कवि घासीराम व्यास के काव्य में राष्ट्रीय चेतना की अभिव्यक्ति

प्रीति गुप्ता
प्रीति गुप्ता

शोधार्थी (हिंदी विभाग), राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर 

भारत के हृदय में स्थित बुन्देलखण्ड का इतिहास अत्यन्त गौरवपूर्ण है। यहाँ प्रकृति की रमणीय छटा सुन्दरता, रम्यता, मनोहरता, मोहकता, मादकता देखते बनती हैं। बुन्देलखण्ड में पर्वतराज विन्ध्याचल जो अपनी कर्तव्यनिष्ठा और उदारता के कारण भारत माता के हृदयस्थल में निवास करता है। ऐसी पावन, रम्य और वन्दनीय भूमि महान वीरों, शहीदों और संस्कृत तथा हिन्दी साहित्य के साहित्यकारों, कवियों की प्रसवस्थली रही है। इस भूमि की प्रकृति में ही कवित्व गुण प्रदान करने की अपार क्षमता विद्यमान है। बुन्देलखण्ड अनेक श्रेष्ठ साहित्यकारों का जन्मस्थान और कर्मस्थली रहा है जिनमें झाँसी के जनकवि भग्गी दाऊ जी, श्याम, चतुरेश नीखरा, हृदयेश, पण्डित मदन मोहन द्विवेदी ‘मदनेश’, सियाराम शरण गुप्त, मुंशी अजमेरी, कवीन्द्र नाथूराम माहौर, अम्बिका प्रसाद अम्बिकेश, घनश्यामदास पाण्डेय, नरोत्तम दास पाण्डेय और इसी परम्परा में राष्ट्र कवि घासीराम व्यास आदि उल्लेखनीय हैं। काव्य में राष्ट्रीय चेतना की दृष्टि से बुन्देलखण्ड उत्कृष्ट रहा है जिससे राष्ट्रीय काव्य के माध्यम से जन-जन में प्रेरणा का संचार किया। उनमें से प्रमुख राष्ट्रीय कविवर पंडित घासीराम व्यास जी है। जिनके जीवन और काव्य का अभिर्भाव विभाव द्विवेदी युग में हुआ। राष्ट्रकवि स्वतंत्रता सेनानी स्वर्गीय पण्डित घासीराम व्यास ने बुन्देली को सशक्त और प्राणवन्त काव्य धारा राष्ट्रीय चेतना को और बुन्देली भाषा के सौष्ठव को अपनी ललित काव्य शैली में सजीव बना दिया। व्यास जी ने इस युग में राष्ट्र और राष्ट्रीयता की उर्जा को जाग्रत किया। राष्ट्र और राष्ट्रीयता की भावना से ओत-प्रोत कवि व्यास जी माँ भारती के उन महान सपूतों में से एक हैं, जिन्होंने अपनी लेखनी और वाणी से सुषुप्त जन मानस में स्वदेश के प्रति स्नेह और चेतना की लहर पैदा की। उनका सम्पूर्ण जीवन देशभक्ति, त्याग, मातृभूमि सेवा एवं बलिदान की भावना से प्रेरित था। उनका मूल उद्देश्य और ही शब्दों में -
“जनता की शुचि सेवा करना अपना स्वधर्म पहिचाना है।
है जान हथेली लिए हुए पावन स्वदेश व्रत ठाना है।
कर्तव्य मार्ग पर मिट जाना इतना बस केवल जाना है,
यह दुनिया गोरख धंधा है सुख -दुःख का ताना बाना है।
है विपदाओं से मीति नहीं उर प्रीति न फल उपहारों से
आजादी के दीवाने हैं, खेला करते अंगारों से।”1

व्यास जी ने अपने साहित्य द्वारा राष्ट्रीय चेतना की प्रखर अभिव्यक्ति की। समकालीन कवियों एवं साहित्यकारों को तो उन्होंने प्रभावित किया ही साथ ही उन्होंने अपने काव्य द्वारा राष्ट्रीय जागरण का संदेश दिया। उनके राष्ट्रीय काव्य की सराहना राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी ने विक्रम संवत 1974 को हिन्दी साहित्य सम्मेलन इन्दौर के मंच से व्यास जी की यह ओजस्वी कविता सुनकर मुक्त कंठ से सराहना करते हुए कहा था - “बुन्देलखण्ड धन्य है, जिसने व्यास जी जैसे जन मानस के हृदय स्पर्श करने वाले राष्ट्रीय कवि को जन्म दिया।”2 व्यास जी महात्मा गांधी के आदर्शों के दृढ़ उपासक थे,वे अपने 20 वर्ष के राजनीतिक जीवन में अपने जनपद के घर-घर में बापू का संदेश पहुँचाया, स्वयं सक्रिय और तत्पर रहे, हर संग्राम में सबसे आगे। वे अलौकिक प्रेरक शक्ति के दर्शन करते थे -
“खेल जाते खेल, जेल जाते, झेल जाते कष्ट/ठेल जाते उसका, दलेल को मिटाते हैं।
लाठियों को खाते, गोलियों से घबराते नहीं/व्यास पास फाँसी के बलि बलि जाते हैं।
मोहन तरूण तेरे एक ही इशारे पर/समुदित सुख-सर्वस्व को लुटाते हैं।
बलिदान होने को स्वदेश बलिवेदी पर/वीरों के करोड़ों शीश आके झुक जाते हैं।”3

