की सजा सुनाई गई। इस सजा को पंडित जगतराम ने हँसते-हँसते स्वीकार किया। पंडित जगतराम फाँसी पर चढने के लिए तैयार थे कि फाँसी होने से एक दिन पहले उनके पिता उनसे मिलने आये और उन्हें अपनी सज़ा के खिलाफ़ अपील करने के लिये बाध्य कर दिया। अपने पिता के कहने पर पंडित जगतराम ने मजबूरन अपील की और उनकी सज़ा घटाकर आजीवन कारावास में बदल दी गई। पंडित जगतराम को काले-पानी भेज दिया गया लेकिन बाद में स्वास्थ्य कारणों के चलते उन्हें गुजरात जेल में स्थानांतरित कर दिया गया। कारावास के दौरान भी आप पर बहुत से अत्याचार किये गये "यहाँ तक कि (एक बार तो) छह वर्षों तक चिराग़ की रोशनी भी नसीब नहीं हुई"3  किंतु इन सब अत्याचारों से पंडित जगतराम की हिम्मत और बढ़ती ही गई और संभवतः इन्हें कई बार स्थानांतरित करके दूसरी जेलों में भेजा गया। क्रांतिकारियों पर जेल के भीतर अंग्रेज अधिकारी बहुत अत्याचार करते थे। पंडित जगतराम हरियानवी ने मातृभूमि की सेवा के लिए निरंतर अत्याचार सहे और अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। अपने कारावास के दौरान भी वे अन्य कैदियों की सेवा करते रहते थे। वे जिस भी जेल में भेजे जाते वहाँ अन्य कैदी उनके मुरीद हो जाते थे और पंडित जगतराम जेल में रहते हुए भी आजादी का अलख जगाते। क्रांतिकारियों को भयंकर यातनाएँ दी जाती थी। इन पर हो रहे अत्याचारों और यातनाओं की ख़बरें सुनकर अन्य युवाओं में जोश की लहर फैल जाती थी और उनका खून उबलने लगता था। जब अन्य कैदी रिहा होकर बाहर जाते तो वे जेल में क्रांतिकारियों पर हो रहे अत्याचार का प्रचार करते थे। इस प्रकार के वृत्तांत सुनकर अन्य युवा भी प्रेरित होते थे और हँसते-हँसते आजादी की लड़ाई में कूद पड़ते थे। इस प्रकार जेल में रहते हुए भी पंडित जगतराम स्वतंत्रता के लिए लगातार संघर्षरत रहे। आजादी का लड़ाई के इस क्रांतिकारी कवि ने आजीवन देश-सेवा की।

पंडित जगतराम हरियानवी बहुत ही अच्छी कविताएँ और ग़ज़लें लिखते थे लेकिन दुर्भाग्य से इनका समस्त रचना-कर्म उपलब्ध नहीं है। इनका उपनाम (तख़ल्लुस) ‘ख़ाकी’ था तथा इनकी निम्नलिखित ग़ज़ल उपलब्ध है, जो संभवतः उन्होंने अपने कारावास के दौरान लिखी थी – 
"गर मैं कहूँ तो क्या कहूँ, क़ुदरत के खेल की।
हैरत से तकती है मुझे दीवार जेल की।
हम ज़िन्दगी से तंग हैं तिस पर भी आशना
कहते हैं, और देखिएगा धार तेल कीॽ
जकड़े गए हैं, किस तरह हम ग़म में क्या कहें,
बल खाके हम पे चढ़ गया, मानिन्द बेल की।
‘ख़ाकी’ को रिहाई तू दोनों जहाँ से दे,
आ ऐ अजल तू फांद के दीवार जेल की!!"4

इनकी एक अन्य कविता भी उपलब्ध है, जिसका शीर्षक इन्होंने ‘एक देशभक्त के शब्दों में’ लिखा है। यह कविता निम्नवत है – 
"उफ़! बाग़े आरज़ू की बहारें उजड़ गईं,
अब बेकरारियाँ मेरी हद से गुज़र गईं!
उफ़! लौहे-दिल पे नक़्शे-तमन्ना नहीं रहा,
अब मेरे दिल को ज़ब्त का पारा नहीं रहा!
जी चाहता है जामा-ए-हस्ती को फाड़ दूँ,
नालों से पाँव पीर फ़लक के उखाड़ दूँ!
रह रह के हूक सी उठती है दिल में आज,
आतशकदा सा है मेरे दिल में छुपा हुआ!
रह रह के याद आते हैं अपने पिता मुझे,
शायद कि दे गये हैं वे अपनी चिता मुझे!
अश्कों का मेरी आँखों से दरिया निकल गया,
महसूस यह हुआ कि कलेजा निकल गया!"5

