केसरिया बालमः प्रेम का भावपूर्ण, मार्मिक चित्रण

समीक्षक: विजय कुमार तिवारी


समीक्षित कृति: केसरिया बालम
उपन्यासकार: हंसा दीप
मूल्य: ₹ 300.00
प्रकाशक: किताबगंज प्रकाशन, गंगापुर सिटी

प्रवासी भारतीय डा० हंसा दीप आज किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। खूब लिख रही हैं, खूब छप रही हैं और खूब चर्चा में हैं। अब तक उनके चार कहानी संग्रह और तीन उपन्यास छप चुके हैं। उनकी रचनाओं की पृष्ठभूमि बहुत व्यापक है। अपना देश तो है ही, विदेशी भूमि की खुशबू भी बहुत सहजता से परोस देती हैं। उनके पात्र चाहे कहीं के हों, बड़े जीवन्त और मानवीय भावनाओं से भरे हुए हैं। विशेष बात यह भी है, लम्बे अरसे से विदेश में रहने के बावजूद उनका मन, भारत में उनके उस परिवेष को भूला नहीं है जिसमें उनका बचपन बीता है, थोड़ी बड़ी हुई हैं या शुरुआत के संघर्ष के दिन, उनकी स्मृतियों में सारा कुछ अटा पड़ा है। जब चाहें, किसी तहखाने से जरूरत की घटनायें, यादें निकाल लाती हैं। विगत को वर्तमान में लाकर जीना या अनुभव करना, उनकी रचनाओं में देखा जा सकता है।

विजय कुमार तिवारी
'केसरिया बालम' उपन्यास में उन्हें सहजता से खोजा जा सकता है। दरअसल रचनाकार अपने सृजन में होता ही है और सारे कथ्य-कथानक उसकी चेतना को प्राणवान बनाते हैं। किसी भी लेखक या साहित्यकार का यह स्वाभाविक सुख और आनन्द है। कहानी अपने देश की राजस्थानी मिट्टी से शुरु होती है और दूर पाश्चात्य देश-देशान्तर तक जाती है। उनका अपने उपन्यास का समर्पण देखिए, लिखती हैं, "जीवन में, किताबों में, कलाकृतियों में, प्रेम के ढाई अक्षर को उकेरते उन तमाम प्रेमियों को समर्पित।" यह कोई साधारण समर्पण नहीं है, प्रेम से भरे एक प्याले का तमाम प्रेमियों तक पहुँचना है। यह उदारता भी है, सहभागिता भी और समर्पण तो है ही।

उपन्यास की पृष्ठभूमि को समझने के लिए डा० हंसा दीप की "अपनी बात" के इस खण्ड को उद्धृत करना उचित ही होगा-"आज भी 'केसरिया बालम पधारो म्हारे देश' लोकगीत की पंक्तियाँ अनायास ही गूँजती रहती है मन में। इन शब्दों के साथ हर उस लड़की की कल्पनाएँ हिलोरें लेती हैं, जो किशोरावस्था से यौवन की देहरी पर कदम रखती है। अपने प्रियतम की प्रतीक्षा में रत ये अल्हड़ नवयौवनाएँ इस गीत को गुनगुनाते हुए कई-कई बार मन के मीत से प्यार भरा आह्वान करती हैं।" यह सहज स्वीकारोक्ति संकेत देती है कि उपन्यास में प्रेम भरा पड़ा है, साथ ही उसमें विरोध-अवरोध और संघर्ष होंगे ही क्योंकि हमारा सामान्य जनमानस सहजता से ऐसी भावनाओं को स्वीकार नहीं कर पाता। जैसा कि उनकी रचनाओं में मन को समझने की बड़ी कोशिश रहती है, इस उपन्यास की संघर्ष गाथा में भी मनोवैज्ञानिक-चिन्तन माध्यम बना है स्थितियों की जटिलता का चित्रण करने में। जीवन के मनोविज्ञान को समझे बिना ना तो अच्छे से जीया जा सकता है और ना ही सम्बन्ध निभाये जा सकते हैं। जिसने जीवन के मनोविज्ञान को समझ लिया, उसके जीवन में सहजता आ ही जाती है। हंसा जी के लेखन का यह बहुत ही मजबूत पक्ष है।

