कहानी: फेसबुक पोस्ट

- किसलय पांचोली


 “आशु, तुम समझते क्यों नहीं, लोग क्या कहेंगे?” झूमर की तरह लटकते, झूलते पीले फूलों वाले अमलतास के पेड़ के नीचे लगी बैंच पर अट्ठाईस वर्षीय युवक आशीष से सटी बैठी, पच्चीस वर्षीया युवती रीना ने तनिक झुँझलाकर दूर सरकते हुए कहा।
 
“क्या कहेंगे?” 

“यही कि… कैसे घर जा रही है रीना? कि उसकी सास… बेटे की शादी से पहले खुद दूसरी शादी कर रही है! डस इट लुक्स नाईस?”

“रीना, मुझे लोगों की परवाह नहीं। एंड लुक्स नाईस आर नॉट इस अ व्हेरी रिलेटिव थिंग। तुम अपने दिल की कहो। तुम क्या सोचती हो?” बैंच पर मढ़े रंग-बिरंगे टाइल्स के टुकड़ों की आउट लाइन पर ऊँगली घुमाते हुए आशीष ने पूछा। 

"अंहअहं वो… कि मैं... ऐसा कुछ नहीं... पर…” रीना इस सीधे प्रश्न से अचकचा उठी। 

"कोई बात नहीं। तुम अपना टाइम लो। जब दिल की आवाज़ सुन पाओ मुझे बता देना। मैं इन्तजार करूँगा।” आशीष ने शांत, गंभीर स्वर में जवाब दिया। 

दोनों उठ गए। अमलतास का पेड़ जिज्ञासा में और ज्यादा कलियाँ चटकाने लगा। फूल बतियाने लगे। 'क्या बोलेगा रीना का दिल?' पुराने प्रेमी-प्रेमिका हैं। पर इस बात पर सहमति नहीं बना पा रहे। आखिर पिछले चार सालों से ये दोनों पार्क की इसी बैंच पर बतियाते रहे हैं। बैंच और पेड़ ने खिलखिलाहटों, प्रेमासिक्त साँसों, प्यार से भीगे स्पर्शों को ही देखा, सुना और महसूस किया है। अनबन जैसी कोई बात कभी हुई ही नहीं।
***

“आशीष, आज तू इतना उदास क्यों है?" प्राइवेट स्कूल में लेक्चरर आशा ने घर आए बेटे को केक के साथ चाय दे, पास बैठ, उसके सिर पर स्नेहसिक्त हथेली रखते हुए पूछा।

“कहाँ माँ?…. मैं कहाँ उदास।… न। बस… जरा थक गया हूँ।” एजुकेशनल स्टार्टअप में कंटेंट राइटर आशीष ने फियांसी रीना के साथ हुए वार्तालाप से उपजी उदासी को माँ के प्रति जिम्मेदार मुस्कुराहट से बखूबी ढकते, उनका हाथ थामकर जवाब दिया। 

“चल रहने दे। तुझे अभी नहीं बताना, मत बता।” आशा ने बात को और नहीं खींचा। हालाँकि वह जानती है कि बेटे द्वारा घर आकर जल्दी से कपड़े न बदल, फेसबुक खोल रोज की पोस्ट न लिख, यूँ ही पेनस्टेंड में रखे पेन, पेंसिल चाबी आदि को गोल-गोल घुमाना, उसकी किस मन:स्थिति का द्योतक है।

यूँ घर में अब है ही कौन? बस माँ आशा और बेटा आशीष। दोनों एक दूसरे का बेहद ख्याल रखते हैं। इतना ध्यान देते हैं कि पूछो मत! चेहरा देखकर दिल पढ़ लेते हैं। भंगिमा बूझकर इस सलीके से बात करते हैं मानो दोनों गहरे मित्र हों।
***

एक समय था जब ज़िन्दगी इस घर को बहुत थपेड़े मारती थी। ये दीवारें ढेरों तानों को परावर्तित करती थीं। जब दरवाजे कँपकँपा उठते थे, गुस्से की थरथराहट से। जब खिड़कियों के शीशे बड़ी मुश्किल से दरकने से बच पाते थे, आए दिन के उलाहनों से। जब घर में आशीष के दादाजी और पापा भी रहते थे। तब वह स्कूल जाता छोटा बच्चा था। क्या समझता? कुछ भी नहीं।

