समीक्षा: 'राख का ढेर' की संघर्ष करती कविताएँ

समीक्षक: विजय कुमार तिवारी


समीक्षित कृति: राख का ढेर (कविता संग्रह)
उपन्यासकार: फूलचंद गुप्ता
मूल्य: ₹ 150.00
प्रकाशक: मानव प्रकाशन,कोलकाता

कविताएँ आलोक फैलाती हैं, दिशा देती हैं और मार्ग प्रशस्त करती हैं। लोगों ने घोषित करना चाहा, वह मर रही है, उसका अंत होने वाला है और बची भी रह गयी तो ऐश्वर्यहीन हो जायेगी। ऐसा कुछ भी नहीं हुआ, ऐसा कुछ भी नहीं होता क्योंकि कविता भावनाओं में कवि के हृदय में पलती है और शब्दों के माध्यम से आकार लेती है। सभ्यता के पहले से ही कविता हृदय से निकल कंठ और गले में आ बसती रही है, लोग लिखना नहीं जानते थे, गुनगुनाना, चहकना, खुश होना जानते थे, यह भी कविता ही है। शब्द ब्रह्म है, अजेय और अमर है, कविता भी अमर है। विद्वतजन बहुत कुछ कहते-सुनते हैं और नाना रुपों से कविता का बखान करते हैं, हमें भी सहज स्वीकार कर लेना चाहिए और कविता का आनंद लेना चाहिए। जीवन का, संसार का, प्रकृति का अर्थात् जो कुछ भी हमारे सामने है, हमारे लिए है, उन सबके साथ आनंद से रहना है।

कविता को मतवादियों ने प्रभावित करने की बहुत कोशिश की है, कविता का आनंद लेने के बजाए, उसकी सर्जरी करते रहते हैं। गुलाब की पंखुड़ी का सौन्दर्य, ऐश्वर्य, खुशबू से आनंदित होने की जगह उसका रेशा-रेशा छिन्न-भिन्न करने की तरह है। आज का पाठक, समीक्षक इन चीजों में नहीं उलझना चाहता, उसे सम्पूर्णता में तलाश है, हर चीज को पूरी गहराई से समझना चाहता है। वह आधुनिक तरीके अपनाता है, चिंतन करता है, खोज करता है, उसके आनंद में डूबता है और हीरे-मोती निकाल लाता है।

विजय कुमार तिवारी
यह भी आरोप लगता है, लोग पक्षपात करते हैं, बढ़ा-चढ़ाकर कहते हैं, किसी को आकाश पर बिठाते हैं और किसी को सीधे रसातल में। यह एक तरह से उलझन पैदा करना है। कोई लेखक, कवि है, लिखता है, इतना तो मानना ही पड़ेगा, उसके भीतर दुनिया को समझने की कोई अतिरिक्त शक्ति है, वह सौन्दर्य से अभिभूत होता है, संगतियों-विसंगतियों को पहचानता है और अपनी भावनाएं दुनिया के सामने रख देता है। उसके इस अद्भुत कार्य के लिए स्वीकारना ही पड़ेगा। जो लोग सिरे से खारिज करते हैं, अन्याय करते हैं। अन्याय कवि-लेखक के साथ तो करते ही हैं, साहित्य को सर्वाधिक हानि पहुँचाते हैं। पाठक, समीक्षक में चिंतन की विविधता होनी चाहिए, उसे अपने औजारों को देश, काल, परिस्थिति के अनुकूल रखना चाहिए। सबसे बड़ी बात, यदि किसी के लेखन पर प्रश्न उठाते हैं तो उसका कारण होना चाहिए। आपको पसंद नहीं, यह आपकी समस्या है। सम्पूर्ण सृष्टि विकासशील है, गतिमान है, नित्य नया हो रहा है, चीजें बदल रही हैं, हमें अपने औजारों को भी बदलना, परिष्कृत करते रहना चाहिए। भोथरे हथियार से उचित काम नहीं होते। सुखद है, आज इस दिशा में चिंतन हो रहा है और लोग सच की बात करते हैं, ईमानदारी की बात करते हैं।

गुजरात में रह रहे वरिष्ठ और बहुचर्चित कवि, साहित्यकार डा० फूलचंद गुप्ता जी का कविता संग्रह 'राख का ढेर' मेरे सामने है। इस संग्रह में छोटी-बड़ी कुल 34 कविताएँ हैं जिसमें 'हे राम' और 'इस दौर में' जैसी व्यापक चर्चा में रही कविताएँ भी हैं। कवि समाज में व्याप्त विसंगतियों से विचलित होता है और अपनी भावनाओं को कविताओं के रुप में उसी समाज को सुपुर्द करता है। हर लेखक, कवि ऐसा करते हुए समाज को, लोगों को आगाह करते हैं और दुखद वातावरण से निकलने की दिशा दिखाते हैं। समस्या तब खड़ी होती है जब विरोधी विचार हावी होते हैं और पक्षीय दृष्टिकोण अपनाए जाते हैं। पूर्वाग्रह जैसी बातें भी बहुत घातक सिद्ध होती हैं। बहुत सी ऐतिहासिक घटनाएं हुई होती हैं जिसका प्रभाव समाज में विद्वेष के रुप में स्थायी भाव में पड़ा रहता है। कवि, लेखक, साहित्यकार और समाज के पुरोधाओं को समाज को इससे बाहर निकालने का प्रयास करना चाहिए। अधिकांश लोग करते भी हैं, तभी हमारा समाज बचा हुआ है। कवि की जिम्मेदारी अधिक होती है और चूक जाने पर इतिहास क्षमा नहीं करता।