हंसा दीप
अपने उपन्यास की कहानी का सारांश बड़े ही मार्मिक तरीके से उन्होंने स्वयं लिखा है-"कहानी के पात्रों की जीवन यात्रा मेरे साथ-साथ चली है। केसरिया बालम का चहकता प्रेमी युगल शनैः शनैः मौन होता चला जाता है। नायिका धानी, शिद्दत से परिवार को टूटने से बचाने की कोशिश करती है, जब तक संभव हो पाता है। नियति के हाथों परिवार टूट जाता है। समय के चक्र के साथ वह टूटी-बिखरी किरचियों को फिर से समेटने की कोशिश करती है। तब प्रेम की अनंत गहराई, मन से मन को छूकर संपूर्णता पाती है।" हंसा जी एक बात और लिखती हैं-"कहानी, कहानी ही नहीं होती, समाज का आईना होती है। उसी आईने से नजर आते यथार्थ को शब्द भर दिए हैं मैंने। सच्चाई और कल्पना के बीच हल्की-सी लकीर भर खींची है। लिखते हुए कोरोना काल की भयावहता ने जन जीवन को प्रभावित किया। मेरे पात्र भी उसकी गिरफ्त में आए। कोरोना से जीवन बचाने के संघर्षों की जद्दोजहद ने कहानी को एक रचनात्मक अंत की ओर मोड़ा।

'केसरिया बालम' को डा० हंसा दीप ने कुल 21 खण्डों में पूरा किया है और शुरुआत राजस्थान की मिट्टी की खुशबू से हुई है-"केसरिया बालम पधारो म्हारे देश" बचपन से ही गाते हुए, अंदर ही अंदर, गहरे तक यह गीत रच-बस गया था। इसके तार दिल से जुड़े थे, मीठा लगता था, कानों में शहद घोलता हुआ। उस मिठास से सराबोर मन हिलोरें लेता रहता, सावन के झूलों जैसी ऊँची-ऊँची पींगें लेकर। इस छोर से उस छोर तक।"

कहानी शुरु होती है, राजस्थानी भाषा में मां-पिता की बातचीत से। उसमें बेटी के सुखद भविष्य का आश्वासन है, खुशी है, जोश, उत्साह है और धानी कहीं खो जाती है। सहेलियों की बातें मस्ती भर देतीं-"कुँवारे मन की उड़ान की कोई हद न थी, कोई सरहद रोक नहीं पाती, बस उड़ते ही जाते वहाँ तक, जहाँ तक मन करता, दिन के हर पल, हर क्षण।" वही धानी विदेशी धरती पर मशीनी दुनिया में मशीन हो गयी है। मोहभंग हो गया है। सारा चित्रण यथार्थ है। सपने बिखर गये हैं, मां सा के सपने, बाबा सा के सपने और खुद धानी के भी। सुखद कल्पनाओं से भरा अद्भुत लेखन है हंसा जी का। चरित्र भले धानी का है, उड़ान और कल्पना की अनुभूतियाँ रचनाकार की हैं। हंसाजी की विशेषता है, हर उम्र के नारी मन को खूब समझती हैं और पूरी बेबाकी से चित्रण करती हैं, सच्चाई बयान करती हैं। सलोनी, धानी और कजरी तीनों के माध्यम से हंसा जी ने जो चित्र खींचा है, जो उड़ान है और अंत में जो सच है, शायद ही कोई पाठक होगा जो डूब न जायेगा।

पंखों को छूती हवाएँ, उपन्यास के तीसरे खण्ड में भी सखियों की बातें जारी है और लेखिका के भीतर का बतरस रिक्त नहीं हुआ है। सलोनी की शादी हो गयी है और वह चली गयी अपने पतिदेव के साथ। अब धानी की बारी है और उसके जीवन में कल्पनाएँ ही कल्पनाएँ हैं, सुखद और रंग-बिरंगी। हंसा जी लिखती हैं-"कुँवारी कल्पनाएँ कितनी मासूम थीं।" बाबा सा धानी को समझाते, साहस देते और नाना तरह से जीवन जीने के मंत्र समझाते। धानी ध्यान से सुन लेती और खुश होती। वही बच्ची अब बाबा सा को फोन, ह्वाट्सएप आदि के बारे में समझाती है। मां सा और बाबा सा के बीच धानी हँसती, खिलखिलाती, सारे उत्सव मनाती और मधुर कल्पनाओं में खोयी रहती। बाबा सा समझाते, "किसी के जीवन में रोशनी लाने की कोशिश करना बेटा!" मां सा कहतीं, " बेटियाँ भी तो वैसी ही होवे हैं मिट्टी जैसी, पराये घर में जाकर वैसे ही ढल जावे हैं। दीयों सी जगमगावे, जहाँ जावे हैं, उजालो फैला देवे।" बाबा सा को चिन्ता होती है कि कैसे रहेगी धानी उनके बगैर? उधर धानी की मनोदशा कुछ और ही है, सोचती है, "जीवन की सबसे अच्छी बातें जो मौन थीं, खामोश थीं। अनगिनत शब्द जो एक लंबी किताब की तरह छप चुके थे धानी के मन में। और बस उस किताब को पढ़ते रहना चाहती थी धानी।" रोएँ खड़े हो जाते हैं, उसके प्रेम के भाव से, धानी सोचती है, "क्या प्रेम इतना सिहरन भरा होता है।" वह महसूस करती है, " प्रेम का यह भाव जब दूरियों में है तो मिलने पर क्या होगा।?

