‘बाजत अनहद ढोल’ उपन्यास: आदिवासी शोषण और प्रतिरोध

शुभम सिंह

शोधार्थी (हिन्दी), हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय, धर्मशाला. काँगड़ा (हि. प्र.), 176215
ईमेल: singhshubham876@gmail.com  चलभाष: +91 701 798 1925

इतिहास कभी-कभी अपने समय और समाज के साथ न्याय नहीं कर पाता है और कुछ प्रश्नों को अंधेरे में रख कर हमें पुनः अतीत में लौटने को मजबूर करता है। आदिवासी अस्मिता मूलक प्रश्न एक ऐसा ही प्रश्न है जो कई दशकों के बीत जाने के बावजूद अपने जीवन और मूल्यों को लेकर संघर्ष कर रहा है। 1857 ई. की क्रांति से पहले 1853 ई. से 1856 ई. के बीच हुए आदिवासी संथाल विद्रोह को आधार बनाकर लिखा गया मधुकर सिंह का ‘बाजत अनहद ढोल’ उपन्यास आदिवासी शोषण एवं दमन जैसी समस्याओं को चित्रित करता है। भारत में आदिवासी एक ऐसा समुदाय है जो आज भी अशिक्षा, गरीबी, बेरोजगारी व आभाव में जीवनयापन कर रहा है। समाज का ऐसा वर्ग जो विकास से कोसों दूर है, जिसके समक्ष अस्मिता संकट तेज़ी से उभर कर आया है। आदिवासी वर्ग को समाज का सबसे पिछड़ा वर्ग माना जाता है। आदिवासी समाज के पिछड़े होने का एक बड़ा कारण अपनी जड़ से जुड़ा होना भी है। आदिवासी समाज अपनी परंपरा, इतिहास व संस्कृति से इतना जुड़ा है कि वह अपनी परिधि से बाहर नहीं आ पाता है और अपनी आने वाली जाति के लिए विकास के सारे मार्ग अवरुद्ध कर देता है। भारत में आदिवासी समुदाय जंगलों, शहर से दूर ऐसे स्थानों पर रहता है जहाँ न तो उसके लिए आवश्यक आधारभूत सुविधाएँ हैं और न ही संसाधन। वे सीमित संसाधन में अपना भरण-पोषण करते हैं। इस पृथ्वी पर हर मनुष्य का कोई न कोई ईश्वर है मगर इस उपन्यास की रचना जिस आदिवासी संथाल को आधार बनाकर लिखी गई है उन आदिवासियों का न कोई धर्मग्रंथ है, न ही ये मंदिर बनाकर पूजा करते है। पहाड़, नदी, झरना, गुफा इनके आराध्य देव हैं। ‘मरांग बरु’ इनका ईश्वर है, मरांग बरु से इनका तात्पर्य बड़ा पहाड़ से है बोंगा इनका देवता है।

‘बाजत अनहद ढ़ोल’ उपन्यास में आदिवासी संथाल के माध्यम से मधुकर सिंह ने अंग्रेज़ों की क्रूरता व अत्याचार को दिखाया है। भारत में अंग्रेज़ों के विरुद्ध पहले विद्रोह को आदिवासी संथालों ने अंजाम दिया था। संथालों के इस विद्रोह को अंग्रेज़ों ने भले ही क्रूरता से दबा दिया हो परंतु आदिवासी अंत तक अपने ईमान, अस्मिता व अधिकारों के प्रति संघर्ष करते रहे। इस विद्रोह में आदिवासी संथालों का निर्ममता से संघार करने के बावजूद आज भी यह संघर्ष अंग्रेज़ी शासन पर दाग है। आदिवासी संथालों ने अपनी अस्मिता और सम्मान को आखिरी साँस तक झुकने नहीं दिया। इतिहास में इस विद्रोह को इतिहासकारों ने भले ही महत्व न दिया हो परंतु इस उपन्यास के महत्व को देखते हुए उपन्यास के कवर पृष्ठ पर राकेश कुमार सिंह कहते हैं, “मधुकर सिंह का यह ताज़ा उपन्यास संथाल संघर्ष की महगाथा है। इतिहास सदैव सत्य ही नहीं कहता।  यूरोपीय इतिहासकारों ने सिकंदर को यूनानी बना डाला ; जबकि मकदूनिया के सिकंदर ने सर्वप्रथम यूनान को ही अपने अंगूठे के नीचे दबाया था। संथाल-क्रांति भी अंग्रेज़ों को भारत से भगाने की पहली संगठित जनक्रांति थी; परंतु ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़-मरोड़कर ‘संथाल हूल’ के परिप्रेक्ष्य को भी सीमित और विरूपित करने के प्रयास किए गए।”  इस अर्थ में देखा जाए तो इस उपन्यास में मधुकर सिंह ने इतिहास के पन्नों पर पड़ी धूल को परत दर परत हटाकर जिस यथार्थता को धरातल पर रखा है, वह आदिवासी संथाल के धूमिल पड़ चुके आत्मसंघर्ष व बलिदान को पुनः जीवित करने का काम करती है।

