कहानी: बेटियाँ

अमर खनूजा चड्ढा (इंदौर)


टैगोर हॉल नोबेल पुरस्कार विजेता रवीन्द्रनाथ टैगोर के नाम पर बना यह हॉल इस प्रांगण की शान है। उनकी बड़ी सी तस्वीर, कविताओं और शांतिनिकेतन की झलकियों से सुसज्जित यह हॉल बड़े आयोजनों को गरिमा प्रदान करता है। शाम के समय छत पर लगे झाड़फ़ानूसों की रौशनी लोगों को सम्मोहित कर देती है। आसपास लगे ख़ुशबूदार फूलों के पौधों से वातावरण महक उठता जिसका जादुई सा अहसास हर किसी को महसूस होता है। हॉल के अनुरूप बना मंच हर तरह आयोजनों में आए लोगों पर अनोखी छाप छोड़ जाता है। बच्चों की चहचहाहट और खिलखिलाहट से गूंजता यह हॉल आज ख़ामोश सा है। बच्चे भी बिना शोरगुल की थोड़ी हिचकिचाहट से परेशानी से इंतज़ार करते अंदर बाहर चहलक़दमी कर रहे थे। आज पैरेंट टीचर मीटिंग जो थी। 

मैं इस शहर के नामी स्कूल में इतिहास का अध्यापक हूँ। मेरी पत्नी सुजाता भी इसी स्कूल में आर्ट्स व क्राफ़्ट सिखाती है। स्कूल कैम्पस में ही मुझे इक छोटा सा घर मिला है जिसे मैंने अपने बागवानी के शौक़ से और सुजाता ने वरली, मधुबनी और गौंड पेंटिग्स से ख़ूबसूरती से सजाया हुआ है। ड्रॉइंग रूम में प्रवेश करते ही हाथ में वीणा लिए हुए सरस्वती की मूर्ति के साथ सीजनल फूलों की सज्जा और ख़ास मद्रास से लाई पीतल की मयूर से सज्जित दीपों की समई विशेष आकर्षण का केंद्र थी। हमारी पसंद व सोच तक़रीबन एक से थे। सिर्फ़ एक बात को छोड़कर। सुजाता की राय में हिस्ट्री की जॉर्ज सैंटायना द्वारा परिभाषा सही थी “हिस्ट्री इज़ ए पैक ऑफ़ लाइज़ अबाउट इवेंट्स दैट नेवर हैपैण्ड, टोल्ड बाए पीपल हू वर नॉट देयर” और मैं इतिहास को प्रागैतिहासिक विरासतों,ऐतिहासिक धरोहरों,कला,संस्कृति,साहित्य व परम्पराओं के साथ समय के साथ बदलते मानदंडों के आकलन का स्त्रोत भी मानता हूँ। वैसे मैं शौक़िया तौर पर साइकोलॉजी की किताबें भी पढ़ता हूँ,जिससे स्कूल के बच्चों के मनोविज्ञान नज़रिए को समझ पाने में मदद मिलती है और कुछ लोगों के एटीट्यूड को भी।

आज फिर कुछ नए चेहरे पढ़ने को मिलेंगे। मैं तैयार होते सोचने लगा, “क्या पता आज वह फिर आए?” मैंने पिछली मीटिंग में उसे पहली बार देखा था। वह कुछ अलग सी नज़र आयी थी। घर से निकलते वक्त सुजाता से मैंने हँसते हुए कहा “चलें इस बार भी वही रेकॉर्ड सुनने। पेरेंट्स की वही फ़िक्रें और दिखावे कि 'हम कितने बिज़ी रहते हैं', 'हमारी लाइफ़ स्टाइल, बिज़्नेस के कारण समय नहीं दे पाते' या 'अच्छी से अच्छी टूइशन है,कोचिंग है पर मार्क्स नहीं आ रहे...' आदि” 

पूरे दिन इनका रूटीन फ़िक्स है स्कूल टूइशन कोचिंग,म्यूज़िक क्लास फिर क्लब में स्पोर्ट्स कहीं समय की बर्बादी या ग़लत संगत नहीं फिर भी मार्क्स के लिए फ़िक्र होती है।
सर आगे कोम्पटेटिव एग्ज़ैम के लिए कैसे प्रिपेयर होंगे?
या फिर क़ल्चरल प्रोग्राम में उनका बच्चा सेंटर ऑफ अट्रैक्शन कैसे बनेगा?
स्पोर्ट्स में इसे सिर्फ़ क्रिकेट सिखाइए। 
पता है सुजाता कुछ क्वेस्चन तो मेरे विषय से मेल भी नहीं खाते लेकिन नहीं ...