चौथे खण्ड, इन्द्रधनुषी रंग में शादी के रीति-रिवाजों के साथ गीत-संगीत की धूम है। हंसा जी का मामा के लिए, दो बार मां की आवृति वाला विचार बड़ा उपयुक्त लगा। लोकगीतों से सजा राजस्थानी वैवाहिक कार्यक्रम सम्पन्न हुआ और भारी मन से धानी की विदाई हो गयी। हंसा जी ने भाषा का ध्यान रखते हुए स्थानीय बोली और शब्दों का खुलकर प्रयोग किया है, इससे कहानी में रोचकता बढ़ गयी है। धानी का प्रेम और बाली से रिश्ता जन्म-जन्म का है। ऐसी अनुभूति उसे अनायास हँसा देती है। वाकई प्यार अंधा होता है। एक सप्ताह बाद बाली अमेरिका चला गया। हंसा जी लिखती हैं, "मिलन और फिर बिछोह ने प्रेम की पराकाष्ठा को छू लिया।" नदी और समुद्र की चर्चा करके आगे कहती हैं, "यह प्रेम है जो अपनी हर लहर के साथ पुनर्नवा हो उठता है।" अंततः धानी अपने बालम बाली के साथ सारे रिश्तों को अच्छे भाव से निभाने का ख्याल लिए निकल पड़ी।

पाँचवाँ खण्ड का शीर्षक है-पुनरारोपण। लेखिका का स्वयं का विदेश जाने का अनुभव है, इसलिए सारा वर्णन स्वाभाविक तौर पर सत्य और रोचक बन पड़ा है। धानी, बाली के परिहास पर उत्तर देती, "मैं जन्मों तक प्रतीक्षा कर सकती हूँ, सुबह-शाम तो कुछ नहीं।" वह कहता, 'पागल लड़की, सचमुच पागल।"

तीनों सहेलियों का अहसास भिन्न है। हंसाजी लिखती हैं, "सही भी तो था, प्रेम का अहसास राजा-रंक, ऋषि-मुनि, स्त्री-पुरुष या फिर यूँ कहें कि हर प्राणी के लिए अलग होता है। तभी तो इस शब्द की असंख्य अनुभूतियाँ हैं।" धानी को अपने लिए काम की तलाश है, "खोजती रहती अपनी उड़ान के लिए ऐसे पंख जो उड़ने की खुशी भी दे और आकाश में अपनी जगह भी बनाये।" वह प्रेम की गहराई को समझना चाहती है, "धानी को लगने लगा कि महसूस करने भर के लिए यह देह उसकी है पर उसमें खुशी, नाराजगी, दर्द, अहसास और इतने सारे खानाबदोश भाव जो आते-जाते रहते हैं, शायद बाली भरता है। बाली ने उसके मन और देह पर इतना अधिकार कैसे पा लिया?" उसका पसंदीदा उत्सव आने वाला है, बाली ना कर देता है। धानी सोकर उठी, देखती है-बाली की शरारतों का अंबार लगा था उसके शरीर पर चारों ओर। अंग-अंग पर इस तरह रंग लगाया था बाली ने कि शरमा कर लाल हो गयी। हंसा जी लिखती हैं, "एक-दूसरे की चिन्ता करते, एक-दूसरे की सोच का आदर करते, एक-दूसरे का ध्यान रखते, एक-दूसरे से बेतहाशा प्यार करते, प्यार के पंछी।"

उपन्यास लेखन का हंसा दीप जी का अपना प्रवाह है। जिस भाव-विचार में उनका मन रमता है, उसका विशद विवरण देकर पाठकों को तृप्त कर देती हैं। यह उनकी विशेषता भी है और शायद कमजोरी भी, कुछ लोग मान लें। छठा खण्ड, एक नया कदम, धानी के जीवन में बेकरी साॅप, नया कदम ही है। बेकरी के लोगों की बातचीत, अर्थतंत्र, मजबूरी और जीवन का फलसफा, बहुत सुन्दर वर्णन की हैं, लिखती हैं.'जब पैसा अपनी धरती से दूर ले जाता है तब मन उसके और करीब हो जाता है। कहते हैं कि दूरियाँ यादों को बढ़ाती हैं तथा यादें और ज्यादा नजदीक ले आती हैं।" धानी मेहनती है, व्यवहारिक है, नित्य नया प्रयोग करती है, उसकी साख बढ़ रही है और मालिक उसे पदोन्नति देकर मैनेजर बनाना चाहता है। बेकरी का प्रचार और विस्तार हो रहा है।