भारतीय इतिहास व संस्कृति में आदिवासियों को प्रायः हांसिये पर ही रखा गया है जिससे न केवल आदिवासी सामाजिक विकास में पीछे रहे अपितु उन्हें समाज का हिस्सा मानने से भी इनकार किया गया। आदिवासी समुदाय के प्रति इतिहास का यह छलावा भी उन्हें अपने अस्तित्त्व संकट से रक्षा के प्रति प्रेरित करता है। सदियों से शोषित, दमित तथा छले जाने के बावजूद वे आत्मसंघर्ष करते रहे हैं किन्तु वे हताश होकर कभी नहीं बैठे। इसका विवरण निरंतर हमें घटित आन्दोलनों और विद्रोहों के माध्यम से इतिहास में देखने को मिलता है। यह उपन्यास इतिहास में हुए आदिवासी संथाल संघर्ष की गाथा को ही नहीं कहता अपितु आदिवासी शोषण, स्त्री देह शोषण, बंधुआ मजदूरी के साथ-साथ उनके प्रतिशोध की आग को भी  चित्रित करता है। जिस आदिवासी विद्रोह को ध्यान में रखकर इस उपन्यास की रचना की गयी है वह विद्रोह इतिहास में ‘संथाल हूल’ के नाम से चर्चित है। आदिवासियों के ऊपर शोषण व अत्याचार की प्रक्रिया पूरे झारखंड में चल रही थी। संथालों ने जिन जंगलों को साफ करके खेती के लिए भूमि तैयार की, उन पर भारी भरकम कर लग रहे थे। अंग्रेज अफसर धीरे-धीरे राजमहल की पहाड़ियों के आस-पास निवास करने लगे। ‘इस्तमारी बंदोबस्त’ के द्वारा अब संथालों द्वारा तैयार की खेती योग्य भूमि के मालिक अब जमींदार  हो गए थे। इसके बारे में उपन्यासकार लिखता है “राजमहल के इर्द- गिर्द अंग्रेज निलहों ने बड़ी-बड़ी कोठियाँ खड़ी कर ली थीं। पोटन बड़ा चतुर अंग्रेज था। लगभग एक शताब्दी पूर्व की ‘इस्तमारी बंदोबस्त’ उसके दिमाग में  रू-ब-रू थी उसे मालूम था कि हिंदुस्तानी जमींदार कैसे उनकी जमीनों के मालिक बनते चले गए।”  इस ‘इस्तमारी बंदोबस्त’ व्यवस्था ने किसानों को मजदूर बनने पर बाध्य किया। इतना ही नहीं उनका हर स्तर पर शोषण होने लगा। “जमींदार और ज्यादा सही कहा जाए तो गुमास्ते, प्यून, महाजन, कर्मचारी, पुलिस, तहसीलदार, अदालत कचहरी के नौकरशाह- कर्मचारी मिलकर एक साथ संथालों का भयंकर शोषण करते। दमन, मारपीट और उत्पीड़न का जाल पसरा हुआ था। कर्ज का सूद पचास से पाँच सौ प्रतिशत तक वसूला जाता।”  ‘इस्तमारी बंदोबस्त’ व्यवस्था से संथालों के समक्ष न केवल जीवन संकट उत्पन्न हुआ अपितु उन्हें अंग्रेज़ों का गुलाम बनकर रहना पड़ रहा था। इस नयी कर नीति के बारे में इतिहासकार विपिन चन्द्र लिखते हैं, “ लार्ड कार्नवालिस ने 1793 ई. में बंगाल और बिहार में इस्तमारी बंदोबस्त की प्रथा का आरंभ किया। इसकी दो विशेषताएँ थीं। पहली यह कि जमीदारों और मालगुजारों को भू-स्वामी बना दिया। अब रैय्यतों से मालगुजारी की वसूली के लिए केवल सरकार के एजेंट को ही काम नहीं करना था, बल्कि अब वे अपनी जमींदारी के इलाक़े के सारी जमीन के मालिक बन गये। उनके स्वामित्त्व के अधिकार को वंशगत और हस्तांतरणीय बना दिया। दूसरी तरफ काश्तकारों का दर्जा गिर गया और अब वे बंटाईदार बन कर रह गये और जमीन पर लंबे समय से चले आ रहे अधिकारों तथा पारंपरिक फ़ायदों से वंचित कर दिया गया। चरागाहों और जंगलों कि ज़मीनों, सिंचाई की नहरों, मछली पालन के तालाबों तथा झोपड़ी डालने की ज़मीनों के इस्तेमाल के अधिकार और लगान में वृद्धि से सुरक्षा - ये सब उनके कुछ ऐसे अधिकार थे जिनसे उनको वंचित कर दिया गया था।”  इस व्यवस्था से जमींदार न केवल मनमाने ढंग से लगान वसूलते अपितु किसी वर्ष उत्पीड़न कम होने या सूखा आदि पड़ जाने पर अनाज कम होता तो भी लगान वसूली मे कोई छूट नहीं दी जाती। जिससे आदिवासियों के पास कर्ज लेने के अतिरिक्त कोई उपाय नहीं बचता था। इस प्रक्रिया में जमींदार, साहूकार आदि सभी उनका शोषण करने लगे थे।

