इतिहास लेखन की परम्परा और राजा शिवप्रसाद ‘सितारे हिंद’

-संजय कुमार

शोधार्थी, पीएचडी (हिंदी), जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली


हिन्दी साहित्य की जड़े चाहे प्राचीन भारत के इतिहास में फैली मिले परन्तु इसके संग्रहण का व्यवस्थित प्रयास उन्नीसवीं सदी में ही दिखाई देता है। उन्नीसवीं सदी से पहले भी हिन्दी में इतिहास के विभिन्न स्त्रोत मौजूद थे, परन्तु या तो वे ज्यादातर मौखिक रूप में मौजूद थे या किवदन्तियों एवं गल्पों के चक्रव्यूह में रची गई पोथियों के रूप में मिलते रहे हैं। मध्यकाल में जरूर हिन्दी के विभिन्न कवियों के जीवनवृत्त से संबंधित वृत्तांत प्राप्त हुए परन्तु इन परिचालक पुस्तकों को व्यवस्थित इतिहास नहीं कहा जा सकता।

चौरासी वैष्णव की वार्ता, भक्तमाल, कविमाला, कालिदास हजारा, अलंकार रत्नाकर, सार संग्रह, रस चंद्रोदय आदि ऐसी ही पुस्तकें है जिसमें अपने समय की युगीन प्रवृत्तियों की सीमित झलक तथा श्लाधात्मक कवि वृत्तांत के लम्बे चौड़े वृत्तांत देखने को मिलते हैं। इन परिचालक पुस्तकों का हिन्दी इतिहास लेखन की परम्परा में अत्यधिक महत्त्व है परन्तु इन पुस्तकों को हिन्दी के इतिहास लेखन की पुख्ता किताब नहीं माना जा सकता क्योंकि कालक्रम एवं सन संवत् का अभाव इन पुस्तकों में स्पष्ट नजर आता है।

19वीं शताब्दी से पहले की पुस्तकों में महिमागान, अतिशयोक्ति की प्रवृत्ति तथा एकरसता का अभाव पाया जाता है जिसके कारण वे हिन्दी साहित्य इतिहास की समृद्ध पुस्तक नहीं बन पायी। डॉ. रामकुमार वर्मा ने भी अपनी पुस्तक- “हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास’ में स्वीकारा है कि “हिन्दी साहित्य की क्रमागत प्रवृत्तियों, विचारधाराओं, और कवि विवरणों का इतिहास विक्रम की उन्नीसवीं शताब्दी तक नहीं मिलता।“1 
 हिन्दी साहित्य में इतिहास लेखन का पहला प्रयास ‘गार्सा द तासी’ के फ्रेंच पुस्तक ‘इस्तवार द ला लितेरात्यूर ऐन्दुई ऐन्दुस्तानी’’1 ग्रन्थ को माना जाता है। इसमें हिन्दी एवं उर्दू के अनेक कवियों का विवरण वृत्तात्मक रूप में दिया गया। इसका प्रथम भाग 1839 में तथा दूसरा भाग 1847 में प्रकाशित हुआ। “इस ग्रन्थ का महत्त्व इसी दृष्टि से है कि इसमें हिन्दी काव्य का सर्वप्रथम इतिहास प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया तथा कवियों के रचनाकाल का भी निर्देश किया गया, अन्यथा कवियों को कालक्रम के स्थान पर अंग्रेजी वर्णक्रम में प्रस्तुत करना, काल-विभाजन एवं युगीन प्रवृत्तियों के विवेचन का कोई प्रयास न करना, हिन्दी के कवियों में इतर भाषाओं को घुलामिला देना आदि ऐसी त्रुटियाँ है, जिनके कारण इसे इतिहास मानने में संकोच होता है।”2 

