कविताएँ (अंजु)

- अंजु

सहायक आचार्य (हिंदी), राजकीय कन्या महाविद्यालय, अजमेर
ईमेल: dranjukalyanwat@gmail.com
चलभाष: +91 946 006 1733


जंगल

एक जंगल मेरे भीतर समाया
हरितिमा के घने आवरण में
गूँजित जीवन-राग।
सरसराते पत्रों का
सात सुरों में बजता अनहद नाद।
थिरकती पंखुड़ियों पर
बिछलता सौंदर्य भरा हरिताभ मन।
पातों से टपकती शबनमी बूँदों में
प्रीत का नम अहसास।
नृत्यरत शाखाओं से
रह-रह चमकता स्वर्णिम उजास।
हवा संग उड़ते पीले पातों में
बची है ऊर्जा और भविष्य की सृजन-आस।
मदिर-मदिर खुशबू लिपटे थपकाते झकोरें 
कानों में लोरी का घोल रहे मिठास।
आसमान से झरती चाँदनी
कर रही पावन गात।
तारों का झिलमिल चँदोवा
सपनों की नगरी का रचता रास।
अवगुंठित नवल रात्रि
कृष्ण-मिलन की देती साखी।
एक बीहड़ में भी देखो
सृजा है, अहा! कितना सुंदर संसार।
***

      
चाहत

मैं जीना चाहता हूँ
साथ तुम्हारे
कुछ कदम तुमसे आगे चलकर
कभी-कभी तुम्हारा हाथ पकड़कर
सिर पर छाते सा तनकर 
सारे निर्णयों से तुम्हें मुक्त रखकर
तुम्हारे जीवन की धुरी बनकर।

मैं जीना चाहती हूँ
साथ तुम्हारे
तुम्हारे संग कदमताल मिलाते हुए चलकर
निर्द्वन्द्व खुले आसमान में उड़कर
अपना वजूद बचाते हुए तुम्हारे साथ खड़े होकर
कुछ तुम्हारी सुनकर कुछ अपनी कहकर
गृहस्थी की गाड़ी का मजबूत पहिया बनकर।
***

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