उपन्यास के अनुसार, अंग्रेजी राज में शोषण इस सीमा तक था कि अकाल पड़ जाने के कारण आदिवासी संथालों के पास भोजन का संकट पड़ जाता है। जिसके कारण इस वर्ष वे ‘सोहराई पर्व’ नहीं मानना चाहते हैं, परंतु उनका पुरोहित अंग्रेज अधिकारी को सोहराई पर्व पर निमंत्रण देता है, और संथालों को सोहराई पर्व मनाने के लिए बाध्य करता है, जिसका विरोध करते हुए उपन्यास की पात्र जोबा कहती है, “इस साल तो मुआर हो गया है। सोहराई तो हम तभी मनाते हैं, जब नए धान की खुशी में देवी-देवताओं, पुरखे-पित्तरों और गोधन का पूजा-अर्चन और सगे-संबंधियों का मान-सम्मान करते हैं। अकाल वर्ष सोहराई या बंधा पर्व कहाँ मनता है। इस साल तो हमारे पास खाने के धान नहीं, तो लोगों को कहाँ से भोज कराएंगे?”  अकाल की मार से आदिवासी पहले ही कर्ज के बोझ से दबे हुए हैं। ऊपर से सोहराई पर्व को मनाने के लिए उनको कर्ज लेना पड़ता है। अकाल के बावजूद वे अंग्रेज अधिकारी के स्वागत के लिए यह पर्व मनाते हैं।