हिन्दी साहित्य में इतिहास लेखन की परम्परा का दूसरा महत्त्वपूर्ण ग्रंथ ‘महेशदत्त शुक्ल’ द्वारा संग्रहित ’भाषा काव्य संग्रह’ है। इतिहास लेखन की परम्परा में हिन्दी में लिखा गया पहला ग्रंथ इसे माना जा सकता है। भाषा काव्य संग्रह में पहले कुछ प्राचीन कविताएं संग्रहित की है फिर उन्हीं कवियों का जीवन-चरित्र तथा समय का संक्षेपीकरण दिया है। अन्त में कठिन शब्दों का कोश भी है। यह नवल किशोर प्रेस, लखनऊ से संवत् 1930 में प्रकाशित हुआ। इतिहास लेखन की परम्परा में इस ग्रन्थ में भी काल-विभाजन एवं युगीन संदर्भों का ध्यान नहीं रखा गया है।
 महेशदत्त शुक्ल तथा तासी की परम्परा को आगे बढ़ाने का श्रेय ‘शिवसिंह सेंगर’ को है। इन्होंने ‘शिवसिंह सरोज’ में लगभग एक हजार कवियों के जीवनवृत्तों एवं उनकी कविताओं को शामिल किया। कवियों के जन्मकाल, रचनाकाल के संक्षेप संकेत उनकी पुस्तक में मिलते हैं परन्तु प्रामाणिकता के अभाव में आज वे संदिग्ध बने हुए हैं। शिवसिंह सेंगर ने हिन्दी के प्राचीन कवियों का एक बड़ा वृत्त संग्रह तैयार किया था, जिसका उपयोग परवर्ती इतिहास लेखन की पद्धति में हुआ। 

1888 में एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल की पत्रिका के विशेषांक के रूप में जार्ज गियर्सन ने ‘द मार्डन वर्नाक्यूलर लिट्रेचर ऑफ़ हिन्दोस्तान’ नामक शोधपरक निबन्ध लिखा। “जो नाम से इतिहास न होते हुए भी सच्चे अर्थ में हिन्दी साहित्य का पहला इतिहास कहा जा सकता है।“3 इस ग्रंथ में पहली बार हिन्दी साहित्य के इतिहास को स्पष्ट 12 भागों में विभाजित किया गया है। कवियों के क्रम का भी इसमें ध्यान रखा गया है। अपितु यह मूलतः अंग्रेजी में लिखा गया था जिसके तहत विभिन्न जानकारियाँ इसमें पर्याप्त रूप में नहीं आ पाई। फिर भी हिन्दी साहित्य के स्वरूप एवं विकास की दृष्टि से ग्रियर्सन का यह शोधपरक संग्रह परवर्ती इतिहासकारों के लिए पथ प्रदर्शक सिद्ध हुआ।

वृत्तात्मक इतिहास लेखन की परम्परा का शीर्षतम कौशल मिश्रबन्धुओं द्वारा रचित ‘मिश्रबन्धु विनोद’ में देखा जा सकता है। यह ग्रंथ चार भागों में विभक्त है। जिसके प्रथम तीन भाग 1913 में प्रकाशित हुए तथा चतुर्थ भाग 1934 में प्रकाशित हुए। इसकी वृत्तात्मकता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि इसमें लगभग पांच हजार कवियों तथा एक हजार साल के इतिहास को समेटने का प्रयास किया गया था। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने इसे ‘हिन्दी का बहुत बड़ा भावी वृत्त संग्रह’ की संज्ञा दी। रीतिकाल के कवियों का परिचय आचार्य शुक्ल ने सीधे इसी ग्रन्थ से लिए थे उन्होंने स्वयं स्वीकारा है कि “रीतिकाल के संबंध में दो बातें और कहनी है। इस काल के कवियों के परिचयात्मक वृत्तों की छानबीन में, मैं अधिक नहीं प्रवृत्त हुआ हूँ, क्योंकि मेरा उद्देश्य अपने साहित्य के इतिहास का एक पक्का और व्यवस्थित ढाँचा खड़ा करना था न कि कवि कीर्तन करना। अतः कवियों के परिचयात्मक विवरण मैंने प्रायः मिश्रबंधु विनोद से लिये है।”4 आठ भागों में विभाजित इस भारी भरकम ग्रंथ की विशेषता यह है कि इसमें कवियों के विवरणों के साथ-साथ साहित्य के विविध भागों पर भी पर्याप्त प्रकाश डाला गया है। अनेक अज्ञात कवियों को प्रकाश में लाने, काल खण्डों का सटीक काल विभाजन, इतिहास में नामकरण का प्रयास तथा काल समीक्षा में परम्परागत सिद्धान्तों और पद्धतियो का अनुकरण करना ‘मिश्रबन्धु विनोद’ की प्रमुख सफलता है। आधुनिक समीक्षा दृष्टि से यह ग्रन्थ भले ही वृत्तात्मक ग्रंथ बनकर रह गया हो परन्तु, साहित्य इतिहास लेखन की परम्परा में इसका महत्त्वपूर्ण योगदान है।

