कहानी: शीतयुद्ध

विजय कुमार संदेश

प्राध्यापक, पी.जी. हिन्दी विभाग, मार्खम कॉलेज, हजारीबाग, झारखंड,भारत
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    विजय कुमार संदेश
शांत, स्निग्ध और हरियाली से अच्छादित खेड़, महाराष्ट्र के दूरस्थ पहाड़ों-जंगलों से घिरा तहसील है। यह फिल्म नगरी मुंबई से लगभग 160 किलोमीटर दूर है। अजेय खेड़ के एक स्थानीय महाविद्यालय के एक कार्यक्रम में शामिल होने गया था। प्रोफ़ेसर विद्या शिंदे जी का विशेष अनुरोध था। हरी-भरी पठारी धरती और स्ट्राबेरी के लिए मशहूर खेड़ एक छोटा-सा कस्बानुमा विरल आबादीवाला शहर है। अजेय ने खेड़ से लौटते हुए सह्याद्रि की श्रेणियों के बीच अवस्थित पर्यटन के लिए ख्यात महाबलेश्वर जाने की इच्छा व्यक्त की तो साथ में चल रहे अनिल सिंह ने कार को दिशा महाबलेश्वर की ओर मोड़ दिया और थोड़े समय के अंतराल में ही वे पहुँच गये महाबलेश्वर। अनिल सिंह जी अजेय के पुराने मित्र हैं और मुंबई के एक कॉलेज में प्रोफेसर हैं। वे भी उस कार्यक्रम में शामिल होने आये थे। महाबलेश्वर महाराष्ट्र का एक प्रसिद्ध सैरगाह है जो मुंबई से दक्षिण-पूर्व और प्रख्यात सतारा नगर के पश्चिम-उत्तर में स्थित है, जहाँ महाबलेश्वर से कोंकण क्षेत्र का मनोरम दृश्य देखा जा सकता है। अपनी अद्भुत संुदरता के कारण महाबलेश्वर महाराष्ट्र राज्य के हिल स्टेशनों में ‘पहाड़ों की रानी’ के रूप में आज भी जाना जाता ख्यात है। अजेय ने इसका खूब नाम सुन रखा था। अतः अपने मित्र अनिल सिंह के साथ पहुँच गया महाबलेश्वर। महाबलेश्वर के एक शिखर ‘हाथी मस्तक’ से दूर-दूर तक फैले पहाड़ी रेंज ने उन दोनों को काफी प्रभावित किया। अभी मौसम अनुकूल नहीं था। दो दिनों से लगातार हल्की बारिश हो रही थी, उसके बावजूद देश-विदेश के हजारों पर्यटक मौजूद थे। सच तो यह है कि प्रकृति ने महाबलेश्वर को पहाड़ों, नदियों, हरियाली और दौड़ते बादलों की बेपनाह खूबसूरती से विशेष रूप से संवारा है। नैसर्गिक सुंदरता और रोमांचक दृश्यों के संगम के कारण यह रोमांचक अनुभव देता है। सुहाना मौसम, सह्याद्रि घाट की ढलान और फिर तटीय कोंकण के सपाट मैदान ने भी अजेय और अनिल को काफी लुभाया। महाबलेश्वर वाया मुंबई से लौटते हुए सुबह-सुबह भुसावल स्टेशन पर समय बिताने की नीयत से उसने एक अखबार खरीदा और पढ़ते हुए एक छोटे से न्यूज पर उसकी दृष्टि टिक गयी। लिखा था- प्रोफेसर धीरेश्वर प्रसाद नहीं रहे। अजेय जब एम॰ए॰ का छात्र था तब धीरेश्वर प्रसाद उस विश्वविद्यालय के प्रोफेसर थे, जहाँ वह अध्ययनरत था। विश्वविद्यालय के लोकप्रिय शिक्षकों में धीरेश्वर प्रसाद की गिनती होती थी पर उनकी लोकप्रियता का कारण उनकी विद्वता नहीं बल्कि रटे-रटाये वे नोट्स थे, जिसे वह क्लास नोट्स के रूप में लिखवाया करते थे।