कवि की शोषितों के प्रति गहरी सहानुभूति एवं उनके जीवन के विस्तृत अध्ययन की झाँकी मिलती हैं। महात्मा गांधी ने ‘व्यास जी की कविता खेत की आत्म कथा’ के माध्यम से व्यक्ति के संघर्षमय जीवन की कथा का सुनने के उपरांत उनकी प्रशंसा करते हुए कहा - ‘‘बुन्देलखण्ड धन्य हैं, जिसने व्यास जी जैसे जन मानस के हृदय को स्पर्श करने वाले राष्ट्र कवि को जन्म दिया। मैं श्री व्यास जी की इस खेत की आत्म कथा नामक रचना का और उनकी काव्य शक्ति की क्षमता का हृदय से स्वागत करता हूँ।’’4 व्यास जी राजनीति में भी पूर्ण निष्ठा के साथ कार्य करते थे तथा समाजसेवी के रूप में भी उनमें उतनी ही लगन थी, जितनी व्यास जी ने साहित्य के द्वारा राजनैतिक चेतना को प्रज्वलित किया। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने इनके काव्य पर अपने विचार व्यक्त किये थे। “इसमें कहना क्या कि स्वर्गीय व्यास जी हमारे प्रांत के एक रत्न थे। उनकी प्रतिभा से हमें और कितना पाने की आशा थी, परन्तु काल ने वह पूरी न होने दी। उनकी मृत्यु से समष्टि रूप में हिन्दी की हानि तो हुई ही है, व्यक्तिगत सम्बंध से मेरी जो क्षति हुई उसकी पूर्ति अब कहाँ।”5 राष्ट्रकवि घासीराम व्यास ने देश भक्ति पूर्ण राष्ट्रीय चेतना के सम्पूर्ण सोपानों का बड़ा ही सजीव चित्रण किया है, इन्होंने देश के स्वतन्त्रता संग्राम के अगुआ महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू, सुभाष चन्द्र बोस, विजयलक्ष्मी पण्डित, चन्द्र शेखर आज़ाद, जैसे प्रिय देश भक्तों को एक ही स्थल पर भाव विभोर हो अपनी कविता के माध्यम से इस प्रकार स्मृत किया है –
“भई रोशनी सारे जग में गांधी हिन्द सितारे की वीर जवाहर प्यारे की।
प्राण भेंट भी कमला कर गयी देवी देश हमारे की।
सुनकर हाँक सुभाष चन्द्र की दम गई अत्याचारे की।
विजय लक्ष्मी कौ तप लख के उठी दुकान द्वारे की।”6

व्यास जी के काव्य से बुन्देलखण्ड की जनता इतनी प्रभावित हुई कि उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलनों में बढ़चढ़ कर भाग लिया। राष्ट्र के लिए तत्पर रहने वाले व्यास जी स्वयं एक कर्तव्य परायण सेनानी रहे। कई बार जेल गए। ब्रिटिश सरकार द्वारा दी जाने वाली यातनाओं, कष्टों की परवाह न करते हुए भारत माता को आजाद कराने के लिए भारत माता के सपूत अपना शीश हथेली पर रखकर रण क्षेत्र में कूद पड़ते थे। वे अपने काव्य के माध्यम से उस सत्ता को ललकारते हुए कह उठते हैं -
“चाहे खूब जितना सता ले जुल्म जालिम कर,
आ गया है अंत अब तेरे हरषाने का।
भारत स्वतन्त्र भारत स्वतन्त्र, हम गाते हैं ललकारों से।
आजादी के दीवाने हैं, खेला करते अंगारों से।”7