मिश्रबन्धु विनोद के पश्चात् उसी लीक पर अन्य छिटपुट इतिहास लेखन के कार्य हुए जैसे-हिन्दी नवरत्न कविता कौमुदी, एडविन ग्रिल्स का ‘ए स्केच ऑफ़ हिन्दी लिटरेचर’ वियोगी हरि की ‘ब्रजमाधुरीसार’ पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का ‘हिन्दी साहित्य विमर्श, बदरीनाथ भट्ट की ‘हिन्दी’ आदि विभिन्न इतिहास परम्परा की पुस्तकें आचार्य शुक्ल के ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ से पहले आ चुकी थी। परन्तु इतिहास लेखन का व्यवस्थित एवं पक्का ढाँचा इन ग्रन्थों में नहीं दिखाई देता है।

हिन्दी साहित्येतिहास की परम्परा में सर्वोच्च स्थान आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा रचित ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ को प्राप्त है। जो मूलतः नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित ‘हिन्दी शब्द सागर’ की भूमिका के रूप में लिखा गया था। अभी तक के लिखे गए इतिहासों में यह पुस्तक सर्वश्रेष्ठ है। इसमें न केवल इतिहास के साथ समालोचना बल्कि आधुनिक दृष्टि से कवियों का निरूपण भी मिलता है।

उन्होंने हिन्दी साहित्य के इतिहास के आरम्भ में कहा कि “प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब होता है, तब यह निश्चित है कि जनता की चित्तवृत्तियों के परिवर्तन के साथ-साथ साहित्य के स्वरूप में भी परिवर्तन होता चला जाता है। आदि से अंत तक इन्हीं चित्तवृत्तियों की परम्परा को परखते हुए साहित्य परम्परा के साथ उनका सामंजस्य ‘साहित्य का इतिहास कहलाता है।’ जनता की चित्तवृत्ति बहुत कुछ राजनीतिक, सामाजिक, साम्प्रदायिक तथा धार्मिक परिस्थितियों के अनुसार होती है। अतः कारण स्वरूप इन परिस्थितियों का किंचित दिग्दर्शन भी साथ ही साथ आवश्यक होता है।”5 

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने कार्य-कारण संबंधों पर आधारित पद्धति पर एक हजार कवियों को लेकर 900 वर्ष के इतिहास का एक वैज्ञानिक ढाँचा तैयार किया। हिन्दी के इतिहास को स्पष्ट चार कालखण्डों में विभाजित किया। उनके द्वारा किया गया नामकरण एवं कालक्रम की धाक इस कदर रही कि अभी तक हिन्दी इतिहास लेखन पद्धति में थोड़े बहुत फेरबदल के साथ वही प्रचलित है। हिन्दी साहित्य इतिहास लेखन की पद्धति को तथ्यता एवं सत्यता की कसौटी पर कसने के बावजूद शुक्ल जी के इतिहास की आज भी महत्ता बनी हुई है।

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की लेखन पद्धति का, बाद के लेखकों ने भी अनुसरण किया। उनमें श्यामसुन्दर दास (हिन्दी भाषा और साहित्य), सूर्यकान्त शास्त्री (हिन्दी साहित्य का विवेचनात्मक इतिहास), डॉ. रामकुमार वर्मा (हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास) आदि ने शुक्ल जी की मान्यताओं को थोड़े बहुत हेरफेर के साथ स्वीकार किया।

