कहानी: एडमिन

कुमार विक्रमादित्य

सहायक शिक्षक, माध्यमिक


“थोड़ा बगल हो जा न यार।”
“क्यों हो जाऊँ?”
“अरे ठीक से बोल, सभी को जाना है।”
“अगर तुम थोड़े से आगे खिसक जाओगे तो मैं भी बैठ जाऊँगा।”
“अच्छा आओ, पर उन्हें तो देखो जो जरदगव* जैसे सीट पर बैठा हुआ है।”
“हाँ भाई साब, जरा अपने पैर को सीधा करेंगे।”
“अरे चल, बड़ा सयाना बनने आया है।”
“भाई साब, प्रेम की भाषा अगर न समझते हों तो क्या मैं अपने असली रूप में आ जाऊँ।”
क्या बोला? तू मुझे डरा रहा है!”
“अरे नहीं चाचा, भला आप मुझसे क्यों डरने लगे। पर क्या करूँ, कुम्भकरण को जगाने के लिए गाजा-बाजा और हाथियों की व्यवस्था तो करनी ही पड़ेगी न।”
मुझसे भी नहीं रहा गया। मैंने कहा, “चाचा अगर आप थोड़े से बगल हो जायेंगे तो वह भी बैठ जाएगा।”
“अरे यार तुम भी, पहले अपने बैठा अब इसकी तरफदारी कर रहे हो। ज्यादा दिल्लगी है तो तुम उठ जाओ और उसे बैठा लो।”
“ठीक है चाचा अगर आपको अच्छा लगेगा तो ये लीजिये मैं उठ जाता हूँ,” यह कहकर मैं उठ गया और उनसे कहा,  “दोस्त बैठ जाओ तुम।”
निर्लज्जता की भी पराकाष्ठा को जब कोई लाँघ जाता है तो उससे बड़ा निर्लज्ज को सामने आना पड़ता है। वही हुआ कोशी एक्सप्रेस बख्तियारपुर जंक्शन पहुँच चुकी थी। भीड़ ने गाड़ी के अन्दर प्रवेश किया। दो लोग वहाँ उतरने वाले थे इसलिए मैं चाचा जी के सामने बैठ गया।
 
भीड़ को आते देख चाचा जी ने अपने आसन को और चौड़ा कर लिया। एक आगंतुक ने कहा, “चाचा जरा ठीक से बैठना।” चाचा जी ने वही रटा रटाया कथन दुहरा दिया। 

चचा जी गर्व से बखान कर रहे थे, “अरे इन दोनों लड़कों को देख रहे हो, तुम्हारे जैसे ही बरबराते हुए आया था पर कोई फायदा नहीं।” पटना से यहाँ तक खड़ा आया और अब जाकर उसे सीट मिली तो वहाँ जाकर बैठा है।
यह सुनते ही उसने अपने और दोस्तों को आवाज दिया। अब बराबरी की बात होने वाली थी। फिर शुरू हो गया दे दनादन। उन सभी ने मिलकर चाचा को सीट पर से उतार फेंका और वह आगंतुक आराम से सीट पर विराजमान हो गया। चाचा ने हमें देखा और अपनी नज़रें झुका लीं। हम लोगों ने भी अपनी नज़र उधर से फेरना ही मुनासिब समझा। बाकी लोग जो ट्रेन में बैठे थे सबने चुप्पी साध ली क्योंकि अभी तक जो शेर बना था वह अब बिल्ली बन खड़ा था।

अपनी बेइज्जती किसे अच्छी लगती है। कुछ देर तो वह चाचा यूँ खड़ा रहा फिर अपना सामान लेकर हमारे कम्पार्टमेंट से निकलने लगा। तभी किसी ने पूछ लिया, “क्या हुआ चाचा आप यही उतरेंगे!”
उसने धीरे से कहा, “हाँ यही उतरना है।”
“पर चाचा आप तो सहरसा जाने वाले थे न।”
“हाँ हाँ सहरसा, नहीं-नहीं वहाँ नहीं।” आपको कोई ग़लतफ़हमी हुई होगी। सभी उनकी हकलाहट पर हँसने लगे। वह वहाँ से चुपचाप जाना ही मुनासिब समझा।