व्यास जी ने राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय भूमिका का निर्वाह किया। देश के लिए तन-मन-धन से जुट गये और जिला राजनैतिक कॉन्फ्रेंस मऊरानीपुर में सन् 1928 में पण्डित रामेश्वर प्रसाद शर्मा की अध्यक्षता में आहूत की गयी। इस अवसर पर प्रमुख राष्ट्रीय विचार धारा के कर्मठ नेता श्री कृष्णकांत मालवीय प्रयाग, उमा नेहरू प्रयाग और श्री बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ कानपुर, बुन्देलखण्ड क्षेत्र के कर्मठ नेता श्री रघुनाथ विनायक धुलेकर झाँसी, दीवान शत्रुघ्न सिंह, रानी राजेन्द्र कुमारी मगरोठ और श्री बेनी माधव तिवारी उरई आदि ने भाग लिया। व्यास जी ने राष्ट्रीय साहित्य का सृजन किया, उनका कवि हृदय अंग्रेजी सत्ता के अत्याचारों से संघर्ष करने लगा था। तब उनकी माता राधारानी ने अपने वीर पुत्र घासीराम के मस्तक पर तिलक लगाकर अंग्रेजी सत्ता के अत्याचारों से जनता को मुक्त कराने व विजय होने का आशीर्वाद प्रदान किया। व्यास जी के राष्ट्रीय विचार और उनकी बलिदान, वीरता का भाव इन पंक्तियों में भलीभांति स्पष्ट है -
“सर पर कफन लपेटकर निकले हैं/आज मरने के लिए माँ की आन की है याद।
मारने दो गोलियाँ चलाने दो लाठियाँ उन्हें/खोलकर सीना, अड़ जाओ कर एतकाद।
है न परवाह व्यास आह न लेना नाम/होगा खुद जालिमों का जोरों जुल्म बरबाद।
फाँसी के तख्ते पर होके दिलशाद कहा/इनकलाब जिन्दाबाद, इनकलाब जिन्दाबाद।”8

इसी संदर्भ में कविवर व्यास जी को उनकी माताश्री राधारानी ने धरना आंदोलन कर शासन को झुका देने का मंत्र दिया था। उसी से प्रेरित होकर व्यास जी ने सन् 1921 में गांधी जी के असहयोग आंदोलन में मऊरानीपुर में संगठित होकर जुलूस निकाला माता राधारानी ने स्वयं व्यास व साथियों को तिलक लगाकर और माला पहनाकर राष्ट्रीय ध्वज देकर इसकी लाज रखने को कहा। इस अवसर पर राष्ट्रकवि व्यास का यह उद्बोधन उनकी राष्ट्रीय भावना का परिचायक है -
‘‘बढ़े चलो मातृ-भू की नमक अदाई हेतु,
भय है क्या काल का त्रिकाल का विधाता का।
गोलियों को खाना, शीश फाँसी पर झुलाना,
मर जाना पर वीरों न लजाना दूध माता का।”9

व्यास जी के काव्य का मूल्यांकन करते हुए साहित्यकार एवं पत्रकार शिरोमणि डॉ० बनारसीदास चतुर्वेदी ने कहा था- ‘श्रीयुत घासीराम व्यास की असामयिक मृत्यु केवल हमारे प्रांत बुन्देलखण्ड की ही नहीं, वरन् अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य क्षेत्र की एक महान दुर्घटना है, जिस किसी ने उनके मधुर स्वर से कविता का पाठ सुना, वही उनका प्रेमी और प्रशंसक बन गया। आज भी उनकी अनेक पंक्तियाँ कानों में गूँज रही हैं। कवि सत्यनारायण ब्रज कोकिल थे, तो व्यास जी बुन्देलखण्ड के कोकिल, दोनों में अनेक समानताएँ थीं और दोनों करीब-गरीब एक ही उम्र में स्वर्गवासी हुए।“10 उन्होंने समकालीन विविध सामाजिक, राजनीतिक एवं साहित्यिक गतिविधियों का भलीभाँति साक्षात्कार किया तथा आदर परक सामग्री जुटाकर युगानुरूप काव्य की सृष्टि की। उन्होंने समाज में एक नयी चेतना जाग्रत करने एवं सदैव सजग व जागरूक होकर युगानुकूल कार्य करते हुए भी वृद्धि की और अग्रसारित होने की प्रेरणा दी। स्वातंत्र्य समर की अनुगूंज ने व्यास जी के हृदय को झंकृत कर दिया तो मातृभूमि के राष्ट्र प्रेम के गीत उनकी लेखनी के स्रोत बन गए। सन् 1933 में उन्होंने इस मातृभूमि गीत की रचना की थी -
“धन्य जगजीवन के फूल/अड़े रहे निज स्वाभिमान पर सदा स्नेह कबूल
अंत समय शुचि मातृ भूमि की शीश चढ़ाई धूल/धन्य जगजीवन के फूल।”11

