चार कविताएँ: चंद्रशेखर दुबे

चंद्रशेखर दुबे
भीड़

हर तरफ भीड़ है
कहीं पार्टी की रेलों की
कही विजय जुलूस की
तो कहीं प्रतिरोध या रोष की
मैं ढूंढता हूँ अपने को
इस भीड़ में तन्हा तन्हा
अजीब रस्म है इस भीड़ का
जहां हर इंसान अकेला है
महज जुनूनी शोर का हिस्सा है।
दीवारों पर लगे पोस्टर की तरह
निर्जीव और लाचार।
भीड़ चाहे राजनीतिक गलियारों का हो
या चौराहे का हर जगह वह चेहरा है
जुनून और बदहवासी का।
***


अंतर्द्वंद्व

कुछ टूटे बंधन हैं
कुछ ख्वाब अधूरे है
आंखों की बेरुखी है
पलकों पर टूटे सपने हैं
अनुरक्त, अव्यक्त जो भी है
वही तो भावों में तिरोहित है।
क्या ढूंढ रहा हूँ पता नहीं
फिर हृदय क्यों यह
दग्ध,विकल है?
स्वर सुधा से सुभाषित जीवन
निर्लिप्त भाव से अंकुरित यह तन
फिर यह झंझावत कैसा?
यौवन के स्पंदन में
यह विद्रूप स्वर कैसा?
क्यों भावों में लिप्त राग
उलझा है वैरागी मन से?
***


पहाड़ और नदी

एक पहाड़ की तरह खड़ा रहा मैं
नदी की तरह चलती रही तुम
मेरी जड़ता मेरी प्रकृति थी
तुम्हारी गति तुम्हारी प्रवृत्ति
न कभी मैं ने पूछा तुम क्यों चल रही हो
न तुमने कभी पूछा तुम क्यों रुके हो?
मैं देखता रहा अपलक तुम्हारे प्रवाह को
तुमने मुड़ कर कभी नही देखा
मेरी जड़ता को।
दोनो सहज थे अपनी अपनी नियति में
मैं स्थित रहा अपनी स्थिरता में
तुम चलायमान रही अपनी गति में।
शायद यही फर्क था
हमारे स्वभाव का।
***


बादल की अभिलाषा

बादलों ने हवा से जो पूछा उसका हाल
उड़ा ले गया वह नील गगन के पार।
बादलों ने कही हवा से अपनी बात
हसरत इतना था चलूं, मचलूं मैं अपने ही लय में
और वरसू  भीगा तन धरा का
तुमने मेरी सुनी ही कब?
हवा ने कहा मैं बहता हूँ अपनी गति से
जो सामने आता उसे ले चलता अपनी ही दिशा में
मुझे मालूम ही क्या?
कौन चाहता है क्या?
मैं निर्वहन करता अपने प्रकृति धर्म का
तुम चलते हो अपने मन से
इस गुफ्तगू में रात ढल गई
चांद की चांदनी में
बादल की गर्मी ढल गई।
चांद की शीतलता ले बादल
ज्यों बरसा तप्त धरा को
निर्मल, शीतल कर गया।
***

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