आसमानी ख्वाब, जमीन पर, सातवाँ खण्ड है। व्यावसायिक गुण कहीं न कहीं होता ही है लोगों में। हंसा जी ने उसी का सदुपयोग किया है और बेकरी साॅप को खूब चमकाया है। साहित्य ज्ञान के साथ, व्यवसाय और मानवीय अनुभूतियों की समझ ने कहानी को खूबसूरत विस्तार दिया है। तनख्वाह बढ़ा दिया है मालिक ने, बोनस भी देता है और धानी को बेटी की तरह मानता है। सम्बन्धों की मधुरता और विस्तार का पाठ हर व्यक्ति को हंसा जी की लेखनी से सीखना चाहिए। धानी के चिन्तन का दायरा विस्तृत हो उठता जब वह सोचती है, "कितनी खुशी होगी उस घर में, जहाँ यह केक कटेगा। "उसका पुरस्कार भी धानी को मिलता जब कोई बच्चा पिता के साथ अपना केक लेने आता और खुश होकर कहता, "आप दुनिया की सबसे अच्छी केक बनाने वाली लड़की हो।" हंसा जी इस दृश्य का जीवन्त चित्रण करती हैं, 'वह एक प्यारा-सा चुंबन देतीं उसे हवा में और तब, देर तक उस बच्चे की खुशी धानी को प्यारी-सी मुस्कान में डुबो देती।"

आठवाँ खण्ड, गर्माहट पर पानी के छींटे में स्वाभाविकता है, पैसा आता है तो बहुत सारी व्यस्तताएं, निश्चिन्तता ले आता है और आपसी सम्बन्धों को प्रभावित करता है। दुनिया में पैसे की कमी वाले लोग जितना दुखी नहीं है, उससे अधिक दुखी पैसे वाले हैं। पैसे की कमी वाले लोगों का दुख कुछ पैसा आ जाने से दूर हो जाता है परन्तु पैसे वालों का दुख लगभग स्थायी होता है और जीवन भर घर की अशान्ति का कारण बना रहता है। धानी समझने लगी है, "प्यार की तीव्रता अब वैसी नहीं रही। रिश्तों की गर्माहट का गुनगुना अहसास भी कम हो गया था। कही कुछ तो ऐसा था जो धीरे-धीरे घटता जा रहा था।" उसे दिखने और लगने लगा कि पहले जैसा कुछ भी नहीं है। वह सोचने लगी, "जमीन पर रहना कितना सुखद है, यह शायद आसमान में रहने वाला ही समझ सकता है।" धानी के सामने प्रश्न था, "न कोई वाद-विवाद, न कोई प्रतिवाद, न गरीबी, न अशिक्षा, न नफरत, न द्वेष, इन सबके बगैर भी अगर रिश्ते में खिंचाव आने लगे तो उसे क्या कहा जाय?"

फूटती कोंपल, नौवाँ खण्ड, धानी मां बनने वाली है। जब बाली को यह खबर मिली तो उछल पड़ा वह। बहुत खुश हुआ। उसने पिता की सारी जिम्मेदारियाँ उठा ली। धानी खुश होती और सशंकित भी, "आदमी से आदमी निकलना कोई हँसी खेल तो नहीं।" धानी आशान्वित रहती कि यह नया परिवर्तन, नया जीवन देगा। आर्या का जन्म हुआ। हंसा जी लिखती हैं, " उसकी चाह होने लगी कि बाली उसके समीप आये। उसकी देह कैनवस हो जाए और बाली उसके पोर-पोर में रंग भरता रहे। वह खुद को इन्द्रधनुष बनते देखना चाहती थी।" आगे लिखती है, "प्रेम जब भौतिक होने लगता है, आकार लेने लगता है तो कई रंगों से मिलकर बनी रँगीली छँटाए मुग्ध कर देती हैं।" हंसा जी का अद्भुत चिन्तन पढ़िए, " बड़ी होती बेटी अपने पिता के हृदय में एक पौधे सी उगने लगती है। जब बाली आर्या के साथ खेल रहा होता तो धानी को लगता प्रेम किस तरह रुप बदलता है। कभी बाली बादल बन धानी की धरती पर बरसता था, अब धानी ने उस मेह को वाष्प में बदल कर फिर से बाली के आकाश में भर दिया है। प्रेम ऐसा होता है कि पिघलता है तो बरसता है। उष्णता पाता है तो घनीभूत होता है ताकि फिर बरस सके। यही तो चाहती है प्रकृति कि उसका बादल कभी शुष्क और खाली न हो।" हंसा जी की भावनात्मक, कोमल उड़ान सबको रोमांचित करती है और प्रेम-मिलन की आतुरता बढ़ा देती है। 