पापा सिविल कांट्रेक्टर थे। देर रात को घर आते। उनके आते ही वह ठण्ड के दिन होते, रजाई में दुबक जाता। गर्मी होती, चादर ओढ़कर सो रहता। बिलकुल भी नहीं हिलता डुलता। आधी आँख और एक कान से चुपचाप देखता सुनता रहता।

“तुम्हें जरा खाना बनाना नहीं आता। गोबर परोस लाती हो गोबर।” झन्न से थाली फिंकती।
 
“मैं गर्म रोटी उतार लाती हूँ।” माँ जल्दी से नई थाली में अचार, पापड रखती कहतीं। लेकिन पापा हर निवाले के साथ माँ को एक और झिड़की देते जाते। तभी दूसरे कमरे से दादाजी कह उठते-

“अरे बेटा मैंने भी बड़ी मुश्किल से खाना खाया। बड़ा बेस्वाद बना था। राम राम! गैया भी मुँह मोड़ ले ऐसा।”
 
आशीष सोचता खाना ऐसा कहाँ था? कोफ्ते की सब्जी कितनी स्वादिष्ट बनी थी। मैंने चटकारे लेकर खाई थी। माँ ने अभी तक खाना नहीं खाया है। पता नहीं अब वे खा पाएँगी कि नहीं। जब पीछे से पापा खर्राटे लेने लगते वह दबे पाँव उनके पास पहुँच जाता।

“माँ, आप खाना खा लो न!” मनुहार से कहता।

“मुझे भूख नहीं है।”

“आप को मेरी कसम। मेरे सामने खाओ।” दोनों की आँखों से आँसू झरते जाते। जब तक वे खाना नहीं खा लेती आशीष वहीं बैठा रहता। टक-टकी लगाए उन्हें निहारता रहता। ‘कितनी सुंदर है मेरी माँ। कितनी कोमल और जगत वत्सला।’ अनावश्यक डाँट और असम्मान के ऐसे दृश्य आए दिन घर में घटित होते रहते। वे सुनती जातीं। नज़रें झुकाए खड़ी रहतीं। आशीष को लगता ‘यह क्या बेहूदगी है? दादाजी पापा का अँधा पक्ष लेते हैं। और पापा दादाजी की गलत बातों पर चुप लगाए रहते हैं। माँ हर बार बस कसमसाकर रह जाती हैं।’

वे शादी से पूर्व स्कूल टीचर थीं। आशीष ने सुना है कि उसके जन्म के पहले ही उन्हें सख्ती दिखाकर जॉब करने से रोक दिया गया था। घरेलू खर्चों की खींचतान से परेशान हो एक बार उन्होंने कहा -

"मैं वापस स्कूल ज्वाइन कर लेती हूँ। आशीष की फीस समय पर दे पाएंगे।"

“बहू, चाहे उधार लेना पड़े। तुम्हें कोई ज़रूरत नहीं है ज्वाइन करने की। हमारे परिवार की बहुऍं बाहर काम करने नहीं जातीं। तुम कहीं नहीं जाओगी।" दादाजी माँ के कँपकँपाते हाथों से अपाइंटमेंट लेटर छीन चिंदी-चिंदी फाड़ते हुए फरमान जारी कर देते। पापा चुप लगा जाते। वे अकेली बैठी आठ-आठ आँसू रोती रहतीं। कोई उन्हें चुप कराने नहीं आता। बच्चा आशीष उन्हें उदास बैठा देखता रहता। उसे घर के समीकरण गणित के समीकरण से भी बहुत कठिन लगते। 

वह सोचता ‘ऐसा क्यों है कि माँ की कोई बात सुनी नहीं जाती?’ रात को वह उनके पल्लू से लिपट जाता। वे उसे प्यार करतीं। एक बार उसने उनसे पूछ लिया।
 
"माँ, आप दिन भर कितना काम करती हो। फिर भी दादाजी आपको झिड़कते हैं। पापा आपकी गलतियाँ निकालते हैं। ताने मारते हैं। क्यों? आप इतना क्यों सहती हो?”