अखबार की इस छोटी-सी सूचना ने अजेय को उसके अतीत में दस-बीस वर्ष पूर्व की स्मृतियों के अथाह सागर में गोते लगाने के लिए धकेल दिया और एकाएक स्मृतियों के कई छोटे-छोटे बादल एक साथ उसकी आँखों के सामने मंडराने लगे। अजेय को वे दिन ठीक से याद हैं जब विभाग में प्रोफेसर धीरेश्वर प्रसाद और प्रोफेसर आशुतोष लाल के बीच शीत-युद्ध जैसी स्थिति थी। दोनों के मध्य का यह शीतयुद्ध एक प्रकार का तनावयुद्ध था जो परस्पर प्रतिद्वन्द्विता और उससे उपजे तनाव तक सीमित था। दोनों के बीच कभी भी आपसी रंजिश और वाक्-युद्ध करते हुए किसी ने नहीं देखा। बस, अपना-अपना वर्चस्व कायम रखने के लिए कभी कूटनैतिक तो कभी वैचारिक द्वन्द्व वे करते रहे। अजेय ने यह सुन रखा था कि दोनों के बीच शीतयुद्ध की यह स्थिति उन दिनों से रही है, जब दोनों एक ही विश्वविद्यालय में सहपाठी थे और स्नातकोत्तर में सर्वश्रेष्ठ होने के लिए एक-दूसरे के हाथ से बाजी खींच लेने के लिए संघर्षरत थे। खैर, आशुतोष लाल ने यह बाजी जीत ली थी और धीरेश्वर प्रसाद अथक प्रयास और तमाम तिकड़मों के बावजूद दूसरे स्थान पर रहे थे। यह संयोग था कि समय के अंतराल में दोनों एक ही विश्वविद्यालय में शिक्षक नियुक्त हुए तो कभी वरीयता और कभी प्रोन्नति को लेकर उनके बीच शीतयुद्ध की स्थिति बनी रह गयी। अजेय जानता था कि शीतयुद्ध जितना राजनैतिक होता है उतना ही वह वैयक्तिक भी होता है। दो देशों के बीच राजनीति में और इसी तरह दो लोगों के बीच मनमुटाव, वैमनस्य, तनाव, निजी खुन्नस या द्वन्द्व की स्थिति ही शीतयुद्ध की स्थिति होती है। शीतयुद्ध में दो पक्षों के बीच आमने-सामने की टकराहट कभी नहीं होती। किन्तु, दोनों पक्ष हमेशा ऐसा वातावरण बनाकर रखते हैं कि उसका घातक परिणाम उनके हितैषियों-पक्षकारों को झेलना पड़ता है। धीरेश्वर प्रसाद और आशुतोष लाल के बीच कुछ ऐसा ही शीतयुद्ध था। दोनों के जो आपसी वैचारिक द्वन्द्व थे, उसमें विभाग के लोग दो खेमों में बँटे हुए थे। शिक्षा-प्रेमी और वैचारिक शुचिता के हिमायती शिक्षक और छात्र प्रोफेसर आशुतोष लाल के साथ थे तो कुछ काइयां किस्म के मुट्ठी भर लोग धीरेश्वर प्रसाद के साथ थे। ये सभी काइयां टाईप लोग आशुतोष लाल की विद्वता और इस कारण उनकी लोकप्रियता से ईर्ष्या करते थे।
इन्हीं दिनों विभाग में एक बड़ा बदलाव हुआ। विश्वविद्यालय सेवा आयोग से प्रोफेसर कमलकांत कुमार विभाग के नए आचार्य सह अध्यक्ष नियुक्त होकर आये। यह पद लंबे समय से रिक्त था और कामचलाऊ व्यवस्था के तहत प्रोफेसर जीतनारायण मंडल आसीन थे। धीरेश्वर प्रसाद अपनी वक्रगामी दृष्टि से लंबे समय से इस पद पर बैठने का सपना तो संजाये हुए ही थे, लोलुप-दृष्टि भी गड़ाये हुए थे। प्रोफेसर कमलकांत कुमार के इस पद पर आ जाने से उनकी अतृप्त