सुख दु:ख दो किनारे हैं - अनुराग शर्मा

मामुपेत्य पुनर्जन्म दु:खालयमशाश्वतम्।
नाप्नुवन्ति महात्मान: संसिद्धिं परमां गता: (श्रीमद्भग्वद्गीता - 8:15)
नमस्कार,

सेतु सम्पादन मण्डल के सदस्य. भौतिकी के सेवानिवृत्त आचार्य और विचारक डॉ. चंद्रमोहन भण्डारी का नाम सेतु के पाठकों के लिये नया नहीं है। हिंदी साहित्य को समृद्ध करने वाले उनके प्रामाणिक और जनहितकारी आलेखों का संग्रह इस माह मानवीय अभिप्रायों की डगर शीर्षक से सेतु द्वारा किंडल पर प्रकाशित किया गया है। इस किंडल पुस्तक के अलावा पेपरबैक में सेतु की तीन नयी पुस्तकें Autumn in America & Other PoemsDear Mama: An Immigrant’s Secret Cry तथा Voices Within: An Anthology of English Poetry पिछले दिनों प्रकाशित हुई हैं। ये सभी पुस्तकें एमेज़ॉन और किंडल पर उपलब्ध हैं, पढ़कर लाभ उठाइये।

लम्बे समय तक करोना की त्रासदी से पूर्ण मुक्ति पाने से पहले ही रूस-युक्रेन युद्ध छिड़ना मानवता के घावों पर नमक छिड़कने जैसा है। वर्तमान घटनाओं से जहाँ गीता में वर्णित दु:खालयमशाश्वतम् की ओर ध्यान जाता है वहीं महान साहित्यकार वॉल्तेयर का कथन "यदि परमेश्वर नहीं था तो उसका आविष्कार आवश्यक था" भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है।

फ़िल्मी गीतकार अभिलाष की पंक्तियाँ कहती हैं, "संसार है इक नदिया, दुःख सुख दो किनारे है।" इस संसार की गति नहीं रुकती लेकिन यह सच है कि जाता हुआ प्राणी एक खाली स्थान छोड़ जाता है, जिसे भरने में कई बार पूरा जीवन चुक जाता है।

पिछले महीनों में संसार में मृत्यु का विस्तार हुआ है। पिछले दिनों में हमने हिंदी के साहित्यकार सुधेश जी, प्रसिद्ध संगीतकार बप्पी लाहिड़ी, और स्वर-साम्राज्ञी लता मंगेशकर को खोया है। सेतु परिवार की ओर से विनम्र श्रद्धाञ्जलि!

डॉ. सुधेश
6 जून 1933 - 20 जनवरी 2022

बप्पी लाहिड़ी
नवम्बर 1952 - 15 फ़रवरी 2022

लता मंगेशकर
28 सितम्बर 1929 - 6 फ़रवरी 2022


अनुराग शर्मा
आपकी मौलिक, अप्रकाशित चुनी हुई रचनाओं का सेतु में स्वागत है। रचना भेजने से पहले कृपया एक बार सेतु हिंदी संस्करण के लेखकों के लिये दिशानिर्देश अवश्य पढ़िये और हर रचना के साथ कृपया प्रेषण के नियमों से सहमति भी भेजिये।

कविता, कहानी, व्यंग्य, आलेख, समीक्षा, दृश्य-श्रव्य, अनुवाद, धरोहर तथा स्थायी स्तम्भों के साथ यह अंक आपको समर्पित है। आपकी प्रतिक्रिया का स्वागत है।

महाशिवरात्रि पर्व की मंगलकामनाएँ!

शुभाकांक्षी,
सेतु, पिट्सबर्ग
28 फ़रवरी 2022 ✍️

2 comments :

  1. परिवेशीय सृजनशीलता के जिस आलेख से इस निबंध संग्रह का आरंभ
    हुआ और जिन संदर्भों में मानवीय अभिप्रायों के विस्तृत वर्णपट की चर्चा
    संग्रह के पृष्ठों में संभव हो सकी उसका बहुत कुछ श्रेय सेतु की आधारभूत
    अवधारणा को जाता है जो सेतु पत्रिका का संकल्प एवं उद्देश्य है।
    अनुराग जी से मिले प्रोत्साहन एवं
    फीडबैक की अनुपस्थिति में यह संभव ही नहीं होता।
    कोई भी सृजन शून्य में
    नहीं आकार लेता और सारा श्रेय रचनाकार को नहीं जाता; इसमें
    पाठक की भी भागेदारी निर्विवाद है।
    सेतु अपनी इस भूमिका एवं जिम्मेदारी को इसी प्रतिबद्धता के साथ अबाध रूप
    से निभाती रहे इसी शुभकामना के साथ

    चंद्रमोहन

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