काव्य: केशव शरण

आदर्श वही हैं

परिदृश्य से
उन्हें हवा कर देना चाहते हैं
वे जो
परिदृश्य के पुष्प-प्राण हैं

जो पाषाण हैं
चाहते हैं
वही रहें स्थापित
और सारा परिदृश्य उनका

ऐसा कैसे हो सकता है
संसार के हर इलाक़े में
फिर हमारा इलाक़ा तो
सदा-से पुष्प-प्राणों से भरा रहा
पाषाण भी रहे यहाँ
शांति और सामंजस्य से

संसार में
ऐसे भी इलाक़े हैं
जहाँ पाषाण-पाषाण पर
खिले हैं पुष्प-प्राण

आदर्श वही हैं
संसार के
***


ग़लत कह गया

रामराज की तरह
सियाराज होता
तो बेग़मपुरा का ख़याल
क्यों आता
संत रविदास को

तुलसीदास चाहते तो
रामायण को बदल सकते थे
राम
सियाराज के संरक्षक होते
जैसे शान्तनु वंश के
भीष्म थे

लेकिन मैं
ग़लत कह गया
संत रविदास
संत तुलसीदास से पहले
हुए हैं
***


चकित दृग

अपने शहर के
पार्कों में
मैंने नहीं देखा कि
कभी ग़ौर से
मुझे देखा हो पेड़ों ने

और यहाँ
मैं देख रहा हूँ कि
सारा जंगल
मुझे ग़ौर से देख रहा है
हर पेड़
हर खग
हर मृग
चकित दृग
जैसे मैं
देख रहा हूँ उनको
***


यह क्या

यह क्या कि
ऊपर देखो तो
महाराजा
प्रतिबिंबित हैं
सूर्य, चन्द्र, तारों-सा
किसी भी आसमानी शिल्प में

और नीचे देखो तो
अपना चेहरा
अपने चेहरे-सी विदीर्ण धरा
जिस पर चलते हुए पाँव अपने कंपित हैं

जग अचंभित
हम चिंतित हैं!
***


बीच पुल के

एक सूखी नदी के ऊपर
एक पुल को पार कर रहा हूँ
और मुझे याद आ रही है
एक कवि की कविता
पुल पार करने से
नदी पार नहीं होती

पुल पर कड़ी धूप है
और मुझे याद आ रहा है
एक शायर का शे'र
तुमको देखा तो ये ख़याल आया
ज़िंदगी धूप तुम घना साया

बीच पुल के
मैं पा रहा हूँ
पुल कुछ ज़्यादा ही लम्बा है
और मैं
ज़िंदगी की इक तरफ़ से
जिंदगी की दूसरी तरफ़
जा रहा हूँ
***


कोई गधा भी

दोस्त
दोस्त का गधा हो गया
दोस्त
दोस्त का धोबी हो गया
हमेशा अपने गंदे कपड़े लादने वाला
लादने वाला ही नहीं
ख़ुद भी लद जाने वाला

अपने गंदे कपड़े लादकर
और ख़ुद लदकर
सोंटा मारता हुआ
गधा-गधा नहीं कहता
दोस्त-दोस्त कहता है

कोई गधा भी
इतना नहीं सहता है!
***


कामना का दीपक

कामना के दीपक को
जलाना भी नहीं पड़ता
स्वतः जल जाता है
कभी बुझता भी नहीं

कैसी भी हवा हो
पानी हो
माटी-पत्थर के नीचे
दबा हो
जगह तालाबंद हो
बुझे न उसकी जोत
भले तेज़ या मंद हो

प्रेम का सौंदर्य
उसी के उजाले में
उद्दीपित होता है
कर्म का सौंदर्य भी

इसकी बस एक कमी दहती है
इससे जीवन में आग बहुत लगती है
***


यही पहले से मालूम होता तो

आकर्षण इतना कि
लाखों मील दूर से खींच लिया
अपनी ओर
लेकिन गुरुत्वाकर्षण बहुत ही कमज़ोर
एक आदमक़द दूरी
हमेशा बनी है
उससे

यही पहले से मालूम होता तो
चाँद-प्रेमी रोता क्यों ?
***


मेरी भाव-तरंगें

मेरी भाव-तरंगें
तमाम चुम्बकीय क्षेत्रों
दीवारों और शिलाओं को
आसानी-से पार कर जाती हैं
लेकिन एक अत्यन्त कोमल मानवी काया को
भेद नहीं पाती हैं
जिसके अंदर एक दिल नामक चीज़ है
लेकिन ये बारहा उधर जाती हैं
यही मेरी हार
यही मेरी खीझ है
***


ग़ज़ब हाल है

इस ज़मीन के अंदर
जड़ों का महाजाल है
लेकिन इसके ऊपर
पीपल है न नीम
महुआ न रसाल है

नदी को निहारती
इस निचाट ज़मीन के ऊपर
अब कंक्रीट के वन का
रोपण होगा
ग़ज़ब हाल है

गाँव का हिस्सा रही यह ज़मीन
अब गाँव नहीं है

हम एक मोटी जड़ पर बैठे हैं
मगर हमारे ऊपर
किसी पेड़ की छाँव नहीं है
***


धरती को चाहिए

धरती की देन हैं पेड़
पेड़ की देन हैं फल

फल का रस-गूदा सारा
मानव के लिए
छिलका पशु के लिए

धरती को चाहिए
सिर्फ़ एक नन्हा बीज
जो उसे
एक चिड़िया के माध्यम से मिले
तो और अच्छा!
***


आदमी, ताड़ और बाँस

ताड़ तना है
तो तना है
बाँस झुका है
तो झुका है

यह इतना साफ़ है
कि ताड़ झुकने पर भी
तना ही मालूम होता है
बाँस के तनने में भी
झुकने का ग्राफ है

आदमी
ताड़ और बाँस
दोनों है
फिर भी कुछ नहीं साफ़ है
कब क्या ग्राफ है!
***

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