जीवन का विस्तृत फलसफा प्रस्तुत करती लघुकथाओं का संग्रह: मैं नहीं जानता

समीक्षक: दिनेश पाठक ‘शशि’

28, सारंग विहार, मथुरा-6
चलभाष: +91 987 063 1805 
ईमेल: drdinesh57@gmail.com
पुस्तक: मैं नहीं जानता (कहानी संग्रह)
लेखक: कमलेश भारतीय
ISBN: 978-93-89389-46-3
पृष्ठ: 136
मूल्य: ₹ 195.00 रुपये
प्रकाशन वर्ष (द्वितीय संस्करण): 2021 
प्रकाशक: हंस प्रकाशन, नई दिल्ली


शिक्षक, प्राध्यापक एवं प्राचार्य के पदों पर अपनी सेवाएँ देने के बाद दैनिक ट्रिब्यून अखबार में मुख्य संवाददाता रहे, हिन्दी साहित्य की कहानी एवं लघुकथा विधाओं में साधिकार लेखनी चलाने वाले, शिक्षाविद्, पत्रकार एवं विद्वान साहित्यकार श्री कमलेश भारतीय ने अपनी लेखनी से 10 कृतियों का सृजन करके हिन्दी साहित्य में श्रीवृद्धि की है।

आप हरियाणा ग्रन्थ अकादमी के उपाध्यक्ष पद पर भी रहे, साथ ही अकादमी की पत्रिका ‘कथा समय’ के सम्पादक भी रहे।

'मैं नहीं जानता' उनका लघुकथा संग्रह है जिसमें उनकी 101 लघुकथाएँ एवं लघुकथा पर केन्द्रित डॉ. लता अग्रवाल द्वारा लिया गया उनका साक्षात्कार भी समाहित किया गया है।

लघुकथा संग्रह 'मैं नहीं जानता' में समाज और मनुष्य जीवन के विविध विषयों, सुख-दुःख, हानि-लाभ, यश-अपयश के विभिन्न रूपों को लघुकथा में पिरोकर इस प्रकार प्रस्तुत किया गया है कि पढ़ने के बाद पाठक उस विषय पर बहुत देर तक चिंतन करने पर अपने आप को वाध्य पाता है।

कमलेश भारतीय जी ने इस संग्रह की कुछ लघुकथाओं में दहेज रूपी कोढ़ को उद्घाटित किया है तो ‘जन्मदिन’, ‘नामकरण’, ‘अगले जन्म मोहि...,’ ‘सात ताले और चाबी’, ‘यह कैसा स्वागत’ आदि कुछ लघुकथाएँ नारी होने की पीड़ा को अभिव्यक्त करती नजर आती हैं।

अक्सर नारी ही नारी की दुश्मन बनती आई है संग्रह की लघुकथा-हार’ भी ऐसा ही कुछ प्रकट कर रही है किन्तु इस संग्रह की लघुकथा "मैं तुम्हें प्यार नहीं करती" इस बात को अपवाद सिद्ध करते हुए सम्बन्धों की शुचिता का आग्रह करती नजर आती है-

"जब एक औरत द्वारा अपना पति छीन लिए जाने का दुःख भोग रही हूँ तब तुम मुझसे यह उम्मीद कैसे करते हो कि मैं अपना घर बसाने के लिए किसी का बसा बसाया घर उजाड़ दूंगी? मैं तुम्हें बिल्कुल मोहब्बत नहीं करती।" (पृष्ठ -22)

 नारी की परतंत्रता और नारी के शोषण के विविध रूपों का उल्लेख करती लघुकथाएँ हैं ‘शर्त’, ‘मैं खूबसूरत हूँ पर’, ‘आज का रांझा’ तथा ‘स्त्री’, तो ‘मन का चोर’ एक ऐसे पति की लघुकथा है जो कल्पना में अपनी पत्नी की जगह किसी अन्य स्त्री को बसाये रखता है। वहीं प्रेम को व्याख्यायित करती लघुकथा है ‘बहुत दिनों बाद’।


दिनेश पाठक ‘शशि’
प्रेम के विभिन्न रूपों को बहुत ही बारीकी से कई लघुकथाओं के द्वारा व्याख्यायित किया गया है इस संग्रह में। जिनमें पारिवारिक प्रेम भी प्रेम ही होता है, मात्र दिखावा ही प्रेम नहीं होता, इस बात की पुष्टि करती नजर आती है संग्रह की लघुकथा-‘कसौटी’, तो प्रेम प्रेम होता है जब चाहत दोनों ओर बराबर की हो, इस बात को रूपायित करती लघुकथा है ‘सर्वोत्तम चाय’। प्रेम में साहस का होना, प्रेम की परिपक्वता यानि लक्ष्य तक पहुँचाने में सहायक होता है अन्यथा अपने प्रेम को खो देना पड़ता है, इस बात को दर्शाती लघुकथा है-‘कायरता’। पति-पत्नी के बीच के प्यार को प्रदर्शित करने वाली संग्रह की लघुकथा है ‘कुछ खास नहीं’।

