व्यंग्य: लालकिला और खाई

हरीश नवल

हरीश नवल


भारत एक किला प्रधान देश है। भारतवर्ष में वर्षभर जितने पर्यटक आते हैं, वे जिन पर्यटन प्रसिद्ध नगर, प्रांतरों में भ्रमण करते हैं, वहाँ किले ज़रूर होते हैं। किले बहुत आकर्षित करते हैं। बरसों बरस से मुस्तैदी से खड़े हैं। उनकी विशालता, दृढ़ता और इतिहास उनके पार्श्व में उनकी ‘यशोगाथा’ कहते हैं।

कभी अपने सोचा कि आज़ादी के बाद के हमारे नेता और किलों में कुछ समानताएँ होती है। उनकी विराटता कई बार किलों से भी अधिक विशाल होती है। वे दृढ़ता के प्रतीक होते हैं, जो भी देश के नाम पर वे अपने लिए करते हैं, उसमें अडिग रहते हैं, बहुधा देश की अर्थव्यवस्था ऋणात्मक होती है किंतु इनकी उत्तरोत्तर धनात्मक। उनकी बुर्जियों पर उनकी विजयपताका फहरती रहती है जैसे किलों पर ध्वज।

दिल्ली गए होंगे तो आपने लालकिला अवश्य देखा होगा। भारत की शान दिल्ली और दिल्ली की पहचान लालकिला। दूर से देखने पर लालकिला को अपनी बाँहों में घेरे एक खाई आपको नज़र नहीं आती है। ऐसी ‘खूबसूरत’ खाई प्रायः हमारे हर बड़े नेता के साथ होती है। दरअसल जितनी बड़ी और गहरी खाई होती है, उतना ही बड़ा हमारा नेता होता है। दूर से वह आपको ज़मीन की सतह से जुड़ा दिखता है पर जैसे जैसे आप उसके क़रीब जाते हैं, आप पाते हैं कि वह अभी भी दूर है और आप कब खाई में गिर जाते हैं, आपको पता भी नहीं चलता।
कृपया किला देखने से पूर्व उसकी ‘खाई’ के विषय में अवश्य सावधान रहें।


2 comments :

  1. जितेंद्र भटनागरMarch 2, 2022 at 5:41 AM

    क्या खूब समानता का वर्णन किया है आपने! बहुत खूब! सुन्दर!

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  2. जितेंद्र भटनागरMarch 2, 2022 at 5:49 AM

    क्या खूब समानता का वर्णन किया है आपने! सुन्दर!

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