सभ्यता के संशयी-दंभ से अभिशप्त किन्नर-समाज पर एक नज़र (साहित्यिक संदर्भ के साथ)

राजेश कुमार यादव

असिस्टेंट प्रोफ़ेसर, महात्मा गांधी पीजी कॉलेज, फतेहपुर, उत्तर प्रदेश।
चलभाष: +91 993 546 7677


शोध-सार:

यद्यपि किन्नर समाज पर अब सार्वजनिक रूप से बोले और लिखे जाने का उपक्रम होने लगा है, पर सदियों तक इस विषय को वर्जित और गोपनीय मानकर इस पर हिक़ारत की नज़र रखने और तमाम अफवाहों और किंवदंतियों से इसे सनसनीखेज और रहस्यमयी बना डालने के कारण अभी भी इसके कुछ एक पहलुओं पर बहुत प्रामाणिक और स्थायी रूप से कुछ कहना मुश्किल ही है। इस विषय पर लिखे गए उपन्यासों और लेखों आदि में भी इस समाज के कुछ एक पहलुओं पर परस्पर विरोधी या अप्रमाणिक बातें देखने को मिल सकती हैं। किन्नरों के सामाजिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर काफी अफवाहें फैली हुई हैं। किन्नर समुदाय में ‘इंटरसेक्स’ और ‘ट्रांसजेंडर’ लोग शामिल होते हैं। दुनिया-भर के तमाम शोधों और वैज्ञानिक प्रयासों के बाद भी किन्नरों की शारीरिक और मनोवैज्ञानिक विशेषताओं के कारणों को पूरी तरह से स्पष्ट नहीं किया जा सका है, इसके लिए लगातार प्रयास ज़ारी हैं, यद्यपि इसमें काफी सफलता अर्जित की जा चुकी है। फिर भी, जो बात स्पष्ट है, वह है किन्नर और किन्नर समाज का अस्तित्व, उनके अस्तित्व को हेय दृष्टि से देखने की लोगों की प्रवृत्ति और इस प्रवृत्ति के चलते सदियों से किन्नर समाज का हो रहा शोषण। इस शोषण के खिलाफ अब आवाज उठने लगी है, यह बात महत्वपूर्ण है। हाशिए पर कर दिए गए इस समाज की बेहतरी के लिए अब लगातार विमर्श की ज़रूरत है। साहित्य के ज़रिए भी अब इस विमर्श को आवाज दी जा रही है। 

