ग़ज़ल: निज़ाम फतेहपुरी

ग़ज़ल- 221 1222 22 221 1222 22
अरकान- मफ़ऊल मुफ़ाईलुन फ़ैलुन मफ़ऊल मुफ़ाईलुन फ़ैलुन

रग-रग के लहू से लिक्खी है, हम अपनी कहानी क्यों बेचें।
हर लफ़्ज़ अमानत है उनकी, वो अहद-ए-जवानी क्यों बेचें॥

ये गीत ही तो बस अपने हैं, हमको जो किसी ने बख्शे हैं।
तुम दाम लगाने आए हो, हम उनकी निशानी क्यों बेचें॥

फ़नकार को जो कुछ देकर खुद, नोटों से तिजोरी भरते हैं।
हम ऐसे दलालों के हाथों, वो याद पुरानी क्यों बेचें॥

लफ़्ज़ो में पिरोयी हैं यादें, जो जान से हमको प्यारी हैं।
क़ीमत ही नहीं जिनकी कोई, घड़ियाँ वो सुहानी क्यों बेचें॥

शोहरत के लिए बिकने से तो, गुमनाम निज़ाम अच्छा यारों।
बेबाक क़लम है अपनी ये, हम इसकी रवानी क्यों बेचें॥


ग्राम व पोस्ट मदोकीपुर, जनपद: फतेहपुर (उत्तर प्रदेश)
सम्पर्क: +91 9198120525, 6394332921

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