"तेरी खातिर बेटा। तेरे लिए मैं सहती हूँ। तू बड़ा हो जा। फिर सब ठीक हो जाएगा।” 
 
जब दादाजी की मृत्यु हुई आशीष की आँखों में एक बूंद आँसू न था। उसे लगा ‘चलो माँ को सताने वाला एक जन कम हुआ।’ पर वह क्या जानता था कि अब घर और गहरे आर्थिक संकट में डूब जाएगा। दादाजी की पेंशन आना बंद हो गई। पापा के काम में अनिश्चितताएँ और बढ़ गई। 

आशीष अपने पापा को कभी समझ ही नही पाया। वह उनसे दूर-दूर और कटा-कटा ही रहता। वे थे ही ऐसे। आत्ममुग्ध-ठसक से भरे इंसान। जितनी देर घर में रहते, खुद की प्रशंसा का आलाप चलता रहता। उनके किस्से, उनकी वाहवाही की बातें होती रहतीं। दादाजी, पड़ोसी या दोस्तों के साथ। साक्षात या टेलीफोन पर। उसे लगता ‘क्या माँ मशीन हैं? इंसान नहीं! उनकी तारीफ में कभी कोई बातें क्यों नही होती?’ 

वह अपने घर के हालात नानी के घर बयाँ करना चाहता। वे उसे मना कर देतीं। 'घर की बात घर में रहनी चाहिए।' वह सोचता ‘ऐसी बात जिससे घर की हवा में घुटन हो उसे घर में ही रखे रखना क्या ठीक है?’ पर वह उनके कहे का बहुत सम्मान करता था। सो बाहर कुछ नहीं कहता।
***

दादाजी के गुजर जाने के बाद भी लगभग पाँच सालों तक घर उसी पटरी पर चलता रहा जो वे खींच गए थे। पापा की कॉन्ट्रेक्टरशिप कभी अच्छी चल निकलती। कभी बिल्कुल ठप्प हो जाती। पर वे अपनी गैर जिम्मेदाराना आदतों जैसे काम को टालना, समय पर नहीं करना और कोई समझाने जाए जैसे माँ उन्हें झिड़क देना, ईगो पर ले लेना से बाज नहीं आते थे। 

हाँ, पर माँ की नसीहत और व्यवहार आशीष के लिए प्रेरणास्पद थे। साथ ही घर के हालातों ने उसे भली-भांति समझा दिया था कि 'मुझे अच्छे नम्बरों से पढाई पूरी करना है। और जल्दी से जल्दी कोई जॉब लेना है। ताकि घर की मुसीबतों को कम करने में सहायक बन सकूँ।' उसने अपने स्तर पर छोटी कक्षाओं की ट्यूशन पढ़ाना भी शुरू कर दिया।

 पापा की ठसक अब भी कम नहीं पड़ी थी। पर फीकी ज़रूर हो गई थी। उनका काम ठीक-ठाक नही चल रहा था। इसलिए उन्होंने माँ नौकरी करने के लिए दुबारा पूछने पर मना नही किया। भले हाँ भी नही किया। और माँ ने नौकरी ज्वाइन कर ली। पहले वे घर में कैद-सी ज़िन्दगी जी रही थीं। अब उन्हें कुछ नए रिश्ते बनाने का मौका मिला। हालाँकि घर और बाहर की जिम्मेदारियों से वे थक जातीं। लेकिन थकान में भी उन्हें सुकून मिलता था। वे अधिक खुश रहने लगीं थीं।

घर अब बेहतर जगह हो गया था। आशीष का जॉब लग गया था। माँ बेटे एक दूसरे को समझते थे। वक्त देते थे। बातें करते थे। पापा घर में अलूप से हो गए थे। ‘मेरा क्या है?’ वाला भाव हर वक्त उनके चेहरे पर पुता रहता। वास्तव में वे अपनी ही बीमार मानसिकता की गिरफ्त में बुरी तरह फँस चुके थे। परिवारों में संस्कार जन्य अंतर होते हैं। पर हर नया परिवार अमूमन माँ के संस्कारों की नींव पर खड़ा होता है। इस बात से इत्तफाक रखना न जाने क्यों वे अपनी तौहीन समझते थे। और तो और किसी मनोचिकित्सक की सलाह लेना भी अनुचित और गैर जरूरी मानते थे। आशीष और आशा ने उन्हें वे जैसे थे वैसे ही स्वीकार करना सीख लिया था। इधर आशीष की जिंदगी में रीना का प्रवेश हो गया था। दोनों बहुत खुश थे।
***