कुंजी-शब्द: किन्नर, ट्रांसजेंडर, इंटरसेक्स, थर्ड जेंडर, सेक्स और जेंडर 



1, 
किन्नरों का अपना एक समुदाय होता है, जिसमें वे गुरु-शिष्य की परंपरा में जीवन-निर्वाह करते हैं। इस समुदाय के कुछ अपने रीति-रिवाज, रस्म और नियम कानून होते हैं। सवाल यह है कि इस समुदाय का निर्माण कौन करता है? यह समुदाय आम इंसानों के समाज से अलग और दूर-दूर क्यों रहा है? इन सब सवालों के जवाब इस प्रश्न के जवाब में हैं कि किन्नर होते कौन हैं? दरअसल, किन्नर उन लोगों को कहा जाता है जो न तो स्त्री होते हैं और न ही पुरुष। इनका लिंग (सेक्स) या लिंगीय-भावना (जेंडर) इन दोनों से भिन्न प्रकार के होते हैं । ये मूलतः दो प्रकार के होते हैं—जन्मजात और बाद में पहचाने गए। इन दोनों के लिए अंग्रेजी में दो शब्द हैं, क्रमशः—‘intersex’ और ‘transgender’. किन्नर-समुदाय से संबंधित प्रसिद्ध पुस्तक ‘Neither man Nor woman: the hijras of India’ की लेखिका सेरेना नंदा के अनुसार-“The view of hijras as an alternative gender category is supported by linguistic evidence. The most widely used English translations of the word hijra, which is of Urdu origin, is either ‘eunuch’ or ‘hermaphrodite’ (intersexed).”  अर्थात अंग्रेजी में ‘हिजड़ा’ शब्द के दो बहुप्रयुक्त अनुवाद ‘यूनक’ और ‘हर्माफ्रोडाइट’ (इंटरसेक्स्ड) उनके वैकल्पिक-लिंगी होने के भाषायी प्रमाण हैं। ‘यूनक’ का मतलब लिंगोच्छेद करवाए हुए पुरुष से होता है और ‘हर्माफ्रोडाइट’ या ‘इंटरसेक्स’ का मतलब ऐसे व्यक्ति से है जिसका जन्म के समय से ही लिंग अविकसित होता है या उसमें महिला और पुरुष, दोनों के अधूरे जननांगों का मिश्रण होता है। क्योंकि लेखिका के अनुसार पुरुष रूप में पैदा हुए किन्नर को किन्नर समुदाय में प्रवेश के लिए लिंगोच्छेदन कराना अनिवार्य होता है, अतः उन्होंने जन्म के बाद किन्नर समुदाय को ग्रहण करने वालों के लिए ‘ट्रांसजेंडर’ शब्द का प्रयोग न कर ‘यूनक’ का प्रयोग किया। पर लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी नामक बहुचर्चित किन्नर द्वारा लिखी हुई आत्मकथा ‘मैं हिजड़ा ...मैं लक्ष्मी!’ नामक पुस्तक के अनुसार भारत में हिजड़ों का लिंगोच्छेदन एक अनिवार्य प्रक्रिया न होकर ऐच्छिक है—“कुल मिलाकर, यूनक्स की संकल्पना में लिंगछेद केंद्रीभूत होता है। लेकिन ‘हिजड़ा’ की संकल्पना में वैसा नहीं है। कुछ हिजड़े लिंगछेद ज़रूरी मानते हैं। उसे कराए बिना हिजड़ा पूरा नहीं होते हैं, ऐसा मानते हैं। पर सभी वैसा नहीं मानते। ... इसीलिए यहाँ के हिजड़े ‘यूनक’ नहीं, तो ट्रांसजेंडर हैं, ऐसा माना जाता है।”  मतलब भारतीय संदर्भ में किन्नर या तो इंटरसेक्स होते हैं या ट्रांसजेंडर; यद्यपि वे यूनक भी हो सकते हैं। अर्थात भारत में पुरुष रूप में पैदा हुए किन्नर के लिए किन्नर समुदाय में प्रवेश करने की प्रक्रिया में उसका लिंगोच्छेदन भी एक रस्म है, पर यह अनिवार्य न होकर ऐच्छिक है। अतः बाद में पहचाने जाने वाले किन्नर को, यदि वह लिंगोच्छेदन की प्रक्रिया से नहीं गुजरता है तो, ‘ट्रांसजेंडर’ कहा जा सकता है। किन्नरों के लिए अब यह शब्द बहुत प्रचलित हो गया है। एक तरह से अब ‘ट्रांसजेंडर’ को ही ‘किन्नर’ का पर्याय माना जाने लगा है। सेरेना नंदा ने जब अपनी किताब लिखी थी, उस समय ‘ट्रांसजेंडर’ शब्द इस तरह प्रचलन में नहीं आया था। अतः उन्होंने किन्नर की परिभाषा में अंग्रेजी के ‘इंटरसेक्स’ के साथ ‘ट्रांसजेंडर’ शब्द का संदर्भ न देकर ‘यूनक’ का उल्लेख किया। पर, जैसा कि संकेत किया गया, किन्नरों के लिए ‘यूनक’ होना अनिवार्य नहीं है।