जिस तरह की भावनाएं अपनी कविताओं में डा० फूलचंद गुप्ता जी व्यक्त करना चाहते हैं, लोग स्वीकार करते ही हैं और उन्हें समादृत करते हैं। 'इससे बेहतर और क्या हो सकता है' कविता से सभी प्रसन्न हैं क्योंकि श्रम करने, पौरुषता, आत्मसम्मान के साथ जीने, धैर्य पूर्वक कठिन दिनों को गुजार लेने और आदमी होने के गौरव को संभाले रहने की बातें करते हैं। यह हर किसी की अपनी आस्था या भावना है, इससे न दुनिया को कोई फर्क पड़ता है और न ईश्वर को, जब कोई दुनिया को बताना चाहता है, "कभी किसी ईश्वर की प्रार्थना नहीं की।" विशुद्ध रुप से यह व्यक्ति का निजी मामला है और पूरी दुनिया इसका सम्मान करती है। 'साँसत में हैं कबूतर' थोड़ी मार्मिक कविता है। गरुड़ देवलोक के पक्षी हैं, वे मृत्युलोक में नहीं आते। कौवे शोर मचा रहे हैं, घुग्घू मौन है, गौरैया, तोते, मैना और कोयल आदि शेष पक्षी भूगर्भ में चले गये हैं। कबूतर शांतिप्रिय पक्षी है, उसकी सांस अटकी हुई है क्योंकि गीधों की भूमिका प्रारंभ होगी सबके बाद/वे सुसज्ज हैं गणवेश में।

'सड़क से संसद तक' कविता स्वयं में प्रश्न भी है और उत्तर भी। सारे विकल्प खुले हुए हैं। 'सफेद दीवारों में' कविता में किसी भयानक दौर का उल्लेख हुआ है और सारे बिम्ब डराते दिखते हैं। पंक्तियाँ देखिए-सफेद दीवारों में खून के छींटों पर/समय/अपनी हथेलियाँ घिसकर/चला जायेगा चुपचाप/आभार पूर्वक हवाएं/धूल की चादर ढंक कर निकल/जायेंगी। संग्रह की कविताएँ किंचित दुरूह हैं. शायद वैचारिक संघर्ष के दिनों में लिखी गयी हैं। सहज काव्य तब लिखा जाता है जब मन शांत होता है, संसार में सुख व्याप्त होता है। 'पृथ्वी के ठीक सिर के उपर' कविता किन्हीं वीभत्स दृश्यों से भरी लगती है, सारे बिम्ब डराते और चौंकाते हैं। कवि का भाव समझना और दुनिया के रिश्तों से जोड़ पाना सहज नहीं है। ऐसी कविताएँ गहन पीड़ा के दौर में लिखी गयी हैं। प्रयुक्त शब्दावलियाँ जटिल लगती हैं और चिंतन की मांग करती हैं। 'यह जीत का जुलूस है' यथार्थ परिदृश्यों की कविता है-यह जीत का जुलूस है/उन्माद जरूरी होता है/जीत के लिए भी, जीत के पश्चात भी। कवि कुचक्रों का रहस्य खोलता है-बस्तियों में/इत्र का छिटकाव किया जायेगा/ताकि दुर्गंध को पहचानने वाले कीटाणु /झूठे साबित किए जा सकें।

