कहानी: कोंका

अमरेन्द्र सुमन

अमरेन्द्र सुमन


खेत-बहियार, हाट-बाजार में दिन-दिनभर बेफिक्र हो भटकने और राड़-चुहाड़ से लेकर भले लोगों तक की दिल्लगी का दलान बन चुका मंद बुद्धि कोंका, पिछले कुछ रोज से काफी चिंतित और उदास दिख रहा था। अब न तो वह किसी के दरवाजे पर कभी हाजिरी बजाता और न ही लोगों की खिल्लियों का मसाज बनता। मरनी-हरनी, शादी-ब्याह या अन्य समारोहों में छुप-छुप कर पत्तलों पर टूट पड़ने वाला कोंका अचानक कैसे परिवर्तित हो गया? गाँव के लोगों में कोंका को लेकर एक नयी बहस छिड़ गई थी। हकीकत से कोसों दूर जहाँ एक ओर कई लोग उसके अचानक सुधर जाने की खबर पर ईश्वर को धन्यवाद ज्ञापित करते, वहीं दूसरी ओर कुछ लोग परिवार वालों की भारी दबिश का इसे परिणाम मानते। जो जितना अनुभवी और ज्ञानी, उसका वैसा ही अनुमान।

वैसे तो कोंका था मंद बुद्धि, किन्तु इशारे से चीजों को समझने की उसमें गजब की महारत हासिल थी। सुन्दर लड़की, शादी-ब्याह और अच्छे-अच्छे भोजन की बात पर तो वह उछल ही पड़ता। लोग पूछते ब्याह कर लाएगा तो खिलाएगा क्या? इशारे से जवाब देकर लोगों की जुबान ही बंद कर देता वह। 

बड़ा सयाना निकला साला, ख्वाब तो देखो इसके?

गूँगा-बहरा अवश्य है दोस्त, दिल और दिमाग तो इंसान का ही ठहरा, भावनाएँ और संवेदनाएँ तो इंसान सी ही ठहरी! पिछले जन्म के कर्म का परिणाम भले ही भुगत रहा हो बेचारा, किसी का कुछ बिगाड़ता तो नहीं? दिव्यांगों पर सहानुभूति रखने वाले दीपू ने एक दिन सोनू से कहा।
 
फिर लोग इसे हेय दृष्टि से देखते ही क्यों हैं?
 
तरह-तरह के लोग, तरह-तरह की विचारधारा! इस दुनिया में कौन किसे रोकता है। हाथ की सभी अंगुलियाँ एक समान होतीं हैं क्या? सभी अंगुलियों के कार्य और स्वभाव एक समान होते हैं क्या? दीपू के इस जवाब से सोनू के चेहरे पर तनाव आ गया था। पढ़ा-लिखा किन्तु जन्मजात उदण्ड सोनू, कोंका को छेड़कर उससे अपने मन की सुनना चाहता था, किन्तु विवेकशील दीपू की दखलंदाजी उसे रोक रही थी।
 
कोंका के घर से बाहर नहीं निकलने से गाँव-घर, हाट-बाजार में ठहाके की गूँज अब मद्धिम पड़ चुकी थी। तनाव की जिन्दगी में घर-परिवार चला रहे जगेसर, मोदी, लड्डू, खेसारी लाल के लिए कोंका प्रतिदिन मनोरंजन का एक स्थायी साधन था।
 
विरंची भाई क्या बात है, किशना का बेटा कोंका पिछले कुछ दिनों से दिखलायी नहीं पड़ रहा?
जगेसर ठीक ही कह रहा है, कुछ तो बात है, हकीकत तो विरंची दा ही बतला सकते हैं? जगेसर की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि बीच में टपक पड़ा था खेसारी लाल। पीछे से लड्डू ने भी अपना समर्थन दिया।
 
पहले तो विरंची ने उन्हें टालने का प्रयास किया, किन्तु ठहरे तो सभी एक ही गाँव के भाई-गोतिया! वह नहीं तो कोई और सही? घटनाएँ तो संदूक में कैद कर रखी नहीं जा सकतीं। लम्बी साँस लेते हुए विरंची ने कहा, पता नहीं एक दिन किशना पर कौन सा भूत सवार हो गया, पूरी बेहरमी के साथ कोंका पर टूट ही पड़ा था। यार, बाप हो कि कसाई? किशना के हाथ से खजूर की छड़ी छिनते हुए मैंने कहा। 

एक नंबर का हरामी है साला। जहाँ देखो वहीं बदमाशी, नाक में दम कर रखा है!
 
क्यों, क्या हुआ?
 
