बिहार की महिला ग़ज़लकारों का साहित्यिक योगदान

आरती कुमारी

आरती कुमारी


भारतीय साहित्य में ग़ज़ल एक ऐसी काव्यविधा है जिसका आगमन भारत- ईरान के सांस्कृतिक आदान प्रदान के क्रम में हुआ। फ़ारसी ने इसे पाल पोसकर बड़ा किया और उर्दू ने इसकी अभिव्यक्ति को और निखारा। आज यह विधा हिंदी-उर्दू दोनों ही भाषाओं में अत्यंत लोकप्रिय है। यह अपने भाव को अपनी भाषा, उपमाओं और प्रतीकों से अभिव्यक्त करने की कला है। यह संक्षिप्त स्वरूप में विचारों का एक महासागर है जो बड़ी से बड़ी गूढ़ बात को एक शेर में कह डालने का सामर्थ्य रखती है।
 
भारतीय साहित्य में स्त्री लेखन की एक लंबी परंपरा रही है। भक्तिकाल से लेकर आधुनिक साहित्य तक में स्त्री लेखन ने हर विधा में अपनी महत्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज की है। बदलते वक़्त के साथ अन्य विधाओं की तरह ही ग़ज़लों में भी विषयों का वैविध्य आता गया। वह अपनी कहन के साथ- साथ जनमानस की वेदना को भी अपने अंदर समोती गयी। अब ग़ज़ल मेहंदी के हाथों से निकलकर स्त्री चेतना के हाथों में थमी मशाल बन गयी है। वह भाषा के भोजपत्र पर लिखी ज़िन्दगी का तजुर्बा बन गयी है जिसमें अजाने क्षितिजों को स्पर्श करने की उद्दाम अकुलाहट साफ़ परिलक्षित होती है।

बिहार की महिला ग़ज़लकार भी ग़ज़ल के बदलते स्वरूप के साथ हर पहलू पर अपनी बात रखती आईं हैं। उन्होंने ग़ज़ल के परंपरावादी विषयों से आगे बढ़कर वर्तमान से जुड़ने की सफल कोशिश की है। उन्होंने अपने अंतर्मन की व्यथा, अपनी अस्मिता और स्त्री जाति के संघर्ष और निज अनुभवों के साथ- साथ जीवन की विसंगतियों, विरोध , अत्याचार, शोषण, असमानता , सियासी दांव -पेंच और मानवता पर मंडरा रहे ख़तरों पर अपनी धारदार क़लम चलाई है।  साथ ही धैर्य, समर्पण, प्रेम आदि जीवन मूल्यों की बातों को भी अपने शेरों में बख़ूबी ढाला है।

औरतों को जन्म से ही बंदिशों में रखा गया है और उन्हें रीति -रिवाजों की दुहाई देकर जकड़ा जाता रहा है। वे घर परिवार से लेकर बाहर तक की ज़िम्मेदारियों को भी बख़ूबी निभा पाने का  सामर्थ्य रखती हैं। फिर भी समाज उनके अस्तित्व को और उनकी आज़ादी को स्वीकार नहीं कर पा रहा है। चंद अशआर देखें-

उन्हें भाती है ग़म को आँसुओं में घोलती औरत
भला भाती नहीं आख़िर उन्हें क्यों बोलती औरत
-अभिलाषा कुमारी

ज़ब्त कर सीने में लाखों हसरतें और ख़्वाहिशें
क़ब्र  में  रस्मों  रिवाजों की मैं दफ़नाई  गई 
-नीलम श्रीवास्तव

वो एक दिन जिसे कहते हैं आप आज़ादी
वो मेरी ज़ात को अब तक अता हुई भी नहीं 
-चाँदनी पांडेय

अपने प्रेम और समर्पण से जिस प्रकार सुबह की पहली किरण से लेकर आधी रात तक वे अपने घर को, अपने बच्चों को और परिवार के अन्य सदस्यों को अपने हिस्से का भी वक़्त दे देती हैं, उन्हें आदर और सम्मान उस तरह नहीं मिल पाता। ऐसे में वे अनायास ही बोल पड़ती हैं- 

वो जिस चराग़ के दम से मकान रोशन था
उसी चराग़ को ख़ुद अपनी रौशनी न मिली
-चाँदनी पांडेय

सबकी  ख़ुशियों में ढूँढें अपनी ख़ुशियाँ
फिर उसकी आँखों में पानी आख़िर क्यों
-रीता सिवानी