साहित्येतिहास दर्शन एवं साहित्येतिहास लेखन के रचना-विधान की दृष्टि से आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के इतिहास लेखन की पद्धति महत्त्वपूर्ण है। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने ‘हिन्दी साहित्य की भूमिका’ पुस्तक लिखकर साहित्येतिहास लेखन की नवीन पद्धति का सूत्रपात किया। हमें नवीनता की क्यों आवश्यकता पड़ी, इस संदर्भ में डॉ. सुमन राजे का मत है- “शुक्ल युग के इतिहास लेखन की कमियों को आचार्य द्विवेदी जी ने अच्छी तरह अनुभव कर लिया था। पहली बार उन्होंने इतिहास को सांस्कृतिक तथा सामाजिक पीठिका पर स्थापित किया। उन्होंने किसी वृहद इतिहास ग्रंथ की रचना नहीं की। परन्तु उनकी विभिन्न कृतियों में इतिहास दर्शन एवं हिन्दी साहित्य के इतिहास से संबंधित उनके जो विचार मिलते हैं, वे एक नये युग का आरम्भ करने में समर्थ है।”6 

‘हिन्दी साहित्य की भूमिका’ लिखकर द्विवेदी जी ने एक नवीन साहित्येतिहास लेखन पद्धति का सूत्रपात किया। उन्होंने इतिहास को सांस्कृतिक जातीय एवं सामाजिक पीठिका पर स्थापित किया। साथ ही यह सिद्ध कर दिया कि आचार्य शुक्ल द्वारा निर्दिृष्ट पथ ही एक मात्र पथ नहीं है उससे भिन्न पथ का अवलंबन करके भी इतिहास लिखा जा सकता है। इस परम्परा को अन्य साहित्यकारों ने पूरी तरह से नहीं अपनाया। यह अपनी परम्परा का अकेला ग्रंथ है। उन्होंने दो अन्य रचनाएं ‘हिन्दी साहित्य’ तथा ‘हिन्दी साहित्य का आदिकाल’ लिखकर अपनी साहित्येतिहास लेखन परम्परा को विस्तार दिया।

मध्यकालीन इतिहास लेखन की पद्धतियों के विस्तार में निःसंदेह आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। परन्तु ऐसा नहीं है कि उनकी इतिहास पद्धति में कोई खामी नहीं थी। “असंगतियाँ तो यहां भी है, जैसे सामाजिक ढाँचे में आर्य-अनार्य मूलक जातिगत सिद्धान्तों का सहारा। इन कारणों से नवीन इतिहास की पृष्ठभूमि के रूप में स्वीकार करते हुए भी हम इसके आदर्शवादी दृष्टिकोण तथा प्रणाली को स्वीकार करने में असमर्थ है।”7 

आचार्य द्विवेदी के बाद इतिहास लेखन संबंधी विभिन्न पुस्तकों एवं शोधपत्रों की बाढ़ सी आ गई। परन्तु इतिहास लेखन पद्धति के विकास में कुछेक पुस्तकों का ही महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। अन्यथा ज्यादातर पुस्तकें वही पुरानी लीक पर चलने को आतुर दिखाई देती है।

इतिहास लेखन की परम्परा में डॉ. गणपति चन्द्र गुप्त के ‘हिन्दी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास’ का उल्लेख करना समीचीन लगता है। डॉ. गणपतिचंद्र गुप्त ने आदिकाल से लेकर आधुनिक पूर्ववत काल (1984-1997 ई.) तक के इतिहास को वैज्ञानिक पद्धति पर कसने का प्रयास किया। उन्होंने इस पुस्तक की भूमिका में लिखा है कि “साहित्य के क्षेत्र में अभी तक कोई विकासवादी सिद्धान्त सुप्रतिष्ठित नहीं है। ऐसी स्थिति में मेरे सामने समस्या थी कि मैं किस सिद्धांत का अनुगमन करूँ। इसके लिए मैंने विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिनिधि सिद्धान्तों के तुलनात्मक अध्ययन के आधार पर एक ऐसे सिद्धान्त की प्रतिष्ठा का प्रयास किया है जिसे विकासवाद का सामान्य या सार्वभौमिक सिद्धान्त कहा जा सके तथा जिसे अन्य क्षेत्रों के साथ-साथ साहित्य पर भी लागू किया जा सके।”8 

गणपतिचंद्र गुप्त ने पाँच नव प्रतिष्ठित विकासवादी सूत्रों में इतिहास लेखनी चलाने का प्रयास किया। वे पाँच सूत्र हैं- प्राकृतिक सृजन शक्ति, परम्परा, वातावरण, द्वन्द्व, संतुलन।

