कहानी: बोस्की

ज्योत्सना सिंह

- ज्योत्सना सिंह


सिर्फ़ पाँच साल का फ़र्क़ था हम दोनों में, पर हमारी दोस्ती बड़ी पक्की थी। प्यार जैसा कोई भाव मेरे दिल में उस वक्त तक नहीं था। उसके दिल का मैं कुछ कह नहीं सकता। 

उस वक्त मैं सातवीं में था और वह ग्यारहवीं में थी। जब उसे पहली बार देखा तब तक तो मुझे उसका नाम भी नहीं पता था। फिर मेरी सहपाठी ग़ज़ाला ने ही उसका नाम बताया था। उसका नाम सुनकर मुझे बहुत अजीब लगा था क्योंकि तब तक मैंने इस तरह का कोई नाम सुना ही नहीं था, उसका नाम था ‘बोस्की ऐल्बेनी’!

उसकी सूरत आज भी मेरी आँखों के आगे, वैसी की वैसी ही आकर खड़ी हो जाती है, उसके घुंघराले बाल, वह भी उसके सिर से ही चिपके हुये, गहरा सांवला चमकीला रंग और उभरे हुये होंठों का रक्तवर्णी फैलाव पूरे मुखड़े पर अपनी आभा बिखेरता था। आँखों के भीतर के लाल डोरे ऐसे लगते थे जैसे किसी ने गुड़हल के फूल के रेशे खींचकर उसकी बड़ी आँखों में पिरो दिये हों। 

उसकी इस तरह की सुंदरता का जितना मैं क़ायल था, उतना ही हमारे स्कूल के बच्चे उसका मज़ाक बनाते थे। बहुत जल्दी ही उसके कई तरह के उपनाम स्कूल के बच्चों ने रख दिये थे। सबसे बड़ी बात यह कि वह अपने सभी नामों से भली-भांति परिचित भी थी। 

जब मेरी उससे दोस्ती हुई, तब उसने मुझे बताया था कि वह जानती है कि स्कूल के बच्चे उसे कालीमाई, भूतनी और हब्शी कहकर बुलाते हैं। मुझे बहुत आश्चर्य हुआ था कि इसे सब पता है, फिर भी वह  किसी की शिकायत संध्या मैडम से नहीं करती। यदि वह शिकायत कर देती तो सबको बहुत बड़ा वाला पनिश्मेंट मिलता। संध्या मैडम हमारे स्कूल को अनुशासित रखने का काम करती थीं।

मेरी दोस्ती उससे तब हुई, जब पढ़ाते समय अचानक ही हमारी राधिका मैडम की तबियत ख़राब हो गई थी। तब प्रिन्सिपल सर के कहने पर वह हमारे क्लास को माइंड करने आई थी। 

उस दिन उसने पूरे तीन पीरियड हमारी क्लास को माइंड किया था। उसके आते ही सबने क्लास में फुसफुसाना शुरू कर दिया था, “ये कल्लो माई क्यों आई है, इससे अच्छा तो हेड गर्ल दीपा दीदी आती, कितना अच्छा होता! वह तो मैथ्स भी अच्छे से समझाती हैं। न समझ आने पर नोटबुक में, करके भी समझा देती हैं।नहीं तो हेड बॉय नौशाद भैया आ जाते, कितने मज़ेदार तरीक़े से जी.के. क्विज़ कराते हैं। बिल्कुल कौन बनेगा करोड़पति का मज़ा आता है।”

सब अपनी कह रहे थे पर मुझे उनका आना अच्छा लग रहा था। उन्होंने आते ही सबको गुड डे बोलते हुये बात शुरू की, “क्लास सेवेन्थ बी, आज लगभग थ्री पीरियड्स तक मैं आप सबके साथ रहूँगी। तो क्यों न इस दिन को मज़ेदार बना दिया जाये।”

क्लास जो बोस्की के आने से बिल्कुल भी ख़ुश नहीं थी, उसने कोई भी जवाब नहीं दिया तब मैंने कहा, “येस, दीदी, आज हम फ़न करेंगे।” जब क्लास में अकेली मेरी आवाज़ आई तब वह बोली, “प्लीज़ अपना प्यारा सा नाम बताओ?” 