लंबी लंबी रातें भी दिन में शामिल हो जाती हैं
काम अधूरा रह जाता है पड़ जाता है छोटा दिन
- सदफ़ इक़बाल

यूँ ही हँस के निबाह करना है
चाहे थक जाए ये नज़र फिर भी
-उर्मिला माधव

हारे थके परिंदे जाने अपने घर कब लौटेंगे
शाख़ों पर बेचैन सी बैठी रस्ता देखे माई है
-आस्था दीपाली

मेरी किताब में मेरी ही ज़िन्दगी थी मगर
मेरा ही नाम सरे दास्ताँ कहीं नहीं था
-हिना रिज़वी हैदर

हालांकि समाज में बेटे- बेटियों के लिए समान क़ानून बने हैं और उन्हें बराबरी का दर्ज़ा देने की भरसक बातें होती रहती हैं फिर भी पुरुषप्रधान समाज में अब भी असमानताएं दिखती हैं। ये अशआर समकालीन परिस्थितियों पर कटाक्ष करते हैं और सुषुप्त चेतना को झकझोर कर जगा देने में भी पूर्ण समर्थ प्रतीत होते हैं।

अपनी पीरी की लाठी हैं बेटे अगर 
ये भी सच है कि नूर-ए-नज़र बेटियाँ
-शमा नासमीन नाजां

जब भी दरिया के पास जाऊंगी
प्यास का मस'अला उठाऊंगी
-कौसर होसाम

रात अब भी हमें दुश्मन की तरह मिलती है 
हम सवेरे के तरफ़दार हुआ करते थे 
-तलअत परवीन

आज के दौर की ग़ज़लें इश्क़ और ख़्याली बातों से ऊपर उठकर वर्तमान से मुठभेड़ करती नज़र आती हैं। इन ग़ज़लों में समसामयिक युगबोध की दृष्टि स्पष्ट झलकती है। जहाँ एक ओर इनमें प्रकृति और पर्यावरण की चिंता विद्यमान है, वहीं दूसरी ओर ये आम आदमी की पीड़ा को रूपायित करती हैं और परिवेशजन्य विद्रूपताओं के प्रति एक प्रश्नचिन्ह सा लगाती हैं। ये हाशिये पर खड़े आदमी की वकालत करते हुए उसकी सुविधाओं की माँग भी करती हैं।

पल में मिट जाएगा ये सूनापन
डाल  दो, चार दाने आँगन में
-आरती कुमारी

हर रोज़ है बदलती सियासत भी रूप को
मुफ़लिस है आज कितना परेशान पूछिए
- चाँदनी समर

मेहनतकश क्योंकर हैं भूखे
मन यह प्रश्न टटोलेगा अब
-पूनम सिन्हा श्रेयसी

लूट क्यों होने लगी है इस वबा के दौर में,
मुस्तहक़ हैं जो सभी उनको दवा भी चाहिए
- नूतन सिंह

अनेक समाजों में सदियों से स्त्री को दोयम दर्ज़े का समझा जाता रहा है। लड़ाई चाहे वर्चस्व की हो, सियासी हो या फिर घरेलू ही क्यों न हो,  उनके बीच स्त्रियाँ ही रौंदी-कुचली जाती रही हैं । आजकल तो यह इतना हिंसक और वीभत्स रूप ले चुका है कि इनकी ये चिंताएँ वाजिब हैं।

चला न ख़ारों पे कुछ बस तो गुल मसल डाले
निकल  रही  है अब  ऐसे  भड़ास  लोगों की
-हिना रिज़वी हैदर

फिर भी समाज में व्याप्त अत्याचार और शोषण के विरुद्ध आवाज़ उठाने वाले लोगों की कमी नहीं है जो विरोध करने का साहस रखते हैं। किंतु वे हालात के वशीभूत हो नक्सल बन जाते हैं।

जब बहू बेटी की इज़्ज़त सामने लुटने लगी
तंग आकर एक दिन आखि़र वो नक्सल हो गया 
-नजमा नाहिद अंसारी

महिलाएँ यह जानती हैं कि वक़्त एक सा नहीं रहता। बुरे वक़्त को सब्र के साथ गुज़ार देना ही अक़्लमंदी है। प्रकृति ने स्त्रियों को ममता करुणा और सहनशक्ति जैसे गुणों से संवारा है। वे दिखावे की दुनिया से दूर अपनी मेहनत और धैर्य से ही अपने दिल के अंदर सुकून तलाश लेती हैं।

चुप रहो बैठो ये हालात बदल जाने दो 
वक़्त के साथ ख़यालात बदल जाने दो
-कमला सिंह ज़ीनत