इन्हीं को आधार बनाकर हिन्दी की सामग्री को पिरोया। जो अति वैज्ञानिकता की शिकार सी लगती है। वैज्ञानिक इतिहास का धरातल तो ठीक है लेकिन साहित्य की हर सामग्री को उस पर कसना कहाँ तक ठीक है। गणपति चन्द्रगुप्त का इतिहास यहीं पर मात खाता है तथा अन्ततः आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की पुरानी लीक पर चलने लगता है। हिन्दी इतिहास लेखन परम्परा में नामवर सिंह का महत्त्वपूर्ण योगदान है। हिन्दी में मार्क्सवादी पद्धति को सहज सुलभ एवं प्रवाहगामी बनाने में उनकी भूमिका महत्त्वपूर्ण रही है। 1952 में आयी उनकी पुस्तक ‘छायावाद’ के क्रान्तिकारी तेवर ने ही बतला दिया था कि उनकी दृष्टि क्या है। आधुनिक साहित्य की प्रवृतियाँ, इतिहास और आलोचना, कहानी: नयी कहानी, दूसरी परम्परा की खोज, कविता के नये प्रतिमान आदि में नामवर सिंह की इतिहास दृष्टि को देखा जा सकता है।

1954 में प्रकाशित ‘शिवदान सिंह चौहान की पुस्तक’ हिन्दी साहित्य के अस्सी वर्ष’ भी प्रमुख पुस्तक है जिसमंे इतिहास लेखन की परम्परा को मार्क्सवादी सिद्धान्तों पर कसने का भरसक प्रयास किया गया। हिन्दी के बड़े लेखक, चन्दबरदाई से लेकर तुलसीदास, बिहारी तथा भारतेन्दु तक को चौहान जी ने मार्क्सवादी पद्धति पर कसने का प्रयास किया। अपितु इस अतिवादी प्रयास में वस्तुनिष्ठता की जगह वे भावगत एवं व्यक्तिगत रूप में बहते नजर आते हैं। “साहित्येतिहास लिखना कोई भावगत या व्यक्तिगत विरंजना नहीं है बल्कि युगीन संदर्भों के आइनों में देखकर अध्ययन परख जानकारी का संग्रहण है... ज्यादातर साहित्येतिहासकार को यह बात अचरज लगती है।”9 
 हिन्दी साहित्येतिहास लेखन के क्रम में अगला नाम डॉ. नगेन्द्र का लिया जा सकता है। नगेन्द्र ने साहित्य से संबंधी एक दर्जन से अधिक किताबें लिखी, परन्तु साहित्येतिहास पर संपादित उनकी पुस्तक ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ का विशेष महत्त्व है। रचनात्मक सौन्दर्य की महत्ता को स्वीकार्य करने वाले नगेन्द्र ने विभिन्न विषय के विद्वानों के शोध परख आलेखों का एक भारी संग्रह तैयार किया, जो हिन्दी साहित्य इतिहास लेखन की पद्धति में महत्त्वपूर्ण साबित हुआ। हालांकि इस ग्रन्थ में इतिहास लेखन की परिपाटी की अलग लीक मौजूद नहीं है, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल एवं हजारी प्रसाद द्विवेदी के मूल सिद्धान्तों का मिश्रण इस ग्रंथ में देखा जा सकता है। 

डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी ने ‘हिन्दी साहित्य और संवेदना का विकास’ में पुरानी इतिहास लेखन की परम्परा से हटकर लिखने का प्रयास किया। साहित्य में संवेदना के स्वर से रचना एवं रचनाकार को परखने की नई शैली चतुर्वेदी जी के साहित्येतिहास में देखने को मिलती है। भक्तिकाल को ‘शक्तिकाल’ घोषित करने वाले रामस्वरूप चतुर्वेदी ने प्रवृत्तिगत जरूर विषय क्षेत्र को विस्तार किया परन्तु पद्धतिगत वे भी रामचन्द्र शुक्ल की तरह काल विभाजन एवं नामकरण की शैली को अपनाते दिखते हैं। रामस्वरूप चतुर्वेदी ने नई कविता के बाद के बिखरे साहित्य को व्यवस्थित किया। यह उनके साहित्येतिहास लेखन की प्रमुख देन है।

