कहानी: कलेक्टर दीदी

विजय कुमार संदेश

प्राध्यापक, पी.जी. हिन्दी विभाग, मार्खम कॉलेज, हजारीबाग, झारखंड,भारत
दूरभाष: +91-943 019 3804
ईमेल: sandesh.vijay@gmail.com

शहर के उत्तर-पूर्वी छोर पर क्रमवार एक साथ जुड़े तीन छोटे-बड़े झील और झील से पूर्व-दक्षिण की ओर एक सीधी सड़क गयी है, जो एक पहाड़ी के चारो ओर घूमती हुई अंततः मुख्य पथ में मिल जाती है। शीत हो, गर्मी हो या हो बारिश, यहां हर मौसम में सुबह-शाम घूमनेवालों की अच्छी भीड़ झील के चतुर्दिक और झील से थोड़ी दूरी पर पहाड़ी के आस-पास जमा हो जाती है। अहले सुबह ही अखबार बेचनेवाले हॉकर यहाँ आ जाते हैं। सैकड़ों बूढ़े-बुजुर्ग और युवाओं की टोली झील किनारे लगे बेंचों पर बैठकर अखबार पढ़ते और समाचार शेयर करते हैं। आज सुबह जिसने भी यह समाचार पढ़ा या सुना वही इलाके के लब्धप्रतिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता सुदर्शन लाल जी के घर की ओर दौड़ पड़ा। आज के प्रायः सभी समाचार पत्रों के मुख्य पृष्ठ के हेड लाईन में यह खबर बड़े-बड़े अक्षरों में छपी थी कि ‘पारिवारिक दायित्वों का निर्वहन करती हुई एक बेटी जिलाधिकारी बनी।’ सुदर्शन लाल, उनका परिवार और गाँव के लोग खुश थे कि उनके गाँव की पुत्रवधू ने यह गौरव प्राप्त किया है। सुदर्शन लाल जी का गाँव शहर की सीमा-रेखा पर बसा हुआ था, जिसमें गाँव और शहर दोनों की खूबियां थीं। बड़े-बूढ़े, स्त्री-पुरुष, युवा सभी सुदर्शन लाल जी की पुत्रवधू रितु यानी ऋतुपर्णा को अपने-अपने तरीके से बधाई और शुभकामनाएँ दे रहे थे। सुदर्शन लाल जी की आत्मिक खुशी इस तरह थी कि वे यह कहते अघाते नहीं थे कि रितु मेरी पुत्रवधू कम और बेटी अधिक है। इसने एक साथ दो कुलों का मान रखा है, गौरव बढ़ाया है। सच तो यह है कि जैसे समुद्र में डूबते हुए जहाज को कोई कप्तान अपनी सूझ-बूझ से बचा लेता है, कुछ उसी तरह रितु ने भी विपरीत परिस्थितियों का सामना करते हुए घर को सम्हाल लिया था। पति शिरीष तो उसका आभारी है ही, यदि रितु नहीं होती तो उसका सारा जीवन बोझ बन गया होता। अपने अल्पवय में ही रितु ने एक सच्चे जीवन-साथी का फर्ज अदा किया और गाँव ही नहीं पूरे शहर के लिए आदर्श बन गयी।

सुबह के आठ बजते-बजते ही शहर के मीडियाकर्मी और कुछ शासन-प्रशासन के लोग आने लगे। मीडियाकर्मी घुमा-फिराकर एक ही प्रश्न पूछ रहे थे- ‘आपको ये सफलता कैसे मिली?’ सभी आश्चर्यचकित थे कि न कोई कोचिंग और न ही किसी संस्थान से विधिवत अध्ययन। फिर भी, यह सफलता अपने आप में बेमिसाल और चकित करने वाली थी। रितु को यह सफलता उसके पहले ही प्रयास में मिली थी और उसका चयन प्रशासन के क्षेत्र में हुआ था।

मीडियाकर्मियों का प्रश्न था-
आप अपनी सफलता का श्रेय किसे देना चाहेंगी?