दसवाँ खण्ड यानी रुख बदलती हवाएं, ऐसा बदलाव लेकर आया, जहाँ बहुत सी चीजें प्रभावित करने लगीं। मां सा कहा करती थीं, "मौसम सदा एक सा नहीं रहता।" धानी ने मित्रों से पता करना चाहा। ज्ञात हुआ कि बाली बड़े आर्थिक संकटों में उलझा हुआ है। धानी को कुछ नहीं बताया। उसने सोचा, "आखिर इतने अपनेपन के बीच इतना परायापन लाया कहाँ से?" उधर पिता की हालत अच्छी नहीं है। धानी हार मान लेने वालों में नहीं है। उसने सीखा है, "आशा की डोर थामे रहना ही आगे का रास्ता बना देता है।" झटके में ही धानी के माता-पिता चल बसे।

ग्यारहवाँ खण्ड, अपने नीड़ में धानी लौट आयी अपने देश से। यहाँ बाली का मन बदला नहीं बल्कि और कठोर हो गया था क्योंकि धानी ने अपने बाबा सा की सारी सम्पत्ति दान कर दी। बेकरी की स्थिति पूर्ववत थी। आर्या के लिए पिता के रुप में बाली ने सारी जिम्मेदारी सम्भाल ली थी। उसे लगा, बाली और उसके बीच प्यार का एक अटूट सेतु है आर्या। आर्या ही है जो दूर होते दो छोरों को कसकर पकड़े हुए है।

बारहवाँ खण्ड, चुप्पियों का बढ़ता शोर, धानी के जीवन में पसरा हुआ था। हंसा जी लिखती हैं, "पुरुष हताशाओं के घेरे में जकड़ने लगे तो उसका पौरुष चोट खाये हुए घायल शेर की तरह हो जाता है जो अपने क्रोध की अग्नि में खुद तो खत्म होता ही है, दूसरों को भी नहीं छोड़ता।" धानी कहती, "मुझे चोट पहुँचा रहे हो बाली।" बाली ने वही तरीका अपना लिया था और नित्य चोटिल करता। धानी संतोष करती, "इसी बहाने बाली मेरे पास आता तो है। अगर इस शरीर से बाली को सुख मिलता है, तो ठीक है। थोड़ा-सा कष्ट ही सही।" चोट खाया अहं और घायल पौरुष रिश्तों को लगातार खत्म कर रहा था। धानी सोचती, "मन की दुविधा को तो हटाया जा सकता था पर जब किसी के मन में भूसा भरा हो तो उसे क्या कहा जाये?

अमावसी अंधेरों में, उपन्यास का तेरहवाँ खण्ड शायद दुखद अनुभूतियों को और घना करने वाला है। अब बाली देर रात तक नहीं आता या बाहर सोफे पर सो जाता या अपनी हवस मिटाकर सो जाता। दोनों के भीतर प्रेम भाव जगाने वाली क्रियाएँ अब हवस हो गयी हैं। मन बदलता है तो जीवन के सार्थक शब्द भी अर्थ बदलने लगते हैं। धानी ठान लेती है, अब जानकर ही रहेगी, आखिर बात क्या है? उसके मन में एकाएक विचार आया, कहीं बाली के जीवन में कोई और लड़की तो नहीं आ गयी है? वह तैयार थी, अपने प्यार के लिए सब कुछ कर सकती है। प्रश्नों का उत्तर नहीं देता, न कोई जवाब, न दिलासा, न बचाव, बस प्रश्नों को अनुत्तरित छोड़ देना। बाली स्वयं को फालतू मान बैठा था जो पत्नी की कमाई पर जी रहा है। पुरुष का अहं स्त्री से सलाह मशविरा करने में कतराता रहा। बाली को लगता था कि एक सफल पत्नी, एक असफल पति को कभी भी धोखा दे सकती है। ऐसे निराशा के दौर में भी हंसा जी की लेखनी उन स्नेहिल क्षणों की चर्चा कर ही देती हैं कुछ पुरानी स्मृतियो के बहाने, मानो उनका स्थायी भाव हो, लिखती है-बाली कुछ बोले, उससे पहले ही वह उसका मुँह बंद कर देती अपने होंठों से। तब वह कुछ न बोल पाता। खो जाता उन होंठों की गुनगुनी छुअन में जो अंग-अंग में फैल जाती, एक खुशबू की तरह। बाली अपनी नाकामियों का ठीकरा धानी के सिर खुले आम नहीं फोड़ता पर रात के अंधेरे उसे असभ्य बना देते। इतने असभ्य कि वह अपनी हर नाकामयाबी का गुस्सा उसी पर निकालता जिसे उसने बेहद चाहा था।

