गणतंत्र, राष्ट्रीय सम्मान महोत्सव है

- विनोद नायक

आजादी, स्वतंत्रता मात्र शब्द नही ये भारतीयों के प्राणों के तुल्य थे। अनगिनत लाशें मातृभूमि अपनी गोद में लेकर लहू के आँसू बहा रही थी तो कालकोठरी में बंद देशभक्तों के हाथ-पैर जंझीरों से जकड़े थे। पेट भूख की तो पीठ कोड़े की मार से चिपक कर एक हड्डियों का ढाँचा भर रह गये थे। माँ-बहनों के आजादी के नारे लगाने मात्र से उनकी अस्मिता कुत्तों की भाँति नोची जा रही थी। दर्द यही नही था। संस्कार व धर्म के दीपक बुझा दिये गये थे। कला व संस्कृति की सीढ़ियाँ तोड़ दी गईं थी। गरीबी नगे बदन पूरे भारत में भिक्षुक की भाँति खड़ी थी।

कठिन चुनौतियों का दृढ़ साहस से मुकाबला कर भारतीयों ने फिरंगियों को देश आजाद करने के लिए बाध्य कर ही दिया। अन्याय को न्याय के समक्ष नतमस्तक होना ही पड़ता है। अन्याय का एक दिन अंत होता ही है।

200 वर्षों तक सोने की चिड़िया पर राज करने वाले अंग्रेज़ों ने चिड़िया का सोना तो लूटा ही साथ ही साथ चिड़िया को घायल अवस्था में 200 वर्षों तक कैद करके भी रखा। दीपक बुझते समय एक बार अवश्य भभकता है। चिड़िया मरने से पहले एक बार अवश्य फड़फड़ाती है। यही भारतीयों का करो या मरो का भभकना व फड़फड़ाना था। जिसने आजादी की आग पूरे भारत में लगा दी। जिसने फड़फड़ाकर जीवन जीने की लालसा पूरे भारत में भर दी और फिरंगियों को मजबूर कर दिया चिड़िया को पुनः चहचहाने के लिए। पुनः आकाश में उड़ान भरने के लिए। पुनः अपना घोंसला बनाने के लिए। यही वह शुभ दिन था जब अंग्रेज़ों ने भारत को स्वतंत्र करने की घोषणा की। हाँ यह शुभ दिन था 15 अगस्त 1947 का। भारतीयों के लिए एक नवीन सूरज उदय हुआ था। धरा से लेकर गगन तक हर्षित थे। सदियों की जकड़ी बेड़ियाँ टूट गईं थीं। चिड़िया ने फिर उड़ान भरने के लिए पंख फैला लिए थे।

अब चुनौती थी देश को कैसे प्रगति के पथ पर अग्रसर किया जाये। आखिर कौन से नियम बनाये जायें। जिस से देश उन्नति के शिखर पर जा पहुँचे। इसके लिए स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पण्डित जवाहरलाल नेहरू ने देश में लोकतंत्र लागू करने हेतु संविधान निर्माण का निर्णय लिया। लोकतंत्र अर्थात जनता द्वारा, जनता के लिए, जनता का शासन। प्रथम कानून मंत्री डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर को प्रारूप समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। क्योंकि आप कानूनमंत्री थे। प्रारूप समिति में अध्यक्ष सहित सात सदस्य थे। अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर, कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी, मोहम्मद सादुल्ला, एन गोपालस्वामी अय्यंगर, बी. एल. मिटर व डी. पी. खेतान। आप सभी के विचार मंथन व सहयोग से संविधान का खाका बुनना प्रारंभ हुआ।

संविधान सभा का गठन 6 दिसम्बर 1946 को हुआ। इसके तहत संविधान निर्माण की समिति बनी। जिसे ड्रॉफ्ट कमेटी भी कहा जाता था।

कर्नाटक के विधिवेत्ता बेनेगल नरसिम्हा राव को विधि सलाहकार का पद देकर संविधान प्रारूप पर काम करने के लिए 1946 में जिम्मेदारी सौंपी गई। इससे पहले आप 1910 में भारतीय सिविल सेवा में चयनित हुए थे। जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरिसिंह ने 1944 में बेनेगल नरसिम्हा राव को राज्य का प्रधानमंत्री नियुक्त किया था। आपको ही संविधान का मूल प्रारूप तैयार करने का कार्य सौंपा गया। आपने 1945 से 1948 तक अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन आदि देशों की यात्रा कर वहाँ के संविधान का अध्ययन किया। इसके बाद आपने 395 अनुच्छेद का संविधान पहला प्रारूप संविधान प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ भीमराव आंबेडकर के समक्ष प्रस्तुत किया।