रितु ने बड़े सहज भाव से उत्तर दिया-
पिता समान ससुर जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में जीना सिखाया।
माँ-बाबूजी जिन्होंने बचपन से संघर्ष करना सिखाया। 
पति जिनके हौसले ने मुझे मजबूती दी।
और, सबसे अधिक अपने उन दो छोटे-छोटे बच्चों को, जिनका समय छीनकर मैंने ये तैयारी की।
मैं इन सभी लोगों के द्वारा दिये गये सकारात्मक सहयोग को ताउम्र नहीं भूल पाऊँगी।

अंत में यह भी पूछा गया कि एक जिलाधिकारी के रूप में आपका लक्ष्य क्या होगा और भविष्य में जो छात्र इस परीक्षा में शामिल होंगे उनके लिए आपका क्या संदेश होगा?

रितु ने संक्षिप्त-सा उत्तर दिया। 
मैं कर्म पर विश्वास करती हूँ। समय और परिस्थितियाँ व्यक्ति के दो बड़े गुरु हैं, जिनसे वह हर क्षण कुछ न कुछ सीखता रहता है। जहाँ भी मेरी पोस्टिंग होगी मेरी कोशिश होगी कि पूरे क्षेत्र में अमन-चैन बनी रहे। नियम-कानून से व्यवस्था कायम रहे। कानून और शांति व्यवस्था मेरी पहली प्राथमिकता होगी। जहाँ तक भविष्य के छात्रों के लिए आपने पूछा है तो मैं यही कहूँगी कि सफलता का कोई शॉर्ट-कट नहीं होता। विषय पर फोकस, सतत अध्ययन और मनन जरूरी है।