हर किसी की, दुनिया और इतिहास को देखने की अपनी-अपनी दृष्टि होती है। जीवन की विकास यात्रा का काव्यात्मक चित्रण बहुत सुन्दर है। 'पुरखों की विरासत' में कवि उन ऐतिहासिक जीवन के पलों को लौटता हुआ देख रहा है-एक बार फिर/बर्बर युग से निकलकर/आ गये हैं व्याध/पत्थरों के आयुष ताने/बौछारों के बीच/एक बार फिर/घिर गयी है/पुरखों की विरासत। 'हवाई कश्तियों में सवार' राजनीतिक चेतना का संकेत करती है। शायद कवि चुनाव काल के प्रचार का चित्रण करना चाहता है और स्पष्ट करता है, भले ही इनकी शक्ल और वेशभूषा पृथ्वीवासियों की तरह है परन्तु इनकी जातियों का ब्योरा इनके घोषणापत्र में है। 'वे सभी संदेह से भरे हुए थे' भय और संदेह पैदा करती कविता है क्योंकि वे जानते थे एक-दूसरे को-जो पहरेदारी कर रहे हैं, जो सोये हुए हैं और जो लाठियाँ ठकठकाते दूर जा रहे हैं। कवि एक बिम्ब दिखाता है, चाय के कप में मोटी परत जम गयी है-जिसे निकालने के लिए/कोई पहल नहीं कर रहा था/समस्या यह थी/कहाँ फेंका जाए इसे/जमीन का जर्रा-जर्रा/ पहले से काबिज था। 'आग बहुत थी तुम्हारे सीने में' कविता की पंक्तियाँ देखिए-आग बहुत थी तुम्हारे सीने में/तुम घास के ढेर होते तो/जलकर बुझ जाते/तुम जले नहीं/तुम पिघले/क्योंकि तुम फौलाद की खान थे। कवि की पीड़ा है कि आँच का अनुभव तो किया परन्तु कोई आकृति नहीं बना पाये क्योंकि ढालने के लिए/हमारे पास/कोई साँचा न था। 'कोई अनुभवहीन फूहड़ दुश्मन' कविता में कवि उन कारणों की पहचान बताता है जिसके बल पर बिना युद्ध किए वे चक्रवर्ती सम्राट बन बैठे-लोकतंत्र की देह में उगी हुई/पंचेन्द्रियाँ ही रूकावटें थीं।

'ऐन वक्त था' कविता में घोड़ा प्रतिनिधित्व करता है और सारी व्यवस्थाएँ उसकी सेवा में लगी हैं। घोड़ा सख्त बीमार हुआ। वैज्ञानिकों की सलाह पर सारे चूहे मार दिए गये। घोड़ा खड़ा हो अपने पैरों पर, चिकित्सकों ने टाॅनिक देने को कहा, सारे कबूतर मार डाले गये। उसकी देह स्वच्छ करने के लिए समाजशास्त्रियों की सलाह पर जलचर मारे गये। उसकी नाल की रक्षा के लिए रास्तों में बिछा दी गयी बंदरों की खालें। घोड़ा स्वस्थ तो हो गया परन्तु अब घोड़े जैसा नहीं था। 'आदमी के विरुद्ध' बहुत गहरी भावना लिए कविता है। प्रेम के नष्ट होने से ही आदमी खड़ा होता है युद्ध में और वह भी आदमी के ही विरुद्ध। प्रेम नहीं तो सभ्यता भी नहीं बचेगी। कवि की विराट भावना देखिए-तमाम-तमाम सभ्यताओं के मलबों में/शेष आदमी ही होंगे/आदमी के पास/प्रेम करते हुए/अंत में। कवि सभ्यता की बात करता है 'बड़ा मायने रखते हैं' कविता में। गौरैया खुशनसीब होती है, तिनके ले जाती है और कामयाब घोंसला बनाती है वरना इस सभ्यता के लिए मायने रखते हैं लोग जैसे घोड़े के लिए घास, बिल्ली के लिए चूहे और जंगल के राजा के लिए मृग शावक वैसे ही खरगोशों की राहों में टोह लेती रहती है चमकती आँखें। कवि की मार्मिक मनोदशा देखिए-सुबह सूर्योदय के बाद/बड़ी देर तक उड़ती रही/चिड़ियाँ/मेरी नींद में। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि काली रात शुरु होने के बाद चिड़ियाँ अपने घोंसले में दुबक गयी तथा मैं सप्तसुरों में बहुत देर तक गुनगुनाता रहा और वीणा के तार सा झनझनाता रहा।

कभी-कभी कुछ ऐसा पढ़ने को मिलता है, लोग क्लासिकल कहते हैं। यह सोच और संवेदनाओं का प्रतिफल है। बिम्ब ऐसे कि दुरूहता बनी रहती है। 'कछुए ने फुसफुसाते हुए पूछा' कविता हमारी सोच और जीवन की परतें खोलती है। जब तक हम अपनी खोल में हैं, बाहर का कुछ पता नहीं चलता। संचार और सूचना के तंत्र बंद हैं, कछुए को सही जानकारी नहीं मिल पाती, वह निस्पंद पड़ा हुआ है। आगे की स्थिति का व्यंग्य और किंचित हास्य देखिए-समुद्र में ज्वार आया/और कछुए को उलट कर चला गया/तब से यह क्लासिकल कछुआ/शीर्षासन में है। 'सर्प' कविता में शासन के लोगों की तुलना सर्प से की गयी है क्योंकि उनके उपर कोई बंधन नहीं है, वे स्वच्छंद हैं, स्वतन्त्र हैं, पाशहीन हैं और उन्हें पुरोहितों का आशीर्वाद प्राप्त है। 'राख का ढेर' छोटी सी कविता है और इसी शीर्षक से संग्रह का भी नामकरण हुआ है। शायद कवि गुजरात के दंगे की ओर संकेत करना चाहता है-

राख के ढेर के पास/बिलख रहा था शिशु/शोक और आश्चर्य में डूबी हुई/किंकर्तव्यविमूढ़ भीड़/कुछ समझ नहीं पा रही थी/कोई कह रहा था/वह कोयला था जो जलकर खाक हो/गया/कोई असहमति में सिर हिलाकर-/गुजरात। 