आशाओं पर जैसे हिमपात-सा हो गया। काइयां दृष्टि, अवसरवादी प्रवृति और खुशामदी स्वभाव का होने के कारण वे प्रोफेसर कुमार की सेवा-टहल में तो रहते, लेकिन इस ताक में भी रहते, थे कि किसी तरह उनकी कुर्सी हिला दी जाये। इसमें संदेह नहीं कि अवसरवाद घातक प्रहार का अचूक अस्त्र है और धीरेश्वर प्रसाद उसके माहिर खिलाड़ी थे। उनके हर कदम, हर चाल में यह प्रयास रहता था कि प्रोफेसर कमलकांत कुमार को येन-केन-प्रकारेण अपदस्थ करवा दिया जाये, अंततः वे उस पद पर आरूढ़ हो जायें। ‘तू डाल-डाल, तो मैं पात-पात’ जैसी कहावतों पर धीरेश्वर प्रसाद को बड़ा विश्वास था। अवसरवादी और धूर्त व्यक्ति के चरित्र में गोपनीयता दूध-पानी की तरह घुली-मिली होती है और यह गुण धीरेश्वर प्रसाद के निजी वैशिष्ट्य का अभिन्न अंग था।
धीरेश्वर प्रसाद के जानने वालों का मानना था कि उनके हृदय रूपी खोह में एक शैतान बसता है। जब जरुरत होती है बड़ी चालाकी से वे खोह के उस शैतान का बखूबी उपयोग अपने विरोधियों, प्रतिद्वन्द्वियों के विरुद्ध कर लेते हैं। उनका यह ‘खोही शैतान’ अपने जहरीले नखदंतों के साथ खोह से तभी बाहर आता था, जब श्री प्रसाद को अपने किसी प्रतिद्वन्द्वी को शांत करना या कराना होता था। उनके लिए विश्वासघात को वे बुरा नहीं मानते थे क्योंकि उनकी दृष्टि में विश्वासघात उनके लिए एक उद्जन बम की तरह काम करता था। एक ही प्रहार में प्रतिद्वन्द्वी चित्त और ध्वस्त। विश्वासघात रूपी यह घातक अस्त्र एक लाभप्रद सौदे की तरह था। रट्टू होने के कारण उनके क्लास नोट्स बीते बीस-पच्चीस वर्षों से एक जैसे थे। अर्ध-विराम या पूर्ण-विराम का भी अंतर नहीं। धीरेश्वर प्रसाद के विपरीत थे- आशुतोष लाल। वे अध्ययनशील और मौलिक प्रतिभा के धनी थे। स्वभाव से मस्तमौला और पान खाने के शौकीन। किसी भी विषय या प्रसंग पर, चाहे वह प्रसंग विज्ञान का हो, वाणिज्य का हो या हो कला संकाय के किसी विषय का, वे कम से कम घंटे भर बिना व्यवधान के बोल सकते थे। व्याख्यान भी इतना प्रभावी और विद्वतापूर्ण होता था कि किसी क्लास-रूम में व्याख्यान हो रहा हो या कि सभा-कक्ष में, पूरा हॉल शांत और दत्त-चित्त रहता था। व्याख्यान सुननेवालों को हमेशा यह प्रतीति होती रहती थी कि जैसे किसी ऋषि परंपरा के आचार्य का प्रवचन चल रहा हो। कोई माँ जैसे अपने बच्चों को भोजन परोसते समय केवल भोजन नहीं परोसती बल्कि अपना आत्मविश्वाास और प्रेम भी परोसती है, वैसे ही प्रोफेसर आशुतोष लाल अपने सुननेवालों को ज्ञान और साहित्य का मर्म परोसते थे। ईश्वर की ओर से उन्हें यह जन्मजात प्रतिभा मिली थी। ईश्वर क्या चाहते थे कह नहीं सकता पर, प्रोफेसर प्रसाद और प्रोफेसर आशुतोष लाल ताउम्र एक-दूसरे के प्रतिद्वन्द्वी बनकर रहे और ताउम्र दोनों के बीच शीतयुद्ध चलता रहा।