रितु के आत्मसंयम और विश्वास से सभी हत्प्रभ थे यह सोचकर कि जिन परिस्थितियों में पहाड़ सदृश चुनौतियों को आसन्न देखकर आदमी घबरा जाता है, रितु ने आसानी से उसका सामना किया और सफल हुई। महीना बीतते-बीतते रितु को नियुक्ति-पत्र मिला और उसे झारखण्ड कैडर मिला। योगदान करते ही पहली चुनौती सामने आ गयी। जिस शहर में उसकी प्रतिनियुक्ति हुई थी- कई कारणों से यहां पहले से ही अनेक चुनौतियाँ थीं। जंगलों-पहाड़ों से घिरे उस जिले में नक्सलवाद का प्रभाव तो था ही, असामाजिक तत्व भी पूरे जिले को संवेदनशील बनाये हुए थे। उनके वर्चस्व को तोड़ना आवश्यक था। स्थानीय छोटे-बड़े राजनीतिज्ञों द्वारा इन तत्वों का हथियार के रूप में उपयोग आम बात थी। ‘सिर मुड़ाते ही ओले पड़े’ जैसी कहावत ने रितु के योगदान के साथ ही उसका दामन थाम लिया था। कार्यभार सम्हाले हुए अभी महीने भर ही बीते थे कि एक दुर्घटना में उसके दायें पांव के घुटने के नीचे की हड्डी फ्रैक्चर कर गयी, उस पर प्लास्टर चढ़ गया। इसी बीच संसदीय चुनाव की घोषणा हो गयी। चुनावी राजनीति के घाघ और माहिर राजनीतिज्ञों ने राजनीतिक दांव-पेंच, अपने-अपने हित को ध्यान में रखकर जाति-संप्रदाय, अगड़ा-पिछड़ा का रंग देना शुरु कर दिया। इस कारण उसके संसदीय क्षेत्र में नगर हो या दूर देहात या हों जंगल बीच बसे गाँव संवेदनशील हो गये। ऋतु ने इसे चुनौती के रूप में लिया और शांतिपूर्ण मतदान के लिए कमर कस कर खड़ी हो गयी। अधिकारियों-पुलिसकर्मियों के साथ रात-दिन बैठकों का दौर चला। उसने जिलाधिकारी के रूप में स्पष्ट घोषणा की कि जिस क्षेत्र में किसी भी तरह की अशोभनीय घटनाएँ होंगी, उस क्षेत्र विशेष में तैनात अधिकारी-पुलिसकर्मी ही दोषी होंगे और उन्हें किसी भी स्थिति में बख्शा नहीं जायेगा, विधिसममत कानूनी कार्रवाई की जायेगी। रितु के सूझ-बूझ और अधिकारियों-कर्मचारियों की रात-दिन की कड़ी मेहनत से मतदान अंततः शांतिपूर्वक संपन्न हो गया। शांतिपूर्ण मतदान के लिए उसने अपने अधिकारियों-कर्मचारियों सहित संसदीय क्षेत्र की जनता के प्रति आभार जताया। मतदान के कुछ दिनों के बाद ही दो संप्रदायों के दो बड़े त्योहार सामने थे। इन त्योहारों के साथ ही अफवाहों का बाजार भी गर्म था। रितु के लिए यह भी कई चुनौतियों में से एक बड़ी चुनौती थी। आम आदमी के अमन-चैन के लिए रितु ने अपने सुरक्षाकर्मियों के साथ पूरे शहर का ‘फ्लैग मार्च’ किया। यह ‘फ्लैग मार्च’ एक इमर्जेंसी प्रशासनिक कार्यक्रम होता है और यह कार्यक्रम उस समय आवश्यक होता है जब किसी कारण से क्षेत्र विशेष में लॉ एण्ड ऑर्डर बिगड़ने का अंदेशा होता है तथा उसके प्रभावस्वरूप जनजीवन अस्त-व्यस्त होने का खतरा होता है। क्षेत्र में परिस्थितियाँ सामान्य रहे, इसलिये प्रशासनिक दृष्टि से यह कदम उठाया जाता है। इसी के साथ ही उसने शहर के गणमान्य लोगों की आपात बैठक बुलाई और शहर में अमन-चैन किस तरह कायम रहे, इस पर विचार किया। असामाजिक तत्वों को कड़ी चेतावनी दी गयी। साथ ही, शहर के लोगों से अपील भी कि वे शहर में अमन-चैन बनाये रखने के लिए प्रशासन का सहयोग करें। रितु के इन प्रयासों और पहल से गर्म अफवाहों पर विराम लगा और दोनों पर्व-त्योहार शांतिपूर्वक गुजर गए। शासन-प्रशासन से लेकर आम आदमी तक ने रितु के इन कदमों की भूरी-भूरी प्रशंसा की। इन सबके अतिरिक्त रितु ने समाज की बेहतरी के लिए सामाजिक कुरीतियों की ओर ध्यान देना शुरु किया। उसने हर सप्ताह आम आदमी की कठिनाइयों को जानने-समझने और उसे दूर करने के लिए जन शिकायत कोषांग, जन सुविधा केन्द्र का गठन करते हुए ‘जन संवाद, जनता दरबार’ जैसे कार्यक्रम शुरु किये। आम आदमी में इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ा। ‘जनता दरबार’ में उसने छोटे-मोटे लड़ाई-झगड़ों से लेकर स्त्री-पुरुष के दांपत्य-संबंधों में आये दरारों को भी पाटने का भरपूर प्रयास किया। अधिकांश मामलों में वह सफल भी हुई। कई उजड़े हुए घर फिर से बस गये। इन कुछ सफल अभियानों से वह इतनी लोकप्रिय हुई कि कलेक्टर साहिबा से आम आदमी की जुबान में कलेक्टर दीदी बन गयी। पूरे शहर-अंचल में लोग अब उसे कलेक्टर दीदी के नाम से ही जानने लगे। चाहे वे युवा हों या वृद्ध, स्त्री हो या पुरुष कलेक्टर दीदी ही कहने लगे।