राष्ट्र की महिमा का गान, अतीत गौरव के चित्र एवं सम्पूर्ण देशवासियों को अपनी स्वाधीनता एवं स्वतंत्रता के लिये आत्मोत्सर्ग के भाव से उदीप्त करने वाले पं. घासीराम व्यास ने अपनी रचनाओं से जन-जन में राष्ट्र प्रेम और मातृभूमि के प्रति अटूट श्रद्धा एवं विश्वास जाग्रत किया। वे सच्चे अर्थों में अपने युग के प्रतिनिधि थे। उनके काव्य में राष्ट्र प्रेम, राष्ट्र भक्ति, शक्ति व स्वाभिमान के चित्र चित्रित हुए। उनके हृदय पर कितने व्याघातों का प्रहार हुआ उतनी ही तीव्रता और राष्ट्रीयता के गीत उनके काव्य रूप बने। व्यास जी का यह राष्ट्रगीत भी इसी परम्परा का है-
“प्रण कर निकले हैं शीश को हथेली घर/प्राण रहते न पग पीछे को पछेलेंगे।
अरि के समक्ष दुरलक्ष लक्ष गोलियों के/समर समझ निज वक्ष पर झेलेंगे।
धसेंगे दुधारों पर नाचेंगे कटारों पर/आरों पर चलेंगे, अंगारों पर खेलेंगे।“12

व्यास जी की राष्ट्रीयता इन्हीं उपर्युक्त भावों पर आधारित रही, वे तन, मन, धन से मातृभूमि के प्रति बलिदान के लिए अग्रसर रहे, तभी तो राष्ट्रीय उद्बोधन में स्वातंत्रत्य वीरों को उन्होंने अपनी राष्ट्रीय भावनाओं से प्रेरित किया। राष्ट्र को अंग्रेजों के अत्याचारों से मुक्त कराने के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने को तत्पर रहे। अंग्रेज सरकार के दमन चक्र से जन-जीवन आक्रान्त होता गया, तब न जाने कितने कंगारूओं ने अपने प्राणों की आहुति दे दी। व्यास जी के कवि हृदय का व्यग्र रूप तब देखने को मिला जब दीवान शत्रुघ्न सिंह की रानी राजेन्द्र कुमारी के नव शिशु की जेल में ही मृत्यु हो गयी, तब उनका हृदय स्वतंत्रता को सम्बोधित करते हुए उग्र भावों में फूट पड़ा। इस घटना से पीड़ित होकर व्यास जी ने नवयुवकों को मातृभूमि पर बलिदान होने के लिए ललकारा-
“काट दी जो मातृ भू की पराधीनता की पाश, /जेल गये जान पर सच्चे स्वाभिमान पर
फूल बरसायेंगे, लगायेंगे गले से देव, /बलि बलि जायेंगे तुम्हारे बलिदान पर।”13

 विजय ग्लानि शीर्षक रचना में देवगढ़ विजय पर दिल्ली की सेना की और से युद्ध करने तथा विजय प्राप्त करने में छत्रसाल की ग्लानि इसी का सूचक है -
“आओ आज हौसले मिटा ले दिल खोलकर/स्वागत है आपकी गफा का जुल्म ढाने का।
हमको मुसीबतें उठाने में मिला है मजा/शौक गपाने में तुम्हें रौब के जमाने का।”14

व्यास जी की आत्मा एक राष्ट्रीय कवि की आत्मा थी, जिसमें भारत माता की करुण पुकार प्रतिध्वनित होकर बही थी। उनके स्फुट कवित्त जो राष्ट्रीयता पर है, बुन्देलखण्ड भर में प्रचलित है। ये छन्द उत्कृष्ट राष्ट्रीयता के धरोहर हैं। उनके कवित्त महाराजा छत्रसाल, महारानी लक्ष्मीबाई राणा प्रताप, शिवाजी, गुरु गोविन्द सिंह तथा देश के अन्य वीरों पर प्रतिदिन पढ़ने की वस्तु है। उनमें वह शक्ति है कि वे मुर्दा दिलों में भी राष्ट्र प्रेम की एक लहर जगा दे। राष्ट्रीय परम्परा के जीवन्त कवि व्यास जी की तो यही हार्दिक कामना है कि देश के लिए तन-मन-धन सब कुछ अर्पित है। मृत्यु भी उन्हें नहीं डरा पाती, उनकी तो यही भावना है -
“कौमी खिदमत में जिन्दगी निसार होये
भूले नहीं व्यास कभी एक पल को भी याद
जेल खुश खेल हाथ हथकड़ियों को बजा,
गाते हो आजादी के तराने दिल हो के शाद
फाँसी हो गले पे और जुबाँ पे यही आवाज,
इनकलाब जिन्दाबाद, इनकलाब जिन्दाबाद।”15