चौदहवाँ खण्ड, अहं से आह तक में अँधेरा और गहरा हो गया है। हंसा जी लिखती हैं, "हारी हुई मनोग्रंथि की जकड़न में छटपटाता अपनी दमित ईच्छाओं को बाहर निकालता। पुरुष का दंभ उसमें यह उन्माद पैदा करता कि वह सब कुछ कर सकता है। वही उन्मादी आवेग रात के अंधेरे में जब धानी पर धावा बोलता तो वह ऐसी हो जाती जैसे किसी ने एक ही बार में उसे निचोड़ कर रख दिया हो। हमले के बाद जैसे किसी हारे हुए सेनापति की दुर्गति होती होगी, वैसे ही वह महसूस करती। उस जंग में हार झेलते, उसकी देह लकड़ी-सी होती जा रही थी। बाली और धानी उसी जीवन को जीते रहे। हंसा जी के लेखन में परत-दर-परत खुलते मनोवैज्ञानिक विवरण जीवन की सच्चाई सामने ला रहे हैं। ऐसी परिस्थिति का अनुभूत जैसा सजीव चित्रण अद्भुत है। ऐसा बहुत कम देखा जाता है। कुछ लोग नकारात्मक भाव-सम्प्रेषण कहकर या अत्यधिक रूमानियत वर्णन कहकर दोष लगा सकते हैं। मुझे लगता है किसी भी लेखिका के लिए यह साहस करने जैसा है। शायद उद्देश्य यही रहा होगा कि पाठक उन परिस्थितियों को यथार्थतः समझें और बाली-धानी के जीवन के अन्तर्द्वन्द पर विचार कर सकें। यह कहानी उन हजारों लाखों दम्पतियों के जीवन को राह दिखा सकती है जो ऐसी परिस्थितियों में उलझे पड़े हैं। विचित्र मनोग्रंथी विकसित हो गयी है बाली की। यह हमारे समाज की परिभाषाओं का दोष है। क्यों पुरुष का अहं आड़े आ जाता है? हंसा जी लिखती हैं, "धानी की उन्नति के आगे अपना हुनर दिखाने की होड़ ऐसी लगी कि धानी का काम नहीं उसके व्यक्तित्व से भी जलन होती। दिखती सुन्दर है, लगती सुन्दर है। दिल जीतने में माहिर है। वह कहीं उससे पीछे रह गया है, बहुत पीछे।

उसे बेकरी के मालिक, ग्रेग, लीटो सबके साथ धानी दिखाई देती, बस उसके खुद के साथ न दिखती। अपने साथ तो अब बिल्कुल भी नहीं दिखाई देती। स्थिति यह हुई कि उस कार को भी बेचना पड़ा जिससे उन दोनों की बहुत सी यादें जुड़ी हुई थीं।

अक्सर हम घर सजाते हैं, नयी-नयी तस्वीरें, पेंटिंग लाते हैं, सुखी और आनंदित होते हैं। धानी के घर में भी महंगी तस्वीर है, बड़ी ही अर्थवान, सुन्दर और खुश करने वाली, परन्तु अब उसका मन करता है कि उसे तोड़ डाले। जब मन हरा-भरा था तब सब अच्छा लगता था। बदलती नजरें, बदलता नजरिया, इस पन्द्रहवें खण्ड की मूल भावना है। उपन्यास की यात्रा को इन थीम आधारित शीर्षकों ने अत्यन्त रोचक बना दिया है। गद्य शैली में लिखा कोई काव्य लगता है। सम्पूर्ण कहानी लगता है जैसे धानी सुना रही है। पाठकों को यह रोमांचित करता है और निश्चित ही सहानुभूति जागती है। लेखन की अपनी विशेषता ही है कि लाख उलाहनाओं, समस्याओं के बावजूद बाली के प्रति कोई आक्रोश नहीं पैदा होता। स्वयं धानी भी इन्हीं भावनाओं के साथ अच्छे दिनों के लौटने की उम्मीद लगाये हुए है। धानी कभी अधंविश्वासी नहीं रही है परन्तु उसके वजूद में उसका प्रवेश होने लगा है। सोहम जैसे मित्र धानी को सुखी करने की नाकाम कोशिश करते, परन्तु यह तो दो लोगों के आपसी रिश्तों का ऐसा शीतयुद्ध था जिसमें न किसी की हार होती दिखती थी, न जीत, परन्तु युद्ध विराम भी नहीं दिखता था।

हंसा दीप जी स्वाभाविक सी कुछ घटनाएं, पात्र उजागर करके जोड़ती हैं। सोहम कुछ वैसा ही पात्र है जो धानी को पसंद करता है और उसका दुख दूर करना चाहता है। उसे बाली पर गुस्सा आता है। सोहम जानता है कि इससे धानी का जीवन लांछित हो जायेगा। वह अपने मन की भावनाओं को दबाकर धानी से दूर हो जाता है। ऐसा होता ही है जीवन में। ऐसे लोग मिलते हैं, वे अच्छे होते हैं। उनके उद्देश्य अच्छे होते हैं परन्तु घटनाएँ घटित हुए बिना अपना मार्ग बदल लेती हैं। सोहम धानी से बनाना चाहा रिश्ता पर बन न सका। यह हंसा जी के लेखन पर पाश्चात्य प्रभाव है वरना यहाँ के जनमानस में ऐसी बातों का उल्लेख नहीं होता।