“राघव मिश्रा।”

“राघव! तो क्यों न आज तुम्हारे नाम की ही कहानी सुनाई जाये। यानी की रामायण की कुछ अच्छी सी घटनाएँ जिन्हें मैं ब्लैकबोर्ड पर ड्रा करूँगी और तुम सब बताओगे कि किस घटनाक्रम से ये चित्र रिलेट कर रहा है।” 

पहले तो क्लास ने कोई उत्साह नहीं दिखाया, लेकिन जब उसने चित्र बनाने शुरू किये तो सबको मज़ा आने लगा।क्लास के बाद जब हम सब ग्राउंड में थे, तब सभी आज के गेम की मज़ेदार बातें शेयर कर रहे थे। उस वक्त ग़ज़ाला ने मुझसे कहा, “तुमको बड़ा इंट्रेस्ट आ रहा था गेम में। और आये भी क्यों न, गेम जो तुम्हारे नाम से शुरू हुआ था। मुझे ये बिल्कुल भी अच्छी नहीं लगती भूऽऽ”

“चुप हो जाओ ग़ज़ाला ! किसी के लिये भी इस तरह से बोलने का हक़ तुम्हें किसने दिया?”  क्लास फ़िफ़्थ से चली आ रही दोस्ती में उस दिन पहली बार कट्टी हुई। जो पूरे तीन दिन तक रही। हमारी दोस्ती करवाने में भी बोस्की का सबसे बड़ा रोल था।

ग़ज़ाला से नाराज़गी के बाद मैं अकेले टिफ़िन खा रहा था। उस दिन मेरा दोस्त सिद्धार्थ भी नहीं आया था। दोस्ती करने में मैं वैसे ही थोड़ा सा कंजूस स्वभाव का था। ग़ज़ाला और सिद्धार्थ से दोस्ती होने के बाद मैंने किसी से भी दोस्ती वाला व्यहवार नहीं बनाया था। मुझे लगता था हम तीन ही, फ़ॉर एवर फ़्रेंड हैं। इस वक़्त मुझे अपना अकेलापन बहुत दुःख दे रहा था क्योंकि ग़ज़ाला अपनी सहेलियों के साथ मज़े से टिफ़िन शेयर कर रही थी। उनकी हँसी और बातें सुनकर मैं बाहर ग्राउंड में आ गया, तभी एक आवाज़ मेरे बिल्कुल पीछे से आई-“अरे, रामचंद्र जी, अकेले क्यों बैठे हैं?” पलटकर देखा तो बोस्की मेरे पीछे खड़ी थी।

“कुछ नहीं दीदी, वो मेरी दोस्त मुझसे नाराज़ है।” उसने मेरे बालों पर हाथ फिराते हुये कहा, “तो कोई बात नहीं हम दोस्त बन जाते हैं। बोलो करोगे मुझसे दोस्ती?”

“आप तो दीदी हो आपको दोस्त थोड़ी न बना सकता हूँ।”

“क्यों दोस्ती में उम्र गिनी जाती है क्या? दोस्ती तो दिल का रिश्ता होता है, राम!”

“एक मिनट आप मुझे राम क्यों कह रही हैं। मैं राघव हूँ।”

“वो तो मैं जानती हूँ।पर मुझे तुम राजा लगते हो, ‘राजा रामचंद्र’ से सच्चे इंसान। तभी तो मैं तुमसे दोस्ती करना चाहती हूँ। मैं तुमसे सिर्फ़ पाँच साल ही तो बड़ी हूँ। मैं अठारह की हूँ और तुम चौदह साल के मैंने तुम्हारी डेट ऑफ़ बर्थ उस दिन तुम्हारी डायरी में देखी थी। इत्तु सी बड़ी होने पर दोस्ती करने में कोई हर्ज़ नहीं। हाँ, कभी प्यार हुआ तब सोचना पड़ेगा।”  कहते हुये वह हँस दी थी, और शर्म के मारे मेरे कान लाल हो गये थे, उस गर्मी का एहसास मैं आज भी महसूस कर सकता हूँ।

उसी वक्त वह मुझे लेकर ग़ज़ाला के पास गई और बोली, “मेरी वजह से अपनी इतनी प्यारी सी सखी से दोस्ती मत तोड़ो। मुझे पता है, तुम सब मुझे क्या कहते हो, मुझे फ़र्क़ नहीं पड़ता। किंतु अच्छी दोस्ती टूटती है तो इस कल्लो माई को बहुत फ़र्क़ पड़ता है। क्योंकि काले तो कृष्ण भी थे पर वे दोस्ती के सच्चे भगवान थे। तो क्यों न हम अच्छे दोस्त बन जायें।”  उसे सुनकर ग़ज़ाला बहुत डर गई और बोली, “दीदी, ये झूठ बोल रहा है, मैंने ऐसा नहीं कहा था।”