 हिन्दी साहित्येतिहास लेखन का अगला प्रमुख डॉ. बच्चन सिंह के इतिहास ‘हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास’ में देखने को मिलता है। नब्बे के दशक में बदले राजनीतिक, सामाजिक एवं साहित्यिक पहलुओं की स्पष्ट छाप उनके इतिहास में देखी जा सकती है। साहित्येतिहास लेखन के क्षेत्र में अब तक ढेरों शोधग्रंथ एवं पाण्डुलिपियाँ प्रकाशित हो चुकी थी, इन्हीं सब का फायदा डॉ. बच्चन सिंह को मिला परन्तु आचार्य शुक्ल की महत्ता उन्होंने तब भी स्वीकार्य की- ‘हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास’ की भूमिका में वे लिखते हैं- “न तो आचार्य रामचंद्र शुक्ल के ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ को लेकर दूसरा नया इतिहास लिखा जा सकता है और न छोड़कर नये इतिहास के लिए शुक्ल जी का इतिहास एक चुनौती है।“10 बच्चन सिंह ने एक हद तक आचार्य शुक्ल की चुनौती को स्वीकार्य भी किया तभी तो वे आदिकाल के बने-बनाये काल विभाजन से हटकर अपभ्रंश एवं बहुतेरे देशी भाषाओं के साहित्य जैसे नया नामकरण का प्रयास करते है। भक्तिकाल को मध्यकाल कहने पर भी बच्चन सिंह को आपत्ति है। रीतिकाल में तो उन्होंने आचार्य शुक्ल से दो कदम आगे निकल कर रीतिकाल के बहुरीतिकाल, रीतिचेतस तथा काल चेतस व अन्य जैसे नये काल विभाजन को स्वीकार किया। आधुनिक काल पर विषयवस्तु की दृष्टि से बच्चन सिंह का इतिहास ठोस जानकारियां प्रदान करता है। लेकिन काल विभाजन एवं नामकरण में उनके अन्तर्विरोध स्पष्ट नजर आने लगते हैं । वे जिन प्रवृत्तियों का विरोध करके मध्यकाल व रीतिकाल की अवधारणाओं को चुनौती दे रहे थे। उन्हीं के आधार पर आधुनिक काल की सभी साहित्यिक विधाओं का विभाजन करते नजर आते हैं। वे काव्य धाराओं की तुलना विचारधारा, स्वच्छन्दतावाद व उत्तरस्वच्छन्दतावाद में बांटकर देखना चाहते थे। बच्चन सिंह अन्ततः साहित्येतिहास में अपने ही अन्तर्विरोधी संजाल में फँसे हुए दिखाई देते हैं।

 सुमन राजे का ‘हिन्दी साहित्य का आधा इतिहास’ साहित्येतिहास लेखन की अगली सशक्त कड़ी है। हिन्दी इतिहास में स्त्री उपेक्षिता का मुद्दा उन्होंने जोरदार ढंग से उठाया तथा तमाम उन स्त्री साहित्यकारों को साहित्येतिहास में स्थान दिलाया जो या तो अभी तक विलुप्त थी या फिर जानबूझकर उनकी रचनाशीलता को उभारा नहीं गया। सुमन राजे की इतिहास दृष्टि की पद्धति भले ही एक नहीं रही है अवधारणाओं के चयन और समन्वय में चाहे उतार-चढ़ाव देखने को मिलता हो परन्तु स्त्री साहित्येतिहास की अनिवार्य उपस्थिति को दर्ज करना, उनकी सबसे बड़ी सफलता रही है। उपेक्षित स्त्री साहित्यकारों के लिए वे धर्म, सम्प्रदाय, अवधारणा यहाँ तक की साहित्यिक कलात्मकता तक को धत्ता बताते हुए आधी आबादी के इतिहास को मुक़म्मल अंजाम देती है। यह उनकी इतिहास लेखन की परम्परा की सीमाएँ भी है और ताकत भी।

 वर्तमान में अस्तित्ववादी साहित्य (दलित, स्त्री, आदिवासी) ने इतिहास लेखन की पद्धतियों को नये सिरे से चुनौती प्रदान की है। अब इतिहास के पुराने पैतरों की जगह स्वानुभूति एवं सहानुभूति की नई अवधारणा जन्म लेने लगी है। उत्तर-आधुनिकता के दौर में साहित्येतिहास लेखन का कार्य जारी है। तथा हिन्दी इतिहास लेखन के पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता लगातार महसूस की जा सकती है।