अजेय स्नातकोत्तर में इन दोनों शिक्षकों का छात्र था। स्नातकोत्तर की परीक्षा में अजेय के प्रथम श्रेणी में प्रथम आने के बाद धीरेश्वर प्रसाद ने बुलाकर कहा था कि अजेय! तुम मेरे साथ पीएच॰डी॰ के लिए रजिस्टर्ड हो जाना। इसी तरह आशुतोष लाल ने भी प्रस्ताव दिया था कि यदि आप पीएच॰डी॰ करना चाहें तो मेरे साथ पंजीकृत हो सकते हैं। अजेय के लिए ये प्रस्ताव दुविधाजनक थे। कई महीनों तक वह इस ऊहा-पोह में रहा कि वह पीएच॰डी॰ के लिए किनके साथ पंजीकृत हो। अंततः उसने प्रोफेसर आशुतोष लाल के साथ पंजीकृत होने का निर्णय लिया और एकदिन उनके साथ पंजीकृत भी हो गया। अजेय के इस कदम से धीरेश्वर प्रसाद खीझ गए। कहा उन्होंने कुछ नहीं पर अपनी टेढ़ी नजरों में चढ़ा लिया। खोह के शैतान ने प्रोफेसर धीरेश्वर प्रसाद के मंसूबे को समझ लिया और अवसर की प्रतीक्षा करने लगा। ऐसा केवल अजेय के साथ ही नहीं हुआ बल्कि प्रोफेसर आशुतोष लाल के अधीन पंजीकृत सभी शोध-छात्रों, प्रशंसकों के साथ हुआ। इसका खामियाजा भी इन शोध छात्रों को झेलना पड़ा। शीतयुद्ध का दुष्प्रभाव प्रकट और अप्रकट रूप में इन सभी पर पड़ा और प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष धीरेश्वर प्रसाद ने चुन-चुन कर अपना हिसाब चुकता किया।
अजेय ने उस दिन अनुभव किया कि धीरेश्वर प्रसाद के अंतर के खोह में बैठा शैतान अब कुलबुलाने लगा है और किसी भी विरोधी पक्ष जो धीरेश्वर प्रसाद के खेमे में शामिल नहीं हैं, जद में लेने के लिए तैयार बैठा है। धीरेश्वर प्रसाद ने विभाग के कुछ उग्र छात्रों का एक उपद्रवी दल गुप-चुप तरीके से बनाकर रखा था तथा पार्श्व में रहकर सूत्रधार की तरह उसका उपयोग वे जब तब करते रहते थे, यानी पतंग आकाश में और डोर उनके हाथ में। अजेय के सामने आज वे स्मृतियाँ बार-बार लौटकर आ-जा रही हैं। स्मृतियों के संसार का एक बुलबुला पलक झपकते उसके सामने आया। उसने देखा कि प्रोफेसर धीरेश्वर प्रसाद के संकेत पर खोही-शैतान अब अपने खोह से बाहर आ गया है और उसके बुने मकड़जाल में प्रोफेसर कमलकांत कुमार बुरी तरह फंसते और उलझते जा रहे हैं। खोही-शैतान की शैतानी हरकतें और उपद्रवी तत्वों ने उन्हें लगातार घेरना और तनाव देना शुरु कर दिया है। परिणामस्वरूप विभागीय परिसर तनाव, छल-प्रपंच और उपद्रव के गढ़ के रूप में तब्दील होता जा रहा है। छात्राएँ संशय और संदेह की दृष्टि से लगातार अनचीन्हें लोगों को देखने लगी हैं और सीधे-शांत छात्र मूक-दर्शक बन कर रह गए हैं। परिसर पूरी तरह डिस्टर्ब है और धीरेश्वर प्रसाद के भाड़े के टट्टुओं ने ऐसा आतंक और भ्रमजाल फैलाया कि प्रोफेसर कमलकांत कुमार अपना तनाव दूर करने के लिए शराब का सहारा लेने लगे और सहारा भी ऐसा लिया कि वे पूरी तरह शराबी हो गए, चौबीसों घंटे नशे में धुत। इस नशे की लत ने उन्हें बर्बाद कर दिया। नशे की हालत में ही एक महिला शिक्षिका के साथ वे बदसलूकी कर गए। फलतः पहले सस्पेंड और फिर बर्खास्त हो गये। प्रोफेसर धीरेश्वर प्रसाद ने बिना किसी हील-हुज्जत के अध्यक्ष की कुर्सी पर कब्जा कर लिया।