सोलहवाँ खण्ड, बारूद के ढेर पर, घर के, जीवन के हालात बहुत बुरे होते जा रहे हैं। कुछ भी ठीक नहीं हो रहा है। पुत्री आर्या बेखबर है और बड़ी हो रही है। आर्या की बातें, उसका हँसना, खिलखिलाना धानी को बचपन की स्मृतियों में ले जाती है। शादी के समय की दहलीज लाँघ कर निकलने का रिवाज इसी लिए तो नहीं बना है कि लड़की फिर वापस आये ही नहीं। हंसा जी बहुत गहरे भाव से पूछती हैं, "क्या यही कारण है कि लड़की हर जगह सहती रहती है, क्योंकि जिस घर में पली-बढ़ी, उस घर के दरवाजे देहरी पूजा के बाद तो बंद ही हो जाते हैं।" धानी उतनी विवश भी नहीं है। वह तो अपने रिश्ते संभालने का हर संभव प्रयास कर रही है ताकि कभी भी उसे यह न लगे कि उसने पूरी कोशिश नहीं की। बड़ी महत्वपूर्ण बात धानी सोचती है-वैसे भी अपनों से हारना भला कोई हारना होता है। अपनों से हार भी जीतने की खुशी देती है। बाली को इस बात से भी शिकायत होती कि धानी उससे दूर क्यों रहती है? जो व्यक्ति अपनी गति, लय ताल भूल चुका होता है, ऐसा ही सोचता है। न स्वयं को समझता है और न दूसरे को। धानी को पता है, बाली कुंठित होता जा रहा है। धानी बेकरी की इजी से अपना दुख बाटती है। इजी उसे हौसला देती है। कहती है, लाख अच्छाइयाँ होने पर भी सब कुछ अच्छा ही अच्छा नहीं होता।

किसी दिन उसने सोच लिया, आज बाली से कहेगी, "असफल तुम हुए हो, इसमें मेरा क्या दोष है। गलतियाँ तुम करते हो और शरीर मेरा नोचते हो।" उसे लगा बारूद का ढेर बढ़ता जा रहा है। हो जाने दो जो होना है। उस रात बाली आया ही नहीं।

'केसरिया बालम' का सत्रहवाँ खण्ड, एक किनारे की नदी, कुछ और ही दिशा का संकेत करने लगी। बाली किसी से फोन पर झगड़ा कर रहा था। धानी आशंकित ही नहीं भयभीत भी हुई। आर्या को भी अपने पापा के लिए और अपने पापा से डर लगा। वह अपने घर की चुप्पी को अब पहचानने लगी थी। आर्या समझने लगी थी कि ममा-पापा के बीच सब कुछ ठीक नहीं है। रिश्तों का ठंडापन घर शब्द का अर्थ बदल देता है। धानी भी तनहा जीना सीख रही थी। उसकी दुनिया में आर्या, घर और बेकरी थी। आर्या अब समझदार हो चुकी है और सब कुछ समझ रही है। उसने अचानक अपनी मां के चोट के निशान को देखा, बौखला गयी। उसने जो रुप धारण किया, ममा को कौंसलर के पास ले गयी। बाली को बचाना मुश्किल था। शायद धानी स्वयं ऐसा नहीं करती परन्तु परिस्थिति ने करवा दिया।

अठारहवाँ खण्ड, केसरिया से केस, अद्भुत स्थिति थी। कानून का खेल शुरु हो गया। आर्या का अपने पिता के लिए सम्बोधन बदल गया था। केस भी अजीब था, आरोपी के खिलाफ कोई आरोप नहीं था सिवाय इसके कि आवेग और उन्माद में सब कुछ हो जाता था, यह हिंसा नहीं थी। दुखद यह था कि आर्या के सामने सारी गोपनीय बातें उजागर करनी पड़ती थी। धानी कभी नहीं चाहती थी इन सब बातों की चर्चा हो परन्तु एक सच यह भी था जब प्यार गुनाह में बदलने लगे तो सजा तो मिलनी चाहिए। वह बाली को दुखी देख दुखी होती थी परन्तु उन स्याह अँधेरे उसके कृत्यों को याद करके परेशान हो उठती थी। आर्या खूब बहस करती, कहती, "जुर्म करना ही अपराध नहीं है, जुर्म सहना भी अपराध है। " आर्या उससे प्रश्न करती, कायर कहती। धानी ने कहा, "बेटा मैं कमजोर नहीं हूँ, कायर भी नहीं हूँ। इसलिए नहीं सहती थी कि मैं विवश थी या कुछ कर नहीं सकती। मैं तो सिर्फ और सिर्फ इसलिए चुप थी कि मैं तुम्हारे पापा से बहुत प्यार करती हूँ। बस, उनके बदलने का इंतजार था, बस इसीलिए।" अंततः बाली को जेल हुई। धानी ने महसूस किया कि सजा तो उसे भी मिली है। अब अपना ही घर बेचैन करने लगा। वह बेडरूम में नहीं जाती, बहुत सी यादें जुड़ी थीं।