कहते हैं न मनुष्य की सोच, कल्पना और ज़िन्दगी की हकीकत अक्सर मेल नहीं खाती। हम सोचते क्या हैं? और हो क्या जाता है! किसी ने नहीं सोचा था वैसा पूरी दुनिया में घटित होने लगा। न जाने कहाँ से कोविड 19 की महामारी ने पूरे देश को चपेट में ले लिया। लॉकडाउन लग गया। पापा का काम बिलकुल ही ठप्प हो गया। माँ की छोटी-सी नौकरी भी समाप्त प्राय सी हो गई। मेनेजमेंट ने कह दिया ‘जब स्कूल ही नही लग रहा कैसी तनख्वाह ?’ आन लाइन क्लासेस लेने का कुछ पैसा मिलता था। घर बचत पर परजीवी हो चला। ऐसे विकट समय में पापा और अवसाद ग्रस्त हो गए। अधिक जिद्दी व और ज्यादा हठी भी। अस्थमा उन्हें था ही। बस अड़ गए तो अड़ गए। फिर बात सही हो या गलत। दुनिया की कोई ताकत उन्हें नहीं समझा सकती। 
 
“सुनो आप सामान लेने बाहर न जाऍं।” माँ कहतीं।

“...............”

“गर जा ही रहे हैं प्लीज मास्क लगा लें।” वे सलाह देतीं।

“नहीं लगाना मुझे मास्क-वास्क। ये सब फ़ालतू के चोंचले हैं। व्यक्ति खुली हवा में साँस भी न ले क्या?” पापा नहीं सुनते। अस्थ्मेटिक होते हुए भी बिना मास्क व सेनीटाईजेशन की सावधानी के निकल पड़ते घर से बाहर। उनकी ज़िद ने उन्हें पहले महीने में ही कोविड हॉस्पिटल पहुँचा दिया। आईसोलेशन वार्ड में अकेले पड़े रहते। माँ खाना देने जातीं।
 
“डाक्टर साहब ये ठीक हो जाएँगे न?”आशा ने डबडबाई आँखों से ड्यूटी डाक्टर मेहरा से पूछा।
 
“आप पहले यहाँ बैठिए मिसेज सिसोदिया। हम आपके पति को बचाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। एक उनके फेफड़ों में इंफेक्शन काफी फैल चुका है। दूसरे अभी इस बीमारी का इलाज भी ट्रायल बेस्ड ही है। तीसरे पेशेंट का कोआपरेटिव होना बेहद ज़रूरी है। आप समझाएंगी मान जाएँगे।” डाक्टर ने प्यार और विस्तार से स्थिति स्पष्ट कर दी।
आशा के दिल में टीस सी उठी। वह क्या बताए डाक्टर को कि न सुनने की, अपनी ही करने की ज़िद कितनी बड़ी है इनकी। शायद जीने की जिजीविषा से भी बड़ी। वे चार महीने एडमिट रहे। अंतत: ज़िद ने जिंदगी लील ली। घर भांय- भांय कर उठा। मौत के आंकड़े, अखबारी प्रतिशत कुछ भी कहें, जिस घर पर गाज गिरती है उसकी पीड़ा और दर्द उस घर को ही भुगतना होता है। सो घर ने भुगता। पापा नहीं रहे। दिवंगतों की श्रेणी में पहुँच गए।

हाँ, पर अस्पताल के चक्कर लगने से आशा और डाक्टर मेहरा करीब आते गए। माँ के लिए यह बिलकुल ही नया अनुभव था कि कोई व्यक्ति उन्हें इतने सम्मान से पेश आए। वे मन से उनसे जुड़ती चली गईं। पापा के चलित उठावने में डाक्टर मेहरा घर भी आए। भीड़ के निकल जाने के बाद रुके रहे। माँ के करीब आ उन्हें सांत्वना दी। उनका फोन नम्बर लिया। वे फोन पर मानसिक संबल देते रहे। उन्हें आनलाइन ट्यूशन भी दिलवा दी। 

“आशीष, मैँ आज शाम डाक्टर मेहरा को खाने पर बुलाना चाहती हूँ। बुला लूँ?” माँ ने पूछा।

हाँ माँ क्यों नहीं बिलकुल। मैं आ जाऊँगा डिनर तक।” आशीष ने ख़ुशी-ख़ुशी सहमती दी। वह चीजों, बातों, भावनाओं को समझता गया। उसे अच्छा लग रहा था कि माँ पहले के असामान्य जीवन और पापा की अकस्मात मौत से उबर रही हैं। तेजी से सामान्य जीवन की ओर लौट रही है। ऐसा जीवन जो उनके सामने पहली बार उद्घाटित हो रहा है। 