अध्यक्ष की कुर्सी पर विराजमान होते ही धीरेश्वर प्रसाद के अंतर के खोह से फिर शैतान बाहर हुआ। धीरेश्वर प्रसाद की शैतानी ताकत ने दूसरा कदम यह उठाया कि अपने चिर प्रतिद्वन्द्वी प्रोफेसर आशुतोष लाल का स्थानान्तरण विश्वविद्यालय मुख्यालय से बाहर दूर किसी छोटे से शहर के स्नातकोत्तर केन्द्र में करवा दिया, जिससे कि किसी तरह के प्रतिरोध की गुँजाइश ही भविष्य में नहीं रहे। स्वभाव से मस्तमौला प्रोफ़ेसर आशुतोष लाल चले तो गये, पर उनके जाने के बाद उनके शोध छात्रों और प्रशंसकों को धीरेश्वर प्रसाद के खोह से निकले शैतान और उनके उपद्रवी तत्वों द्वारा ढेर सारी यातनाएँ झेलनी पड़ीं।
इन यातनाओं को अजेय ने भी खूब झेला। संघर्ष और ठोकरों के सैकड़ों दृष्टांत उसे आज भी याद हैं। उसे याद है कि विश्वविद्यालय में प्रथम श्रेणी में प्रथम आने के बावजूद उसकी राह में कई नुकीले कील जड़ दिये गये थे। पीएच॰डी॰ की मौखिकी में ही बाह्य परीक्षक के द्वारा कई अटपटे और विषय से बाहर के प्रश्न पूछे गए थे। यद्यपि, अपनी प्रतिभा के बल पर उसने पीएच॰डी की डिग्री हासिल कर ली थी और धीरेश्वर प्रसाद हाथ मलते रह गये थे। अजेय की तरह दर्जनों शोध-छात्र धीरेश्वर प्रसाद के खोही-शैतान के शिकार हुए। वे सभी परेशान अवश्य हुए, पर अंततः सफल भी हुए।
उन्हीं दिनों विश्वविद्यालय में कॉलेज एवं विश्वविद्यालय शिक्षकों की नियुक्ति के लिए अंतर्वीक्षा होनेवाली थी। धीरेश्वर प्रसाद ने जोड़-तोड़ तथा विश्वविद्यालय में अपनी खुशामदी पहुँच के बल पर मौखिकी लेने के लिए आंतरिक परीक्षक के रूप में अपनी जगह सुरक्षित करवा ली। इस क्रम में एक बार फिर खोह से शैतान बाहर निकला और शैतानी ताकत के बूते उन्होंने चुन-चुन कर प्रोफेसर आशुतोष लाल के शोध-छात्रों को बड़ी कुटिलता से किनारे लगा दिया और अपवाद स्वरूप एक-दो को छोड़कर शेष अपने शोध छात्रों को तथा छात्राओं को, जिनमें कई से उनके आत्मिक संबंध भी थे, साक्षात्कार में अपनी ओर से और बाह्य परीक्षक से अनुरोध करके या कहें एक तरह से गिड़गिड़ा करके सफल छात्रों की सूची में शामिल करवा लिया। इस तरह अपने मिशन में वे सफल हो गए। अंतर्वीक्षा की मेधा सूची में पंचानबे फीसदी वे उपद्रवी और लफंगे थे तथा आत्मिक तौर से जुड़ी वे शोध छात्रायें थीं जिनका कई तरह से शोषण धीरेश्वर प्रसाद किया करते थे। मेधा सूची में प्रोफेसर आशुतोष लाल के प्रिय और मेधावी छात्रों का दूर-दूर तक कहीं नाम नहीं था।