बढ़ते वैचारिक मतभेद, उभरे नये अस्तित्ववादी मूल्य तथा बदलती सामाजिक, राजनीतिक, प्रवृत्तियों के बीच एक बार फिर से साहित्येतिहास लेखन की माँग लगातार बढ़ रही है।


 इतिहास लेखन की परम्परा में राजा शिवप्रसाद ‘सितारेहिंद’
 
हिन्दी में इतिहास लेखन की परम्परा ज्यादा पुरानी नहीं है। 18वीं शताब्दी तक हिंदी भाषा में इतिहास लेखन का आधुनिक रूप स्पष्ट नहीं हो सका था। कथासार, इतिहास चन्द्रिका जैसी अनूदित पुस्तकें ही हिन्दी विद्यार्थियों के लिए मुख्य स्त्रोत बनी हुई थी। मौलिकता के लिहाज से राजा शिवप्रसाद सितारे हिंद की इतिहास संबंधी पुस्तक ‘इतिहास तिमिरनाशक’ का महत्त्वपूर्ण स्थान है। “यह हिन्दी का प्रथम मौलिक इतिहास ग्रंथ है। इसमें अन्य पाठ्यपुस्तकों के विपरीत कई स्थानों पर स्वतन्त्र विचार भी प्रकट हुए है।”11 इतिहास तिमिरनाशक 19वीं सदी के सांतवे दशक में हिंदी की पहली ऐसी पुस्तक थी जिस पर प्राच्यविदों और अन्य अंग्रेज इतिहासकारों द्वारा अपनाई गई इतिहास संबंधी शोध की आधुनिक पद्धतियों का सबसे गहरा तथा स्पष्ट असर था। इतिहास तिमिरनाशक चूंकि विद्यार्थियों की रोचकता को ध्यान में रखकर लिखी गई थी। इसीलिए इसमें साहित्यिक गंभीरता तथा ऐतिहासिक तथ्यता के पक्के प्रमाण हमें नहीं दिखाई देते। परन्तु यह भी सच है कि ‘इतिहास तिमिरनाशक’ ने हिन्दी के आगे के इतिहास लेखन की परम्परा को प्रशस्त करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। ऐतिहासिक बोध एवं राष्ट्रीय चेतना का जो जुझारूपन राजा शिवप्रसाद सितारेहिंद की इस रचना में अपने आरम्भिक काल में था वही बाद की रचनाओं में स्पष्ट रूप से विकसित होकर सामने आया।

 इतिहास लेखन की परम्परा के विविध आयामों से टकराने से पहले राजा शिवप्रसाद सितारेहिंद से रूबरू होना आवश्यक लगता है। यह हिन्दी साहित्य के ऐसे उपेक्षित व्यक्तित्व है। जिसने हिन्दी में इतिहास लेखन की न केवल मौलिक शुरूआत की बल्कि अपने समय में विविध साहित्यिक विधाओं को परिष्कृत करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