संसार में बहुत कुछ है जो डरा हुआ है या देखने में डरावना, इसका सम्बन्ध मनोविज्ञान और जीवन की परिस्थितियों से होता है। हालात कुछ ऐसे हैं, प्रसव देने वाली औरत राहत छावनी में है-रात के अंतिम पहर/अनिश्चय में ताक रही औरत/काले आसमान में ढूँढ रही है/आतंकित कोख में पल रही/संतान के भविष्य का रंग। हालात भयावह है। कवि डरी हुई औरत के बारे में सोच नहीं पा रहा है-उसकी डरी हुई कोख से/जन्म लेने वाला बच्चा/डरा हुआ होगा/या डरावना/या फिर हर अच्छे-बुरे के विवेक से परे/सृष्टि का एक निडर अंग। 'आम आदमी' कविता में कवि किसी आदिम गुफा की तलाश में है। युद्ध के बाद की स्थिति है, उसके भीतर खंडहर, मलबे, लुटे बाजार, टूटी दीवारें, सन्नाटा, धुआँ और पत्थर भरी सडकें हैं। कविता की मार्मिकता देखिए-आभ्यंतरिक यात्रा से मुझे/बहुत डर लगता है/मैं-/बाहर ही बाहर/भागा-भागा फिर रहा हूँ।

'चक्र' कविता में समय चक्र की अवधारणा है, जो कल था, वह आज नहीं है और जो आज है, कल बदल जायेगा। कवि सबको जागते हुए देख रहा है-रात जाग रही है/लोग जाग रहे हैं/गाँव जाग रहा है। कल भी सभी जाग रहे थे/लेकिन ये वही नहीं/जिन्हें मैंने देखा था/मैं भी वह नहीं आमूल/जिसने कल देखा/इन्हें जागते हुए। कवि को समय चक्र का रहस्य पता है कि सब कुछ बदलता रहता है, आज सब नूतन है-यह दीपक नया/ज्योति नई/जिसमें सब जाग रहे हैं/वह काल नया/काल का चक्र नया/चक्र की गति नई। 'सहस्त्रों समाधियाँ' कविता में मुर्गा असमंजस में है। हर जागरूक और चेतन प्राणी की यही स्थिति है। मुर्गा सुबह-सुबह बाँग देता है, लोगों को जगाता है और नये आलोक का संदेश देता है। कल रात देर तक वह सो नहीं सका, सुबह उसने बाँग दिया परन्तु कोई नहीं उठा। कवि की संवेदना देखिए-हताशा में यह सोचते हुए/उसने खुदकुशी कर ली-/क्या ऐसी सुबह देकर जीता रहूँ/वसीयत में/आगामी पीढ़ी को? 'कहते हैं' कविता में कवि भिन्न चिंतन की बात करता है, किंचित व्यंग्य है और विचारधारा पर आक्रमण भी। कवि की पंक्तियाँ देखिए-कहते हैं/ईश्वर को पाना हो तो/सिर झुकाना सीखो/इस शास्त्रादेश पर/करीब-करीब सारे सिर झुके/एक न एक बार/पर बरामद न हुआ कुछ। कवि को लगता है, सब के सब खोजी लोग मठों के आसपास हैं जिनके सिर आज भी झुके हुए हैं। इस संग्रह की अनेक कविताएँ हैं जहाँ कोई तर्कपूर्ण समाधान न देकर पाठकों को सोचने-विचारने के लिए स्वतन्त्र छोड़ दिया गया है। यह कवि की ताकत है और साहस भी। ऐसा भी हो सकता है कि कविता के लेखन काल में विचारों की परिपक्वता की प्रतीक्षा हो।

'सारी की सारी प्रेतात्माएं' किंचित दुरूह कविता है, इसका संदेश या भाव समझ पाना सहज नहीं है। मनुष्य का इस तरह बदल जाना चकित करता है वह भी प्रेतात्माओं के रुप में और उनका इस तरह नृत्य में डूबना विस्मय पैदा करता है-सारी की सारी प्रेतात्माएं/उत्सव में मग्न थीं/नग्न नृत्य/मदिरा पान/मादक संगीत। सारी लड़ाईयाँ संपति के लिए होती हैं। संपति विभाजन में भागीदारी का दावा करने वालों का इंतकाल हो चुका है। कवि को उनका रहस्य पता है। उन सभी के शव गायब हैं। वे कहाँ हैं? कविता की पंक्तियाँ देखिए-शव करीब-करीब सभी के गायब थे/जबकि उत्साहवर्धन के लिए/समारोह में जमा प्रेतात्माओं में/बेहिसाब बढ़ोत्तरी हुई थी। 'उन्होंने उसका दूध पिया' बड़ी मार्मिक और व्यंग्य की कविता है। अगली पीढ़ी या संतान को लेकर कवि विचलित है-उन्होंने उसका दूध पिया/और सो गये उसके सीने पर सिर रखकर/इसी तरह पीते-सोते वे छोटे से बड़े हो गये। पुत्र बड़े हो गये हैं।