डाक्टर मेहरा जब डिनर पर आए आशा ने कोफ्ते की सब्जी के साथ दाल चाँवल रायता और गुलाबजामुन भी बनाए। उन्होंने तारीफों के पुल बांधते हुए खाना खाया। आशीष ने देखा माँ की आँखों में ख़ुशी के आँसू झिलमिला रहे थे। और यह भी कि वे जो सिल्क की साड़ी गिफ्ट दे गए थे माँ उसे पहन काफी देर तक काँच के सामने खड़ी रहीं। सुबह जब आशीष उठा वे उसी साड़ी को ओढ़ पलंग पर किसी मासूम परी-सी सो रही थीं। उसे देखकर हड़बड़ा कर उठ बैठीं।

“माँ आप लेटो। मैं चाय बना लाता हूँ।” आशीष ने जाना माँ धीरे-धीरे प्यार की ओर बढ़ रही हैं। वह यह भी बूझ रहा था कि वे कदम आगे बढ़ाने से हिचक रही हैं। वही सामाजिक बेड़ियों, स्त्रियों के लिए बनाए गए अलिखित नियम कानून, संस्कार, परिपाटी, रस्मों रिवाजों के चलते। आशीष ने सोचा वह आज डाक्टर मेहरा से मिलेगा। और वह मिला भी। 
 
 आशीष ने शाम को रोज की तरह फेसबुक खोला। वह पूछता है ‘व्हाट्स आन योर माइंड।’ यूँ वह रोज पोस्ट लिखता है जन्मदिन की शुभकामनाएँ, बधाईयाँ, शोक सन्देश लिखता है। पर आज उसे लगा फेसबुक उसी से कुछ ख़ास पूछ रहा है। उसने सोचा क्यों न मैं अपने मन की बात फेसबुक पोस्ट में डाल दूँ। और पोस्ट लिखना शुरू कर दी। और उसे पब्लिक पोस्ट भी कर दी।

मित्रों,

मैं इस पोस्ट के माध्यम से पूरी दुनिया को यह बताना चाहता हूँ कि माँ प्रकृति की सबसे अनोखी रचना होती है। जीवन का सबसे बड़ा वरदान। उसका प्यार निशर्त होता है। वह बच्चों पर अपना सब कुछ न्यौछावर कर देती है। और बदले में कुछ भी नही मांगती। दरअसल यह हर माँ के लिए गढ़ी गई स्टीरिओटाइप इमेज भर है। जिसे वह अनजाने में आत्मसात कर लेती है। विचार ही नहीं करती अपने स्वयं की ज़िन्दगी व सपनों के बारे में। 

हमारी ज़िन्दगी में प्रेम ना हो यह हमारे लिए बड़े दुख की बात होती है। लेकिन माँ की ज़िन्दगी में प्रेम के स्टेट्स की हम कभी परवाह नहीं करते। हम यह महसूस नहीं कर पाते कि हमारे आसपास की अकेली, तलाक़शुदा या विधवा माँओं ने अपना जीवन निचाट अकेले कैसे काटा होगा? 

हम सोच नहीं पाते कि माँ सिर्फ माँ नहीं होती। एक औरत और इन्सान भी होती है। सुख-दुख, अकेलापन उसको भी सालता है। अगर पिता का जीवन प्रेम से खाली हो और वे अपने लिए प्रेम ढूंढ ले। कोई नाराज़ नहीं होता। सबको लगता है पिता को सुख का अधिकार है। किसी को नहीं लगता कि माँ को भी सुख का अधिकार है। 

लेकिन जो अपने लिए कुछ नहीं चाहती क्या हम बच्चों को उसके लिए कुछ नहीं चाहना चाहिए? जो हमें निस्वार्थ भाव से प्रेम करती है क्या हमें कभी उसका प्रेम लौटाना नहीं चाहिए? 