कुछ देर की चुप्पी के बाद आगंतुक ने मुझसे पूछा भाई कहाँ जाना है आपको। मैंने सहरसा कहा तो वह बोला, “अरे मुझे भी तो वही जाना है।”
“सहरसा में कहाँ,” मैंने कहा “महावीर चौक।” 
“महावीर चौक पर कहाँ?” 
“अरे रिफ्यूजी कॉलोनी, ... और आपको।” 
“मुझे गंगजला जाना है। अच्छा कहाँ से आ रहे हो?”
“पटना से ही। कुछ आवश्यक काम था आज ही आया था और वापस लौट रहा हूँ।”
“तुम सहरसा ही रहते हो क्या?”
“अरे नहीं, मैं पटना रहता हूँ।”
“क्या करते हो वहाँ?”
“एक्सपोर्ट इम्पोर्ट का काम है। वैसे तो मैं अक्सर बाहर ही रहता हूँ। पहले केन्या में था अभी श्रीलंका में कारोबार है। इसी सिलसिले में यहाँ आया था सोचा चलो घर भी हो आते हैं। क्या नाम है आपका?”

मैंने कहा, “चन्द्रशेखर मिश्र पर लोग मुझे चंदू कहते हैं। जिला स्कूल में जब पढता था तभी से सभी मुझे चंदू ही कहते हैं।” उसने मुझे गौर से देखा, “अरे मित्र तुमने मुझे पहचाना नहीं, मैं भी तो तुम्हारे सेक्शन में ही था।”

मैंने भी उसे ध्यान से देखा, “कहीं तुम प्रतीक तो नहीं।”
“हाँ-हाँ मैं प्रतीक ही हूँ। अरे यार ये बात मुझे पहले पता होता तो उस चाचा की तो खैर नहीं थी। पर छोड़ो, पूरे पच्चीस बरस हो गए जब हमलोग साथ पढ़ते थे। उस चाचा के कारण हम साथ तो हो गए।”

अब यादों का सिलसिला बढ़ चुका था। हमलोगों के सामने जिला स्कूल की यादें एक एक कर सामने आने लगी। सभी शिक्षक और उनसे जुड़ी यादें ऐसे आने लगे मानो आज ही हमलोगों ने अपनी पढाई वहाँ से ख़तम किया हो। 
मैंने पूछा दोस्त प्रतीक तुम क्या कर रहे हो अभी? उसने कहा मैं पत्रकार हूँ और दैनिक अखबार में काम करता हूँ। फिर हमारी बातें आगे बढ़ चली। हमलोगों ने कई मित्र के बारे में पूछा। कुछ जो अच्छे पदों पर थे उसके बारे में तो पता चला लेकिन बाकी गुमनाम ही थे। हम अपने सारे दोस्तों को याद करने की कोशिश की पर मुश्किल से पंद्रह बीस जाते-जाते हमारे सोच का अंतिम विन्दु आ चुका था।

इस तरह बातों का सिलसिला तब तक चलता रहा जब तक हम सहरसा नहीं पहुँच गए। एक दूसरे से विदा ली नंबर का आदान प्रदान किया और फिर मिलने का वादा कर अपने घर की तरफ चल दिया।

मैंने घर आकर पास के दोस्तों से संपर्क किया। पता चला विप्लव पटना से कल ही आया है। मैं तुरंत उसके घर पर गया और कुछ बातें की। अब दोस्त के बारे में पता किया कि कौन कौन सहरसा में है। विप्लव ने आदित्य को फ़ोन किया। हमलोग अब दस हो चुके थे। हम सभी लोग विप्लव के साथ बैठे और एक योजना बनायी कि क्यों न ऐसा हो कि सभी लोग जिला स्कूल वाले मित्रों को याद करें और सभी का नंबर आदान प्रदान हो। काफी देर बात हुई फिर हुआ कि हमलोग जब अगले बार आएंगे तो एक बैठक किया जाय। चाय पीकर हमारी बातें ख़तम हुई।

