काव्य: सुमन शर्मा (लखनऊ)

प्रश्नचिन्ह

तुमसे प्रेम 
किसी प्रयोजन के तहत नहीं हुआ
क्योंकि स्थितियाँ और परिस्थितियाँ 
दोनों ही प्रतिकूल थीं।

तुमसे प्रेम ठीक वैसे भी नहीं हुआ 
जैसे दुनिया के तमाम प्रेमियों को हुआ
अचानक पहली नज़र में ही।

सुमन शर्मा

यह प्रथम दृष्टि का प्रथम प्रेम नहीं बल्कि
 जानने-समझने की दीर्घ प्रक्रिया से गुजर कर
शनैः-शनैः विकसित हुआ प्रेम है।
प्रगाढ़ और अटूट...!

तुम्हारे तरफ से कितना और क्या है?
बहुत बार कोशिश की समझने की
 बहुत बार निष्कर्ष तक भी पहुँची 

लेकिन मेरी आदत है न!
मेरे हर निष्कर्ष पर तुम्हारी पुष्टि की मुहर...
और यहीं...
यहीं मेरे सारे अवलोकन पर

प्रश्नचिन्ह धर देते हो तुम!
***


मैं चाहती हूँ!

मैं सारी चांदनी को
एक पोटली में बांध
रख देना चाहती हूँ तुम्हारे सिरहाने
ठीक तुम्हारे तकिए के जगह 
कि जब कभी रातें अंधेरी होने लगे
तुम्हारी रात रौशन रहे

मैं आकाश के सारे सितारों को बटोर के
टाँक देना चाहती हूँ तुम्हारी चादर पर
कि बेख़्वाब रातों में
तुम खेल सको अक्कड़-बक्कड़
साथ इनके

मैं सूरज को उगाना चाहती हूँ
तुम्हारे बेड के साथ वाली खिड़की पर
कि रोज़ इसकी नर्म किरणें 
माथा सहला कर
चूम लें
तुम्हारी अलसाई पलकें

चाँद को टांग देना चाहती हूँ
तुम्हारे स्टडी टेबल के सामने वाली दीवार पर
कि गर कभी कोई प्रेम कविता लिखते हुए
याद न आए कोई उपमा तुम्हें
इसमें झाँक कर तुम ढूंढ सको
कोई उपमा नई

समंदर की सारी सीपियों से मांग लाना चाहती हूँ सारे मोती
कि जब कभी दिन-भर की भाग दौड़ से ऊब जाओ
तो चौसर खेलो तुम इनसे

मैं बारिशों को भरके अपनी आँखों में
बरसा देना चाहती हूँ तुम पर
कि तपते मौसम में 
थोड़ा सा ही सही
मिल जाए तुम्हें सुकून

तुम्हें सर्दियाँ पसन्द हैं न
मैं पहाड़ों की सारी बर्फ़ीली नमी
तुम्हारे लिए 
मैं अपनी गर्म साँसों में सोख लेना चाहती हूँ
कि जब तक चले मेरी साँसें
महसूस करते रहो तुम इसे मुझमें

मैं अपनी पलकों की झालर बना
तान देना चाहती हूँ तुम पर
कि बचे रहो तुम हमेशा
परिस्थितियों की धूप से
और कभी तुम्हारे ललाट पर
थकन का स्वेद न उभरे

मैं अपनी सारी खुशियों के ऐवज में
चाहती हूँ तुम्हारी हँसी
कि तुम मुस्कराओ सदा
जिसे देख मैं भूल जाऊँ अपना सारा ग़म

मैं अपनी धड़कनों की माला गूंथ 
तुम्हें अर्पण कर देना चाहती हूँ
कि जिसे पहन कर तुम चिरंजीवी हो 
और मैं सौभाग्यशालिनी हो जाऊं तुम्हारे गले लगकर...

मैं अपने जीवन का एक-एक क्षण
ईश्वर को साक्षी मानकर
तुम्हारे नाम कर देना चाहती हूँ
तुम जीओ मेरी उम्र भी
क्योंकि तुम्हारा होना 
मेरे लिए ईश्वर के अस्तित्व का प्रमाण है....
***


प्रेम से ज़्यादा

इंतज़ार की थकन अब
आँखों से छलक 
मन में उतरने लगी है

वर्षों की आस मायूस होने लगी है
कि प्रेम न सही
मेरा होना शुमार हो जाए तुम्हारी आदतों में ही

समझती हूँ कि प्रेम 
कभी किया नहीं जाता 
दुनियाँ के बाकी कामों की तरह
प्रेम तो बस हो जाता है

अचानक ही
अपात्र-कुपात्र किसी से भी
इसलिए प्रेम की उम्मीद से ज्यादा
चाहा था मैंने तुम्हारी आदत हो जाना

आदतें जीवन भर नहीं छूटतीं
***


बातें

हमने हमेशा 
अपनी पसन्द के विषयों पर ही 
बातें कीं एक दूसरे से

हमने कभी कोई
तर्क-वितर्क नहीं किया 
नापसंद बातों पर 

मसलन 
हम मौसमी बातें करते
सर्दियों में धूप की
और बारिशों में बादलों की
लेकिन 
गर्मियों के दिनों में
हमारी कोई बात नहीं होती 

उसे सर्दियाँ पसंद थी
और मुझे बारिशें
लेकिन गर्मियाँ हम दोनों को नहीं

हमने बात नहीं की कभी 
गर्मियों पर
***


वसंत का रंग

मेरे वसंत का रंग 
पीला नहीं
गुलाबी है
जो खिलता है 
तुम्हारी मुस्कान में
***


सुख-दुःख

खुशियों के लिए गाये जाने वाले 
स्वागत गीतों के जब बदल जाते हैं सुर
लगता है कभी कभी ...

दुःख सदैव चलता है
खुशी के संग-संग ही 
इसलिए तो कहते हैं
कि दुःख के पीछे आता है सुख

कभी-कभी सुख से पहले ही
पहुँच जाता दुःख
और काबिज़ हो जाता
उसकी जगह!
***


गुज़रा वक़्त

इन दिनों 
न खुला आसमान 
न हँसी धरती

मैं रात का हिसाब लेकर कहा जाऊँ
कि आँखों में हो चुका है अमर सावन

सोचती हूँ 
तुम्हें पाना
गये वक्त को वापस लाना।
***


मुट्ठी भर धूप

जब कभी उम्मीदों का सूरज
ढलने लगता है
ग़लतफ़हमी के बादलों के पीछे

खोलती हूँ पुराने खत
जिसमें बंद पड़ीं हैं किरणें
आशाओं की!

मुट्ठी भर धूप
साँस लेने भर हवा
जीवन को महकाती खुशबू!

मुड़े कागज़ के तहों को खोलते
बिखर जाती है अनायास की हँसी
हया से दबी-दबी मुस्कराहटें

आखर-आखर से बरसने लगता है
प्रीत का बीता पल
बूँद-बूँद फिर भर उठता है
मायूसियों से रीता मन

यादों की तितलियाँ
उड़-उड़ के बैठने लगती हैं
एहसासों के मुरझाते पुष्पों पर
उनके रंग बिरंगे पंखों की छुअन से
फिर हरिहरा जाता है मन-उपवन!
***

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।