हजारी प्रसाद द्विवेदी के निबंध और उनका लालित्यबोध

रशिमां बांसल 

हिन्दी अध्यापिका, सरकारी मिडल स्कूल, झोटीवाला, फरीदकोट (पंजाब)

निरीक्षकः- डॉ. रवीन्द्र कुमार
सरकारी सीनियर सैकण्डरी स्मार्ट स्कूल (लड़के) पंजगराईं कला, फरीदकोट

सारांशः-
प्रकृति निर्मित इस ब्रह्मांड में सभी जीव-जंतु, नदी, पहाड़, जंगल, रेगिस्तान, समुद्र मिलकर सांसारिक वातावरण को एक बाहरी अलौकिक छटा प्रदान करते हैं। दूसरी ओर मानवीय जीवन के अंदर भी एक ब्रह्मांड निर्मित है जो उसे बुद्धि तत्व के माध्यम से आंतरिक संतुष्टि के साथ-साथ प्रत्येक क्षण कुछ नया देखने और नया करने को आतुर रखता है। हिन्दी के प्रख्यात विद्वान हजारी प्रसाद द्विवेदी इसे लालित्यबोध का नाम देते हैं। जिसे हम अक्सर सौन्दर्यात्मकता के नाम से पुकारते हैं। द्विवेदी जी द्वारा रचित उनकी सभी रचनाओं के गहन अध्ययन के माध्यम द्वारा मानसिक रूप से वही सौन्दर्य प्राप्त होता है। लालित्यबोध का चित्रण, उसकी अभिव्यक्ति एवं उसका अनुसरण कोई आसान कार्य नहीं है। यह केवल बुद्धिमत्ता के सहारे भावनाओं का बहता हुआ वह सागर है जो मानवीय कल्याण हित, उसके जागरूक करने हित, उसके भीतर अडिग चेतनता का प्रवाह लिए हुए उसे निरंतर क्रियाशील रखने की आस में निरंतर बहता रहता है। हजारी प्रसाद द्विवेदी वही सागर हैं।

मुख्य शब्दः- चित्रात्मकता, माधुर्य, सहजता, लावण्य, कोमलता, रमणीयता, कलात्मकता, सरसता, मनोहरता।

अज्ञान, लालच, स्वार्थ एवं एक दूसरों से अकारण आगे निकलने की कोशिश, आज की मानवीय प्रवृत्ति बन चुकी है। मनुष्य की ओर से जितने भी कार्य किये जा रहे है उनके प्रतिरूप को मनुष्य विकास का नाम दे रहा है और उसी विकास की छाया में अकेलापन, द्वन्द्व, भय, अशान्ति और चिंतत भरा जीवन व्यतीत कर रहा है। हज़ारों लाखों की तादात में कुदरत की ओर से मिले उपहारों के बदौलत भी उसे शान्ति नहीं है। कारण, केवल मानसिक रूप से संतुष्टि न होना ही है। जो बाहरी दिखावे अथवा अंधी दौड़ लगाने से नहीं मिलती, वह तुष्टि इन सभी से बहुत दूर है किन्तु है हमारे अंदर के ब्रह्मांड का एक हिस्सा ही।

हजारी प्रसाद द्विवेदी हिन्दी साहित्य के प्रख्यात पंडित एवं भावी पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शक के रूप में जाने जाते हैं। क्योंकि बचपन से ही उनके गहन साहित्य एवं धार्मिक अध्ययन एवं अथक प्रयासों ने उन्हें कभी गिरने ही नहीं दिया और न ही कभी ठहरने का अवसर दिया। इन सभी कारणों से उन्हें यह भली भाँति अहसास हो गया था कि बाहर कुछ भी नहीं है जो कुछ भी है वह केवल हमारे अंदर ही है। अपने सारे जीवन में उन्होंने विभिन्न विधाओं में अनेक रचनााएँ की और उन सभी में केवल वही उतारा जो उन्हें अंदर से मिलता चला गया। भावार्थ यह कि उनके साहित्य को यदि ध्यानरत्त अवलोकन किया जाए तो यही पायेंगे कि वह केवल लालित्यबोध से ही सराबोर है।