उसकी मृत्यु के बाद
उन्होंने उसके शव पर ताजे फूल रखे
और निकल गये लंबी व्यावसायिक यात्रा पर
लौट कर
ड्राइंगरूम में लटके उसके चित्र को
उन्होंने मालाएँ पहनाई
अंत में कवि संवेदना से भर उठता है और पीढ़ियों की सच्चाई लिखता है, अब उन्हें मां की स्मृति नहीं है-
अब उनका सारा काम
सूखे, मुरझाए फूल करते हैं।

'चीजों से लोगों का वास्ता' कविता बताना चाहती है, जब किसी वस्तु को पहली बार देखते, समझते हैं तो उसी नाम से जानते हैं जो बताया गया है। कवि को लगता है कि लोकतंत्र एनीमियाग्रस्त है। वह फौजी को गूंगा बने रहने की सलाह देता है और बताना चाहता है-उनके पास भोंपू थे/वे चिल्लाते रहे-/यह नये किस्म का समाजवाद है/जो पुराने समाजवाद की राख से जन्मा है। भिन्न विचारों से प्रभावित होने से अक्सर ऐसे चिन्तन उभरते हैं जो व्यक्ति की सोच पर प्रश्न खड़ा करते हैं। यह मानवता की चिन्ता नहीं बल्कि अति उत्साह में किसी राष्ट्र की संप्रभुता पर आक्रमण है। 'कैलाश के उत्तुंग शिखरों से' कविता चिन्तन का भिन्न दरवाजा खोलती है। जलकुंभी किसी ठहरे हुए पानी में जन्म लेती है। अक्सर हम देखते हैं, गर्मी के दिनों में नदियों का जलप्रवाह बढ़ता है तो बहुतायत जलकुंभियाँ जल के साथ-साथ नीचे उतरती हैं। सहमत हों या न हों, कवि का चिन्तन देखिए-तालाब नदी नाले फतह करने के बाद/अब उनका लक्ष्य/आदमी का खून है। आदमी के खून में 98% पानी होता है। कवि की संवेदना और चिंता देखिए-पानी का एक अजस्र झरना है/आँखों के गड्ढों में/जलकुंभियाँ अब वहीं फूलेंगी, फलेंगी/पीली टोपियाँ पहने। 'उन्होंने समझा लिया था अपने मन को' कविता में शायद किसी विरक्त का चित्रण है जो संसार त्याग कर जाना चाहता है। सारी तैयारी हो गयी है। विदा करते समय लोग उदास होने के बजाय हँसने लगते हैं, वे भी खूब हँसते हैं। कवि मान लेते हैं, ऐसे माहौल में उनका मन पूर्णतः संकल्पित नहीं रह गया है और पंक्तियाँ देखिए-इसके बाद वे/हलके-फुलके मन से/विदा हुए/वे गये तो, पर/वे अपनी वापसी सुनिश्चित करते गये।

कभी-कभी ऐसा होता है, हम जो संप्रेषित करना चाहते हैं, कतिपय कारणों से कर नहीं पाते और हमारा पूर्ण मनोभाव हमारी रचना में पूरी तरह उभर नहीं पाता। या तो हम हड़बड़ी में होते हैं या हमारे मन में कुछ और चल रहा होता है तथा कागज पर कुछ और उकेर रहे होते हैं। आखिर जिस पाठक वर्ग के लिए संप्रेषित करना चाहते हैं, वहाँ तक हमारा चिन्तन पहुँचना चाहिए। फूलचंद गुप्ता जी के चिन्तन में मानवता है और उसके लिए उनके भीतर संवेदना भरी पड़ी है। अति उत्साह में कभी-कभी हम नारे लगाने लगते हैं और सामने की भीड़ जय-जयकार करती है। लगता है, अब क्रान्ति होकर रहेगी। 'उस दिन असावधानी की अवस्था में' कविता में बड़ा वीभत्स और भयावह दृश्य उपस्थित हुआ है। कवि का अनुभव संवेदना जगाता है। गोलियाँ चलने लगीं, लाशें बिछने लगी, कवि स्वतःस्फूर्त सो गया जमीन पर। पंक्तियाँ देखिए-

सन्नाटे के बाद
ऊपर लदी हुई लाशों को परे ढकेलते हुए
जब मैं बाहर आया
जख्मी तो था, पर खतरे से बाहर था।