त्रिलोक जो डॉक्टरेट करने के बाद सहरसा में ही रह रहा था वह आदित्य का लंगोटिया यार था। हर दुःख सुख में उसका साथ निभाता था। इतना ही नहीं जब उसके डार्लिंग ने उस पर कोई ध्यान नहीं दिया था तो उसके टूटे दिल को जोड़ने की जिम्मेवारी भी उसी की थी। वाह रे दोस्ती, प्रतिदिन त्रिलोक एक ही कहानी उसे सुनाता। “अरे यार वो छत पर आयी थी मैंने उधर देखा था फिर वह पीछे मुड़कर चली गयी।”

अब इसके कई अर्थ वह लगाता। कभी कहता इसका मतलब हुआ दोस्त कि वह हमसे बहुत प्यार करती है, दूसरे दिन कहता पीछे मुड़ने का मतलब शायद उसकी परेशानी होगी कि कोई उसे देख न ले। फिर कहता एक दिन धूप में वह कपड़ा टांगने आयी थी। आदित्य के मन में आता कि वह बोल दे कि कपड़ा धूप में नहीं सुखाने आयेगी तो भला पानी में सुखाएगी पर चुप रहता कि उसके ऐसा कहने से कहीं दोस्त का दिल न दुखे।

पर सब दोस्त एक जैसे तो नहीं ही होते न, एक दिन सुमित खीजकर बोला, “तुम पागल हो गए हो, अरे वह तुम्हें बना गयी अब भी तो बात को समझो।”

त्रिलोक यह सुनकर निराश हो गया और लगभग रोते हुए बोला, “तुम लोगों को मेरा प्यार मजाक लग रहा है।”

फिर आदित्य ने उसे संभाला, “अरे मित्र छोडो न उसे, भला वह क्या समझेगा। आजतक किसी से प्यार किया है क्या!”
चुप हो जाओ मित्र, “मैं हूँ न”। मैं तुम्हारी भावना को समझता हूँ फिर, दोनों घंटों बात करते और त्रिलोक वही कहानी लेकर फिर बैठ जाता। ऐसी दोस्ती थी दोनों की। 

अरे दोस्त शाम को चलना है डॉक्टर हरि के यहाँ, त्रिलोक ने आदित्य को फ़ोन किया। हरि आदित्य के साथ ही पढता था लेकिन जिला स्कूल के बाद कभी भी उससे मुलाक़ात नहीं हुई थी। वे लोग डॉ हरि के क्लिनिक पर पहुँच चुके थे। सिटी हॉस्पिटल में आपका स्वागत है, उसने हॉस्पिटल के गेट पर लगे बैनर को देखा। सामने हरि उनलोगों को देखकर मुस्कुरा रहा था। उसने अपने दिमाग पर जोर लगाया। अरे हाँ यह तो वही है जिसे एक दिन मन्नी बाबू ने प्रश्न पूछे थे और वह कुछ भी नहीं बोल पाया था।

किस्मत और उनकी मेहनत दोनों ने उसका बखूबी साथ दिया था, आज वह डॉ और मैं शिक्षक यह सोचकर वह बुदबुदाने लगा। तभी हरि ने उसे जगाया अरे कहाँ खो गए मित्र। उसने कहा अरे सोच रहा था काश वो पुराने दिन वापस आ जाते जब हर्षराज बाबू के डर से हमलोग भागा करते थे और पंडित जी की एक आवाज पर हम सभी थरथरा जाते थे। चाय ख़तम होते होते कुछ और दोस्त वहाँ आ गए थे। प्रतीक भी वहाँ आ चुका था। उसने वे बातें बतायी जो ट्रेन में उसे हमारे साथ हुई थी। सभी एक दूसरे को देखकर हँसने लगे। काफी देर बातें हुई फिर निर्णय हुआ कि दोस्तों को जोड़ने के लिए सभी अपने स्तर से प्रयास करें।

हरि बोला, “...और मेरा क्लिनिक तुम सभी के लिए खुला है जब भी मीटिंग करनी हो तुम सभी यहाँ आ सकते हो।” वही हुआ कई मीटिंग हुई तरह तरह के दोस्त जो गुमनाम थे निकल निकल कर सामने आने लगे। डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, पत्रकार, वकील, थानेदार, मेजर, शिक्षक, पदाधिकारी के साथ साथ अपना रोजगार करने वाले जैसे टेलर मास्टर, ठीकेदार, दुकानदारी के अलावे ऐसे भी थे जिसके बारे में उसे खुद भी पता नहीं था कि वह क्या कर रहा है तो भला हमारी क्या औकात। हाँ पर एक बात थी इस पच्चीस वर्ष में सभी अपने परिवार को व्यवस्थित करने के चरम बिन्दु को छू रहे थे। शाम होने को आयी वे लोग वहाँ से विदा लेकर वापस आ चुके थे।