द्विवेदी आधुनिक युग के एक प्रकाण्ड विद्वान, साहित्यकार एवं आलोचक के रूप में प्रतिष्ठित हैं। उन्होंने साहित्य की प्रायः सभी विधाओं में लिखा है। इनमें निबंध, उपन्यास, आलोचना, संस्मरण आदि प्रमुख विधाएँ हैं, जिन पर उन्होंने उत्कृष्ट कृतियांे का प्रणयन किया है। लेकिन आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की सर्वाधिक ख्याति एक निबंधकार, उपन्यासकार एवं आलोचक के रूप में भारतीय साहित्य में विद्यमान है। उनके निबंधों में ‘लालित्य बोध’ की परख और पहचान के लिए सबसे पहले यह जानना अति आवश्यक है कि लालित्य बोध से क्या आशय है। ’लालित्य‘ शब्द को रमणीयता के संदर्भ में लिया जाता है। किन्तु यह शब्द संस्कृत के ‘लालित्य’ का ही एक रूप है। ‘‘लालित्य’ की व्युत्पत्ति ‘लालितस्य भावः’ की गई है।" वस्तुतः यह शब्द मंजुलता, चारुता, अभिरामता इत्यादि का ही वाचक है।

निबंध हिन्दी गद्य साहित्य की एक महत्वपूर्ण एवं विचार प्रधान विघा है। संस्कृत आचार्यों ने गद्य को कवियों की कसौटी मानते हुए कहा है, ‘‘गद्यं कविनां निकषं वदन्ति"। स्पष्ट है कि गद्यकार के समक्ष एक चुनौती भरा साहित्यिक कर्म होता है जिसमें उसे कल्पना और भावनाओं के संयमित रखना होता है ताकि उसकी रचना शैली तर्क बुद्धि से वंचित न हो सके। यूँ तो निबंध किसी भी विषय पर हो सकता है, यथा वैज्ञानिक, सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक घटनाओं पर लेकिन प्रस्तुत शोध आलेख में लालित्य बोध के निकष पर आचार्य द्विवेदी के निबंधों पर विवेचन, विश्लेषण एवं मूल्यांकन करने का प्रयास किया है। हिन्दी में निबंध लेखन का क्रम भारतेन्दु काल से ही अग्रसर है। "किन्तु भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के समय तक निबंध के साथ ललित विशेषण का प्रचलन नहीं हुआ था फिर भी उस समय के निबंधों में ललित निबंधों की प्रारंभिक विशेषताएँ दिखाई पड़ती हैं। द्विवेदी युग में आचार्य शुक्ल, बालमुकन्द गुप्त, अध्यापक पूर्ण सिंह इत्यादि ऐसे निबंधकार हुए जिनका निबंध विशुद्ध भावप्रधान है। इनके निबंधों को ललित की कोटि में रखा जा सकता है।" उस समय उन सभी निबंधों में भाव पक्ष की अपेक्षा बुद्धि पक्ष की ही प्रधानता थी इसलिए वह सभी निबंध लालित्य की श्रेणी में शामिल नहीं किये जा सकते। हाँ, द्विवेदी युग में आकर छुट-पुट निबंध इस