कवि को छलांगे लगाने का अनुभव है परन्तु उनकी संवेदना देखिए-मैं बाहर न आ सका/अपने आसपास पड़ी लाशों को लांघकर। कवि भावुक है-बाहर तो आ गया हूँ/लाशों के नीचे से/परे नहीं कर पाया हूँ सीने से भार/मुझे लगा मुझे भी इन्हीं के साथ/गिरना चाहिए था/गोलियों से बिंधकर। संवेदना और साथ होने का भाव किसी हो भी द्रवित कर सकता है-मैं तभी से खड़ा हूँ/रक्तरंजित/लाशों के बीच/एक भी लाश लांघ नहीं पाया हूँ। 'दूसरी आजादी' संभवतया व्यंग्यपूर्ण कविता है। बात इतनी सी ही है कि समुद्र से रंग-विरंगी मछलियों को शीशे के एक्वेरियम में रखा गया है, लोग शौक से देखते हैं और खुश होते हैं। हमारी आजादी की मुहिम चल रही है और विशेषज्ञों की राय है, एक्वेरियम में हमारा स्वाभाविक विकास संभव नहीं है-कमाल देखिए कि अब हमें/महासागरों में स्थानांतरित किया जा रहा है। एक्वेरियम में लाये जाने पर भी, कवि ने लिखा-बुद्धि से नहीं/यह गहरी नीयत से जुड़ा हुआ निर्णय था और अब भी लिख रहा है-फैसले इस बार भी बुद्धि के नहीं/नीयत के ही हैं। बुद्धिशाली तब भी लोग थे और इस जमाने के लोग भी बुद्धिशाली हैं।

कवि फूलचंद गुप्ता जी अपनी कविताओं में बिम्बों का खूब प्रयोग करते हैं और उनके उदाहरण हमेशा पाठकों को चमत्कृत करते हैं। 'उसके मंसूबे अच्छे थे' में बिम्ब, उदाहरण, भाषा और मुहावरे उनकी कविता को आम पाठकों से जोड़ते हुए दिखते हैं। संवेदना और उदाहरण का भाव देखिए-सील-बन्द लिफाफों के भीतर/कुलबुला रहे थे/मासूम शब्द!/सर्दी की रात जैसे/रजाई में बच्चे। लिफाफे के भीतर पड़े शब्द बच्चे हैं। इसलिए उसके मंसूबे अच्छे थे और उसकी आत्मा को स्वीकार नहीं था उनपर मुहर लगाना। कविता किसी साजिश का संकेत करती है और सारी व्यवस्था लगी हुई है मानो कुछ हुआ ही नहीं-कोई मरा नहीं है/इस इलाके में/डाकिया बरखास्त कर दिया गया/लापरवाही के आरोप में। कविता उत्तरोत्तर भयावह होती जा रही है क्योंकि रक्तपायी मकड़ा जाल बुन रहा है और अधिकांश लिफाफे उसी जाल में उलझे हैं, कुछ पीकदानों में पड़े हैं, कुछ दीमकों की दरों में और कुछ रेत से भरी बोरियों के साथ दबे हैं समुद्र की गहराई में जबकि सीलबंद लिफाफों में/कुलबुला रहे थे/मासूम शब्द। कवि की मार्मिकता देखिए-उदासी में डूबा डाकिया/अभी भी मारा-मारा फिरता है/चिर-परिचित गलियों में/बाकी बेनाम-बेठिकाना लिफाफों की/गठरी पीठ पर लादे/सीलबन्द लिफाफों के भीतर/उसकी पीठ पर/अभी भी कुलबुला रहे हैं/मासूम शब्द। 

'राख का ढेर' संग्रह की 'अंततः तुम हार जाओगे' अंतिम कविता है जिसमें अच्छी भावनाओं के साथ कवि स्वयं है, निराश-हताश करता उसका मित्र है और लम्बी यात्रा तय करते बिम्ब हैं। कवि को अपनी कविता से बहुत उम्मीद है जिसमें नाना बिम्ब भरे पड़े हैं। मित्र कटु सत्य बताता है-मेरे दोस्त! तुम्हारे भीतर एक कुत्ता है/जो वक्त जरुरत दुम हिलाता है/फिर कान पटपटाकर सो जाता है। कवि संभावना या विकल्प की बात करता है-आग कुछ इस तरह भी जलाई जा सकती है/जैसे कविता जलाती है। वह अनगिनत कवियों का उदाहरण देता है जिन्होंने तनाव ग्रस्त मनःस्थितियों में कविताएँ लिखी हैं। कवि रहस्य खोलता है-सबसे ज्यादा नफरतों के बीच/हम सबसे ज्यादा/प्रेम को ही छिपाते हैं। विपरीत परिस्थितियों की चर्चा करते हुए कवि को महसूस होता है-जब से सूर्य की सारी गर्मी/समा गयी है कविता में/कविता स्निग्धता से भर गयी है। ऐसी कविताएँ विस्तृत आसमान देती हैं, चिन्तन का द्वार खोलती हैं और पूरी मानवता के लिए आलोक फैलाती हैं। 