विभिन्न बातों को मुद्दा बनाकर लड़ने के स्रोत खोजते इंसान को राह दिखाती लघुकथा है ‘चौराहे का दिया’ तो धर्म और जाति-पांति के आधार पर बंटते हुए इंसान का खुलासा करती लघुकथाएँ हैं ‘सवाल’, ‘ये घर किसका है’ आदि।

कभी-कभी परिस्थितियों के वशीभूत हुआ इंसान, घर-परिवार और समाज के विरोध को सहन करते-करते इतना बदल जाता है कि वह अपने अतीत से भी छुटकारा पाना चाहने लगता है। ऐसे ही विवश इंसान की बात प्रस्तुत करती लघुकथा है इस संग्रह की शीर्षक लघुकथा ‘मैं नहीं जानता’।

आपसी सम्बन्धों के महत्व को दर्शाती हुई संग्रह की लघुकथाओं में जिनका नाम लिया जा सकता है वे हैं, ‘मेरे अपने’, ‘रिश्ते’, ‘उपहार’, ‘सेलिब्रिटी’ आदि।

कुछ लोगों पर अपने देश से अधिक पाश्चात्य की संस्कृति अधिक प्रभाव छोड़ती है। इस बात की ओर भी लघुकथाकार का ध्यान गया है और उन्होंने लघुकथा दी हैं- ‘बैग’ तथा ‘डर’ तो लघुकथा-‘कितनी चाबियाँ’ भी परिवार के उन सदस्यों की स्थिति को स्पष्ट कर रही है जो पाश्चात्य जीवन शैली पर अति भौतिकता की दौड़ में बेतहासा दौड़ रहे हैं। यानि जिस तरह कोई व्यक्ति होटल के कमरे में आकर ठहरता है, परिवार का हर सदस्य भी घर की चाबी अपने-अपने पास रखता है और जब लौटता है तो बिना एक-दूसरे को डिस्टर्ब किए अपनी चाबी का प्रयोग करता है। और इसी भावभूमि को आगे बढ़ाते हुए कमलेश भारतीय जी ने जीवन की उस आपाधापी को, जिसमें इंसान अपने विगत की मोहक यादों को भी भुला बैठता है, व्यक्त किया है- ‘ऐसे थे तुम’ तथा ‘खोया हुआ कुछ’ लघुकथाओं के माध्यम से।

कमलेश भारतीय जी के जीवनानुभव बहुत विस्तृत हैं इसलिए उनके इस लघुकथा संग्रह 'मैं नहीं जानता' में जीवन के विविध रूपों का बहुत ही सजीव चित्रण करती हुई लघुकथाओं का विपुल भण्डार है।

बच्चे जैसा बड़ों को करते हुए देखते हैं वैसा ही अनुसरण वे करने लगते हैं, इस बात की पुष्टि करती हुई लघुकथा है ‘जीवन और चौराहा’ तो गतानुगति को लोको की पुष्टि करती हुई लघुकथा है ‘ईश्वर का जन्म’।

गरीबों के बच्चे बहुत कम उम्र में ही समझदार हो जाते हैं इस बात की पुष्टि करती हुई लघुकथाएँ हैं ‘समझ’ तथा ‘शर्मिंदा’ वहीं मंहगाई से त्रस्त मानव की हालत को दर्शाती लघुकथाएँ हैं ‘दहशत’ तथा ‘गुनहगार’।

गरीब-अमीर के भेद को दर्शाती संग्रह की लघुकथा है ‘फटकार’ तो भ्रष्टाचार के विविध रूपों को व्याख्यायित करने वाली संग्रह में कई लघुकथाएँ हैं जैसे ‘तंत्र और आदमी’, ‘विश्वास’, ‘अपने आदमी’, ‘ईमानदारी’, ‘बस इतनी सी बात’, ‘असलियत’, ‘लेखक और पुरस्कार’ तथा ‘तिलस्म’, ‘दौड़’ तथा ‘कारण’, ‘राजनीति के कान’ आदि।

कमलेश भारतीय जी ने साहित्यकार, पत्रकार, शिक्षक और प्रशासनिक अधिकारी आदि अनेक रूपों में जिन्दगी के विभिन्न रूपों को करीब से देखा-परखा है। वही जीवनानुभव और अनुभूतियाँ उनकी लघुकथाओं में स्पष्ट देखे जा सकते हैं।

किसान जो पूर्ण रूप से प्रकृति और दैव पर निर्भर रहता है ऊपर से दलालों की दलाली भी उसे झेलनी होती है की बेचारगी को भी लघुकथा-‘ओले’ के माध्यम से व्यक्त किया गया है तो पेट की भूख को शान्त करने के लिए चालाकी का सहारा लेते आदमी की स्थिति को व्यक्त किया गया है-‘भिखारी’ तथा ‘मस्तराम जिंदाबाद’ लघुकथाओं में। वहीं गरीबी की मजबूरियों को व्यक्त किया गया है ‘अंगूठा’, ‘बचपन’, ‘कसैला स्वाद’ आदि लघुकथाओं के द्वारा और गरीबों द्वारा निष्छल सेवाभाव को व्यक्त करती हुई लघुकथा है ‘दुविधा’ वहीं सामन्तवाद पर श्रमिक वर्ग की जीत को दर्शाती हुई लघुकथा है ‘श्रमसंगीत’।