संबंध में अवश्य लिखे गये। भारतेन्दु ने स्वयं अनेक प्रकार के ललित सामाजिक आदि निबंध लिखे हैं। द्विवेदी काल में महावीर प्रसाद द्विवेदी, डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल, डॉ. नगेन्द्र, डॉ. विद्या निवास मिश्र, अज्ञेय तथा कुबेरनाथ राय आदि के नाम महत्वपूर्ण हैं। इन सभी निबंधकारों ने विचार प्रधान, वर्णनात्मक, विवरणात्मक, भाव-प्रधान, व्यंग्य-प्रधान तथा लालित्य बोध निबंध लिखे हैं। हिन्दी में ललित निबंधों का अपना एक महत्वपूर्ण स्थान है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के सभी निबंध लालित्य बोध से ओत-प्रोत हैं। एक बात यहाँ कहना वाँछनीय हो जाता है कि मानवीय प्रवृति का एक यह गुण है कि जिस व्यक्ति की जैसी प्रवृति होती है वह अपने आसपास का वातावरण; उससे मिलने वाले लोगों इत्यादि को भी वह उसी प्रवृति के अनुसार ही देखता है अथवा देखना चाहता है। द्विवेदी जी ने जितने भी निबंध लिखे, प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से लालित्यबोध उनकी विशेषता रही है। अपनी किताब ’कालिदास की लालित्य योजना’ भी यही विशेषता साफ झलकती हुई नज़र आती है। इस किताब में उन्होंने कालीदास जी पर काफी कार्य किया। अपनी लालित्यबोध की प्रवृति के अनुसार ही उन्होंने कालिदास के कार्योंं में भी यही कुछ निकालने का प्रयास किया। उनके कार्यों के संबंध में वह कहते हैं कि "इस देश की संस्कृति में अनेक प्रकार के वैचित्र्य आये। काव्य में, चित्र में, मूर्ति में, वास्तु में, नृत्य-गीत-वादित्र में और नाटक आदि चाक्षुष कलाओं से नवीन बातों का समावेश होता गया। और एक प्रकार की प्रच्छन्न गतिशीलता का प्रादुर्भाव हुआ। इस बहु-विचित्र जनमंडली के सर्वोत्तम को रूप-ललित रूप-देना बड़ी मर्मभेदनी दृष्टि और अर्थग्राहिका शक्ति का परिचायक है। कालिदास में यह शक्ति पूरी मात्रा में थी। इसीलिए वे सम्पूर्ण राष्ट्रीय चेतना को ललित रूप देने में कृतकार्य हुए।‘‘ भावार्थ यह कि कालिदास ने जो भी भारतीय समाज अथवा सभ्यता के संबंध में कार्य किये हों, किन्तु द्विवेदी जी ने उनके बारे में अपने विचारों के माध्यम से उनमें लालित्यबोध को प्रस्तुत करने का भरपूर प्रयास किया है। उन्होंने कालिदास जी पर कार्य करते हुए उसमें से भी अपनी मनोवृत्ति के अनुसार ही लालितस्य भाव को अभिव्यक्त किया है।