कुछ महीनों के बाद ही रितु का तबादला आदिवासी बहुल क्षेत्र में हो गया। उसके तबादले से सारा शहर जैसे मौन हो गया। प्रशासनिक स्तर पर अधिकारियों के तबादले तो होते ही रहते हैं। शासन-प्रशासन के लिए यह रूटीन वर्क है। किंतु, कलेक्टर दीदी के अकस्मात् स्थानांतरण से नागरिक खुश नहीं थे। पर, स्थानांतरण तो हो चुका था। अतः नागरिकों ने रितु के सम्मान में उसका ‘नागरिक अभिनन्दन’ किया। यह पहली बार था जब इस शहर में किसी प्रशासनिक अधिकारी का नागरिक अभिनन्दन किया गया था। नागरिक अभिनंदन के दूसरे ही दिन रितु ने अपने स्थानांतरित शहर में जाकर ज्वाईन कर लिया। इस आदिवासी अंचल में भी अबतक उसके द्वारा किये गये सुधारात्मक कार्यों की सुगंध आ चुकी थी। इसलिए गणमान्य नागरिकों ने न केवल भव्य स्वागत किया प्रत्युत् हर कठिनाइयों में साथ रहने का वादा भी किया। रितु आदिवासी बहुल इस अंचल में सुधार और विकास के लिए जिस तत्परता से आगे बढ़ी उसने सिद्ध किया कि जैसे उगता सूर्य पूरे दिन का आभास दे देता है, वैसे ही उसकी प्रतिबद्धता ने उसके मजबूत इरादे और हौसले का संकेत दे दिया। उसके द्वारा किये गये विकास कार्यों और सुधारात्मक कार्यक्रमों की चर्चा घर-घर होने लगी थी। लोगों के लिए वह कलेक्टर दीदी ही नहीं बल्कि युवाओं के लिए रोल-मॉडल बन गयी थी। शायद, इसी कारण अंधविश्वास से जुड़े कई शिकायती आवेदन उसे जन-शिकायत दरबार के दौरान मिले। उसे यह तथ्य मालूम था कि आदिवासी समुदाय में डायन-भूत, ओझा-गुणी जैसी कई कुप्रथाएँ प्रचलित हैं। उसने लोगों को समझाया कि टोना, टोटका, भूत-प्रेत कुछ भी नहीं होता है। दरअसल, जादू-टोने जैसे अंधविश्वास के कारण शिक्षा से दूर अपढ़-निरक्षर लोग संदेह में किसी निरपराध की हत्या तक कर देते हैं। उसने समझाया कि भूत-प्रेत एक वहम है, इससे कोई बीमार नहीं होता। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि लोग बीमार व्यक्ति को चिकित्सक के पास न ले जाकर ओझा-गुणी के पास ले जाते हैं। वैसे बीमार लोगों को रितु स्वयं अस्पताल पहुँचा देती है, जहाँ से स्वस्थ होकर वे घर आते हैं। 