इंटरसेक्स, जैसा कि संकेत किया गया, जन्मजात किन्नर होते हैं। जन्म के समय इनका जननांग अविकसित, अस्पष्ट या मिश्रित होता है, जिसे देखकर यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि पैदा होने वाला बच्चा लड़का है या लड़की! ट्रांसजेंडर उन्हें कहा जाता है जो पैदा तो स्पष्ट जननांग के साथ होते हैं, अर्थात पैदाइश के समय जिनकी पहचान लड़का या लड़की के रूप में की जा सकती है, लेकिन विकास की अवस्था में उनका लड़का या लड़की न होना स्पष्ट होता जाता है। मतलब ये पैदा तो लड़के या लड़की के रूप में ही होते हैं पर इनका ‘लिंग-भाव’ (जेंडर) जन्म के समय निर्धारित लिंग (सेक्स) से मेल नहीं खाता। इस तरह के मामलों में अगर पैदा होने वाला बच्चा लड़का होता है तो उसके अंदर लड़कियों वाली भावनाएँ और विशेषताएँ होती हैं; और यदि वह लड़की होता है तो उसके अंदर लड़कों वाली भावनाएँ और विशेषताएँ होती हैं। अर्थात पैदा होने वाला बच्चा न तो लड़का होता है और न ही लड़की। उसमें दोनों की विशेषताएँ होती हैं या वह दोनों से अलग होता है। ऐसा क्यों होता है, इस पर तमाम शोधों के बाद भी कुछ स्थिर नहीं किया जा सका है; यद्यपि हार्मोनल डिसऑर्डर के चलते ऐसा होता है, यह मान्यता अधिकांशतः प्रकाश में आयी है। विकास की प्रक्रिया में ऐसे बच्चे अपने निर्धारित लिंग से विपरीत आचरण करते हैं—खेलने-कूदने, चलने-फिरने, पहनने-ओढ़ने, हाव-भाव से लेकर सारे क्रिया-कलापों में—समाज इसकी इजाज़त नहीं देता है और वे मानसिक उथल-पुथल का शिकार हो जाते हैं। शरीर पुरुष का, पर भावनाएँ स्त्री की; या शरीर स्त्री का, पर भावनाएँ पुरुष की—ऐसी स्थिति होती है ट्रांसजेंडर की। उनके शरीर में जन्म के समय निर्धारित लिंग के विपरीत लिंग से संबंधित हार्मोन की मात्रा ज्यादा होती है, अतः उसी के अनुकूल उनमें शारीरिक बदलाव भी हो सकते हैं—मसलन पुरुष रूप में जन्मे व्यक्ति के शरीर में स्त्रियोचित और महिलाओं के शरीर में पुरुषोचित लक्षण विकसित हो सकते हैं। शीला डागा की एक पुस्तक है ‘किन्नर गाथा’। इसमें उन्होंने ट्रांसजेंडर के बारे में लिखते हुए जानकारी दी है—“स्टीफन नामक ट्रांसजेंडर ने एक लड़की के रूप में जन्म लिया। बचपन में यह लड़की बीमार चलती रही। किशोरावस्था तक पहुँचते-पहुँचते इस लड़की को कुछ अलग अनुभव होने लगे। इसकी दाढ़ी आ गयी। छाती पर बाल भी थे। लड़कियों की तरफ यौन आकर्षण बढ़ गया।”  जब सामाजिक रोक-टोक, या अपने प्रति व्यंग्य-मज़ाक उन्हें अपने लिंग-भाव के अनुकूल आचरण नहीं करने देते तब तंग आकर वे घर छोड़कर चले जाते हैं। समाज उन्हें अपना घर छोड़ने के लिए मजबूर कर देता है। ऐसी स्थिति में उन्हें पहले से स्थापित किन्नर-समुदाय ही अपने लिए सहारा दिखता है। वे उस समुदाय में प्रवेश कर ‘किन्नर’ बन जाते हैं—‘निर्वाण’ यानी लिंगछेद की ‘रस्म’ से गुजरकर या ऐसे ही। यह बात उल्लेखनीय है कि घर से अक्सर पुरुष रूप में पैदा हुए ट्रांसजेंडर ही भागते हैं, महिला रूप में पैदा हुए ट्रांसजेंडर की घर-परिवार से अक्सर निभ जाती है—“लड़कियों की अपेक्षा लड़कों को अपना स्त्री-लिंगभाव अपनाने और समाज में उसे व्यक्त करने में तकलीफ होती है। टॉमबॉय लड़की को पुरुष का हाव-भाव, पहनावा, बर्ताव समाज में ज्यादा कष्टकर नहीं होता। उल्टे पुरुष सत्ता के दमन से व्यथित औरतों को यह खुशी ही दे जाता है।”  महिलाएँ अक्सर घर से नहीं भागती, इसीलिए समाज में लगभग यह धारणा बनी हुई है कि ‘किन्नर’ पुरुष ही होते हैं। पर ऐसा नहीं है, अगर शारीरिक विशेषताओं को आधार बनाया जाय तो इस रूप में पैदा हुई महिलाओं को भी ‘किन्नरों’ की श्रेणी में रखा जा सकता है।