उल्लेखनीय यह है कि ललित निबंध में विचार प्रधानता, चिन्तन, निष्कर्षण, ज्ञानवर्धन तथा निर्दोष-बंधत्व का गुण होता है। इससे व्यक्ति निष्ठता, भावमयता, हार्दिक व मधुर सज्जा के तत्व भी विद्यमान रहते हैं। इस प्रकार हृदय एवं बुद्धि दोनों पक्षों का प्रतिनिधित्व करने के कारण ललित निबंध लोकप्रिय एवं सशक्त गद्य विद्या के रूप में प्रतिष्ठित है। ललित निबंध में विचारों के साथ भावों की सुगंध होती है, गद्य काव्य जैसा माधुर्य होता है, कविता जैसा आकर्षण होता है, कहानी जैसा रस होता है, उपन्यास जैसी सजीवता होती है और रेखाचित्र जैसी चित्रात्मकता तथा नाटक जैसी गूूढ़ता व गतिशीलता होती है। इस प्रकार ललित निबंध गद्य एवं पद्य के मध्य के सेतु है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने अपने निबंधों के वस्तु विधान तथा शिल्प विधान में लालित्य बोध को उच्च सीमा पर दर्शाया है। उनके निबंध विशेष प्रकार के माधुर्य, सहजता, कोमलता और रमणीयता को उजागर करते हैं। ’अशोक के फूल’ नामक अपने निबंध संग्रह के पहले ही निबंध ’अशोक के फूल‘ में वह कहते हैं कि "अशोक में फिर फूल आ गये हैं। इन छोटे-छोटे लाल-लाल पुष्पों के मनोहर स्तबकों में कैसा मोहन भाव है! वहुत सोच-समझकर कन्दर्प-देवता ने लाखों मनोहर पुष्पों को छोड़कर सिर्फ पाँच को ही अपने तुणीर में स्थान देने योग्य समझा था। एक यह अशोक ही है।" निबंध के इस गद्यांश में द्विवेदी जी का भावपक्ष इतना प्रबल नज़र आ रहा है कि माधुर्य, सहजता, कोमलता इत्यादि शब्द भी फीके नज़र आ रहे हैं। फूल अपने गुणों के कारण जो स्थान प्राप्त कर चुके हैं। यह प्रदर्शित करना ही द्विवेदी जी का लालित्य है। अपने विचार और वितर्क नामक निबंध संग्रह में भी वह इसी प्रकार के लालित्यबोध को वर्णित करते हैं कि "ग्यारह वर्षों तक लगातार रवीन्द्रनाथ जैसे महापुरुष के संसर्ग में रहना सौभाग्य की बात ही कही जाएगी। मुझे यह सौभाग्य मिला था। जानकर और अनजान में मैंने उसे कितना लिया है इसका कोई हिसाब नहीं है, किन्तु जब सोचकर कोई संस्मरण लिखने का अवसर आता है तो कुछ भी स्पष्ट याद नहीं आता। केवल एक ही बात रह-रहकर मस्तिष्क को छाप लेती है-उनका सहज प्रसन्न मुखमण्डल, स्नेहमेदुर बड़ी-बड़ी आँखें और अनन्य-साधारण मंद हास्य।" बुद्धितत्व के साथ-साथ भावनाओं की कोमलता के अहसास को चित्रण करना द्विवेदी जी के लालित्यबोध अभिव्यंजना का एक सशक्त हिस्सा है। इस निबंध संग्रह के अंतर्गत ’वसंत आ गया है’ नामक निबंध के दौरान उनका बहुत सा समय गुरुदेव रवीन्द्रनाथ जी के साथ प्राकृतिक वातावरण में व्यतीत हुआ। द्विवेदी जी ने अपनी मर्मानुभूति गुरुदेव के साथ-साथ प्रकृति के रहस्योद्धाटन करके भी प्रस्तुत की है जो मानवीय जीवन एवं प्रकृति के आपसी संबंधों पर दृष्टिपात करती नज़र आती है। इसी संबंध में रामनिवास अपनी आस्था और आदर्श नामक निबंध संग्रह में कहते हैं कि "सौन्दर्यशास्त्र का उद्देश्य सौन्दर्य तथा उसकी अनुभूति की व्याख्या करना है। साधारणतः सौन्दर्यशास्त्र के विद्वान जिस सौन्दर्य का विवेचन करते हैं, वह साहित्य तथा अन्य ललित कलाओं का सौन्दर्य होता है। प्रकृति और मानव जीवन के सौन्दर्य की व्याख्या किये बिना कलात्मक सौन्दर्य का विवेचन करना संभव नहीं है।"