रितु को अपने इन कदमों से जहाँ शांति की अनुभूति होती थी, वहाँ उसकी लोकप्रियता में भी चार-चांद लगते गये और वह सबकी प्यारी कलेक्टर दीदी होती गयी। एक दिन किसी कार्यक्रम में शामिल होने सुदूर घने जंगलों से होती हुई वह जा रही थी तो रास्ते में बालिका स्कूल देखकर रुक गयी और विद्यालय परिसर में प्रवेश कर गयी। बच्चे सस्वर प्रार्थना कर रहे थे। बिना किसी औपचारिकता के उसने प्रधानाध्यापिका और शिक्षिकाओं को अपना परिचय दिया और कहा कि मैं विद्यालय की छात्राओं से मिलना चाहती हूँ। उसने बारी-बारी से सभी कक्षाओं का निरीक्षण किया। कुछ छात्राओं से पूछा और  अपनी ओर से कुछ बताया भी। विद्यालय का अनुशासन और छात्राओं के द्वारा दिये गये उत्तर से वह काफी खुश थी। इसी क्रम में उसने 10वीं कक्षा की एक छात्रा को देखा जो अनुमानतः 16-17 वर्ष की रही होगी। उसके माथे में सिंदूर पुता देखकर उसका माथा ठनका। कानूनन अभी इस छात्रा की उम्र विवाह योग्य नहीं हुई थी। जिज्ञासावश, उसने छात्रा से पूछ लिया कि कम उम्र में तुम्हारी शादी कैसे हो गयी? वह एक संथाली बालिका थी। उस बालिका ने बताया कि उसके समाज में शादियों की सदाय रायवर बापला (विवाह), टुमकि दिपिल बापला, अंगीर बापला, इतुत बापला जैसी कई वैवाहिक प्रथायें प्रचलित हैं। इन वैवाहिक प्रथाओं में कुछ में माता-पिता की सहमति से, कुछ में प्रेम संबंध होने पर शादी की रस्म पूरी की जाती है। किंतु, इतुत बापला में किसी युवक के द्वारा इच्छित कन्या की मांग में जबर्दस्ती सिंदूर पोत दिया जाता है और लड़की को यह रिश्ता स्वीकार करना पड़ता है। "मै’म, मेरा विवाह इसी रीति से हुआ है।" संथाली बालिका की बात सुनकर रितु थोड़ी देर के लिए स्तब्ध और मौन हो गयी। उसकी आँखों के सामने वे दिन याद आ गये, जब वह इंटरमीडियेट की छात्रा थी और अपने ननिहाल गयी हुई थी। स्मृतियों का जो भंवर रितु के मनोमस्तिष्क में इस समय शुरु हुआ, वह उलझता ही चला गया। एक के बाद एक स्मृतियाँ आती गयी। इन स्मृतियों के जाल से वह जितना निकलने की कोशिश करती, उतना ही उसमें उलझ जाती। उसने स्मृतियों के झरोखों से देखा कि किशोर वय की रितु अपने मामा के साथ ननिहाल आयी हुई है। रितु अक्सर गर्मियों की तातील में जब विद्यालय-कॉलेज बंद होता था ननिहाल आ जाया करती थी। उसे ननिहाल का गंवई परिवेश और ननिहाल की हमउम्र लड़कियों के साथ नाना जी की अमराई में खेलना बहुत पसंद था। अमराई में साठ के करीब कतार में आम के पेड़ थे, जिसमें लंगड़ा, हिमसागर, दशहरी, आम्रपाली, बंबई, जरदालू से लेकर किस्म-किस्म के व्यावसायिक और स्थानीय बीजू आम थे। इसी के साथ ही जामुन, महुआ, कटहल, बेर, नींबू, अनार, अमरूद जैसे सदाबहार फलदार पेड़ भी थे। अमराई के एक कोने में गुलाब, गुड़हल, हरसिंगार, रजनीगंधा, चमेली और गेंदे के फूल कतार में लगे हुए थे तो दूसरे कोने में गंभार, शीशम, महोगनी, नीम जैसे काष्ठोपयोगी सैकड़ों पेड़ खड़े थे। रितु को अमराई के इन पेड़-पौधों से गहरा लगाव था। वह आम के टिकोरे तोड़ती और नमक-मिर्च लगाकर बड़े चाव से खाती थी। रितु का घर भी गाँव में ही था पर शहर की सीमा-रेखा पर गाँव होने के कारण उसका गाँव शहर जैसा ही था। आज जिस तरह से गाँव सिमटते जा रहे हैं और शहर बढ़ता जा रहा है, कुछ वैसी ही स्थिति रितु के गाँव की भी थी। एक तरह से उसका गाँव शहर की संस्कृति के मेल में आ गया था। ठेठ गंवई और उसका प्राकृतिक परिवेश उसे अच्छा लगता था। उसे अपना ननिहाल जो बिहार का ठेठ देहात था,जहाँ जाने के लिए बमुश्किल सवारी गाड़ियाँ मिलती थीं। दिनभर में एक-दो ही और सवारी भी इन गाड़ियों का इंतजार करते थे। मुख्य पथ से कोई आठ-दस किलोमीटर दूर कच्चा रास्ता उसके ननिहाल तक जाता था। रितु की माँ उसे बताती थी कि प्रायः वह बैलगाड़ी से ही मुख्य सड़क तक आया-जाया करती थी। उसके मामा या नाना लेने आते थे।