‘ट्रांसजेंडर’ शब्द यद्यपि एक ‘अंब्रेला टर्म’ है—यह किंचित भिन्न समानधर्मी अर्थों को अपने में समेटे हुए है, पर भारतीय संदर्भ में अब यह ‘किन्नर’ का लगभग पर्याय बन चुका है। ‘इंटरसेक्स’ के रूप में बहुत कम बच्चे पैदा होते हैं और जन्म के बाद यदि संकीर्ण सोच या सामाजिक दबावों के चलते उन्हें किन्नर-समुदाय को नहीं दिया जाता तो बड़े होने पर वह अपना जेंडर निर्धारित कर डॉक्टरी क्रिया द्वारा लिंग में तदनुकूल परिवर्तन कराकर पूर्ण लड़का या लड़की का रूप पा भी सकते हैं। किन्नर-समुदाय में ज्यादातर ‘ट्रांसजेंडर’ वर्ग के लोग ही रहते हैं। और जैसा कि पहले ही कहा गया, ये स्पष्ट जननांग के साथ पैदा होते हैं, पर इनमें यौन-रुझान का, या विपरीत-लिंग के प्रति यौन-रुझान का अभाव रहता है। सेरेना नंदा के अनुसार—“The hijra role and identity appear to be adopted by people whose sexual impotence has a psychological rather than an organic basis, but this, of course, does not make it less real. The concept of a psychologically compelling desire that motivates a man to live as a woman is not well understood in India generally and certainly not among the lower-middle and lower classes from which hijras are generally recruited. This may be part of the reason that hijras say they are ‘born that way’.”  

सेरेना नंदा ने अपनी पुस्तक में किन्नर-समुदाय में प्रवेश के लिए लैंगिक असमर्थता या बच्चा उत्पन्न करने की क्षमता का अभाव अनिवार्य पक्ष माना है। पूर्ण स्त्री और पूर्ण पुरुष में यह क्षमता प्राकृतिक रूप से रहती है इसीलिए किन्नरों को दोनों से अलग माना गया है। ‘किन्नर गाथा’ की लेखिका शीला डागा के अनुसार भी किन्नर बच्चे पैदा करने में असमर्थ होते हैं—“मानव जाति में स्त्री और पुरुष इन दो लिंगों के अतिरिक्त भी एक वर्ग है जो संतान उत्पन्न नहीं कर सकता, यद्यपि उसमें सजीवों के अन्य सभी लक्षण विद्यमान हैं। इस वर्ग के लिए विश्व के भिन्न-भिन्न समुदायों की भाषा में भिन्न-भिन्न शब्दों का प्रयोग मिलता है।”  सेरेना नंदा ने अपनी पुस्तक में ‘हिजड़ा’ के अंग्रेजी अनुवाद ‘यूनक’ और ‘इंटरसेक्स’ नामक शब्दों की तरफ संकेत करने के बाद इस तरफ भी इशारा किया है कि भारतीय संदर्भ में ये शब्द लैंगिक असमर्थता यानी नपुंसकता की तरफ इशारा करने वाले होते हैं—“Both terms, as used in India, connote impotence—an inability to function in the male sexual role—and the word hijra primarily implies a physical defect impairing the male sexual function. ... Impotence is the force behind the word eunuch and hermaphrodite as they are used in India, and impotence is central to the definition of the hijra as not man.”  

ऊपर यह कहा जा चुका है कि ट्रांसजेंडर और किन्नर अब लगभग पर्याय माने जाने लगे हैं, और यह भी कि किन्नर बच्चा पैदा करने में असमर्थ होते हैं। इस संदर्भ में यह स्पष्ट कर देना ज़रूरी है कि दरअसल ट्रांसजेंडर एक ‘अम्ब्रेला टर्म’ है। मतलब ट्रांसजेंडर्स के कई प्रकार होते हैं। उनमें से कभी-कभी कुछ ट्रांसजेंडर काउंसलिंग या हार्मोनल उपचार के द्वारा बच्चे भी पैदा कर सकते हैं—“कभी-कभी ऐसे लड़के का यद्यपि स्त्री के प्रति कोई आकर्षण नहीं होता, लेकिन कुछ हार्मोनल चिकित्सा के द्वारा वह संतान उत्पन्न कर पाता है, क्योंकि उसके जननांग विकसित होते हैं, परंतु उसमें समलैंगिक आकर्षण होता है।”  यद्यपि ऐसे उपचार या काउसिलिंग के पहले वह लड़का ‘ट्रांसजेंडर’ था और उसके बाद भी वह पूर्ण रूप से पुरुष बन ही गया है, यह नहीं कहा जा सकता है; क्योंकि यह मामला यौन-रुझान और ‘जेंडर-आइडेंटिटी’ का है। उसे इन सबके प्रति फिर से अरुचि हो सकती है। इस मामले में यौन रुझान शारीरिकता से ज्यादा मानसिकता का अंग है। अतः इस तरह की मान्यताओं में कि किन्नर-समुदाय में वही व्यक्ति शामिल होता है जो बच्चा पैदा करने में असमर्थ होता है, किंचित बदलाव यह किया जा सकता है कि कुछ हार्मोनल चिकित्सा या काउंसिलिंग के द्वारा जो ट्रांसजेंडर बच्चा पैदा करने में समर्थ भी हो सकते हैं, वे भी अपने लिंग की विपरीत जेंडर भावना और मानसिकता के कारण किन्नर समुदाय का अंग बन जाते हैं—अधिकांशतः तो किन्नर बच्चे पैदा करने में असमर्थ होते ही हैं।  