'इस दौर में' कविता के माध्यम से फूलचंद गुप्ता जी समय के अपने दौर को पहचानना चाहते हैं। हर साहित्यकार का सम्पूर्ण सृजन उसके दौर का दस्तावेजी इतिहास होता है। चाहे-अनचाहे वह अपने समय की व्याख्या करता है और संगति-विसंगतियो को समझना-समझाना चाहता है। घट रही हर घटना उसे अलग अनुभव देती है और मानवता के सन्दर्भ में वह उस पर विचार करता है। कविता के शुरु में ही कवि का मनोवैज्ञानिक चिन्तन देखिए-समय के/इस नाजुक दौर में/बड़ा होने के लिए जब/सड़ना जरूरी हो जाये/तो ओछापन ही आदर्श हो जाता है। ऐसे अनेक परस्पर विरोधी तथ्य उभरे हैं इस कविता में और बलात्कार, अत्याचार या कत्लेआम अखबारों के लिए सनसनीखेज समाचार हैं। कवि व्यंग्यात्मक तरीके से लिखता है-आत्मा जैसी बातें मूढ़ करते हैं, धर्मात्मा यानी जो आत्महंता हैं, आप सीधे आदमी हैं, हथियारों से बच जायेंगे परन्तु विश्वास के खंजर से कोई हिंसा नहीं होगी और आप मार दिए जायेंगे। पृथ्वी से रोटी तक/हर गोल चीज/खतरनाक हो गयी है। सब कुछ संदिग्ध हो गया है/केवल संशय/विश्वसनीय रह गया है। कवि महंगाई, बेरोजगारी की बातें करते हैं। पूंजीवाद, समाजवाद दोनों प्रमुखवाद आफत में हैं। निरस्त्रीकरण कहने के लिए है, शांति प्रस्ताव बेचैन करते हैं और तलब भर खून पी लेने के बाद युद्ध-विराम की रस्म होती है-प्रस्ताव और विराम/लहू के खेल का/अन्तर्राष्ट्रीय नियम है। राष्ट्र बारूद के विकास से समृद्ध हो रहे हैं। समाज में हर जगह गंदगी देखने के बाद कविवर को शांति-चैन लाल झंडे में दिख रहा है। समाज में संवेदना नहीं है, सारा स्वार्थ का खेल है। कवि प्रश्न खड़ा करता है, उत्तर खोजता है। प्रश्न करती कवि की पंक्तियों का उत्तर कौन देगा? अंतिम पंक्तियों को देखिए-सही रास्ते को/गलत दिशा में/मोड़ने वाले गुनहगार/क्या अब भी/आपको दिखाई नहीं देंगे? डा० गुप्ता जी की बातों से सहमत हों या नहीं 'इस दौर में' कविता पर चिन्तन तो करना ही पड़ेगा।

'हे राम!' डा० फूलचंद गुप्ता जी की लम्बी कविता है। 'राम' हमारे देश सहित दुनिया भर में, गम्भीर आध्यात्मिक भाव से कहें तो सृष्टि के कण-कण में व्याप्त हैं। हो सकता है, बहुत लोग ऐसा न मानें क्योंकि उनका चिन्तन-मनन किंचित भिन्न है। सारा मसला हमारी दृष्टि, समझ और ज्ञान का है। सुखद है, अपनी कविता के लिए डा० फूलचंद गुप्ता जी ने 'हे राम!' शीर्षक चुना है। कवि की कविताओं में भूखण्ड, नदी, समुद्र, पहाड़, हरियाली, पेड़-पौधे, जलचर, नभचर और मनुष्य अपने सम्पूर्ण गौरव के साथ उपस्थित होते हैं। यह किसी की विराट चिन्तन-दृष्टि से ही सम्भव है। भेद-मतभेद होना स्वाभाविक है और पाठकों को भी सहमत-असहमत होने का पूरा अधिकार है। 'राम' को अपनी कविता का आधार बनाने के पहले निश्चित ही कवि ने हर दृष्टि से उनके उद्दात्त चरित्र को समझने का प्रयास किया होगा। नहीं भी किया हो तो, लोग कहते हैं, उनका चरित्र-चिन्तन सब कुछ समझा देता है। 'हे राम!' कविता वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य पर प्रश्न खड़ा करती है और अपने तरीके से उत्तर की तलाश करती है। कवि की पीड़ा है कि मनुष्य को एक पूर्ण मानव के रुप में समझने के बजाय जातियों, वर्गों में बांटकर देखा जाता है। कवि त्रासद स्थितियों के अपने अनुभव को बांटना चाहता है और उनके कारणों की खोज करता है। इसे वह साम्प्रदायिक कहता है और अपना चिन्तन प्रस्तुत करता है। कवि की कड़ी दृष्टि पूंजीवादी अर्थव्यवस्था पर है और समाजवादी विचार शायद अधिक पसंद हैं। कवि की भाषा असंयत हो उठती है क्योंकि उसके भीतर आक्रोश है।