अंग्रेज अधिकारियों का शोषण व अत्याचार इस स्तर तक बढ़ चुका था कि वे संथाल औरतों के साथ जबरदस्ती या लालच देकर उनका शारीरिक शोषण करते थे। उपन्यास में शारीरिक शोषण को व्यापक रूप में दिखाया गया है ‘सोहराई पर्व’ पर अंग्रेज अधिकारी पोटन जोबा के साथ जबरदस्ती करने की कोशिश करता है। वह जोबा को पकड़ लेता है परंतु जोबा अपनी आत्मरक्षा में मुर्गी काटने की छूरी से पोटन साहब को मार देती है। जिस अंग्रेज अधिकारी के स्वागत के लिए सोहराई पर्व मनाया जाता है वही अंग्रेज संथाल औरतों के साथ जबरदस्ती करता है और पुरोहित खड़ा देखता रहता है। सोहराई पर्व पर यह घटना एक तरह से आदिवासियों के मन में शोषण के विरुद्ध उठ रही आग का प्रतीक थी। इस घटना को आदिवासियों ने स्त्री- अस्मिता से जोड़कर देखा अपितु उनके मन में आग कि ज्वाला धधक उठी थी। इस काम को सीधू और कान्हू जैसे क्रांतिकारी आग में घी डालने का काम कर रहे थे। जोबा के इस साहसिक काम की सराहना करते हुए गोकों नायक कहते हैं, “बेटी! तुम्हारे कदम की हम तमाम आदिवासी सराहना करते हैं। हमारी औरतें तुम्हारी तरह बने, हमारी हार्दिक इच्छा है।”  जोबा ने जो काम किया था उससे आदिवासी संथाल औरतों में एक नया आत्मविश्वास जाग उठा। उपन्यासकार इस घटना के बारे में लिखता है, “संभवतः आदिवासी इतिहास की पहली घटना होगी, जब किसी स्त्री ने अस्मिता रक्षा स्वयं की थी और उसकी सराहना युवकों की टोली ने की  थी।”  जोबा संथाली औरतों को शिक्षित कर चेतना जागृत करने की जिम्मेदारी लेती है और इस कार्य को करने के लिए वह शोभा, सूमों आदि साथिनों के साथ पूरा करने में जुट जाती है। इस उपन्यास में आदिवासी औरतों के साथ-साथ एक गैर आदिवासी महिला मारिया का भी जमींदार भवेश और अंग्रेज अधिकारी रॉबर्ट द्वारा शोषण को दिखाया गया है। जमींदार भवेश के द्वारा आदिवासियों का शोषण दिनों-दिन बढ़ता जा रहा था। उसके अत्याचार से आदिवासी इस सीमा तक त्रस्त थे कि, “जब चाहे, जिसकी चाहे अनाज, जानवर और लड़की उठाकर चल देता है।”

अंग्रेज अधिकारी पोटेंट आदिवासी संथालों की बढ़ती ताकत से डरा हुआ था। उसे भय है कि यदि आदिवासी शिक्षित और सजग हुए तो उन पर बहुत दिनों तक शासन नहीं किया जा सकता है। जब पोटेंट साहब को कुत्ता काटता है और बहुत इलाज़ करने के बावजूद उसका पैर सही नहीं होता है तो गाँव का जमींदार उसे जरी वैद्य के पास ले जाता है। जरी वैद्य के इलाज़ के बाद पोटेंट का पैर सही हो जाता है। ऐसे में “पोटेंट कि नज़र में सबसे पीड़ादायक यह बात थी कि इनके भीतर कला-कौशल, ज्ञान-विज्ञान को बढ़ावा मिला तो इन पर बहुत दिनों तक राज करना मुश्किल हो जाएगा। मुगल तो ऐसे लोगों के ज्ञान और हाथ छीनने में भी नहीं चूकते थे।”  पोटेंट कि नज़र में जरी वैद्य नासूर था, अगर जरी वैद्य जैसे लोग रहेंगे तो अंग्रेजी सरकार का आधिपत्य बहुत दिनों तक नहीं रहेगा। इसी उद्देश्य से पोटेंट की जिस आदिवासी जरी वैद्य ने जान बचायी, उसको ही वह मारने की योजना बनाता है और अंत में वह उसकी हत्या भी करवा देता है। पोटेंट साहब आदिवासी गोको नायक के गाँव को शिक्षा, स्वास्थ्य, विकास का लालच देकर छलावा करता है। वह अंदर ही अंदर अंग्रेज की शक्ति को मज़बूत करता है। साथ ही योजना बनाकर वह विद्रोही संथालों सुकेल, सिदो आदि को पकड़ने की कोशिश भी करता है।