इस प्रकार की ग़ज़लों व कविताओं से प्रेरित होकर कितने ही युवा आज़ादी की लड़ाई में शामिल हो गये थे। पंडित जगतराम ने भारत-भूमि की सेवा के साथ-साथ अपने रचनाकर्म से हिन्दी भाषा की भी खूब सेवा की थी। अपने अमेरिका प्रवास के दौरान वे गदर पार्टी के लिए हिन्दी अखबार में लेखन का कार्य भी करते थे। उनके हिन्दी अखबार का नाम ‘श्रीगणेश’ था। पंडित जगतराम अमेरिका उच्च शिक्षा प्राप्ति के लिए गए थे लेकिन वहाँ जाकर देश-सेवा की भावना ने हृदय में ऐसा स्थान लिया कि "अमेरिका-प्रवासी भारतीय भाइयों को मातृभूमि की दयनीय दशा का दिग्दर्शन कराना ही इस पत्र का उद्देश्य था और जगतराम की कुशल लेखनी ने उसका एक से बढ़कर एक वास्तविक चित्र खींचना आरम्भ कर दिया। इस कार्य में उन्होंने काफी सफलता भी प्राप्त की।"6 और यही कार्य उन्होंने भारत वापस आने के बाद भी लगातार जारी रखा।

इस प्रकार पंडित जगतराम सरीखे कितने ही विस्मृत क्रांतिकारी कवियों और नायकों ने त्याग और सेवा-भाव से स्वतंत्रता संघर्ष में अपना अमूल्य योगदान दिया। पंडित जगतराम का योगदान इस संदर्भ में अधिक महत्वपूर्ण कि उन्होंने मातृभूमि की सेवा के साथ-साथ मातृभाषा हिन्दी की भी महती सेवा की थी। प्रति वर्ष हम स्वतंत्रता दिवस का राष्ट्रीय उत्सव मनाते हैं और आजादी की लड़ाई में शहीद हुए लोगों को याद करके उनके प्रति सम्मान प्रकट करते हैं। प्रति वर्ष स्वतंत्रता दिवस मनाने की यह प्रथा आजकल बिल्कुल तकनीकी सी हो गयी है, थोड़े से देश-भक्ति गीत गा-बजाकर और रटे-रटाये से सांस्कृतिक कार्यक्रम करते हम सभी हर बार खाना-पूर्ति कर लेते हैं। इस प्रकार के कार्यक्रमों में अब मूलभूत परिवर्तन की आवश्यकता है। रविंन्द्रनाथ टैगोर के शब्दों में कहें तो राष्ट्रवाद या देशभक्ति की भावना का प्रदर्शन वास्तव में प्रतिदिन देश-कल्याण के लिये कुछ न कुछ अच्छा करना है। वैसे भी यदि हम लगातार प्रयास करें बूँद-बूँद से हम सागर भर सकते हैं। कुछ महीनों के बाद ही हम आजादी की 75वीं वर्षगाँठ का उत्सव मनायेंगे और ऐसे समय में पंडित जगतराम जैसी विभूतियों को याद करके उनके प्रति अपनी निष्ठा और सम्मान का प्रदर्शन कर सकते हैं। इस प्रकार की विभूतियों को याद करके हम अपने युवाओं में भी देश-भक्ति का संचार कर सकते हैं और उन्हें लगभग रोजाना राष्ट्र-कल्याण के लिए कुछ न कुछ नया करने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।


संदर्भ:
  1. आजादी के परवाने (विप्लव-यज्ञ की कुछ महत्त्वपूर्ण आहुतियाँ), संपादक: आर. सहगल, प्रकाशक: कर्मयोगी प्रेस लिमिटेड, इलाहाबाद, प्रथम संस्करण – मार्च, 1948, पृष्ठ 258-59
  2. आजादी के परवाने (विप्लव-यज्ञ की कुछ महत्त्वपूर्ण आहुतियाँ), संपादक: आर. सहगल, प्रकाशक: कर्मयोगी प्रेस लिमिटेड, इलाहाबाद, प्रथम संस्करण – मार्च, 1948, पृष्ठ 259
  3. आजादी के परवाने (विप्लव-यज्ञ की कुछ महत्त्वपूर्ण आहुतियाँ), संपादक: आर. सहगल, प्रकाशक: कर्मयोगी प्रेस लिमिटेड, इलाहाबाद, प्रथम संस्करण – मार्च, 1948, पृष्ठ 262
  4. आजादी के परवाने (विप्लव-यज्ञ की कुछ महत्त्वपूर्ण आहुतियाँ), संपादक: आर. सहगल, प्रकाशक: कर्मयोगी प्रेस लिमिटेड, इलाहाबाद, प्रथम संस्करण – मार्च, 1948, पृष्ठ 265-266
  5. आजादी के परवाने (विप्लव-यज्ञ की कुछ महत्त्वपूर्ण आहुतियाँ), संपादक: आर. सहगल, प्रकाशक: कर्मयोगी प्रेस लिमिटेड, इलाहाबाद, प्रथम संस्करण – मार्च, 1948, पृष्ठ 264
  6. आजादी के परवाने (विप्लव-यज्ञ की कुछ महत्त्वपूर्ण आहुतियाँ), संपादक: आर. सहगल, प्रकाशक: कर्मयोगी प्रेस लिमिटेड, इलाहाबाद, प्रथम संस्करण – मार्च, 1948, पृष्ठ 258

2 comments :

  1. ना जाने ऐसे कितने मूल्यवान नगीने इस देश की नींव में हैं जिनका नाम तक भुला दिया गया है। यह देखकर खुशी होती है कि आज की युवा पीढ़ी इन नगीनो को खोदकर निकाल लेने में भी रुचि रखती है।

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    1. बहुत बहुत आभार पंकज जी।

      अजय कुमार

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