 राजा शिवप्रसाद सितारेहिंद के व्यक्तित्व और कृतित्व की जानकारी देने वाले स्त्रोत बहुत कम है। उनकी आत्मकथा ‘सवानेह उभरी’ में भी उनके जीवन की अंदरूनी झलक बहुत कम मिलती है। “ राजा शिवप्रसाद ‘सितारेहिंद’ का जन्म तीन फरवरी सन् 1824 ई. को बनारस के भूतही इमली मुहल्ले की भाट की गली में हुआ था।”12 उनके पुरखों को मुगल बादशाहों ने पहले ‘राजा’ और फिर ‘जगतसेठ’ की उपाधि दी थी। शिवप्रसाद की शिक्षा बनारस के सरकारी स्कूल और काॅलेज में हुई। पाँच साल से शुरू होकर सत्रह साल की उम्र तक शिवप्रसाद की शिक्षा चलती रही। उन्होंने हिन्दी-उर्दू के अतिरिक्त संस्कृत, फारसी और अंग्रेजी का भी अध्ययन किया। 
 स्पष्टतः उन्नीसवीं सदी का इतिहास कई मायनों में विशिष्ट है। साहित्य की दुनिया में जहाँ पुनर्जागरण का आगाज इसी समय हुआ, सामाजिक स्तर में सतीप्रथा तथा बाल विवाह जैसी कुप्रथाओं के खिलाफ पहली बार लामबंध होकर विभिन्न संगठनों ने पहली बार एक स्वर में आवाज उठाई। 19वीं सदी में ही भारतीय राजनीति में युगांतकारी मोड़ देखने को मिलता है। साहित्य के माध्यम से चहुँमुखी ज्ञान के प्रकाश में लोगों में राष्ट्रीयता की भावना का विकास इसी समय हुआ। कुल मिलाकर 19वीं सदी का समय बदलाव के दौर से गुजर रहा था। ऐसे समय में राजा शिवप्रसाद सितारेहिंद जैसे व्यक्तित्व को आंकना कई मायनों में विशिष्ट है। साहित्य से लेकर राजनीति तक तथा भाषा से लेकर विभिन्न सामाजिक आंदोलनों में सितारेहिंद की विशिष्ट भूमिका रही है। वर्तमान में चाहे इतिहास के पन्नों में राजा शिवप्रसाद सिंतारेहिंद को खलनायक की तरह पेश किया जाता है परन्तु सच्चाई इससे अलग है। जो व्यक्ति फारसी भाषा को अदालती भाषा बनाने के खिलाफ हो, जो हिन्दी को राजकीय भाषा बनाने का कट्टर समर्थक हो तथा जो गौशाला के निर्माण के लिए अपनी जमा पूँजी दान कर दे, भला ऐसा व्यक्ति हिन्दी विरोधी कैसे हो सकता है? इतिहास तिमिरनाशक’ से लेकर भूगोलहस्तामलक जैसी विविध पुस्तकों का हिन्दी में पहली बार रचना करने वाला व्यक्ति, भला हिन्दी का कैसे विरोधी हो सकता है? अपनी पुरानी पुश्तैनी जमीन को गिरवी रखकर जो व्यक्ति ‘बनारस’ जैसा हिन्दी का पहला अखबार निकालता हो? भला इससे बड़ा हिन्दी हितैषी कौन होगा। “राजा शिवप्रसाद ‘सितारेहिंद’ 19वीं सदी के महत्त्वपूर्ण हस्ती थे। उस दौर की बहुत सी घटनाओं के सूत्र उनसे जुड़े थे। उन्हें छोड़कर उस दौर के इतिहास को न समझा जा सकता है, न लिखा जा सकता है।”13

 हिन्दी नवजागरण के अंदर सबसे विवादास्पद व्यक्तित्व होने के बावजूद अपने साफ-सुथरे प्रवाहपूर्ण गद्य के कारण, हिन्दी भाषा की सशक्तता के कारण तथा हिन्दी-उर्दू विवाद की सही पड़ताल के कारण उनकी छवि अपने समकालीनों में भिन्न बनी हुई है। आज समय की आवश्यकता है कि हिन्दी साहित्य के और हिन्दी भाषी समाज के इतिहास में उनकी भूमिका पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। 
 
 

संदर्भ:
1. वर्मा, रामकुमार, हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास, पृष्ठ 1
2. नगेन्द्र हिन्दी साहित्य का इतिहास, पृष्ठ 26 
3. वही, पृष्ठ 26
4. शुक्ल, हिन्दी साहित्य का इतिहास, पृष्ठ 6
5. वही, पृष्ठ 15
6. राजे, सुमन, साहित्येतिहास: संरचना, स्वरूप, पृष्ठ 122
7. नामवर सिंह, आलोचना, इतिहास विशेषांक, पृष्ठ 12
8. गुप्त, गणपतिचन्द्र, हिन्दी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास, भूमिका, पृष्ठ 6
9. त्रिपाठी विश्वनाथ, हिन्दी साहित्य का सरल इतिहास, पृष्ठ 86
10. सिंह, बच्चन, हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास, (भूमिका) पृष्ठ 2 
11. एच.आर. सिंह, हिस्टारिकल राइटिंग इन हिन्दी, पृष्ठ 462 
12. तलवार वीरभारत, राजा शिवप्रसाद सितारेहिंद, प्रतिनिधि संकलन
13. तलवार, वीरभारत, प्रतिनिधि संकलन, पृष्ठ 24


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