औद्योगीकरण आदिवासियों के लिए असमाप्त होने वाले संघर्ष के रूप में उभर कर आता है। इसने न केवल पुनर्वास व विस्थापन की समस्या को उत्पन्न किया अपितु शोषण को चरम पर पहुँचा दिया था। जो भी इन जंगलों में आया यहाँ के निवासियों को भगाने का प्रयास किया। औपनिवेशिक काल में अंग्रेजों ने इन आदिवासियों का सर्वाधिक शोषण किया। 1850 ई. के बाद रेल नीति में लकड़ी की माँग बढ़ी तो अंग्रेजों ने ठेकेदारों के माध्यम से जंगलों को कटवाना शुरू कर दिया। आदिवासियों को नील की खेती करने के लिए बाध्य किया गया जिससे परम्परागत खेती नष्ट होने लगी। ‘इस्तमरी बंदोबस्त’ व्यवस्था ने जमींदारों को जमीन का मालिक बना दिया। इस व्यवस्था को लागू करने के बाद, “अब हर अंग्रेज को अधिकार मिल गया है कि वह भारत मे आकार बस सकता है और जमीन-जायदाद का मालिक भी बन सकता है। नतीजतन अंग्रेजों ने बड़ी- बड़ी जमींदारियाँ खरीदकर नील की खेती शुरू कर दी। पहले ईस्ट इंडिया कंपनी की नील की कोठियाँ थी। अब निलहे साहबों की या फिर दूसरी- दूसरी कंपनियों की कोठियाँ जगह- जगह खुल गयी थी।”  ये कंपनियां अपने निजी आर्थिक फायदे के लिए आदिवासियों से जबरदस्ती नील की  खेती करवाते, कुछ निलहे अपनी जमीन पर खुद नील की खेती कराते “मगर अधिकांश खेतिहरों को जबरन अग्रिम देकर नीले की खेती कराने के लिए मजबूर करते।”

अंग्रेज अधिकारी व व्यापारी पहले से ही अच्छी ज़मीनों को चिन्हित कर लेते थे। जिन आदिवासियों को नील की खेती करनी होती थी, उन आदिवासियों को नील की खेती करने के लिए सूद लेना पड़ता था क्योंकि उन्हें अंग्रेजों की तरफ से सिर्फ प्रति बीघा दो रुपया मिलता था। कंपनी द्वारा चिन्हित की गयी जमीन पर आदिवासी अन्य फसल की खेती नहीं कर सकता था। “सामाजिक और आर्थिक दृष्टिकोण से यह स्थायी व्यवस्था निंदनीय थी। जमींदारों का भूमि पर पूर्ण अधिकार मानकर कंपनी ने भूमिपति अथवा किरायेदार कृषकों दोनों के हितों की अवहेलना की। भूमिपति जो कल तक स्वामी था, आज एक किरायेदार हो गया तथा किरायेदार अब जमींदार की दया पर आधारित था तथा अब उसे अधिकारिक किराया देना पड़ता था। ऐसा अन्याय भारत के इतिहास में कभी नहीं हुआ।”  इस व्यवस्था से प्रकृति और मनुष्य का शोषण लगातार हो रहा था। ऊपर से नीचे तक सभी अंग्रेज, जमींदार, महाजन आदि सभी आदिवासियों के दमन व शोषण में लगे हुये थे। आदिवासियों का इस व्यवस्था के विरुद्ध एक ऐसा आंदोलन था जिसमें सभी वर्ग के लोग शामिल थे। उपन्यास का पात्र सिधू कहता है, “जन-आंदोलन अकेला संथाली ही नहीं चला सकते। जन- आंदोलन में हमें सबका सहयोग चाहिए। लोहार भाइयों ने हमें कुठार, टांगी और अस्त्र- शस्त्र बनाकर दिये हैं।”  इस तरह इस आंदोलन में संथाली और गैर- संथाली दोनों समुदायों ने मिलकर शोषण के विरुद्ध आंदोलन किया। इस शोषण के बारे में रमणिका गुप्ता कहती हैं- “अंग्रेजों द्वारा जमीन की मालगुजारी, हल-बैल की संख्या के अनुसार तय करके वसूली जानी शुरू हो गयी थी, लगान की राशि भी बढ़ा दी गयी थी, रेल लाइनों का जाल बिछने लगा था, जिससे पचास हज़ार से अधिक लोग अपनी जमीन से बेघर कर दिये गए थे। उनसे बेगारी अलग से ली जा रही थी। सूदखोर दिकू महाजन के समर्थक महेश के अत्याचार से दामिन-ई-कोह की जनता आजिज़ आ चुकी थी।”  संथालों का यह विद्रोह मुख्यतः आर्थिक शोषण के खिलाफ था। संथाली लोग अपने लिए एक आदर्श राज्य का निर्माण करना चाहते थे जहाँ न कोई राजा हो न प्रजा, न शोषक व शोषित का भेद हो, सभी के लिए समानता की भावना हो, सबके लिए शिक्षा व रोजगार की व्यवस्था हो। उपन्यास का पात्र सिधू संथाल परगने को संबोधित करते हुए कहता है, “तुम संथाल राज कायम करो, कंपनी राज को खत्म करो।”  संथालों का यह आंदोलन अपनी मातृभूमि की रक्षा के चलाया गया था, एक तरह से इस आंदोलन को अंग्रेजों के विरुद्ध भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के आगाज के रूप में माना जा सकता है।