माँ, मैं आपका बेटा हूँ। मैंने आपको तकलीफ सहते हुए करीब से देखा है। आपने पूरे पच्चीस साल पापा के साथ निकाले हैं। पापा जो दिल के अच्छे इंसान थे। लेकिन गुस्सेल और बदजुबान भी थे। आप कहेंगी ‘बेटा दिवंगत आत्मा के लिए इस तरह नही कहा करते।’ पर माँ आज मुझे मेरे मन का गुबार लिख लेने दो। मुझे हल्का हो जाने दो। पापा न जाने क्यों इन्फ़िरिअरिटी काम्प्लेक्स से ग्रसित रहते थे? पता नहीं उन्हें जिन्दगी से असुरक्षा की भावना क्यों जोड़ रखी थी? और इसी से निजात पाने के लिए वे गुस्से की शरण लेते थे। जो फिर एक नई गलती हो जाती थी। 

 माँ, अब मैं बड़ा हो गया हूँ। मैं आपके साथ खड़ा हूँ। आप अनावश्यक द्वंद्व से उबर जाओ। मैंने आपकी नजरों में प्यार को पनपते देखा है। और आपको उसे छुपाने की नाकाम कोशिशें करते हुए भी। माँ, आप डाक्टर मेहरा से प्यार करने लगी हो। इसमें कुछ भी गलत नही। वे भी आपको चाहते हैं। मेरी उनसे बात हुई है। वे आपसे शादी करना चाहते हैं। मैं जानता हूँ कि आप भी यही चाहती हैं। बस झिझक रही हो। मैं आपके निर्णय को उचित समझता हूँ। आप को इसका पूरा हक है। मैं मानता हूँ कि प्रेम के आगे सिर झुकना चाहिए सम्मान में। फिर चाहे वह प्रेम माँ का ही क्यों न हो। मैं चाहता हूं जिन्दगी के उतरार्ध में आपको खिलती कलियों-सा सुख नसीब हो। आपको होने वाली शादी मुबारक हो माँ! 
***

आशीष ने कभी सोचा नहीं था कि उसकी पहली पब्लिक पोस्ट एक ही दिन में इतनी लाइक्स बटोर लाएगी। उसने बस अपना दिल खोल कर रख दिया था। यह सोचते हुए कि भले अभी तक रीना ने उसकी बात का जवाब नहीं दिया है। पर वह खुद को स्वार्थी की श्रेणी में नहीं गिनना चाहता। 

 हाँ, पोस्ट लिखने से पहले उसने इतना जरुर सोचा था कि ‘मेरी अभी ज़िन्दगी की शुरुवात है। रीना अगर मुझे नहीं भी मिल पाई कोई बात नहीं। मुझे और मौके मिलेंगे। पर मेरी माँ की बची ज़िन्दगी में कदाचित यह पहला और आखिरी अवसर हो। मैं इसी तरह माँ का प्यार कुछ हद तक लौटा सकता हूँ। फिर मैं क्यों पीछे हठूँ? पहले माँ की शादी फिर मेरी यही ठीक रहेगा।’

न जाने किस धुन में आशीष के कदम बगीचे की ओर मुड़ गए। उसी झूमर की तरह लटकते, झूलते पीले फूलों वाले अमलतास के पेड़ के नीचे लगी बैंच की ओर। उसने देखा फ़िलहाल वहाँ पचपन वर्षीय डाक्टर मेहरा पचास वर्षीया माँ के साथ बैठे थे! यूँ अमलतास के फूलों में सुगंध नही होती लेकिन आज आशीष के नथुने सुवास से भर उठे। वह मुस्कुरा दिया। और फेसबुक पोस्ट खोलकर बढ़ती हुई लाइक और कमेन्ट देखने लगा। शायद कहीं रीना का नाम दिख जाए!
***
परिचय

प्राध्यापक, वनस्पति शास्त्र शासकीय होलकर विज्ञान महाविद्यालय इंदौर (मध्य प्रदेश)

चार एकल पुस्तकें 'अथवा', 'नो पार्किंग', 'नामायन', 'इंदु की स्लाइड', तथा चार साझा संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित।
हिंदी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन, मराठी व गुजराती पत्रिकाओं और पुस्तकों में कहानियाँ अनूदित. कहानियों पर टेली फ़िल्में निर्मित, कहानियों के नाट्य रूपान्तर मंचित, आकाशवाणी इंदौर से कहानियाँ प्रसारित। 
कादम्बिनी, कथाक्रम, कथादेश, कथाबिम्ब, कथा समवेत, अहा जिंदगी अमेज़न पेन टू पब्लिश आदि से रचनाएँ पुरस्कृत।

सम्पर्क
डाक: एफ 8, रेडियो कालोनी, इंदौर  (मध्य प्रदेश)
चलभाष: +91 992 656 0144
ईमेल: kislayapancholi@gmail.com

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