ऊपर-ऊपर ख़्वाब सा मंज़र होता है
मीठा  पानी  रेत के  अंदर  होता है
-मंजुला उपाध्याय 'मंजुल'

लहजे पे अपने सब्र का पानी मैं डाल दूँ
दामन तेरा न छू ले ये शोला अलाव का 
-नूतन सिंह

जीवन अपने आप में अनुभवों का, विचारधाराओं का, अपनी समृद्धि, परिमार्जन और नवीकरण का अतुल भंडार होता है। वह यथार्थ का आइना होता है जहाँ ख़्वाबों के महल ज़्यादा देर टिक नहीं पाते। ज़िंदगी जितना रुलाती है उतनी ख़ुशियाँ भी लेकर आती है, ज़रूरत है ज़िन्दगी को समझने की और उसको अपनाने की। 

ज़िंदगी मुझसे तू गले तो मिल
ऐसी नाराज़गी भला क्यूँ है
- आस्था दीपाली

भले हो मुख़्तसर ये ज़िंदगानी 
मगर ऊँचा ख़ुदा किरदार कर दे
-ज्योति मिश्रा

बनते नहीं मकान ख़यालों से अब यहाँ
पत्थर सी सख़्त एक हक़ीक़त है ज़िंदगी
-शांति जैन

प्रेम की भाषा को रब की भाषा मानकर वे प्रेम के संदेश दे रही हैं। इन अशआर में तग़ज़्ज़ुल और रवानी के साथ ही ज़िंदगी को देखने का एक ख़ास नज़रिया भी है।

इक लम्स ही बहुत है मुहब्बत की राह में 
टकरा गया जो पाँव से पत्थर सँवर गया
-तलअत परवीन

इश्क़ को आप बुरा कहते हैं, कहते रहिये
रब को मैंने तो इसी लफ़्ज़ से पहचाना था
-हिना रिज़वी हैदर

अपनी छोटी सी ज़िन्दगी में अपनी अस्मिता के लिए लंबा संघर्ष करती ये औरतें सकारात्मकता से भरपूर हैं। अपने धैर्य और हौसलों के दम पे वे आज ज़िंदगी के कड़वे अनुभवों के विष को भी पीकर प्रेम की मिठास ही घोल रही हैं और बाधाओं से आँख मिलाकर मुस्कुराते हुए उनके समाधान निकाल रही हैं। 

जानती हैं कैसे हल निकलेंगे इन बाधाओं के
धैर्य के जादू से फूँकें प्रेम मंतर लड़कियाँ
-आरती कुमारी

माना सफ़र में पेश थीं दुश्वारियाँ बहुत
पैरों में छाले पड़ गए अपने, मगर गए
-ज़ीनत शेख़

दम-ब-दम इम्तिहान देते हुए
पूरा करना ही है सफ़र फिर भी
-उर्मिला माधव

जुड़ती हैं, टूटती हैं, निशाने पे हैं सदा 
हर गाम इम्तिहान में रहती हैं औरतें
-कविता विकास

चंदन की सोहबतों में रहा नाग बेअसर
खु़शबू से तर-ब-तर, वो हलाहल से तर-ब-तर
-नजमा नाहिद अंसारी

मैंने दरवाज़े सभी खोल रखे तेरे लिए
तू भी मेरे लिए इक तंग सा रस्ता रख दे
-तलअत परवीन

हमें लहरों को मुट्ठी में जकड़ना ख़ूब आता है
हमें देखा है दुनिया ने समंदर के उफ़ानों में
-रंजिता सिंह 'फ़लक'

आज बिहार की हिंदी-उर्दू अदब की समकालीन महिला ग़ज़लकारों में अनिता सिंह, मंजुला उपाध्याय, उर्मिला माधव, हिना रिज़वी हैदर, कमला सिंह 'ज़ीनत', तलअत परवीन, नूतन सिंह आदि के नाम प्रमुख हैं तो वहीं आस्था दीपाली, सौम्या सलोनी 'हीर' आदि उभरती ग़ज़लगो भी अपनी प्रतिभा से अपना एक मुक़ाम बना रही हैं। अपनी शायरी के फ़न से लबरेज़ इनकी ग़ज़लें पत्र -पत्रिकाओं से लेकर नशिष्तों और अदबी महफ़िलों में भी पढ़ी-सुनी और सराही जाती हैं। ग़ज़ल के समृद्ध साहित्य में बिहार की इन महिला ग़ज़लकारों के योगदान को सदैव याद रखा जाएगा।

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