कहानी: खुशी

अमरेन्द्र सुमन

अमरेन्द्र सुमन

ओफ ओ गाड़ी आज भी निकल गई, टिकट काटने वाले एजेण्ट की ओर देखते हुए उन्होंने कहा।

सर, थोड़ी देर पहले आ गए होते तो...! खैर कोई बात नहीं। आधे घंटे के बाद अंतिम गाड़ी खुलने जा रही है, आप कहें तो एडवांस टिकट बना दूँ ! तनिक रुकते हुए एजेण्ट ने कहा और फिर उत्तर का इन्तजार किये बिना ही अंतिम गाड़ी के लिए टिकट बना दिया।

वैसे सर करते क्या हैं, महीने में एकाध मर्तबा आपसे भेंट हो ही जाती है?

टिकट एजेण्ट की ओर मुखातिब होते हुए उन्होंने कहा- इलेक्ट्रोनिक्स मीडिया का रिपोर्टर हूँ। किशनगंज से ट्रन्सफर होकर यहाँ आया हूँ।

कितने दिन हो गए यहाँ आए हुए?

लगभग नौ-दस महीने, उत्तर सुनने के बाद एजेण्ट अपने काम पर लग गया। 

जिस जगह पत्रकार मित्र की पोस्टिंग थी, वहाँ से महज सौ किमी की दूरी पर उनका अपना घर था, अतएव प्रत्येक पन्द्रह दिन पर दो दिनों के लिए घर जाना वे नहीं भूलते थे। पत्रकारिता के अलावे भी तो अपनी एक दुनिया है, घर-परिवार है। बीबी-बच्चे, दोस्त-यार हैं। सबकी अपनी-अपनी अपेक्षाएँ, सबके एक-दूसरे से सरोकार। दिनभर के काम से फारिग हो पत्रकार मित्र निकल पड़े थे अपने गन्तव्य की ओर। बस स्टॉप पर आधे घंटे तक इन्तजार करने के अलावा दूसरा कोई उपाय नहीं था।

बैठने की कोई जगह तो होनी चाहिए बिना देर किये स्टेण्ड के निकास द्वार पर बने पुलिया के गॉडबॉल पर जाकर वे बैठ गए और फिर फोन पर इधर-उधर की बातों में मशगुल हो गए। उन्हें इस बात का तनिक भी भान नहीं था कि आधे-अधुरे मैले-कुचेले कपड़ों में आठ-दस वर्षीय एक लड़का जो निहायत ही गरीब दिख रहा था, गौर से उनके जूतों को देख रहा है।

कहीं कोई चोर-उचक्का तो नहीं? मन में इस विचार के आते ही उन्होंने लड़के से सवाल पूछा, "बात क्या है?" लड़के ने डरते हुए किन्तु पैर में पड़े जूतों की ओर इशारा करते हुए कहा, "आपका जूता गन्दा हो गया है, पॉलिस कर दूँ क्या?" इतना छोटा बच्चा, जूतों की पॉलिस क्या खाक कर पाएगा?

"कितने दिनों से यह काम कर रहे हो?"

"यही कोई चार-पाँच साल से," लड़के ने कहा।

"चार-पाँच साल से, और तुम्हारा बाप, वह काम नहीं करता?"

"करता है किन्तु हमें नहीं देखता।"

"क्यों?"

"पियक्कड़ है, दिन भर नशे में धूत रहता है। माँ को रोज गरियाता और हमें मारता-पिटता था। अब तो दूसरी बीबी के साथ ही रहता है। उससे हमारा कोई संबध/ कोई लेना-देना नहीं है।"

"कितने भाई-बहन हो?"

"कुल चार, तीन बहन और भाई एकमात्र मैं ।"

"दिनभर में कितनी कमाई हो जाती है?"

"यही कोई दो-तीन सौ रुपये," निराश होते हुए लड़के ने कहा। 

"दो-तीन सौ रुपये में घर चल जाता है?"

"किसी तरह।"

"पॉलिस करने के कितने पैसे लेते हो?"

"दस रुपये मात्र।"

कितना छोटा बच्चा है, खेलने-खाने की उम्र में घर-परिवार की चिन्ता?

"माँ काम नहीं करती?"