अंग्रेज़ी भाषा के ’एस्थेटिकनैस‘ शब्द के समांतर हम सौन्दर्यात्मकता शब्द को ले लेते हैं। किन्तु कला की दृष्टि से इसमें अंतर पाया जाता है। "वस्तुत कलागत सौन्दर्य को ‘लालित्य’ नाम देकर उसे नैसर्गिक सौन्दर्य से भिन्न स्थापित करने का प्रयास किया गया जो उचित कहा जा सकता है। यह मान्यता स्वीकृत की जा सकती है कि मनुष्य के चित्त में जो ललित भाव होते हैं, उनकी अभिव्यक्ति-सौन्दर्य का नाम ही लालित्य है।" विगत भी वर्णित रहा था कि लालित्य और सौन्दर्य शब्द एक दूसरे के पर्याय के रूप में परिलक्षित होते हैं। लेकिन कलाओं के विभाजन के संदर्भ में ललित शब्द का प्रयोग किया गया है। सौन्दर्य को नैसर्गिक माना गया है लेकिन आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने मनुष्य निर्मित सौन्दर्य को ’लालित्य’ की संज्ञा प्रदान की हैं। किन्तु फिर भी इनमें मूलभूत अंतर द्विवेदी ही स्वयं ही अपनी किताब ’कालिदास की लालित्य योजना’ में स्पष्ट करते हैं कि "एक प्राकृतिक सौन्दर्य है, दूसरा मानवीय इच्छाशक्ति का विलास है। दूसरा सौन्दर्य प्रथम द्वारा चालित होता है; पर है मनुष्य के अन्तरतर की अपार इच्छा को रूप देने का प्रयास। एक केवल अनुभूति देकर विरत हो जाता है, दूसरा अनुभूति द्वारा अभिव्यक्त होकर अनुभूति-परम्परा का निर्माण करता है। भाषा में, धर्माचरण में, काव्य में, मूर्ति में, चित्र में बाधा अभिव्यक्त मानवीय शक्ति का अनुपम विलास ही वह सौन्दर्य है, जिसकी हम मीमांसा करने का संकल्प लेकर चले हैं। अन्य किसी उचित शब्द के अभाव में हम उसे लालित्य कहेंगे। लालित्य अर्थात् प्राकृतिक सौन्दर्य से भिन्न, किन्तु उसके समान्तर चलने वाला मानवीय रचित सौन्दर्य।" यह तो सत्य है कि एक विशेष प्रकार की मनोवृत्ति के कारण व्यक्ति उसी से संबंधित कार्य करने अथवा भावाभिव्यक्ति हेतु बाध्य रहता है।

‘विचार और विर्तक’ नामक अपने निबंध संग्रह में भी हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लालित्य बोध को बड़े ही संुदर ढंग से प्रस्तुत किया है। अपने निबंध ’मधुर रस की साधना में वह कहते हैं कि "नन्ददास ने ठीक ही कहा है कि यह भगवान की छाया है जो माया के दर्पण में प्रतिफलित हुई है-
 या जग की परछॉह री माया दर्पण बीच।

अब अगर दर्पण की परछॉह की जाँच की जाए तो स्पष्ट ही मालूम होगा कि इसमें छाया उल्टी पड़ती है। जो चीज़ ऊपर होती है, वह नीचे पड़ जाती है और जो नीचे होती है, वह ऊपर दीखती है।" अपने निबंधों में इस प्रकार का प्रदर्शन करना बुद्धि तत्व के विलक्षण स्वरूप का दृष्टिपात है जो केवल द्विवेदी जी ने ही कर दिखाया और इसमें भी अलौकिक रूप को मानवीय समझ के अनुसार प्रस्तुत करना ही द्विवेदी जी का लालित्य रूप का प्रदर्शन है।