प्रारूप समिति की बैठक में कहा गया कि- सलाहकार बी.एन. राव द्वारा तैयार प्रारूप पर विचार कर इसे संविधान सभा में पारित किया जाए। संविधान सभा ने संविधान का अंतिम प्रारूप प्रस्तुत करते हुए 26 नवंबर 1949 को पारित किया। संविधान के निर्माण में 2 वर्ष 11 महीने 18 दिन का समय लगा। संविधान सभा में विचार मंथन हेतु अनेकों बार प्रस्ताव रखे गये। तब कहीं जाकर संविधान का निर्माण हुआ।

प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद, प्रथम प्रधानमंत्री पण्डित जवाहरलाल नेहरू, प्रथम उपप्रधानमंत्री सरदार बल्लभभाई पटेल, डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन, मौलाना अबुल कलाम आजाद व जयराम सिंह ने अपने विचारों और मतों से संविधान को और अधिक समृद्ध व भारतीय संस्कृति के अनुरूप ढालने में अहम योगदान दिया।
इस संविधान में 395 अनुच्छेद, 22 भाग व 12 अनुसूचियाँ समाहित थीं।

संविधान की मूल प्रति हिन्दी व अंग्रेजी भाषा में लिखी गई। प्रमुख महत्वपूर्ण बात यह है कि संविधान की मूल प्रति हाथों से लिखी गई। इसे प्रेमबिहारी रायजादा ने लिखा। रायजादा ने पेन होल्डर की निब से संविधान के प्रत्येक पृष्ठ को बहुत ही सुंदर इटैलिक अक्षर में लिखा है। संविधान में लिखे अक्षर (सुलेखन) इतिहास बन गये। सुलेखन अर्थात कैलीग्राफी रायजादा की पारिवारिक रूचि थी। ये लेखन उनकी कठिन परिश्रम और दृढ़ आत्मविश्वास से ही संभव हो पाया।

26 नवंबर 1949 को संविधान सर्वसम्मति से पारित कर दिया गया परंतु इसे लागू करने हेतु प्रधम उपप्रधानमंत्री व गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल की एक सलाह से लागू करने की दिनाँक निश्चित की गई। चूँकि संविधान 26 तारीख़ को बनकर पारित किया गया था। अत: सर्वसम्मति से दिनाँक 26 तारीख तो तय कर दी गई परंतु माह कौन-सा हो? 26 दिसंबर अर्थात वर्ष का अंतिम माह साथ ही साथ 25 को क्रिसमस पर्व इसलिए पटेल साहब ने 26 जनवरी 1950 का दिन संविधान सभा को विचार करने हेतु सुझाया। संविधान सभा के आग्रह पर भारत के नागरिकों ने 26 जनवरी 1950 के दिन संविधान को पूर्ण निष्ठा से अंगीकार किया।

मनुष्य बिना नियम के पशु समान है। संविधान से ही भारतीय नागरिकों को विभिन्न मौलिक अधिकार प्राप्त हुए तो वहीं कानूनों से अपने जीवन को संवरना के पर्याप्‍त अवसर भी मिले। हम संविधान के प्रति श्रद्धा व विश्वास रखें। संविधान का अनुशरण करें। जिससे भारत देश को एक बार पुन: सोने की चिड़िया बनाया जा सके। हमारे पास जीवन जीने हेतु अधिकार हैं लेकिन दूसरों को जीने के अधिकार भी दें। पशु-पक्षियों से प्रेम करें। जल का सद्उपयोग व शुद्ध बनाये रखें। ईधन-ऊर्जा का भंडार सीमित है अत: ईधन का अपव्यय ठीक नही। स्वच्छता मानव की गरिमा है। वरिष्ठजन व नारी का सम्मान करें। शांति और चरित्र निर्माण हमारी संस्कृति है। अतएव संविधान का राष्ट्रीय पर्व गणतंत्र दिवस ऐसा मनाया जाये कि - जन-जन के लिए हितकर व विश्वपटल पर भारत का मान बढ़ानेवाला हो। गणतंत्र मात्र राष्ट्रीय पर्व नही बल्कि देश के प्रत्येक नागरिक का राष्ट्रीय सम्मान महोत्सव भी है।

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