अंग्रेजी सरकार ने भले ही इस आंदोलन को अपनी ताकत से दबा दिया हो परंतु आदिवासी संथालों ने अपनी मातृभूमि व अस्मिता की रक्षा के लिए अंत तक लड़ते रहे। आदिवासी अपनी सामूहिक जीवन शैली को बनाए रखना चाहते थे। यह विद्रोह अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध ही नहीं अपितु जमींदार, साहूकार, महाजन, सभी के विरुद्ध था, जो भी अंग्रेजी शासन के प्रतीक थे। साहित्य का इतिहास और समाज से अंतःसंबंध घनिष्ठ रूप में होता है, साहित्य समाज को व्यापक फ़लक पर आत्मसात करता है। इस दृष्टि से यह उपन्यास इतिहास के उन पहलुओं उजागर करता है जिसे इतिहासकारों ने नज़रअंदाज़ कर दिया था। यह उपन्यास ऐतिहासिक और सामाजिक परिप्रेक्ष्य में आदिवासी शोषण व दमन को चित्रित करता है। आदिवासी समाज आज भी उन्हीं मूल्यों और अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहा है। सरकार, शोषक का रूप भले ही बदल गया हो परंतु समाज में शोषक, शोषित की प्रवृत्ति आज भी विद्यमान है। 


संदर्भ:

[1]  बाजत अनहद ढ़ोल, मधुकर सिंह, कवर पृष्ठ
[2] वही,पृष्ठ -9
[3] वही,पृष्ठ- 10
[4] आधुनिक भारत का इतिहास, विपिन चन्द्र, पृष्ठ - 88
[5] बाजत अनहद ढ़ोल, मधुकर सिंह, पृष्ठ – 88
[6]  वही, पृष्ठ – 14
[7] वही, पृष्ठ  - 14   
[8] वही, पृष्ठ – 38
[9]  वही, पृष्ठ – 39
[10] वही, पृष्ठ - 47
[11] वही, पृष्ठ  - 48
[12] आधुनिक भारत का इतिहास, बी. एल. ग्रोवर, पृष्ठ – 85
[13] बाजत अनहद ढ़ोल, मधुकर सिंह, पृष्ठ- 82 
[14] आदिवासी अस्मिता का संकट, रमणिका गुप्ता, पृष्ठ – 115
[15]  बाजत अनहद ढ़ोल, मधुकर सिंह, पृष्ठ – 88


संदर्भ ग्रंथ
1. बाजत अनहद ढ़ोल, मधुकर सिंह, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण: 2005 
2. आधुनिक भारत का इतिहास, विपिन चन्द्र, ओरियंट ब्लैकस्वान प्राइवेट लिमिटेड, नई दिल्ली, संस्करण: 2012 
3. आधुनिक भारत का इतिहास: एक नवीन मूल्यांकन, बी. एल. ग्रोवर, एस.चन्द एंड कंपनी लिमिटेड, नई दिल्ली, संस्करण: 2006 
4. आदिवासी अस्मिता का संकट, रमणिका गुप्ता, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली,  संस्करण: 2014          

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