धीरेश्वर प्रसाद के इस खुटचाल से प्रोफेसर आशुतोष लाल को धक्का-सा लगा। उन्होंने सपने में भी नही सोचा था कि धीरेश्वर प्रसाद इस तरह की खोटी सोच के होंगे। इतना घृणित काम करेंगे। परिस्थितियों को जानते, समझते हुए इतना उन्होंने अवश्य किया कि अपने उन मेधावी छात्रों को राज्य और राज्य से बाहर किसी न किसी विश्वविद्यालय या कॉलेज में देर-सबेर बहाल करवा दिया। अजेय भी एक कॉलेज में नियुक्त हुआ, पर उसके संघर्ष और ठोकर के दिन अभी खत्म नहीं हुए थे। उसने तय किया कि अपने संघर्ष के अभियान में वह न रुकेगा, न झुकेगा और न चुकेगा। अजेय ने खुद को संयत कर लिया यह सोचकर कि दरवाजे बंद होते कभी नहीं। एक दरवाजा बंद होता है तो दूसरा दरवाजा स्वतः खुल जाता है। वह जानता है कि जहाँ भ्रष्टाचार ही शिष्टाचार हो जाये, वहाँ शिष्टाचार और सत्यपथ के राही को अनेक ठोकरें झेलनी ही पड़ती है।
प्रोफेसर आशुतोष लाल के प्रयास से उन मेधावी छात्रों को कहीं न कहीं जगह मिल जाने से धीरेश्वर प्रसाद चिढ़-से गए थे। उन्हें इस बात का गुमान हो गया था कि खोह से निकले शैतान ने उन्हें जीत दिला दी है। उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन हो या विश्वविद्यालय का कोई पद प्रोफेसर आशुतोष लाल के मेधावी छात्र हाशिये पर जाने लगे और प्रायः लफंगे विभिन्न विश्वविद्यालीय पदों पर बैठकर इतराने लगे। यह क्रम वर्षों चलता रहा जिससे विश्वविद्यालय की गरिमा धीरे-धीरे घटने लगी।
कहते हैं प्रतिभा किसी की मोहताज नहीं होती। समय कभी न कभी प्रतिभा को अवसर जरुर देता है। यह अवश्य है कि वे जो कभी हाशिये पर थे, परिस्थितियों ने उन्हें आगे कर दिया था। पर कोई भी बाधा या अवरोध प्रतिभा को आगे बढ़ने से रोक नहीं सकती। संघर्ष के ताप से प्रतिभा और निखरकर सामने आती है तथा उसके सामने समस्यायें स्वतः बौनी हो जाती हैं। प्रोफेसर आशुतोष लाल के सभी छात्र प्रतिभा के धनी थे। सबने समय के अंतराल में अपने लिए नयी राह की तलाश कर ली। देश-विदेश में उनकी पहचान बनी और अपने गुरु का नाम रोशन किया।
अकस्मात् ट्रेन में कुछ हलचल हुई। ट्रेन एक छोटे से स्टेशन पर आकर रूक गयी थी। कुछ यात्री उतर रहे थे और कुछ नये यात्री बोगी में सवार हो रहे थे। सहसा, अजेय भी अपनी स्मृतियों की दुनिया से बाहर आया। उसे स्मरण हुआ कि कुछ दिनों पहले ही उसकी भेंट धीरेश्वर प्रसाद के पटु शिष्य वरुण से हुई थी। वरुण ने बताया था कि अपने अंतिम दिनों में वे अपने किये उन तमाम अपराधों का प्रायश्चित करना चाहते थे और स्वयं को अपराधी मान रहे थे। पर, नियति ने कुछ और ही लिख रखा था। अजेय ने सोचा था कि खेड़ से लौटकर वह प्रोफेसर धीरेश्वर प्रसाद से अवश्य भेंट करेगा। पर, अखबार की यह सूचना? देर तक वह अपनी स्मृतियों में खोया रहा।

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