अभी रितु को ननिहाल आये बस दो दिन ही हुए थे। ननिहाल की हमउम्र सहेलियों के साथ वह गाँव के चौराहे पर लगे हाट को देखने आयी थी। यहाँ के बाजार को स्थानीय भाषा में लोग पैंठ, हाट या हटिया कहा करते थे। उसी गाँव में अपने नाना जी के यहाँ शिरीष भी आया हुआ था और अपने ममेरे भाई विपुल के साथ शाक-भाजी खरीद रहा था। दोनों हम उम्र थे, इसलिये उनमें मित्रवत व्यवहार था। हाट के एक मोड़ पर रितु और शिरीष की अकस्मात टक्कर हो गयी। रितु ने शिरीष को देखा और शिरीष ने रितु को, दोनों की आँखें मिली, रितु शर्म से लाल हो गयी और ‘धत्त’ कहकर भाग गयी। शिरीष को रितु का ‘धत्त’ कहना और धत्त कहकर भाग जाना इतना भाया कि उसने विपुल से अनुरोध किया कि वह उसके पीछे-पीछे जाये और उसका पूरा पता लेकर आये। विपुल ने वापस आकर बताया कि वह भी अपने ननिहाल आयी हुई है और उसका नाम ऋतुपर्णा है। प्यार से लोग उसे रितु कहकर पुकारते हैं।

शिरीष बंगलुरू की एक आई॰टी॰ कंपनी में मैनेजर है। वह एम॰बी॰ए॰ और कम्प्यूटर साइंस में एम॰सी॰ए॰ है। अच्छी नौकरी और अच्छे पैकेज पर कार्यरत है। घर का भी सुखी-संपन्न है। शील-स्वभाव से सरल, हँसमुख है। अच्छे संस्कार हैं और अपनी उच्च शिक्षा का अभिमान रंच-मात्र भी नहीं है। उसने अपने नाना जी से अनुरोध किया, अपनी इच्छा जतायी और कहा कि वे रितु के नाना जी से बात करें। एक ही गाँव में रहने के कारण रितु के नाना जी और शिरीष के नाना जी में गहरी आत्मीयता तो थी ही, बीते जमाने के वे सहपाठी भी थे। दोनों परिवारों में बात हुई। किंतु, रितु के कम उम्र का हवाला दिया गया और कहा गया कि अभी तो वह मात्र अट्ठारह वर्ष की ही है। पर, संभ्रांत परिवार और शिरीष के शील-स्वभाव से प्रभावित होकर विवाह के लिए सहमति दे दी गयी। सादगी और आडम्बररहित रस्म अदायगी के साथ शिरीष और रितु परिणय-सूत्र में बंध गये।

शिरीष अपने पिता का एकमात्र पुत्र था और पिता पचहत्तर पार कर चुके थे गोकि, वह अक्सर कहा करते थे कि मर्द और घोड़ा कभी बूढ़े नहीं होते और उसमें एक वाक्य यह भी जोड़ देते कि रेस का घोड़ा इसलिए जीत जाता है कि उसे अपने स्वामी द्वारा दिये गये तकलीफों के कारण दौड़ना पड़ता है। शिरीष के पिता सुदर्शन लाल व्यापारी थे और व्यापार के सिलसिले में उन्हें दौड़ना ही पड़ता था। अपने आत्मबल को बनाये रखने के लिए हमेशा - इस सूक्ति को दुहराते रहते थे कि ‘आदमी को चाहे वह किसी भी पेशे में हो रेस के घोड़े की तरह दौड़ते रहना चाहिए, वरना रेस में पिछड़ने का भय बना रहता है।’ कार्य पूरा हो, वे दम साधकर फिर जुट जाते थे। शिरीष ने पिता की उम्र और भाग-दौड़ देखकर नौकरी से त्याग-पत्र दे दिया था और व्यापार में सहयोग करने लगा था। रितु के लिए ये घड़ी सोने के दिन और चांदी की रातें जैसी थी। ये उसके सुनहरे दिन थे। पढ़ने की लालसा रहने के बावजूद स्थिति ऐसी बन गयी थी कि आगे पढ़ाई करना उसे संभव नहीं दिख रहा था। अधूरी शिक्षा को नियति मानते हुए वह घर-परिवार को संवारने में जुट गयी थी। किंतु, भविष्य कोई नहीं जानता और न ही यह जानता है कि आनेवाला कल कैसा होगा? भविष्य की केवल कल्पना ही की जा सकती है और वर्तमान अच्छा हो तो स्याह भविष्य दूर-दूर तक दिखायी नहीं देता। सुखद वर्तमान और सुनहरे भविष्य की परिकल्पना प्रायः रोमानी होती है। इन्हीं रोमानी परिकल्पनाओं में जीते हुए रितु के जीवन में पाँच वर्ष कैसे बीत गए पता ही नहीं चला। इन पाँच वर्षों के अंतराल में वह शेखर और सुनंदा जैसे दो प्यारे-प्यारे बच्चों की माँ बन गयी।