“व्यास जी के दो प्रमुख रूप थे एक और वे प्रखर राष्ट्र भक्त थे, दूसरी और एक यशस्वी राष्ट्रकवि। उनके अन्तर में निरन्तर तीव्र राष्ट्र भक्ति हिलोरें मारती थी, वहाँ सतत् काव्य सर्जना फलित हो रही थी। देश को स्वतंत्र कराने की छटपटाहट, व्याकुलता की सदा आग धधकती रहती थी साथ ही काव्य सर्जना का यश चलता रहता था। जहाँ देश भक्त के रूप में वे ज्वालामुखी थे वहीं सरस्वती की उपासना में आरती थे।”16 इस प्रकार अगर देखा जाए तो बुंदेलखंड की एक समृद्ध हिंदी काव्य परम्परा रही है और इस परम्परा के कवियों ने राष्ट्रीय चेतना से संबंधित विविध पक्षों पर अपनी लेखनी के माध्यम से जन-सामान्य में राष्ट्रीय भावना का संचार किया है और राष्ट्र सेवा के पथ पर आगे बढ़ने हेतु प्रेरित किया है। व्यास जी की आत्मा सम्पूर्ण निष्ठा के साथ भारत माता की भक्ति और सेवा में लगी रही। राष्ट्र के स्वाधीनता संग्राम में अपना सर्वस्व न्यौछावर करके कूद पड़ने वाले वे एक महाकवि थे। देश और साहित्य की सेवा में उन्होंने अपना जीवन ही खपा दिया। राष्ट्रीय चेतना के द्वारा अपने काव्य में राष्ट्रीयता को स्थान दिया, क्योंकि राष्ट्रीय चेतना की पहचान भी राष्ट्रीयता से जुड़ी होती हैं। इसीलिए इन हिंदी कवियों का काव्य हिंदी के लिए उपहार है। राष्ट्रीय स्वतन्त्रता संग्राम में उनके त्याग और बलिदान को कभी भी भुलाया नहीं जा सकता, वे आज भी हमारे प्रेरणा स्रोत है और रहेंगे। 

संदर्भ 
1. सुकवि 15 जून 1941, आजादी के दीवाने – छंदांश
2. श्रद्धाञ्जलि अंक - राष्ट्रकवि पंडित घासीराम -पृष्ठ संख्या - 5
3. श्री नाथूराम माहौर, अभिनंदन ग्रंथ - राष्ट्र कवि श्री व्यास जी, पृष्ठ संख्या - 35
4. राष्ट्रकवि घासीराम व्यास व्यक्तित्व एवं कृतित्व रामचरण हयारण ‘मित्र’ पृष्ठ संख्या -51
5. श्रद्धाञ्जलि अंक - राष्ट्रकवि पण्डित घासीराम पृष्ठ संख्या -6
6. व्यास-सुधा-घासीराम व्यास, पृष्ठ संख्या - 38
7. व्यास-यश-सिंधु, राष्ट्रकवि घासीराम व्यास, जन्म शताब्दी ग्रंथ पृष्ठ संख्या - 92 
8. श्रद्धाञ्जलि अंक - राष्ट्रकवि पण्डित घासीराम पृष्ठ संख्या - 8
9. व्यास-यश-सिंधु, राष्ट्रकवि घासीराम व्यास, जन्म शताब्दी ग्रंथ पृष्ठ संख्या - 15
10. श्रद्धाञ्जलि अंक - राष्ट्रकवि पण्डित घासीराम पृष्ठ संख्या - 25
11. सुकवि 15 जून 1941 मातृभूमि गीत, पृष्ठ संख्या - 16
12. सुकवि, सन् - 1930 राष्ट्रीय गीत
13. व्यास-यश-सिंधु, राष्ट्रकवि घासीराम व्यास, जन्म शताब्दी ग्रंथ, पृष्ठ संख्या - 91
14. व्यास-यश-सिंधु, राष्ट्रकवि घासीराम व्यास, जन्म शताब्दी ग्रंथ, पृष्ठ संख्या - 98
15. व्यास-यश-सिंधु, राष्ट्रकवि घासीराम व्यास, जन्म शताब्दी ग्रंथ, पृष्ठ संख्या - 109
16. व्यास-सुधा - घासीराम व्यास, पृष्ठ संख्या - 33

शोध निर्देशक: डॉ. दीपिका विजयवर्गीय
सह आचार्य (हिंदी विभाग), राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर

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