राजभाषा, राजभाषा अधिनियम एवं राजभाषाधिकारी शब्दों को पूर्ण व्याख्यायित करता ग्रंथ: राजभाषा अमृत

समीक्षक: आचार्य नीरज शास्त्री

34/2 गायत्री निवास, लाजपत नगर, एन.एच.-2, मथुरा-281004
चलभाष: +91 925 914 6669



पुस्तक: 
राजभाषा अमृत
रचनाकार: श्री के. पी. सत्यानंदन
आई एस बी एन 978-81-951887-6-5
पृष्ठ: 280, मूल्य: ₹ 450.00 रुपये, प्रकाशन वर्ष: 2021
प्रकाशक- जवाहर पुस्तकालय, सदर बाजार, मथुरा
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 राजभाषा अमृत श्री के. पी. सत्यानंदन द्वारा प्रणीत एक उत्कृष्ट ग्रंथ है। ग्रंथ के प्रकाशन के उपरांत श्री सत्यानंदन ने इस ग्रंथ की समीक्षा हेतु आग्रह किया तो मैं इस ग्रंथ को पढ़ने लगा। कई बार इस ग्रंथ की विषयवस्तु को पढ़ने के उपरांत ही मैं इस पर लिख पा रहा हूँ। यह ग्रंथ राजभाषा हिंदी के प्रति श्री सत्यानंदन के समर्पण का प्रमाण है। विद्वान लेखक ने इस ग्रंथ में स्वयं के हिंदीभाषी न होने पर भी हिंदी से अपने जुड़ाव एवं हिंदी के प्रति निष्ठा व्यक्त करते हुए अपने हिंदी सेवा के अनुभवों को साझा किया है। श्री सत्यानंदन ने हिंदी अनुवादक के रूप में राजकीय सेवा में पहली नियुक्ति प्राप्त की। उस समय वह अपनी कर्तव्य सूची के विषय में अनभिज्ञ थे। उन्हीं के शब्दों में देखिए- "कार्यग्रहण के पहले दिन मेरे से भी कर्तव्य सूची के बारे में पूछे जाने पर मेरे द्वारा अंग्रेजी /हिंदी में अनुवाद करना बताया गया था। वास्तव में उस वक्त अनुवादक की ड्यूटी के बारे में इससे अधिक जानकारी मुझे नहीं थी।"1/15

आचार्य नीरज शास्त्री
धीरे-धीरे उन्हें अपने कार्यों की जानकारी हुई तथा उन्होंने हिंदी अनुवादक से निदेशक- राजभाषा, रेल मंत्रालय, रेलवे बोर्ड - नई दिल्ली तक का सफर तय किया।इसकी स्वीकृति श्री के.पी. सत्यानंदन ने अपनी इस कृति के अध्याय 1'अनुवादक से निदेशक तक का सफर... ' में की है। कृति का अध्याय 2 'संघ की राजभाषा और उसका कार्यान्वयन' के अंतर्गत विद्वान लेखक ने भारतीय संघ की राजभाषा नीति और उसका कार्यान्वयन, भाषा, भाषा के विविध रूप, राजभाषा, संघ की राजभाषा, संविधान में राजभाषा संकल्प व वार्षिक कार्यक्रमों के सम्बन्ध में विषद जानकारियाँ प्रदान की हैं। संघ की राजभाषा के विषय में उन्होंने लिखा है-अध्याय 3 - 'राजभाषा अधिकारी और प्रबंध कौशल' के अंतर्गत विद्वान लेखक ने प्रशिक्षण के महत्व को दर्शाते हुए लिखा है- "राजभाषा प्रबंधन से संबंधित सभी अधिकारियों एवं कर्मचारियों के प्रशिक्षण के लिए विभाग की ओर से समुचित व्यवस्था की जानी चाहिए। " 3/51
 लेखक के अनुसार प्रबंधन के मुख्य कार्य पाँच है -
1- योजना बनाना 2- संयोजन 3-समन्वय 4- निर्देशन 5- कार्य को नियंत्रित करना।

इन सभी कार्यों को सुचारु रुप से करते हुए ही सफल प्रबंधन किया जा सकता है। वह एक सफल राजभाषा अधिकारी मैं सत्यनिष्ठा, अनुशासन, प्रशासकीय क्षमता, योजना, कर्मनिष्ठा, विषय का ज्ञान, अनुभव, स्वच्छ छवि और व्यवहार कुशलता होने के साथ-साथ उसके अंदर साहस तथा उत्साह का होना भी नितांत आवश्यक मानते हैं। इतना ही नहीं श्री के. पी. सत्यानंदन के अनुसार एक योग्य राजभाषा अधिकारी में साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक अभिरुचि भी होनी चाहिए। अध्याय 4 'राजभाषा संबंधी संवैधानिक उपबंध' के अंतर्गत राजभाषा और उसके कार्यान्वयन से संबंधित विभिन्न रूपों को प्रस्तुत करते हुए उनका विवेचन किया गया है। अध्याय 5 'राजभाषा अधिनियम, 1963 की धारा 3 (3) के अनुपालन की अनिवार्यता' में बताया गया है कि राजभाषा अधिनियम की धारा 3 क्या है तथा क्यों अनिवार्य है। अध्याय 6 ' राजभाषा के विकास में केंद्रीय सचिवालय हिंदी परिषद की भूमिका ' में हिंदी परिषद की स्थापना के उद्देश्यों पर विद्वान लेखक ने प्रकाश डाला है। अध्याय 7 'संसदीय राजभाषा समिति के गठन व कार्य' के अंतर्गत लेखक ने संसदीय राजभाषा समिति का परिचय प्रदान करते हुए उसके गठन के विधान एवं कार्यों पर प्रकाश डाला है। इस हेतु लेखक ने संसदीय राजभाषा समिति के प्रतिवेदन के सभी खंडों पर विचार विनिमय किया है। अध्याय अन्य सूचनाओं की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। अध्याय 8 'विभिन्न संसदीय समितियाँ' में संसदीय समितियों की समीक्षा गई है।

