असली-नकली की पहचान

हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् । तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये (ईशोपनिषद्, 15)
अनुराग शर्मा
नमस्कार, 

मैंने पहले भी कई बार इस बात पर ज़ोर दिया है कि हर अफ़वाह की एक एक्सपायरी डेट होनी चाहिये ताकि वर्षों पहले मर चुकी अफ़वाहें बार-बार अपनी कब्र से उठकर मासूम लोगों को सताती न रहें। बहुत पहले किसी पत्रिका में पढ़ा था कि हिंदू शब्द फ़ारसी भाषा से आया जहाँ इसका अर्थ अपमानजनक था। इंटरनैट के ज़माने में अन्य अफ़वाहों के साथ इस अफ़वाह को एक बार फिर से सिर उठाते देखा। अफ़वाहों का मनोविज्ञान दो मूल बिंदुओं पर आधारित है। पहला तो पाठकों का अज्ञान, और दूसरा उनकी अतृप्त कामना की पूर्ति की आकांक्षा। जब हम इस कथन पर विश्वास कर लेते हैं कि 1857 की क्रांति के मूल में एनफ़ील्ड रायफ़ल के कारतूस में लगी गाय और सूअर की चर्बी थी तब उसके मूल में भारतीय संस्कृति के प्रति हमारा गहन अज्ञान छिपा है। यदि कारतूस में लगी चर्बी गाय और सुअर की न होकर कुत्ते और चमगादड़ की होती तो क्या मंगल पाण्डेय सहित सभी भारतीय सैनिक किसी आपत्ति और संकोच के बिना उसे आराम से दाँत से काट लेते? भारतीय संस्कृति में भोजन की शुचिता के आग्रह को देखते हुये यह समझना कठिन नहीं है कि उन कारतूसों में चर्बी की बात करते समय गाय और सुअर का संदर्भ डाला जाना असत्य और अनावश्यक है। ऐसे कथनों में लेखक का अज्ञान और पूर्वाग्रह दोनों शामिल हैं। ऐसी बातों को यथावत दोहराने में भी हम अपनी ही संस्कृति और इतिहास के प्रति उपेक्षा और निरादर दर्शाते हैं। 

पिछले दिनों 'रॉबिन विलियम्स' के बारे में पढ़ने में आया कि उन्होंने जिस भी फिल्म में काम किया उस फिल्म के कॉन्ट्रेक्ट में कम से कम दस बेघर लोगों को काम पर रखने की शर्त रखी, और अपने पूरे करियर के दौरान उन्होंने लगभग 1,500 से 2,000 बेघऱ लोगों की मदद की। कथा असत्य है, लेकिन कोमल मानवीय भावनाओं को झंकृत करती है और शायद इसी वजह से 65,000 से अधिक वैबपृष्टों पर मौजूद है।

इसी शृंखला में कुछ साल पहले गरुड़ द्वारा चालीस वर्ष की आयु होने पर अपने पंख नोचकर, फिर अपनी चोंच तोड़कर लम्बे समय तक उपवास करके कायाकल्प द्वारा यौवन की पुनर्स्थापना करके 70 वर्ष की आयु तक अजर जीने की कहानी फैलायी गयी थी, जो आज भी गाहे-बगाहे दिख जाती है। बेशक़, यह कहानी भी चंडूखाने की गप्प थी।

पैकेज्ड खाद्य पदार्थों के अवयवों में सूचित ई कोड वाले सभी अवयवों में शूकर-वसा होना निहित स्वार्थों द्वारा फैलायी गयी अफ़वाह थी। विभिन्न ई कोड वाले रसायनों की वास्तविक जानकारी प्रामाणिक अंतर्जाल से जाँची जा सकती है।

ऐसी कहानियों में कई बार किसी तथ्य के आधार पर आधे-अधूरे, अतिशयोक्तिपूर्ण और कई बार पूरी तरह से ग़लत निष्कर्ष भी प्रस्तुत किये जाते हैं। आयोडीन युक्त नमक विरोधी प्रचार हो या माइक्रोवेव ओवन के बारे में कहानियाँ, उनमें भरपूरअसत्य है। धर्म के आधार पर वैज्ञानिक निष्कर्ष हों, या विज्ञान के आधार पर धार्मिक फ़तवे, ऐसे घालमेल अक्सर अप्रामाणिक हैं, और उनसे बच रहने में ही आपका भला है।

कुछ गप्पें पूर्ण निरापद निर्मल हास्य से भरी हो सकती हैं। लेकिन अनेक अफ़वाहों के पीछे कोई न कोई बदनीयती छिपी होती है जो सामाजिक, व्यक्तिगत, या राष्ट्रीय हानि का कारक बनती है। कृपया वाट्सएप, फ़ेसबुक, ईमेल आदि में मिली रोचक, अति-रोचक खबरों को बिना जाँचे-परखे आगे फैलाने से बचें। विभिन्न प्रकार के कैंसर सहित बीमारियों के इलाज, या स्वास्थ्य सम्बंधी अधकचरी जानकारी जानलेवा सिद्ध हो सकती है। इसी प्रकार दंगे, मारकाट आदि से सम्बंधित चित्र आदि जनमानस में क्रोध और देश में अराजकता फैलाने के उद्देश्य से फैलाये जा सकते हैं। आदर्श नागरिक बनें, और कुप्रचार के प्रसार को रोकने में सहायक बनें।

और हाँ, असली-नकली की बात आ ही गयी है तो याद दिलाता चलूँ कि फ़ारसी में असली सिर्फ़ शहद होता है, और शक्कर की मिठास की कल्पना भी भारतीय सभ्यता के बाहर दो-एक सदी पहले तक कहीं नहीं थी।

सेतु का यह नया अंक आपको समर्पित है। आपकी प्रतिक्रिया का स्वागत है।  यदि सेतु आपको पसंद आती है तो इसे अपने मित्रों तक भी अवश्य पहुँचाइये।

शुभाकांक्षी,
सेतु, पिट्सबर्ग
30 अप्रैल 2022 ✍️

2 comments :

  1. बढ़िया आलेख। आपने लिखा- 'शक्कर की मिठास की कल्पना भी भारतीय सभ्यता के बाहर दो-एक सदी पहले तक कहीं नहीं थी', तब तो केक और डोनट्स उन्नीसवीं सदी में आए होंगे!

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    1. जी बेशक, उनका वर्तमान स्वरूप बिलकुल नया है। चीनी के प्रसार ने भारत से बाहर मिठाइयों का स्वरूप और मात्रा दोनों को बदला है फिर भी भारत की मिठाइयों की संख्या/प्रकार आज भी शेष समस्त संसार की मिठाइयों के योग से अधिक हों तो आश्चर्य नहीं। पुराने केक में शहद पड़ता था और आधुनिक केक अमेरिका में ग्रेट डिप्रेशन के दिनों में बना। डोनट का श्रेय 1847 में एक अमेरिकन हेन्सन ग्रेगेरी को जाता है।

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