अध्यात्म् चिंतन की ओर सहज ही उन्मुख करते जीवन को अमृत तुल्य बनाने वाले आलेख

समीक्षक: दिनेश पाठक ‘शशि’

28, सारंग विहार, मथुरा-6
चलभाष: +91 987 063 1805 
ईमेल: drdinesh57@gmail.com
पुस्तक: उजास की तलाश में (अध्यात्म चिंतन)
लेखक: विनोद बब्बर
ISBN: 978-81-951142-2-1
पृष्ठ: 151
मूल्य: ₹ 300.00 रुपये
प्रकाशन वर्ष: 2021 
प्रकाशक: अरावली प्रकाशन, पोस्ट-वीरपुर, हिम्मतनगर, (गुजरात)


राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय अनेक साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत/ सम्मानित, राष्ट्रवादी विचारधारा के पोषक, प्रखर चिंतक, मनीषी, 18 वर्ष से राष्ट्रकिंकर के संपादन से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार श्री विनोद बब्बर जी अनेक भाषा एवं बोलियों के जानकार, हिन्दी तथा भारतीय भाषाओं के प्रबल पक्षधर तथा पूर्वोत्तर भारत में लिपि रहित बोलियों को देवनागरी लिपि से जोड़ने के अभियान में गत दो दशक से अधिक सक्रिय भूमिका निभाते आ रहे बब्बर जी ने अब तक 18 देशों की साहित्यिक एवं सांस्कृतिक यात्राएँ की हैं, इनकी प्रकाशित 38 पुस्तकों में से 8 पुस्तकों का विभिन्न भारतीय भाषाओं में अनुवाद हो चुका है साथ ही देश के 5 विश्वविद्यालयों में इनके साहित्य पर शोध कार्य हो चुके हैं। इनकी पुस्तक-‘उजास की तलाश में’ पढ़ने का सौभाग्य मिला।

विनोद बब्बर
पुस्तक में अलग-अलग शीर्षकों से 70 गद्य आलेख  समाहित किये गये हैं। 
पुस्तक के पहले आलेख का शीर्षक है ‘शब्द तू मरहम बन’ जो अपने आप में मनुष्य जीवन का पूर्ण सार समाहित किए हुए है। ‘या काया में अमृत कूप भरे’ वाणी से निकला एक-एक शब्द निर्धारित करता है कि इससे अमृत की वर्षा होगी या विष की। इसलिए राष्ट्रवादी चिंतक, साहित्यकार डॉ. विनोद बब्बर जी ने शब्द को मरहम बनने की कामना की है। वे लिखते हैं-

इतिहास अपनी विकास यात्रा के दौरान हर शब्द और उसकी महत्ता को भी तय करता है। (पृष्ठ- 7)

हर शब्द में ऊर्जा है, प्रेरणा है। यह ऊर्जा और प्रेरणा सकारात्मक हो कर भला कर सकती है और नकारात्मक होकर विनाशक भी सिद्ध हो सकती है। (पृष्ठ- 8)


दिनेश पाठक ‘शशि’
मधुर स्मृतियों में लौटना संग्रह का दूसरा आलेख है जो सकारात्मक दृष्टिकोण की पक्षधरता पुरजोर तरीके से कर रहा है-

"अपने आप को पहचानिए कि आप क्या हैं? दुनिया बनाने वाले ने आपको श्रेष्ठ जीवन दिया है। अपनी शक्तियाँ दी हैं। आपके अन्दर उस असीम की झलक मिलती है लेकिन आप अपनी खींची हुई लकीरों से बनी आभासी सीमाओं में कैद हैं। पर उस परम आनन्द का सागर आपके अन्दर है, उसे हिलोरें लेने दो।" (पृष्ठ-10)

आलेख ‘क्या यह सच नहीं’ में चरित्र की तो ‘आत्मानुशासन का अभिप्राय’ में आत्मानुशासन की और ‘इंसानियत भी तो सिखाओ’ में इंसानियत की पक्षधरता की गई है।

कहने के लिए एक मुँह और सुनने के लिए दो कान ईश्वर ने बनाये हैं यानी, बोलिए कम और सुनिए , गुनिए अधिक। इसी बात का समर्थन कर रहा है आलेख-‘कंठीमाला’ तो ‘रिश्तों की डोर’ आलेख में रिश्तों की मनोरमता बनाये रखने की कला को मार्मिक ढंग से समझाया गया है।

आत्मदृष्टि के बिना पूजा-पाठ, और परोपदेश सब व्यर्थ हैं। आत्मदृष्टि अर्थात आत्मावलोकन। विद्वान साहित्यकार डॉ. विनोद बब्बर जी पुस्तक के आलेख-"आत्मदृष्टि" और "इस पार, उस पार" दोनों आलेखों में आत्मावलोकन पर विचार करने की सलाह देते हैं -

"जैसे सूर्य-चन्द्र को राहु-केतु पीड़ित करते हैं, ऐसे ही संसारियों को मिथ्या सुख-दुख पीड़ित करते रहते हैं। जीव को अज्ञान रूपी भूत लगा है। इसी से उन्मुक्त होने के कारण उसे स्वप्नतुल्य जगत सत्य प्रतीत होता है।" (पृष्ठ-20)

"आत्मदृष्टि ही श्रेष्ठ है जिसे पाने से सारे दुख नष्ट हो जाते हैं। जिसकी दृष्टि आत्मदृष्टि हो गई, जो आत्म विचार से सम्पन्न हो गया, उसके सामने कोई भी दुख नहीं टिकता।" (पृष्ठ-21)

दूसरों के धन पर मौज करने वाले तथाकथित उपदेशकों और बाबाओं की असलियत उजागर करता आलेख है ‘भक्ति और दान’ । 
केवल अपने लिए जीने वालों को संसार भुला देता है जबकि राष्ट्र और समाज के हित में प्राण त्यागने वालों की मृत्यु को उत्सव सरीखी बताया गया है संग्रह के आलेख ‘मृत्यु तो उत्सव है’ में -

"आत्मकेन्द्रित होकर केवल अपने सुख, आनन्द, संतुष्टि तक सीमित रहे तो हमारा जीवन व्यर्थ कहलायेगा। ...लेकिन जो समाज हिताय जीते और मरते हैं वे मरकर भी नहीं मरते। ऐसे महापुरुषों का महाप्रयाण महोत्सव है।" (पृष्ठ-29)

पुस्तक-उजास की तलाश में’ विद्वान, राष्ट्रवादी साहित्यकार, पत्रकार डॉ. विनोद बब्बर जी ने जीवन को अमृत तुल्य बना देने वाले 70 आलेखों को समाहित किया है जिन्हें अपनाने पर गृहस्थ जीवन जीते हुए भी मनुष्य देवतुल्य व्यक्तित्व का मालिक बन सकता है। संग्रह के अन्य आलेखों के शीर्षक हैं- जीवन यज्ञ भी, युद्ध भी, गुरु और सत्संग, संयम का महत्व, निज स्वरूप का बोध, ज्ञान और मुक्ति, रामनाम मनि दीप धरु, मानवता ही सच्चा धर्म, नैतिकता खेल नहीं, श्मशान और शिव, संन्यास: वस्त्र नहीं, वृत्ति, साधन, साधना और मोक्ष आदि।

सभी आलेखों की भाषा-शैली सरल और सहज ग्राह्य है। आवरण आकर्षक है तथा मुद्रण त्रुटिहीन है। पुस्तक का सर्वत्र स्वागत होगा, ऐसी आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है।

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