"झाड़़ू-बर्तन करती थी, देह नहीं चलता अब। चाल की ओर इशारा करते हुए कहा, साल भर से घर पर ही बैठी है वह।"

और कुछ पूछने से पहले पत्रकार मित्र ने जूते उतारकर उसे दे दिया ।

कितनी विचित्र दुनिया है। इसी शहर में कुछ बच्चे ऐसे हैं जिनके पास सुख-सुविधा की कोई कमी नहीं। कुछ ऐसे ठहरे, जिन्हें इस छोटी उम्र में भी पेट भरने के लिए अपनी उम्र की सारी शक्ति झोंक देनी पड़ती है।

जूता लेकर लड़का मंद-मंद मुस्कुराने लगा। उसकी आँखों में एक अदृश्य चमक तैर रही थी। बाजार की इस मंदी में दस रुपये की आमद से अब उसे कोई रोक नहीं सकता। 

पत्रकार मित्र की आँखों के सामने पीठ अड़ाकर लड़का जूता पॉलिश करने लगा।

पता नहीं पॉलिश ठीक-ठीक कर पाएगा भी या नहीं, अचानक पत्रकार मित्र लड़के के सामने जा खड़े हो गए। 

जूता पॉलिश करने वाला ब्रश पूरी तरह झड़ चुका था। बूट पॉलिस बॉक्स में क्रीम भी नदारद थी। फिर भी लड़का अपनी ताकत की पॉलिश से जूते को चमका रहा था।

"ब्रश तो पूरी तरह झड़ चुका है बेटा, इस ब्रश से जूता पॉलिश कर लोगे?"

लड़का शरमा गया।

"दूसरा ब्रश नहीं है?"

लड़का निरुत्तर था।

"कितने में मिलता है यह ब्रश?"

"पचास रुपये में एक," साहस बटोरते हुए लड़के ने कहा।

पचास-पचास के दो नोट थमाते हुए पत्रकार मित्र ने लड़के को दो ब्रश लाने को कहा। 

हाथ में नोट पकड़ते ही लड़का हिरण की तरह उछल़ पड़ा। कुछ ही देर में उसके हाथ में दो नया ब्रश था। पहले ब्रश से उसने पॉलिश प्रारंभ कर दिया जबकि दूसरा ब्रश पत्रकार मित्र को थमाने लगा।

"बाबू तुम इसे अपने पास ही रखो। यह तुम्हारे काम आएगा।" लड़के ने बिना देर किये ब्रश को बूट पॉलिस डब्बे में रख लिया। पत्रकार मित्र का जूता चमकने लगा। दस के बदले बच्चे की मेहनत देखकर उन्होंने उसे बीस का नोट थमा दिया।

दस का एक मरियल नोट बच्चा वापस करने लगा। "रख लो, तुम्हारा ही है यह।" अन्दर ही अन्दर खुश लड़के ने वह नोट अपने पॉकेट में रख लिया और सीधा अपनी चाल की ओर दौड़ पड़ा। पत्रकार मित्र की गाड़ी अभी भी पाँच-सात मिनट लेट थी। अभी कुछ ही देर बीते थे कि एक बड़ी फौज लेकर लड़का फिर हाजिर था उनके सामने।

अरे इतने सारे लड़के एक साथ, क्या बात है?

"पैसे तो तुम्हें मिल चुके हैं, फिर इन बच्चों को लेकर आने का मतलब?"

साथ आए दोस्तों की ओर इशारा करते हुए लड़के ने पत्रकार मित्र से कहा, "ये सारे मेरे लंगोटिये यार हैं। आपके बारे में मैंने इन्हें बता दिया है। सभी आपसे मिलना चाहते थे।" अपने दोस्तों को नया ब्रश दिखलाते हुए वह गर्व महसूस कर रहा था। बच्चों को ब्रश दिखाते हुए उसने कहा, "देखो इन्हीं साहब ने खरीदकर दिया है मुझे।" बच्चे आश्चर्यचकित थे, लेकिन अन्दर ही अन्दर खुश भी। एक साथ इतने सारे बच्चों को देखकर पत्रकार मित्र ने टॉफी का एक बड़ा पैकेट खरीदा और उन बच्चों के बीच उसे बाँट दिया।

टॉफी चूसते-चूसते सभी बच्चे फिर अपनी-अपनी दुनिया में खो गए। जीवन में कुछ अच्छा कर सकने की खुशी पत्रकार मित्र की आँखों में साफ देखी जा सकती थी।

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