उन्नीसवाँ खण्ड, बदली देहरी, बदले पैर, अब हालात और बदल गये हैं। बाली बालेन्दु प्रसाद के रुप में सुधार गृह में है। धानी और आर्या दोनों अपनी-अपनी स्मृतियों के आधार पर दुखी हुए। आर्या ने ममा को जाकर देख आने को कहा और लौट आने पर उसने बहुत कुछ पूछना चाहा। बाली सब कुछ भूल चुका है और एक छोटे बच्चे की तरह हो गया है। धानी ने नौकरी छोड़ दी है और उसी सुधार गृह में बाली और वैसे अन्य लोगों के सुधार में लगी रहती है। बाली उसकी प्रतीक्षा करता है और उसके आने पर खुश होता है।

बीसवाँ खण्ड, और दौड़ती दुनिया थम गयी, पूरी दुनिया एकाएक रुक सी गयी। कोरोना ने तबाही मचा रखा है। आर्या घर आ गयी है। सबको बचकर रहना है। उस सुधार गृह में भी कोरोना फैल गया, जिसमें चार लोगों की मौत हो गयी। धानी को अनुमति मिल गयी है, वह बाली को घर ले जा सकती है। लाने के समाचार से आर्या न खुश न दुखी हुई। सारी तैयारियाँ पूरी हो गयी। उसने भी कुछ जिम्मेदारियाँ ले रखी थी। बचपन से आज तक उसने अपनी ममा में उसने एक नदी की चंचलता देखी तो सागर का गाम्भीर्य भी देखा। आर्या अपनी मां के बारे में सोचकर गर्व महसूस करती है।

उपन्यास का अंतिम इक्कीसवाँ खण्ड, केसरिया भात की खुशबू, सब कुछ सहेज लाया है। जीवन में खुशियाँ लौट आयी हैं, कम से कम ऐसे ही आसार हैं। आज बाली घर आने वाला है। सिर्फ अपनी देह के साथ। ऐसी चेतना विहीन देह जो देह होने का अर्थ भी नहीं जानती। ऐसी देह जहाँ न मन है, न दिमाग। न विचार है, न भावना। और ये सब जब न हों तो क्या हम उसे पागल कह दें? वह और कुछ न हो, इंसान तो है। उसी इंसान के लिए घर तैयार हो रहा है। आर्या को पापा के लिए कभी प्यार था, फिर नफरत हुई और अब सहानुभूति है।

बरसॊ बाद घर में केसरिया भात बन रहा था। वही खुशबू फैल गयी थी घर में, धानी के तन-मन में, जो बाली की पहली झलक में मिली थी।

उधर आर्या खुश होकर ममा के गले लग गयी क्योंकि पापा के आ जाने के बाद आर्या का प्रेमी अवि प्रस्ताव देने वाला है। बाली सीखने लगा, बोलने लगा, समझने लगा और दोनों खुश होने लगे। वासना से दूर पारस्परिक नेह में बँधे दो इंसान।

'केसरिया बालम' दो देशों के बीच जीवन की उष्णता, प्रेम, संघर्ष, उत्थान, पतन और फिर सहेज लिए जाने की खुशियों की कहानी है। भाषा और शैली सारे परिदृश्यों को जीवन्त बनाते हैं। यह उपन्यास नारी-विमर्श, नारी चेतना को सामने लाता है। कहीं-कहीं कुछ खाली-खाली सा लगता है या किसी एक ही भाव की बार-बार पुनरावृत्ति भी हुई है। सुखद है कि उसके बावजूद रोचकता बनी हुई है। सबके चिन्तन का मनोवैज्ञानिक पक्ष खूब उभरा है और प्रेम की टीस भी। हंसा जी को इसमें महारत हासिल है। लेखिका अनेक स्थलों पर कुछ अधिक ही भावुक होती दिखती हैं। भेद करना मुश्किल हो जाता है कि उनका अपना दुख और संघर्ष है या उस चरित्र का? महाकवि नागार्जुन अज-विलाप के प्रसंग में लिखते हैं-"कालिदास सच-सच बतलाना, अज रोया या तुम रोये थे?" खुशी है कि उपन्यास अपना संदेश सफलता पूर्वक दे सका है और पाठकों को बाँधे रखने में सफल है। हंसा जी का हिन्दी साहित्य में स्थान बन चुका है और वे लगातार अपने सतत लेखन द्वारा साहित्य में समृद्धि ला रही हैं।

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