गोबर चुनने जा रही झुरिया की बेटी को देखकर हँस रहा था। पेटफूली उसकी मईया परचारने आयी थी। कितनी बार कहा है नकचढ़ी को कि इसके हाथ-पैर में जंजीर डालकर रखो, सुनती ही नहीं हमारी। आज उसे भी मजा चखाता हूँ। वह खैनी रगड़ते हुए तैश में बोले जा रहा था।
 
जन्म से अपंग और कोंक, यह बेचारा झुरिया की बेटी को देखकर क्योंकर हँसेगा? जरूर उसी ने छेड़ा होगा इसे।

यादव टोला से लेकर मिसिर टोला तक, कोई ऐसा दिन नहीं, जहाँ से शिकायत न आती हो। किसी घर से कभी कपड़े चुरा लेने की शिकायत आती, तो कोई पैसे चुरा लेने का कम्प्लेन करता। किसी के बरामदे पर कभी दिन-दिन भर नंग-धड़ंग पड़ा रहता, तो कहीं शादी-ब्याह में फेंके पत्तलों पर टूट पड़ता। पता नहीं किस जन्म का बदला ले रहा है यह मुझसे!

ज्यादा टेंशन लेने की कोई बात नहीं। अपने आप सब ठीक हो जाएगा। दिमाग रहता तो पढ़ता-लिखता नहीं? रही बात चोरी-चमारी की तो आज तक ऐसी शिकायत मैंने नहीं सुनी। जो यह आरोप लगाते हैं, निराधार है। यादव टोला से लेकर मिसिर टोला तक, कौन नहीं पहचानता मुझे। सूई तक चोरी हो जाए तो पूरा इलाका छान मारता है। तोहमत लगाना अलग बात है, सच से सामना अलग बात। हो न हो, तुमसे दुश्मनी रखने वालों की यह कोई सोची-समझी चाल हो? कोंका के माध्यम से लोग तुमसे अपनी दुश्मनी निकालना चाहते हों? विरंची की बातें सही लगी उसे। किशना का गुस्सा धीरे-धीरे शांत हो गया।

इधर किशना की अंधाधुँध पिटाई से घायल कोंका माथे से रिस रहे खून को देखकर कभी रोता, तो कभी अचानक हँस पड़ता। उसकी पीड़ा को बाँटने वाला कोई नहीं था। न माँ को उसपर तरस आती, और न ही भाई-बहनों को। किशना के प्यार का तो वह भूखा ही रह गया। इस दृश्य से विरंची के रोंगटे खड़े हो गए। कोंका के घाव पर मरहम-पट्टी की चाह रखते हुए भी वह विवश था। उसकी तरफदारी पर, पता नहीं किशना कुछ गलत न सोच ले। मन ही मन किशना से घिन हो गई थी उसे। कोंका पर इस अप्रत्याशित अत्याचार की कहानी से जगेसर भाई और खेसारी लाल की आँखें भी नम हो आयीं। बहुत बुरा हुआ, दूसरे का बच्चा है, वे कर भी क्या सकते हैं? लड्डू ने कहा।

बात आयी, गई हो गई। कोंका के नहीं दिखने से दो-चार दिनों तक लोगों के चेहरे पर मायूसी छायी रही। धीरे-धीरे सबकुछ सामान्य होता जा रहा था। लोग कोंका को अब भूलने भी लगे थे।

झोला छाप डॉक्टर, फिर भी भीड़ में कोई कमी नहीं। लम्बी लाइन लगी रहती। हाथों से पर्ची लेता और रूक-रूक कर दवाईयाँ देता। आपकी जो भी मजबूरी हो, डॉक्टर की अपनी मर्जी थी। दवाई की पर्ची के साथ कतार में खड़ा कोंका जितनी जल्द आगे बढ़ने का प्रयास करता, लोग उसे ठेलकर उतना ही पीछे कर देते। नये खून वाले तो दो-चार हाथ जड़ भी देते।

अचानक कैसे टपक पड़ा साला? दवा की इसे क्या जरूरत? कोई कागज का टुकड़ा हाथ में दबाए खड़ा होगा? दो-चार को रगड़ देना कोंका के बाँये हाथ की बात थी। चेहरे पर भारी क्रोध के वाबजूद वह फिर भी शांत और खामोश था। पर्ची की दवा उसे चाहिए थी। दवा मिली कि हवा में उड़कर वह पहुँच जाएगा घर।

किशना के भविष्य के सितारे उसके दोनों बेटे पिछले कुछ महीने से घर पर नहीं थे, जिनके होने से उसका सीना उँचा रहा करता। पढ़ाई के सिलसिले में या तो वे बाहर थे या फिर शहर में जाने के बाद वहीं के होकर रह गए। दूर-दूर तक जमीन और साल भर की खेती-बारी से उनका कोई लेना-देना नहीं था। किशना भी वैसा नहीं रहा जो अकेले दम पर घर-गृहस्थी की बैलगाड़ी संभाल सके। समय एक सा नहीं रहता। पहले सर्दी, खाँसी, जुकाम और फिर बाद में वही एक गंभीर बीमारी? हट्ठा-कट्ठा, मुस्तंड किशना सूखकर काँटा हो चुका था।

एक अकेली औरत चूल्हा-चौकी संभाले या किशना को देखे? घर पर नौकर-चाकर रखने की कोई परंपरा नहीं थी। वे बस गाय-बैल और खेतों तक ही सीमित रहते। जब से मुफ्त अनाज की परिपाटी चली, उन मजदूरों के सूर भी बदल गए जो दिन-दिन भर जी हूजुरी करते नहीं थकते थे। हाट-बाजार से लेकर किशना की देखभाल और समय पर दवा-दारू? बिना घूँघट के जो कभी बाहर नहीं निकलती उसका चेहरा सार्वजनिक हो चुका था। विरंची का अपना घर-परिवार था। बीच-बीच में अपनी उपस्थिति जरूर दर्शा जाता वह, लेकिन वह भी कब तक? कोंका के अलावे भरोसे का कोई और नहीं था वहाँ। बेटी परदेश में थी, जब तक लौटेगी पता नहीं क्या हो जाएगा ।