संग्रह में कुछ लघुकथाओं ‘समाज सेवा’, ‘शौक’ तथा ‘फीता और जेब’ के माध्यम से समाज सेवा के नाम पर दलाली करने वालों का भी कच्चा चिट्ठा बांचा गया है तो लघुकथा ‘जल्दबाजी’ में शव वाहन के ड्राइवर की, ‘सहानुभूति’ में विकलांगों की सेवा का दिखावा करने वालों की तथा ‘इश्तिहार’ में ताबूत खरीदने के लिए दुबारा आने का आमंत्रण का विज्ञापन, सभी इंसान की संवेदनहीनता को प्रकट करने वाली लघुकथाएँ हैं तो संवेदनशीलता को दर्शाती लघुकथा ‘सबसे खूबसूरत मुस्कान’ भी है।

पुलिस विभाग की कार्यप्रणाली को दर्शाती लघुकथाएँ हैं ‘पुलिस कार्यवाही’ और ‘कार्यवाही’।

मनुष्य के स्वाभिमान को व्यक्त करती लघुकथा है ‘स्वाभिमान’ वहीं पद के अहंकार और अधीनस्थों की मजबूरी को ‘बासी धूप’ और ‘पहचान’ के माध्यम से स्पष्ट किया गया है।

यह सत्य है कि हम दूसरों का सम्मान करके ही स्वयं के सम्मान के अधिकारी बनते हैं जिसे विद्वान लघुकथाकार कमलेश भारतीय जी ने लघुकथा ‘खण्डित मूर्ति’ के माध्यम से अभिव्यक्त किया है।

अपनी बहन, बहन होती है और दूसरों की बहन, बहन नहीं होती, ऐसी दोहरी मानसिकता रखने वालों पर करारा चांटा जड़ती संग्रह की अच्छी लघुकथाएँ हैं ‘संस्कृति’, ‘सबसे बड़ी खुशी’ और ‘नेगेटिव’।

कलयुग के प्रभाववश आज की संतति बुजुर्गों तथा वृद्ध माता-पिता को धोखा देने से भी नहीं चूकती। किन्तु माता-पिता फिर भी अपनी संतति का बुरा नहीं चाहते। वृद्ध माता-पिता की सम्पत्ति को हड़पने का प्रयास करते ऐसे ही पुत्र-पुत्रवधु की नीयत का खुलासा करती लघुकथा है ‘लापता’ तो माता-पिता का अपमान करके बड़ा बने आदमी को भी झुकना ही पड़ता है या कहें कि दो नम्बर की कमाई में सिर को नीचा होना ही पड़ता है, इसी बात की ओर इशारा करती लघुकथा है-‘कारोबार’ तो सफलता प्राप्ति के लिए अपनाया गया हर शॉर्टकट दुर्गंधपूर्ण ही होता है इस बात की पुष्टि करती हुई लघुकथा हैं, ‘शॉर्टकट’ और ‘मैं और आप’।

मनुष्य के सोचने की दिशा पर निर्भर करता है कि वह गिलास को आधा खाली समझता है या आधा भरा। एक साहित्यकार का दायित्व होता है कि वह समाज में मधुरता भरने का और समाज को जोड़ने का प्रयास करे न कि तोड़ने का। श्री कमलेश भारतीय जी इस कार्य में सिद्धहस्त हैं। संग्रह की लघुकथा ‘उपहार’ की नायिका पड़ोसी के घर में लगे पौधे से अपने घर में बिखर जाने वाले फूलों से तंग आकर उलाहना देती है और पड़ोसियों को पेड़ कटवा देने के लिए अपने पति से कहती है। इस पर पति का जबाव सुनकर नायिका मुस्करा उठती है-

"मैंने हँसते हुए इतना ही कहा कि ये कितने अच्छे पड़ोसी हैं जो सुबह-सुबह हमारे आँगन में उपहार के तौर पर फूल बिखेर देते हैं, वर्ना पड़ोसी तो कब, कितने कांटे बिखेर दें, कौन रोक सकता है।" (पृष्ठ -68)

कुल मिलाकर लघुकथा संग्रह की अधिकांश लघुकथाएँ अपनी मार्मिकता से पाठक के हृदय पर अपना प्रभाव छोड़ने में पूर्ण सक्षम हैं तथा उसे चिंतन करने पर विवश करती प्रतीत होती हैं। कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि लघुकथा के सभी मापदण्डों का पालन करते हुए जीवन का विस्तृत फलसफा प्रस्तुत करतीं लघुकथाओं का संग्रह है ‘मैं नहीं जानता’।

संग्रह का मुद्रण त्रुटिहीन एवं साफ-सुथरा है। लघुकथा ‘मैं तुम्हें प्यार नहीं करती’ त्रुटिवश पृष्ठ 22 तथा 44 पर भी, दो जगह प्रकाशित हो गई है।

हिन्दी साहित्य जगत में लघुकथा संग्रह ‘मैं नहीं जानता’ का भरपूर स्वागत होगा, ऐसी आशा है।

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