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी प्राकृतिक सौन्दर्य को सौन्दर्य ही कहते हैं तथा मानव द्वारा रचित सौन्दर्य को ’लालित्य’ की संज्ञा देते हैं। वह स्वयं ही कहते हैं "सत्पुरुषो के हृदय में निवास करने वाली ललिता ही वह शक्ति है जो मनुष्य को नयी रचनाओं के लिए प्रेरित करती है। इसलिए यह परम्परागृहीत अर्थ मानव-रचित सौन्दर्य को ’लालित्य‘ कहना उचित ही है।" अपने कल्पलता नामक निबंध संग्रह में भी द्विवेदी जी कहते हैं कि "अगर आदमी अपने शरीर की, मन की, वाक् की अनायास घटने वाली वृत्तियो के विषय में विचार करे, तो उसे अपनी वास्तविक प्रवृत्ति पहचानने में बहुत सहायता मिले" भावार्थ यह कि मनुष्य केवल बाहरी दिखावा अथवा व्यर्थ के कार्यों में अपने बुद्धि, बल और समय की बर्बादी पर अमादा रहता है। यदि वह अपने अंदर स्वयं की तलाश करे तो उसे अपनी असीम शक्तियों की पहचान हो सकती है जो कहीं न कहीं उसके साथ-साथ मानवीय कल्याण में भी सहायी रहेगी। उसी को पहचानने एवं उससे कार्य करवाने की शक्ति को ही द्विवेदी जी ने लालित्य की श्रेणी में शामिल किया है।

उनके समग्र साहित्य में माँ भगवती ललिता की चर्चा अनेक स्थलों पर आई है, जिससे स्पष्ट है कि माँ भगवती ललिता के आधार पर ही वे ’लालित्य‘ नामकरण करते हैं। इस संबंध में डॉ. कविता रानी अपनी किताब ’हजारी प्रसाद द्विवेदी के साहित्य में लालित्य योजना’ में कहती हैं कि "आचार्य द्विवेदी ने शक्त आगमों में वर्णित माँ भगवती ललिता के स्वरूप और कलाओं से उसके सवध को स्वीकार करके उनके प्रमुख गुण ‘लालित्य’ को ही मानव रचित सौन्दर्य का नाम देने का एक प्रमुख कारण प्रस्तुत किया है। इससे पाश्चात्य सौन्दर्य-शास्त्र को भारतीय परिपेक्ष्य और परम्परा में देखने का अवसर मिल सकता है।" उन्होंने सभी कलाओं के एक शास्त्र के लिए ’लालित्य’ शब्द का प्रयोग किया है। वे मानते हैं कि सभी कलाओं की आत्मा एक ही है। इस आत्मा को उन्होंने भारतीय दृष्टि से देखा और परखा है। नवीन रचना की इस प्रेरणा का अर्थ ग्रहण करने के कारण ही आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने ‘लालित्य शब्द को उपयुक्त माना है। उन्होंने चैतन्य की सीमा हीन अभिव्यक्ति की व्याकुलता को लालित्य का मूल उत्स माना है।

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का लालित्य सिद्धांत समष्टि मानव के आधार पर स्थित है, जिसमें लोक तत्व और मानवता का समावेश हो जाता है। लालित्य तत्व का दूसरा कोण वेदना, भाषा और छन्द का तथा तीसरा कोण मिथक का है। इस प्रकार मानव, मिथक, वेदना, भाषा, छन्द, सम्प्रेषणीयता का धर्म आदि मिलकर लालित्य सिद्वांत का निर्माण करते हैं। इनके मूल में आस्था का प्रश्न है, जिसे उन्होंने इच्छा, ज्ञान और क्रिया के माध्यम से प्रस्तुत किया है। यहाँ इच्छा छन्द है, ज्ञान वेदना (रस आदि)है और क्रिया मिथक (लोक तत्व)है। इस संबंध में डॉ. कविता रानी अपनी किताब ’हजारी प्रसाद द्विवेदी के साहित्य में लालित्य योजना’ में कहती हैं कि ‘‘आचार्य द्विवेदी का आस्थावादी दृष्टिकोण लालित्य सिद्धांत का केन्द्र बिन्दु है, इसलिए वे इच्छा, ज्ञान और क्रिया के द्वारा रस, छन्द और लोक तत्व की समीक्षा करते हैं। वे अपने सिद्वांत का ताना-बाना मानव के चारों ओर ही बुनते हैं। वे साहित्य का प्रयोजन समष्टि मानव कल्याण ही मानते हैं, इसलिए उनके समग्र साहित्य में समष्टि-मानव-चिन्तन का प्रयास परिलक्षित होता है। उनके निबंध,े उपन्यास, समीक्षा, साहित्येतिहास तथा अन्य विधाओं में मानव कल्याण की कामना है। उनकी स्पष्ट मान्यता है कि "नर लोक से किन्नर लोक तक एक ही रागात्मक हृदय" व्याप्त है जिसका संधान वे अपने साहित्य के माध्यम से करते हैं। इसी व्याकुलता को वे अपने लालित्य सिद्धांत का अंग बनाते हैं।"