“लेकिन इसने तो कुछ कहा ही नहीं, सिवाय इसके कि तुम इससे बोल नहीं रही हो और इसी वजह से ये दुःखी है और इसने अपना टिफ़िन भी नहीं खाया है। प्लीज़ इससे दोस्ती कर लो।”  इतनी बातों के बीच लंच ब्रेक ख़त्म हो गया और बोस्की ग़ज़ाला से दोस्ती का प्रॉमिस लेकर हमारी क्लास से चली गई। छुट्टी तक हम दोनों फिर से पक्कुड वाले दोस्त बन गये थे। छुट्टी के वक्त बोस्की हमें गेट पर मिली और मुझे देखकर उसने हाथ हिलाते हुये अपनी राइट आई विंक की, उसका ऐसा करना क़रेंट लगने जैसी हरकत मेरे शरीर में कर गया।

अब हम चार दोस्त बन गए थे। ग़ज़ाला, सिद्धार्थ, बोस्की और मैं। साथ खाते और खेलते थे। इत्तफ़ाक़ से हमारा हाउस भी एक ही था। तो हमारी एक्टिविटी भी एक ही रहती थी। कोई भी एक्टिविटी कराते वक्त बोस्की मुझे छूती तो मेरे अंदर एक हलचल सी होती। मैं जितना उसके साथ रहता, उतना ही और उसके साथ रहने का जी करने लगता।

एक साल हो गया था हमारी दोस्ती को। हम आठवीं में आ गये थे और बोस्की बारहवीं में। यह बोस्की का स्कूल में आख़िरी साल था। मार्च से वह कॉलेज स्टूडेंट हो जायेगी। वह रोज़ अपने नये-नये प्लान हम सबको बताती, हम उसे सुनकर अपने पीछे रह जाने का अफ़सोस भी कर लेते थे। फिर उसके समझाने पर समझ भी जाते कि स्कूल के दिन सबसे प्यारे होते हैं, वह कभी लौटकर नहीं आते! 

दिसंबर में हमारे विंटर वेकेशन से पहले, स्कूल से जयपुर के लिये हम सब पिकनिक पर गये। वहीं पर हम सबको पता चला था बोस्की के बर्थ के बारे में, उसने ट्रूथ और डेयर खेलते वक्त ट्रूथ को चुना तो शीतल दीदी ने उससे प्रश्न किया था, “अपने रूप रंग के बारे में कुछ बताओ किस साबुन का कमाल है, यह चमकदार त्वचा?”

तब बोस्की ने कहना शुरू किया और हम सब साँस रोककर उसे सुनते रहे, “मेरी शक्ल सूरत विदेशी है लेकिन मेरा दिल हिंदुस्तानी है। रही बात मेरी इस सूरत की, तो उसकी कहानी में थोड़ा सा ट्विस्ट है दोस्तों! मेरी माँ एक बड़े से परिवार को पाल रही थी क्योंकि वह बिना कमाई वाले घर की सबसे बड़ी संतान थी, छोटे-मोटे काम करके वह अपने भाई-बहनों को पाल रही थी। लेकिन पाँच भाई-बहनों के उस परिवार के एकलौते बेटे ने एक सपना अपनी आँखों में पाल लिया कि वह डाक्टर बनेगा। जब मेरी माँ को यह पता चला, तब वह ख़ुश तो बहुत हुई लेकिन सिलाई-बुनाई से दाल-रोटी तो चल रही थी। पढ़ाई, वह भी अंग्रेज़ी स्कूल की, ज़रा टेढ़ी खीर थी। उसने अपनी मेहनत की रस्सी को और खींचना शुरू किया, मेहनत की रस्सी रबर की तरह बढ़ती तो लेकिन कमाई के नाम पर वैसे ही छूटकर हाथ पर लगती जैसे रबर खींचकर कोई एकदम से छोड़ दे। तभी उसे पता चला कि कुदरत ने हम औरतों को जिस नेमत से नवाज़ा है अब उसका भी कारोबार होता है। बस उसने भाई के सपने को पूरा करने के लिये अपना नया कारोबार शुरू किया। उसने अपनी कोख किराये पर देनी शुरू की। वक्त बीतने लगा, भाई पढ़ने लगा था। घर के हालात भी दाल-रोटी से सब्ज़ी चावल और चटनी तक आ पहुँचे थे। यह तीसरी बार था जब वह अपनी कोख किराये पर देने जा रही थी। डाक्टर ने उसे मना कर दिया कि यह आख़िरी बारी है अब आप यह काम नहीं कर सकती हैं। इस बार माँ की कोख ‘इथोपिया’ से आये एक दंपति ने ली थी। लेकिन माँ का आठवाँ माह लगते ही खबर मिली कि वे लोग एक दुर्घटना में मारे गये। डाक्टर ने मेरी माँ से कहा कि, “परेशान होने की कोई बात नहीं है वह यह बच्चा या तो किसी निःसंतान को, या किसी संस्था को दे देंगी। उनकी कोई भी ज़िम्मेदारी बच्चे को लेकर नहीं होगी।” उसी रात माँ ने वहाँ से बाकी पैसे लेकर अपने घर भेज दिये ताकि बाद में रुपयों को लेकर कोई विवाद न हो। मेरे जन्म के बाद माँ ने डाक्टर से इजाज़त ली और मेरी क़ानूनी माँ बन गईं। अब माँ की कोख में बीज विदेशी था तो मुझे रूप विदेशी मिला लेकिन कोख देशी थी तो दिल देशी मिला।”

