मोज़ेल: आम आदमी की पीड़ा को महसूस करती कहानियाँ

समीक्षक: अरुण कुमार निषाद


पुस्तक: मोज़ेल (कथा संचयन)
लेखक: स‌आदत हसन मण्टो
सम्पादक: शीन काफ निजाम और नन्द किशोर आचार्य
प्रकाशक: वाग्देवी प्रकाशन नई दिल्ली, 
संस्करण: 2012 
पृष्ठ संख्या: 184 
अंकित मूल्य: ₹ 70 रुपये

साहित्य जगत में यथार्थवादी लेखन को समृद्ध करने में सआदत हसन मण्टो एक अग्रणी नाम है । उनकी कहानियाँ समाज का प्रतिबिम्‍ब दिखाने का कार्य करती हैं । उनकी कहानियों के पात्र एवं घटनाएँ काल्पनिक न लगकर अपने आसपास के लगते हैं । इसीलिए उनकी कहानियाँ कालजयी मानी जाती हैं । सआदत हसन मण्टो की कहानियों का मुख्य विषय आम जीवन की त्रासदी, साम्प्रदायिकता, भ्रष्टाचार, मानवता का शोषण, स्त्री शोषण, वेश्यावृत्ति, राजनीति आदि हैं ।

अरुण कुमार निषाद
'टोबा टेकसिंह' कहानी का बिशन सिंह भले ही पागल है पर उसे अपनी जमीन 'टोबा टेकसिंह' सदैव याद रहती है और अंत में उसकी मृत्यु उसी जगह होती है।

उधर ख़ारदार तारों के पीछे हिन्दुस्तान था, इधर वैसे ही तारों के पीछे पाकिस्तान दरमियान में ज़मीन के टुकड़े पर, जिसका कोई नाम नहीं था, टोबा टेकसिंह पड़ा था । (पृष्ठ 22)

'खोल दो' कहानी का सिराजुद्दीन अपनी हिन्दुस्तान पाकिस्तान के बँटवारे में भागते समय अपनी बेटी सकीना से बिछड़ जाता है और अन्त उसे मिलती है सकीना की लाश।

उसने लाश के ज़र्द चेहरे पर चमकता हुआ तिल देखा और चिल्लाया: “सकीना...” (पृष्ठ 27)

'ठण्डा गोश्त ' कहानी अवैध संबंधों के इर्दगिर्द घूमती कथा है। इसी संदेह में कुलवन्तकौर ईशरसिंह की हत्या कर देती है।

उसने लपककर कोने में से किरपान उठाई, मियान को केले के छिलके की तरह उतारकर एक तरफ फेंका और ईशरसिंह पर वार कर दिया। (पृष्ठ 34)

'काली शलवार' सुलताना नाम की एक वेश्या की कहानी है जो एक काली सलवार के लिए अपने कान के झुमके शंकर को दे देती है और वही कान के झुमके वह अपनी सहेली मुख़तार के कान में देखती है। दोनों एक दूसरे से अपने अपने समान के लिए एक दूसरे से झूठ बोलती हैं।

सुल्ताना ने दरवाजा खोला तो मुख़तार अंदर दाखिल हुई। उसने सुल्ताना के तीनों कपड़ों की तरफ देखा और कहा: “कमीज और दुपट्टा तो रंगा हुआ मालूम होता है। पर यह सलवार न‌ई है... कब बनवाई?” सुल्ताना ने जवाब दिया: “आज ही दर्जी लाया है...” यह कहते हुए उसकी नज़रें मुख़तार के कानों पर पड़ी: “यह बुंदे तुमने कहाँ से लिए?” मुख़तार ने जवाब दिया: “आज ही मंगवाए हैं... ” इसके बाद दोनों को थोड़ी देर ख़ामोश रहना पड़ा। पृष्ठ 56-57
'रामखिलावन' कहानी में हम देखते हैं कि किस प्रकार मज़हब के नाम पर फसाद कराकर मानवता का अंत किया जा रहा है।

उसने रोना शुरू कर दिया: “साब, मुझे माफ़ कर दो... यह सब दारू का कुसूर था... और दारू....दारू... आजकल मुफ्त मिलती है... सेठ लोग बाँटता है कि पीकर मुसलमीन को मारो...।” (पृष्ठ 68)

'लाइसेंस ' कहानी में मंटो ने लिंगभेद की समस्या को उठाया है। एक औरत कोठे का लाइसेंस प्राप्त कर सकती है परन्तु ताँगा चलाने का नहीं।

शहर की कमेटी ने जवाब दिया: “ जाओ, बाजार में जाकर बैठ जाओ... वहाँ कमाई ज्यादा है।” पृष्ठ 80

'नया कानून ' कहानी में लेखक लिखता है कि नया कानून केवल कागजों पर दर्ज होता है ।आम जनमानस का उससे कोई फायदा नहीं।

'नया कानून, नया कानून, क्या बक रहे हो... कानून वही है पुराना।' और उसको हवालात में बंद कर दिया गया। (पृष्ठ 94)

‘हतक’ कहानी की सौगन्धी की पीड़ा यह थी कि उसे वह प्यार नहीं मिला जिसकी उसे तलाश थी। जो भी उसके पास आए सब अपनी हवस मिटाने आए। इसलिए कहानी के अंत में वह अपने कुत्ते के साथ सो जाती है।

बहुत देर तक वह बेंत की कुर्सी पर बैठी रही-सोच-विचार के बाद भी उसको अपना दिल परचाने का कोई तरीका न मिला तो उसने अपने ख़ारिशज़दा कुत्ते को गोद में उठाया और सागवान के चौड़े पलंग पर उसे पहलू में लिटाकर सो गई। (पृष्ठ 122)

‘बू' कहानी का नायक रनधीर वह गंध ढूंढता रहा जो उसे घाटन लड़की के शरीर से मिली थी।
वह हिना की मस्ती... उस घाटन लड़की के मैले जिस्म से आई थी। (पृष्ठ 131)

'बाबू गोपीनाथ' कहानी के गोपीनाथ की पीड़ा थी कि जब उसके पैसे खत्म हो जायेंगे तो उसकी प्रेमिका (ज़ीनत उर्फ जी़नू) कैसे रहेगी। इसलिए गोपीनाथ उसका विवाह हैदराबाद के जमींदार गुलाम हुसैन से करवा देता है।
उसने ज़ीनत के सिर पर हाथ फेरा और बड़े ख़ुलूस के साथ कहा: “खुदा तुम्हें खुश रखे।” (पृष्ठ153)

'मोज़ेल' कहानी की नायिका अपनी जान की बाजी लगाकर त्रिलोचन की शादी उसी के मज़हब की सरदारिन कृपालकौर से करवा देती है।

मोज़ेल ने अपने बदन पर से त्रिलोचन की पगड़ी हटाई: “ले जाओ इसको... अपने इस मज़हब को...।” (पृष्ठ 183)

इस यथार्थवादी लेखक की कृतियों पर शोधकार्य की आवश्यकता है । 

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