एक शाम को मैं अपने व्हाट्स एप्प पर किसी का सन्देश देख रहा था तभी कई सन्देश एक साथ आने शुरू हो गये था। हमने देखा एक समूह का नाम यार कमीने आ रहा है और मैं प्रतीक के द्वारा जोड़ा जा चुका हूँ। फिर फटाफट कई फोटो आने लगे सभी अपने बारे में फोटो के साथ परिचय देने में लगे थे। मैंने समूह के अन्दर जाकर देखा तो पता चला, प्रतीक ही अपने समूह का एडमिन है और वही सभी को जोड़ रहा है। 

कई दिन तक यह सिलसिला चलता रहा। कई नए दोस्तों से परिचय हुआ। छोटे मोटे सन्देश आने लगे थे, हाय हेल्लो से आत्मीयता बढ़ने लगी थी। सभी अपने दोस्तों के बारे में पढ़कर आह्लादित होते। जब भी कुछ वीडियो आते, सभी उन्हें चाव से देखते। सभी अपने परिवार के सभी सदस्य से उसे शेयर करते और गर्व से कहते देखो मेरे दोस्तों का समूह कितना अच्छा है पर तभी ऐसे कुछ दोस्तों ने समूह में प्रवेश किया जो कोकशास्त्र के विशेषज्ञ थे। उनका कहना था कि अरे जीवन में सेक्स के अलावे और कुछ है क्या! इसलिए इसके हरेक प्रकार को जानना चाहिए। बहुत फुर्सत थी उन्हें, पता नहीं कहाँ-कहाँ से वीडियो इकठ्ठा करते थे। कभी कुत्ता वाला तो कभी घोड़ा वाला, कभी देशी कभी विदेशी, अपने मूड के अनुसार वह भेजते थे। अन्य सदस्यों को उनके संदेश और विडियो असहज लगने लगे थे।

एक दोस्त का मोबाइल उसके बच्चे के हाथ में था तभी एक विडियो आया। बच्चे ने उसे खोल कर देखा और दौड़कर पापा के पास गया। पापा-पापा देखो न यह नंगू-नंगू है। अब तो काटो तो खून नहीं। उस बेचारे पर जो बीती होगी आप सोच सकते हैं। उसकी महारानी उन पर बरस पड़ी, यही है आपका दोस्त। बहुत बखान करते थे। 
उसने अगले दिन यह बात ग्रुप में शेयर की। कुछ दिन तो वे शांत रहे फिर वही दौड़ शुरू। जब तक सब दूसरे से कहते, "गलत बात" तब तक एक और संदेश आ जाता। उस बेचारे दोस्त ने आजिज होकर ग्रुप ही छोड़ दिया।
 
हमारी संख्या बढ़ती चली गयी समूह में कई सारे दोस्त निकल कर सामने आया। एक दिन अचानक से फ़ोन आया नए साल में सभी दोस्तों को हरि के क्लिनिक पर जमा होना है। सभी वहाँ जमा हुए, पार्टी हुई। सबको एक दूसरे को जानने का मौका मिला। प्रतीक ने सभी को एक दूसरे से परिचय कराया। मुश्ताक, अरवाज, समर, दिगंत, बल्लू, श्रीनाथ, जीवेश, प्रियंकर, गजनी, प्रवीण, अभिनंदन, कुंदन ऐसे कितने नाम जो अभी तक अनजान थे सब एक दुसरे से जुड़ गए थे। सभी एडमिन को मन ही मन धन्यवाद दे रहे थे कि उसके कारण हम सभी मित्र एक दूसरे से जुड़ सके। हमलोगों ने फिर से अगले वर्ष मिलने का वादा करके विदा लिया। उन दोस्तों को फिर से जोड़ा गया जो किसी कारण से समूह छोड़ चुके थे। अब उन दोस्तों ने अपने मोबाइल और एप्प दोनों पर लॉक लगाना सीख लिया था।
कब समय बीत गया पता भी न चला। आज फिर से समूह में सन्देश फैलने लगा था इस बार नए वर्ष में अपनी-अपनी बीवी को भी साथ में लाना है। हाँ न करते-करते सभी तैयार हुए। अब समस्या थी पत्नियों को मनाने की। किसी की तो आसानी से मान गयी पर कोई मैराथन जीतने में लगा हुआ था।