अब तक सब साँस रोके उसे सुन रहे थे।उसके चुप होते ही हम सब ने ज़ोरदार तालियाँ उसके लिये बजायीं! दूसरे दिन हम आमेर का क़िला घूमने गये। वहाँ की चकाचौंध देखकर हम सब मंत्रमुग्ध थे। तभी बोस्की मुझसे बोली, “मुग़लों के शासनकाल से कहीं भव्य तो राजा रामजी का काल था। फिर मुझे शरारत से देखते हुये बोली, “है न, राम।” सबके सामने राम बोलने से मैं कुछ झेंप सा गया। मैंने भी तुरंत एक प्रश्न उसके सामने रख दिया, “तुम्हारा नाम भी तो बहुत अजीब है?”

“हाँ, वो तो है। पता है मेरा नाम बोस्की क्यों है? मेरी माँ कहती है बिना एक भी बोसा के तू मेरी झोली में आई तो मैंने तेरा नाम ही बोस्की रख दिया।और ऐल्बेनी मेरे पिता का नाम था।” कुछ समझते हुये और  कुछ न समझते हुये मैंने उससे पूछा, “अब ये बोसा क्या होता है?” उसने मेरा हाथ पकड़ा और किले की एक दीवार के कोने में ले जाकर मेरे गाल पर एक चुंबन देते हुये, मुझे अपने बाहों के दायरे में समेट लिया। मैं किसी खिलौने सा उसे यह सब करने दे रहा था। उसने मुझे ख़ुद में ही भींचते हुये कहा, “यही होता है बोसा! अब तो बोसा समझ गये हो न मुझे मेरा बोसा वापस कर दो।” मेरा पूरा शरीर काँप रहा था। ख़ुद को उससे अलग करने का विचार अभी तक मेरे मन में नहीं आया था। तभी उसने मेरा हाथ पकड़कर अपने उरोजों पर रख लिया, उसके ऐसा करते ही मैंने झटके से खुद को उससे अलग कर लिया। भागता हुआ अपने ग्रुप से जा मिला। थोड़ी ही देर में वह भी वहाँ आ गई। अब वह बराबर मुझे देखकर मुस्कुरा रही थी और मैं हद से ज़्यादा घबरा रहा था। 

घर लौटकर मैं बीमार पड़ गया था। न जाने कितने विचार मेरे दिमाग़ में उस वक़्त उठा-पटक मचाते रहते थे। बहुत दिनों के बाद मैं खुद को सयंत कर पाया था।

उस दिन के बाद आज लगभग बीस साल बाद वह मुझे इस आर्टिकल में दिखी। बाल यौन शोषण पर लिखा उसका लेख इस अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका में छपा था उसके नाम और फ़ोटो के साथ। उसे पढ़ने से पहले ही आज भी मेरे भीतर एक सिहरन सी दौड़ गई और मुझे यह सब याद आ गया। उम्र के इस पड़ाव पर आकर भी खुद के साथ गुजरे उस घटनाक्रम को भुला नहीं पाया हूँ। उसने इस लेख में कौन सा रंग बुना होगा अब बिना पढ़े ही मैं समझ सकता हूँ।मेरा शोषण और उसका प्यार!

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