अभी वह ठीक से भविष्य के बारे में सोच पाती कि एक अनहोनी ने उसके जीवन में जैसे भूचाल ला दिया। शिरीष अपनी दुकान जाते समय एक दुर्घटना का शिकार हो गया। रीढ़ की हड्डी में चोट आयी तो वह महीनों बेड पर रहा। उसके इलाज में धीरे-धीरे घर की सारी जमा पूँजी लग गयी। जो पिता अक्सर कहते थे कि मर्द और घोड़े बूढ़े नहीं होते, परिस्थितियों ने उन्हें भी थका दिया था और बच्चों की पढ़ाई बाधित होने लगी थी। इन विषम परिस्थितियों में रितु ने एक साहस भरा निर्णय लिया। उसने शिरीष से और सुदर्शन लाल जी से निवेदन किया कि वे उसे गाँव के कुछ बच्चों को पढ़ाने की अनुमति दें। साथ ही, वह  अपनी पढ़ाई को भी पूर्ण करना चाहती है। सुदर्शन लाल जी की बूढ़ी पर अनुभवी आँखों ने रितु के साहस और लक्ष्य को चंद क्षणों में ताड़ लिया और अपनी ओर से अनुमति दे दी। पढ़ाई छोड़ चुकी रितु ने घर पर ही गाँव के बच्चों को ट्यूशन देना शुरु किया। समय के साथ दूरस्थ शिक्षा केन्द्र से स्नातक और उसके बाद स्नातकोत्तर भी उसने कर लिया। केन्द्रीय लोक सेवा आयोग की परीक्षा में बैठी। भाग्य और श्रम दोनों ने साथ दिया और अपने पहले ही प्रयास में सफल हो गयी। इन्हीं दिनों उसने शिरीष को देश के बड़े-बड़े चिकित्सकों से भी दिखलाया। उसकी सेवा, लगन और कोशिश से शिरीष में इतना बदलाव अवश्य हुआ कि वह अपनी दुकान में बैठने लायक हो गया और व्यापारिक कार्यों में हिस्सा लेने लगा।

इन तमाम घटनाओं-परिघटनाओं की साक्षी रही रितु ने उन बीते स्याह दिनों को कुछ ही पलों में फिर से जी लिया था। अंततः उस संथाली बालिका ने ही उसे टोका और कहा, "कलेक्टर दीदी!"

रितु जैसे झटके से जाग गयी। उस बालिका से कहा खूब पढ़ो और आगे बढ़ो। बालिका ने फिर कहा, "मै’म, मेरे पति ने और सास-ससुर ने मुझे यह भरोसा दिया है कि मैं जहाँ तक पढूँगी, वे पढ़ायेंगे। इसीलिए आज आपके सामने इस कक्षा में उपस्थित हूँ।" रितु में कुछ ही पलों में सैकड़ों स्मित मुस्कान के भाव उठे। चेहरा खिल उठा। उस अबोध किशोरी संथाली बाला में उसे अनंत संभावनाओं के छिपे बीज दिखे। बच्चों को आशीर्वाद दिया कि वे खूब पढ़ें, खूब बढ़ें और उसके कदम आगे बढ़ गए।


No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।