खाट पर पड़ा-पड़ा किशना कराह रहा था। जीने की उम्मीद ही छोड़ चुका था वह। डील-डौल शरीर वाला व्यक्ति जब दूसरों के कंधे के सहारे जीवित हो, उसकी मनःस्थिति क्या होगी, सहर्ष ही समझा जा सकता है। बाहर रह रहे बेटों को उसके बीमार होने की खबर तो थी, वाबजूद इतनी जल्द घर लौटने की कोई जल्दबाजी नहीं। फोन पर ही कहते, सब ठीक हो जाएगा। काम की अधिक व्यस्तता का हवाला देकर दोनों ने अपना- अपना पल्ला झाड़ लिया।

कितनी मासूमियत थी दोनों में, किन्तु समय के साथ-साथ सबकुछ बदल गया। क्या कुछ नहीं किया उनके लिए। पढ़ाई के लिये पैसे की जुगाड़ में हालत पतली हो जाती। कई-कई बीघा धानी जमीन बेच डाली। बच्चे बुढ़ापे का सहारा होते हैं, महज किताबी बात है। स्कूल से लेकर कॉलेज तक की पढ़ाई में किन-किन मुसीबतों का सामना नहीं करना पड़ा। पंख निकल जाने के बाद उनकी दुनिया ही बदल गई। इसे ही कलियुग कहते हैं। बिस्तर पर पड़ा पुरानी बातों को याद कर किशना बैचेन और उदास हो उठता। एक कोंका था, जिसपर कभी कोई ध्यान नहीं था। रोटी के चंद टुकड़े फेंक दिये, बस। कभी कोई परवाह नहीं की उसकी। लात-थप्पड़ और गालियाँ ही मिलती रही बेचारे को। एक तरह से बोझ ही था समझो। दोनों भाईयों को तो फूटी कौड़ी नहीं सुहाता था वह। विचित्र दुनिया है। अपने बलबूते जब तक करने की शक्ति और सामर्थ्य हो, सभी अपने हैं। कमजोर हुए कि सभी साथ छोड़ जाते हैं।

जबतक बीमार रहा किशना, बिना थके बाप की सेवा में जुटा रहा कोंका। उचित, अनुचित जो कुछ मंदबुद्धि कोंका की समझ में आया, अपने आधे-अधुरे अंगों से करता रहा। उसकी इस सेवा में स्वार्थ और छल-कपट का दूर-दूर तक कहीं कोई स्थान नहीं था। मंदबुद्धि बेटे की इस पितृ भक्ति से किशना अविभूत था। जीवन में पहली दफा उसने महसूस किया, ईश्वर का दिया सब एक समान है। जिससे जीवन में रत्तीभर की उम्मीद नहीं थी, पिछले कुछ दिनों से वही उसका सबकुछ था। बेटे की इस वफादारी से उसकी आँखें भर आयीं। हरवक्त उसे प्रताड़ित करते रहने के पश्चाताप से वह गड़ा जा रहा था। कोंका को जन्म देकर भी उसकी छाया से दूर रहने वाली किशना की पत्नी सश्रम उसकी सेवा से पूरी तरह पिघल चुकी थी। काश बहुत पहले समझ पाती तुम्हें, और कोंका को गले से लगाते हुए वह फूट-फूटकर रोने लगी। 

माँ-बाप के स्नेह, सानिध्य और सहानुभूति से कोंका भी तर गया। पहली दफा उसे महसूस हुआ कि उसके भी माँ-बाप हैं। यह समय माँ-बेटे के मिलन का अद्भुत क्षण था। ईश्वर की लीला भी अजीब है। जिसे खुद की उपस्थिति का कोई ज्ञान नहीं, सांसारिक जीवन और अपने-पराये शब्दों से जिसका कभी कोई सरोकार नहीं रहा, आज वही सबसे बड़ा सहयोगी था। अंधे को जैसे दिव्यदृष्टि प्राप्त हो गई हो। 

और एक दिन कोंका को पास बिठाते हुए किशना ने कहा "झुरिया की बेटी से ब्याह करेगा क्या?"

कोंका के चेहरे पर कोई प्रतिक्रिया न देख, सबकुछ समझ चुका था किशना। छोटी-छोटी बातों पर गाँव में रिश्तों की बुनियाद अचानक हिल जाती है, अब समझ पाया था वह।

कोंका की निश्छल हँसी और उसके निर्मल हदय से खुद व खुद उसकी ओर आकर्षित हो चुकी पेटफूली झुरिया की बेटी के मलीन चेहरे की ताजगी कोंका की एकमात्र झलक से वापस लौट आएगी, गुलाबो को पूरा विश्वास था।

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