कवि का संकेत देखिए-सूखे ठूंठों पर जम गई है/वर्फ/यह प्रकृति का नहीं/सभ्यता का संकट है। भयानक तूफान में दस्यु कारवाँ था, किनारे वे आना नहीं चाहते थे/मंझधार प्रतिकूल था/उन्हें किसी लंगर की तलाश थी। कवि उनके लिए 'कुत्तों की फौज' का भाव रखता है जो मालिकों के हितों के लिए भौंकते थे। कुछ लोग उनके हितों के विरुद्ध एकजुट होने-होने को थे। कवि का कुत्तों के बारे में विषद ज्ञान अद्भुत है और उन्होंने हमारी सम्पूर्ण व्यवस्था को समेट लिया है, विधान सभा और संसद को भी। यहाँ सम्बन्ध, रिश्ते-नाते सब फिजूल हैं क्योंकि अनजान लोगों द्वारा ट्रेन, बसों में यात्रा करते लोगों को जिन्दा जला देना, उनके घरों को फूँक देना, कवि के मन को पीड़ित करता है। वह कहता है-भोथरी संवेदनाएं सर्वाधिक वफादार होती हैं। कवि का सारा चित्रण भय, संशय से भरा हुआ है, कविता की पंक्तियाँ देखिए-कर्ता भी हमीं थे/क्रिया भी हमीं थे/कर्म भी हमीं थे/इस नरसंहार के व्याकरण में/तुम कहीं न थे। कवि की अपनी सोच है और वह अपने तरीके से व्याख्या, विवेचना करता है। हम पक्ष या विपक्ष जिधर भी हों, सच नहीं समझ सकते। सच समझने के लिए हमें निष्पक्ष होना होगा। कवि कुछ कहना चाहता है-

यही सूरज है
जो मन्दिर के लिए सुबह लाता था
मस्जिद के लिए भी
यही रात है
जो हिन्दुओं के लिए भी नींद लाती थी
मुसलमानों के लिए भी
अब रातें दहशत लेके आती हैं
सूर्य उगता है नफरत लेकर

एक होती है स्वतःस्फूर्त और दूसरी आरोपित, दोनों में अंतर होता है। कवि ने बहुत मार्मिक, भयावह और वीभत्स चित्रण किया है। हम सभी को सोचना होगा, आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? पहले तो कभी ऐसा नहीं हुआ। सीधी, सरल विवेचना तो यह होनी चाहिए कि सब स्वयं को बदलें, जिनने शांति भंग करने की शुरुआत की है, उनकी जिम्मेदारी अधिक बनती है। कवि, लेखक सभी लिखें कि सुख से रहो, शांति पूर्वक रहो और सबको रहने दो, सबको जीने दो। कवि ने लिखा है-

दोनों ने गिरा दी हैं
दीवारें सारी
तोड़ आये हैं सभी छतें
सभी घटादार, छतनार वृक्ष काट आये हैं

पंक्तियाँ समझने योग्य हैं-यह धर्म युद्ध है/धर्म युद्ध में आदमी/आदमी नहीं होता/वह सिर्फ दुश्मन होता है। आश्चर्य है लोकतंत्र से जन्मे बच्चे के बिम्ब पर प्रश्न खड़ा हो रहा है और सम्पूर्ण स्वदेशी को सहजता से स्वीकार करना कठिन लग रहा है। यह कैसी सोच है? संसद पर प्रश्न खड़े हो रहे हैं। अब किन राजाओं की बात हो रही है? देश एक है, संसद है, संविधान है और लोकतंत्र है। कवि सब समझता है और हर तथ्य को विस्तार से लिखता है। कभी-कभी उसके प्रश्न चिंता में डालते हैं। वह व्यंग्य करता है, लोग उसे भी समझते हैं। लोगों को हमेशा याद रखना चाहिए, आप अपनी दो आँखों से दुनिया को देखते हैं जबकि हजार-हजार आँखों से दुनिया आपको देखती है, आपके पास एक दिल और दिमाग है, दुनिया के पास लाखों और करोड़ों। साहित्य में पुनरुक्ति की समस्या खड़ी होती है, भाषा और शैली की चर्चा होती है और विचारों को लोग समझना चाहते हैं। जो है, जो नहीं है और जो होना चाहिए, सब पर हमारी सही दृष्टि जाना चाहिए। केवल नकारना सही नहीं होता या सिरे से खारिज करना भी उचित नहीं है। कवि ने मार्मिक काव्यात्मक पंक्तियाँ लिखी हैं और अपनी अनुभूतियों को जन-जन तक पहुँचाने की कोशिश की है। कहीं-कहीं जोरदार आक्रमण है और एक पक्ष की पुस्तकों, विधि-विधानों पर विचित्र भाव वाली दृष्टि है। यह संदिग्ध बनाती है और ऐसे लेखन पर प्रश्न खड़ा होता है। पूरी कविता पढ़ते हुए 'हे राम!' की पुकार कहीं नहीं दिखाई दी, हाँ 'हे राम' का विचित्र भाव अवश्य दिखा। यह कवि की स्वतन्त्रता है, चाहे जिस भाव से लिखे।

1 comment :

  1. मैं श्री विजय कुमार तिवारी जी का और संपादक महोदय सहित सेतु से जुड़े समस्त विद्वतजनों की टीम का हृदय से आभारी हूं।
    अपने कविता संग्रह ' राख का ढेर ' की समीक्षा यहां प्रकाशित देखना मेरे लिए बहुत सुखद अनुभव है। धन्यवाद।

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