“आप तो बस इतना ही सुन व समझ रहे हैं सुजाता ने कहा। कितने बच्चों की मम्मी तो जैसे सोशल गेदरिंग के लिए ही आती हैं। कई बार उनके शनेल या बरबरी के क्लचेस से टैग भी नहीं निकाले गये रहते। कुर्सी पर बैठकर उनकी उँगलिया अंगूठी या हार पर घूमती रहती हैं और तो और कितने स्टूडेंट के पापा घड़ी या कार की चाबियाँ घूमाते रहते हैं।” सुजाता ने एक साँस में जवाब दिया।

पर वह ऐसी नहीं। जैसा मैंने पिछली बार देखा था। मैं सोचने लगा वह सादे लिबास में थी। सोशल गैदरिंग की तरह तो नहीं आई थी। उसने अपने बच्चे के व्यवहार के लिए पूछा था. “खाना खाते वक्त क्या तरीक़ा रहता है? कक्षा में उनका व्यवहार ठीक तो है...। हाँ, यह भी पूछा था कि स्कूल में गुमसुम तो नहीं रहता।”

इसी सोच में मैं हॉल के अंदर दाख़िल होकर कुर्सी में जा बैठा। वाक़ई सभी को रिपोर्ट कार्ड देते व एक से सवालों का जवाब देते मुझे थकान सी होने लगी। मीटिंग का समय ख़त्म होने को था। 

“गुड ईवनिंग सर!” मैंने देखा ये वही थी। जी ये मेरा बेटा मनमीत है। मुझे अपने बेटे के विषय में बात करनी है। आइ मीन क्या यह पढ़ाई में इतना इंट्रेस्ट लेकर सही जवाब देता है। दूसरी एक्टिविटीज में हिस्सा लेता है या नहीं? क्लास में इस का व्यवहार दूसरे बच्चों के साथ कैसे रहता है? कोई शिकायत! किसी से झगड़ा? या बातचीत में कोई अब्यूसिव लैंगुएज...” वह एक के बाद एक प्रश्न करती रही और मैं शांति से जवाब देता रहा। लेकिन ये प्रश्न दोबारा आये थे। मैंने गौर से उसके चेहरे को पढ़ने की कोशिश की। बड़े से ग्लेयर से उसका आधा चेहरा छिपा हुआ था।

सूती चिकनकारी का गुलाबी रंग का सूट पहना था। सवाल जवाब के दौरान दुपट्टा गले से कंधे तक खिसक गया। लंबी गर्दन के नीचे गहरा नीला निशान सा दिखाई दिया। मुझे कुछ सवालों के जवाब ख़ुद ही मिल गये।

“आप पंजाब की तो नहीं लगतीं, आपके बातचीत के लहज़े से भी नहीं लगता” मैंने पूछा। 

“जी मैं भिलाई से हूँ। ज़्यादातर लोगों को इस शहर के बारे में पता ही नहीं।”

“लेकिन मैं वाक़िफ़ हूँ। मेरी बेगम साहिबा भी उसी तरफ़ की हैं। आइए मैं उनसे मुलाक़ात करवाता हूँ” मैं उसे लेकर सुजाता के टेबल की तरफ़ बढ़ा। सुजाता उस समय अकेली थी।

“सुजाता ये मोहतरमा तुम्हारे शहर से हैं।”

मुझे सुजाता की खासियत मालूम है। जल्द ही सबसे घुलमिल जाती है। वह उसे भी दोस्त बना लेगी। 

वैसे तो हम दोनों को किसी की पर्सनल लाइफ़ में दख़ल देने का कोई हक़ नहीं बनता था। लेकिन तीन बेटियों में से एक को हमने इसी तरह खो दिया था। तब से एक बात समझ में आ गई थी। बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ के साथ-साथ बेटियों को इस तरह से भी तो बचाया जाना चाहिए। 
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सम्पर्क: amarkhch@gmail। com

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