जिन लोगों ने समूह से रुखसत ले ली थी उन्हें भी पार्टी में आने का  संदेशा सुनाया गया। सभी लोग आये, एडमिन की मैडम भी आयीं। सभी मित्रों की पत्नियाँ भी एक दूसरे के नजदीक आ गयी थीं। हरि, समर और प्रतीक ने योजना बनायी कि महिलाओं का भी समूह बने। वह समूह बनाया गया। अभी तक जो परिवार बिखरा हुआ था अब एक संयुक्त परिवार लगने लगा था। मित्रोंकी शादियाँ होती गयीं और अशालीन संदेशों का स्थान शालीनता ने लेना शुरू कर दिया। हाँ, एक आध दोस्त इसके अपवाद थे जिसके रक्त में ही सेक्स का जीन सवार था उसे पता ही नहीं चलता कि कब उसकी उंगली नान वेज के बर्तन में चली गयी है।

सभी ने विचार किया कि इस वर्ष हमलोग अन्य बार से बेहतर करेंगे। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। इस वर्ष के शुरुआत में कोरोना महामारी फ़ैल गयी और हम चाहते हुए भी प्रकृति के आगे लाचार थे। इस वैश्विक महामारी के प्रथम लहर में तो हम सभी सुरक्षित बचे लेकिन दूसरी लहर ने हमारे कई मित्र को अपनी चपेट में ले लिया। हमारा एडमिन भी उस लहर का शिकार हुआ। उसने पहले तो घर में इलाज करवाया। हमारे डॉ मित्रों ने उसे दवाई दी पर हालत में सुधर नहीं हो रहा था, फिर उसे प्राइवेट अस्पताल में भर्ती कराया गया। जान बूझकर उसे हरि के क्लिनिक के समीप भर्ती कराया गया ताकि वो हमेशा सब के नज़र में रहे। 

दोस्तों ने दिन रात एक कर दिया। हमारे सभी कमीने दोस्त मोबाइल के स्क्रीन पर नज़र गड़ाए हुए थे। कभी संदेशा आता उसकी हालत अच्छी है, कभी खराब तो कभी सुधार हो रहा है। सभी मित्रों ने ईश्वर से प्रार्थना की मन्नतें माँगी, लेकिन सब बेकार एक दिन खबर आया मेरा मित्र हमें छोड़कर चला गया है। समय का तकाज़ा कि दोस्त अपने दोस्त के पास डर से मिलने तक न जा सका। अगर कुछ ने हिम्मत की भी तो उसके घरवालों ने रोक दिया।

दो चार दिनों तक समूह में सन्नाटा रहा फिर हरि ने प्रतीक के परिवार के लिए मिलकर कुछ करने का आह्वान कार्ते हुए ऑनलाइन मीटिंग की। यह निर्णय हुआ कि सभी दोस्त आर्थिक मदद करें ताकि उनकी पत्नी को अपने पैरों पर खड़ा किया जा सके। पता चला कि उसकी पत्नी को नर्सिंग में अभिरुचि है और वह समूह मिलन में भी इस बात का जिक्र हुआ था परन्तु प्रतीक के लिए दैनिक अखबार की पत्रकारिता से इतना पैसा जमा करना मुश्किल था कि वह उसका कोर्स करा सके। प्रतीक के जाने के बाद अब हमलोगों को वही एक रास्ता दिख रहा था।

सभी ने स्वेच्छा से मदद की। हाँ कुछ दोस्त ऐसे भी थे जो अंत तक यही देखते रहे कि कौन-कौन मदद के लिए आगे आ रहा है। पर, कभी भी अपने हाथ जेब पर नहीं गए। कुछ दोस्त ऐसे भी थे जो समूह में न रहते हुए भी मदद की। एक दोस्त सात समुद्र पार बैठा था, उसने भी अपने डॉलर खर्च किये।