सारांश-
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के निबंधों में लालित्य बोध एक तरह से मानव रचित सौन्दर्य है। लालित्य के बिना किसी भी ललित कला की रचना नहीं की जा सकती। यही सही है। कि सभी ललित कलाओं के माध्यम भिन्न हैं। इसलिए नादात्मक सौन्दर्य बोध के लिए संगीत, रेखात्मक सौन्दर्य बोध के लिए चित्र, अकारात्मक सौन्दर्य बोध के लिए स्थापत्य गद्यात्मक सौन्दर्य बोध के लिए नृत्य, रुपात्मक सौन्दर्य बोध के लिए मूर्ति और वाणी के सौन्दर्य बोध के लिए काव्य कला का आविर्भाव हुआ। माध्यमों की इस भिन्नता में सौन्दर्य एक्य है। किसी एक कला एक कलाकार अथवा साहित्यकार का मूल्यांकन भी लालित्य सिद्धांत के आधार पर ही सम्भव है।
***

पाद-टिप्पणियाँ

[i] देव राधाकान्त, शब्दकल्पद्रुम, चतुर्थ कांड, मोतीलाल बनारसी दास, दिल्ली, 1961, पृष्ठ-216
[ii] https://www.hindikunj.com/2020/02/lalit-nibandh.html
[iii] द्विवेदी हजारी प्रसाद, कालिदास की लालित्य योजना, नैवेध निकेतन, वाराणसी, 1965, पृष्ठ-02
[iv] द्विवेदी हजारी प्रसाद, अशोक के फूल, सस्ता साहित्य मंडल, नई दिल्ली, 1958, पृष्ठ-01
[v] द्विवेदी हजारी प्रसाद, विचार और विर्तक, सुषमा-साहित्य-मन्दिर, जवाहरगंज, जबलपुर, पृष्ठ-149
[vi] शर्मा, डॉ. रामविलास, आस्था और सौन्दर्य, किताब महल प्राइवेट लिमिटेड, इलाहाबाद, पृष्ठ-19
[vii] लालित्य तत्व, सप्त सिंधु, मई-1963, पृष्ठ-25
[viii] द्विवेदी हजारी प्रसाद, कालिदास की लालित्य योजना, नैवेध निकेतन, वाराणसी, 1965, पृष्ठ-113
[ix] द्विवेदी हजारी प्रसाद, विचार और विर्तक, सुषमा-साहित्य-मन्दिर, जवाहरगंज, जबलपुर, पृष्ठ-121
[x] द्विवेदी हजारी प्रसाद, ग्रंथावली भाग-7, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 1981, पृष्ठ-35
[xi] द्विवेदी हजारी प्रसाद, कल्पलता, ज्ञानमंडल लिमिटेड, बनारस, संवत् 2012, पृष्ठ-03
[xii] रानी डॉ. कविता, हजारी प्रसाद द्विवेदी के साहित्य में लालित्य योजना, भावना प्रकाशन, दिल्ली, 1989, पृष्ठ-30
[xiii] रानी डॉ. कविता, हजारी प्रसाद द्विवेदी के साहित्य में लालित्य योजना, भावना प्रकाशन, दिल्ली, 1989, पृष्ठ-252

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