‘हिजड़ा’ शब्द और उसके दोनों अनुवाद ‘यूनक’ और ‘इंटरसेक्स’ प्रायः पुरुष रूप में जन्मे किन्नरों की तरफ ही संकेत करते हैं। क्योंकि, जैसा कि पहले ही कहा गया, पुरुष रूप में पैदा हुए किन्नर ही घर-परिवार से बाहर जाकर किन्नर-समुदाय का निर्माण करते हैं, अतः यह एक तरह से निश्चित कर दिया गया है कि किन्नर मूलतः पुरुष रूप में पैदा होते हैं—“हिजड़ा पुरुष के रूप में जन्म लेता है। बचपन से पुरुष के रूप में ही बड़ा होता है ... लेकिन मूल रूप से ही उसकी लैंगिकता अलग होती है। बड़ा होते-होते वो स्त्री की भूमिका अपनाने लगता है।”  किन्नर पुरुष ही होता है, अगर किन्नरों को उनके द्वारा निर्मित समुदाय के रूप में देखा जाय तो यह बात सत्य हो सकती है, पर अगर शारीरिक विशेषताओं को केंद्र में रखा जाय तब यह कहा जा सकता है कि स्त्री के रूप में पैदा हुआ और बढ़ा बच्चा भी किन्नर हो सकता है। ऐसी स्त्रियाँ जो स्त्री के रूप में जन्म लेती हैं पर उनकी भावनाएँ पुरुषों की तरह होती हैं, जिनमें पुनरुत्पादन से संबंधित अंगों का विकास न हो पाने के कारण बच्चे पैदा करने की क्षमता नहीं होती, वे भी किन्नर ही होती हैं। पर, क्योंकि अक्सर वे घर-परिवार के साथ रह जाती हैं, अतः ‘सामुदायिक-किन्नरों’ को पुरुष मान लिया जाता है। “शरीर स्त्रियों का और भावनाएँ पुरुषों की, ऐसी भी कुछ औरतें होती हैं। ... लेकिन हमारे समाज में पुरुषों का विद्रोह करना औरतों के मुकाबले आसान होता है। औरतों को बहुत मुश्किल होता है। ... वैसे पुरुषों जैसा होने पर औरतों में कुछ कमी है, ऐसा माना नहीं जाता और ना ही उस वजह से पुरुष ‘हिजड़ों’ के रूप में सामने आते हैं। उतनी खुलकर औरतें नहीं आतीं, आ ही नहीं सकतीं, शायद उन्हें इसकी ज़रूरत नहीं महसूस होती।”  स्त्री के रूप में जन्मी और उसी रूप में बढ़ी संतान भी किन्नर हो सकती है, अगर वह पूरी तरह से औरत नहीं है। इस मान्यता को ‘नीदर मैन नॉर वुमन’ में स्पष्ट किया गया है—“As I suggested, it is the absence of menstruation that is the most important signal that a person who has been assigned to the female sex at birth and raised as a female, is a hijra. This sign—the absence of the onset of a female’s reproductive ability—points to the essential criterion of the feminine gender that hijras themselves make explicit: they do not have female reproductive organs, and because they cannot have children they cannot be considered real women.” 

