काव्य: नमिता गुप्ता 'मनसी'

क्या-क्या मैं लिखूँ, और क्या बतलाए फिरता हूँ

न हँसता हूँ न रोता हूँ, मैं बेबस हो तुझे पुकारा करता हूँ, 
क्या बतलाऊँ कैसे सबसे अपना हाल छिपाए फिरता हूँ।

मौसम बीते, सदियाँ बीती, मैं भी बीत गया ऐसे ही, 
पर एक दर्द रहा इस सीने में, मैं जिसे उठाए फिरता हूँ।

न कह पाऊँ, न सह पाऊँ, है अजब फेर ये जीवन का, 
मैं पतझड़ का सावन बनकर, आँसू बहाए फिरता हूँ।

ये रातें न तो जागी हैं न सोई सी, दिन बेचैनियों से भरा, 
मैं अजब से इस माहोल को ही, शहर बताए फिरता हूँ।

कभी हालात से, तो कभी जज्बात से रूठा सा रहता हूँ, 
पर तेरी उन प्यारी बातों से मैं खुद को मनाए फिरता हूँ।

सुकून भी है साथ होने का, है दर्द भी पास न होने का, 
कोई कहे कि क्या है ये, जिसे मैं प्रेम बनाए फिरता हूँ।

कुदरत के हिस्से हम सब, न जानें क्या लिखा लकीरों में, 
तेरे उस दिन के एलान को मैं दिल से अपनाए फिरता हूँ।

सुन 'मनसी', बेहिचक, बेसबब, बेहिसाब, बेशुमार
जाने क्या-क्या मैं लिखूँ और क्या बतलाए फिरता हूँ।
***

नमिता गुप्ता 'मनसी'
मेरठ (उत्तर प्रदेश)
यह अंत ही अगर शुरुआत हो जाए तो

मैं कुछ कहूँ या न कहूँ, पर बात हो जाए तो
ये मौन ही हमारा अगर संवाद हो जाए तो

उलझे-सुलझे रहते हैं अपनी ही उलझनों में हम
उलझन ही मिलने का आसार हो जाए तो

न जाने क्यों अपनों में भी चुप-चुप ही रहे मगर
किसी एक अजनबी पे ही एतबार हो जाए तो

नहीं पता कि क्या खोजने को निकले घर से हम
यह रास्ता ही मंजिलों की पहचान हो जाए तो

किसी से कुछ कहूँ या न कहूँ, हाल-ए-दिल मगर
बस एक तेरा नाम ही राज़ उजगार कर जाए तो

संजोए कितने ही सपने और ये अनगिनत उम्मीदें
मगर किस्से तेरे-मेरे ही एक किताब बन जाए तो

कसक सी इक दिल में रह जाती है हर बार ही 
फिर भी खूबसूरत अगर ये इंतज़ार हो जाए तो

न कहना फिर कभी कि जिंदगी यूँ ही बीत गई
मनसी, ये अंत ही अगर शुरुआत हो जाए तो।
***

1 comment :

  1. सुमन शर्मा की "प्रश्न चिन्ह" रणपाल जी की "चींटियां" बहुत अच्छी लगी मुझे। सभी रचनाकारों को हार्दिक बधाई..सभी रचनाएं उत्क
    सेतु पत्रिका का

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