हमलोगों ने इतने पैसे इकठ्ठे कर लिए थे कि नर्सिंग कोर्स के वास्ते भाभी को तैयार कर सकें। दिन तय हुआ कि हमें उनके घर जाना है।  एक दिन हरि और कुंदन भाभी के पास पहुँच चुका था। भाभी ने भी बात मान ली। दोनों ने वहाँ बैठे बच्चे को देखा जो माँ के आँचल से लिपटा था। जिसमें प्रतीक के बचपन का अक्स दिख रहा था। तभी कुंदन ने भाभी से समूह के एडमिन को बदलने का आग्रह किया। अगले ही पल उसने अपना मोबाइल हरि के हवाले कर दिया। कुंदन ने समर सालेह को नया एडमिन बनाया। फिर हरि ने भाभी से आग्रह किया कि अब आप इस समूह को छोड़ दें। भाभी वहाँ से उठकर कमरे के अन्दर चली गयी और सिसकने लगी। 

हरि और कुंदन वहाँ से जा चुके थे पर भाभी के लिये छोड़ गये थे मदद की वह पोटली जिस पर प्रतीक की अगली पीढ़ी का भविष्य टिका था।

इधर समूह में हलचल तेज हो चुकी थी। किसी ने आग्रह किया समूह से मत निकालो प्रतीक को। किसी ने कहा अरे पक्का कमीना निकला हरि। चार दिन हुए नहीं कि प्रतीक से पल्ला झाड़ लिया। जितनी मुँह उतनी बातें।

आदित्य ने कहा, “जरा सोचो दोस्त, अभी तक हमारा समूह एक परिवार के तरह था और परिवार के प्रत्येक सदस्य का उसपर अधिकार होता है। एक बात हमेशा याद रखनी चाहिए, विपत्ति के बाद उसका साथ देना चाहिए न कि उससे दूर होना चाहिए।”

तभी कुंदन ने सन्देश प्रेषित किया, “दोस्तों, अब हम प्रतीक को एडमिन नहीं रख सकते। अब यह मोबाइल नंबर कोई और प्रयोग करेगा। वैसे भी भाभी महिला वाले समूह में तो रहेगी ही न। अगर कोई दिक्कत होगी तो हमलोगों से संपर्क कर सकती है। हरि और समर ने भी उसका साथ दिया।”

तभी कुंदन ने दूसरा सन्देश भेजा, “अरे दोस्त मैं सबकी भावना की कद्र करता हूँ सुनो मैंने ये सभी बातें भाभी से पूछकर ही किया था और अभी भी वही बैठा हूँ। दोस्त थोड़ा प्रैक्टिकल होकर सोचो हमारे समूह में वेज और नॉनवेज सभी सन्देश आते रहते हैं इसलिए भाभी असहज महसूस करेगी।”

आदित्य ने कुंदन के सन्देश का उत्तर दिया, मान गए दोस्त पर ये बताओ “नॉनवेज सन्देश भेजना जरूरी है क्या?”
***
*जरदगव = बूढ़ा बैल

लेखक परिचय
हिंदी में कई कविताएँ व कहानियाँ प्रकाशित। मैथिली में पाँच रचनाएँ प्रकाशित - मेघलेखा (काव्य ग्रन्थ),  हर हर शूलीन (उपन्यास), दो आँखें (कहानी संग्रह), ऑनलाइन शिक्षा प्रणाली  (उपन्यास), मास्टरबा (उपन्यास), अंग्रेज़ी में RHYTHM and RHYTHM (उपन्यास)
सम्पर्क
डाक: कृष्णा नगर, सहरसा, बिहार 852201; चलभाष: 763 171 3526; ईमेल: kmrvikramaditya82@gmail.com 

3 comments :

  1. बहुत बहुत आभार ... अपने अंक में स्थान देने के लिए...

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  2. Wow that's great... बहुत प्यारी कहानी.. वर्तमान परिपेक्ष्य में प्रासंगिक

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  3. Very nice story Sir 👍👍👍

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