अध्याय 9 'नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति के कार्य' के अंतर्गत नराकास के कर्तव्य एवं गतिविधियों को उजागर किया गया है। अध्याय 10 में हिंदी कार्यशाला के आयोजन में ध्यान देने योग्य बातों को समझाया गया है। अध्याय 11 'कार्यालयीन हिंदी का स्वरूप' में कार्यालयीन हिंदी के चार गुण स्पष्ट किए हैं- निर्वैयक्तिकता 2- तथ्यों में संपूर्णता व स्पष्टता 3- असंदिग्धता तथा 4- वर्णनात्मकता। 

इसी प्रकार वह मानते हैं कि "कार्यालयीन भाषा सरल व स्पष्ट होनी चाहिए। यह संक्षिप्त होनी चाहिए। इसमें दूसरी भाषाओं के प्रचलित शब्दों का प्रयोग होना चाहिए तथा वाक्य विन्यास सुगठित होना चाहिए। इतना ही नहीं इसमें एकरूपता, सभ्यता तथा सुसंस्कृति झलकनी चाहिए।" अध्याय 12 'कार्यालयीन साहित्य के अनुवाद में प्रवीणता' में बताया गया है कि अनुवाद कार्य श्रेष्ठ, सरल व स्पष्ट होना चाहिए तथा इसके लिए विषय विशेषज्ञों से सलाह भी ली जानी चाहिए।

अध्याय 13 'राजभाषा विभाग की वेबसाइट का परिचय ' है। इसमें विद्वान लेखक श्री के. पी. सत्यानंदन राजभाषा विभाग की वेबसाइट और उससे संबंधित संपूर्ण जानकारी प्रदान की है। अध्याय 14 'राजभाषा के कार्यान्वयन में विभागीय समितियों की भूमिका' के अंतर्गत राजभाषा के लिए कार्य करने वाली सभी विभागीय समितियों द्वारा दिए जाने वाले योगदान का विवरण है।

अध्याय 15 'विश्व हिंदी सम्मेलन नागपुर से मॉरीशस की राजधानी पोर्ट लुई तक' में सभी विश्व हिंदी सम्मेलनों का ब्यौरा प्रस्तुत किया गया है।

अध्याय 16 में पारिभाषिक शब्दावली निर्माण और वैज्ञानिक व तकनीकी शब्दावली आयोग तथा आयोग की भूमिका पर प्रकाश डाला गया है। अध्याय 17 में हिंदी भाषा में सूचना प्रौद्योगिकी के विकास की बात की गई है। अंत में कुछ कविताएँ, कुछ प्रमुख साहित्यकारों की जीवनी कथा हिंदी भाषा से संबंधित सूक्तियाँ दी गई हैं, जिन्होंने पुस्तक के सौंदर्य को बढ़ा दिया है; तथा परिशिष्ट के अंतर्गत विधिक शब्दावली दी गई है।

इस प्रकार विषयवस्तु के आधार पर इस कृति में विद्वान लेखक श्रीसत्यानंदन ने गागर में सागर भर दिया है। अर्थात् राजभाषा हिंदी से संबंधित लगभग समस्त जानकारियों को प्रस्तुत किया है। यह उनका भगीरथ प्रयास है और इसके लिए वह बधाई के पात्र हैं। पुस्तक को सरल भाषा में विवरणात्मक तथा विवेचनात्मक शैली में लिखा गया है जिससे उसकी उपयोगिता और भी बढ़ जाती है परंतु प्रत्येक अध्याय के शीर्षक अत्यंत लंबे हो गए हैं।यदि शीर्षक छोटे होते तो कृति और भी आकर्षक हो जाती।  पुस्तक हार्ड बाउंड है। आवरण आकर्षक है। इस 280 पृष्ठीय पुस्तक का मूल्य भी उचित ही है।

मैं हिंदी भाषा से संबंधित इस विशिष्ट ग्रंथ की रचना हेतु इसके लेखक श्री के. पी. सत्यानंदन जी को बधाई देते हुए आशा करता हूँ कि यह कृति उन के यश में श्री वृद्धि करेगी।
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