मतलब ऐसी संतानें जो न तो पुरुष हैं और न ही औरत, भले ही उनमें से अधिकांश ने पुरुष या औरत के रूप में जन्म लिया हो, ‘किन्नर’ होती हैं, यद्यपि कि जब तक ये किन्नर समुदाय के धार्मिक और सांस्कृतिक विधि-विधानों से गुज़रकर उस समुदाय का अंग नहीं बन जातीं तब तक इन्हें ‘इंटरसेक्स’ और ‘ट्रांसजेंडर’ ही कहना उचित है; क्योंकि ‘किन्नर’ अब एक सांस्कृतिक समुदाय के रूप में जाना जाता है जिसकी अपनी कुछ मान्यताएँ और रीति-रिवाज हैं। बावजूद इन सबके इस रूप में पैदा हुए बच्चों या स्त्रियोचित स्वभाव के पुरुषों को समाज में पहले से ही ‘हिजड़ा’ पुकारने की प्रवृत्ति रही है, चाहे वो किन्नर-समाज में गए हुए हों या नहीं। यहाँ तक कि ‘हिजड़ा’ शब्द एक गाली की तरह इस्तेमाल किया जाता है, और तब यह ‘नामर्द’ का अर्थ लिए हुए होता है। हिजड़ा शब्द के इस तरह के प्रयोग की प्रवृत्ति को देखते हुए यह आसानी से समझा जा सकता है कि किन्नरों को पुरुष मानने की समझ कहाँ से विकसित हुई है। फिलहाल पुरुष और महिला दोनों ‘जेंडर’ में फिट न बैठने के कारण ही इन्हें ‘थर्ड जेंडर’ की मान्यता उच्चतम न्यायालय की तरफ से मिली है। भारतीय संदर्भ में अब थर्ड जेंडर, ट्रांसजेंडर और किन्नर लगभग पर्याय के रूप में प्रयोग किए जाते हैं।

स्पष्ट है कि जन्मजात किन्नरों यानी ‘इंटरसेक्स’ के जननांग में स्त्री-पुरुष दोनों के जननांगों का मिश्रण होता है या वे बिलकुल अविकसित होते हैं। ऐसे बच्चे माता-पिता को तत्काल उलझन में डाल देते हैं। इन्हें जल्द ही  किन्नर समुदाय को सौंपकर उलझन से छुटकारा पा लिया जाता है। और अपनी भावना के अनुरूप बाद में किन्नर बनने वाले व्यक्ति यानी ‘ट्रांसजेंडर’ स्पष्ट लिंग के साथ पैदा होते हैं। विकास की अवस्था में उनका किन्नर होना स्पष्ट होता जाता है। इसमें, जैसा कि पहले ही स्पष्ट किया गया है, अक्सर होता ऐसा है कि बच्चे सामान्य लड़के या लड़कियों की तरह पैदा होते हैं पर उनका ‘लिंग-भाव’ इसके विपरीत होता है। समाज में ऐसी संतानें खुद को अपनी भावना के अनुकूल स्थापित नहीं कर पातीं और उन्हें अक्सर घर-परिवार छोड़कर भागने पर मजबूर कर दिया जाता है—विशेषकर लड़कों को। घर से भागकर अक्सर ये लोग किन्नर-समुदाय में प्रवेश कर जाते हैं। मूलतः किन्नरों की दो यही कोटियाँ हैं, यद्यपि दो और कोटियों की तरफ इशारा करते हुए थर्ड जेंडर पर काम करने वाले विद्वान किन्नरों के चार प्रकार मानते हैं—“वैसे हिजड़ों को चार वर्गों में विभक्त किया जाता है—बुचरा, नीलिमा, मनसा और हंसा। वास्तविक हिजड़े तो बुचरा ही होते हैं क्योंकि ये जन्मजात ‘न पुरुष न स्त्री’ होते हैं, नीलिमा किसी कारणवश स्वयं को हिजड़ा बनने के लिए समर्पित कर देते हैं, मनसा तन के स्थान पर मानसिक तौर पर स्वयं को विपरीत लिंग अथवा अक्सर स्त्रीलिंग के अधिक निकट महसूस करते हैं और हंसा शारीरिक कमी यथा नपुंसकता आदि न्यूनताओं के कारण बने हिजड़े होते हैं।”  इन प्रकारों के परिहार के लिए कहा जा सकता है कि जो व्यक्ति अपनी लैंगिक भिन्नता के अलावा किसी और कारण से अपने आपको किन्नर बनने के लिए समर्पित करते हैं, वे किन्नर होते नहीं हैं, बन जाते हैं। इसी तरह के दो और शब्दों की ओर ध्यान दिलाया जाता है—अबुआ और छिबरा। अबुआ नकली किन्नरों, यानी किन्नरों की वेशभूषा धारण कर पैसा वगैरह माँगने वालों को कहा जाता है। छिबरा उन पुरुषों को कहा जाता है जिन्हें पारिवारिक रंजिश आदि के कारण लिंगछेद के द्वारा जबरदस्ती किन्नर बना दिया जाता है।  


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किन्नर मानव-सभ्यता की शुरुआत से ही रहे हैं और उनका इसी तरह समाज-बहिष्करण किया जाता रहा है—ऐसा कोई स्पष्ट प्रमाण तो नहीं है, पर कहा जा सकता है। वैदिक-काल में इनकी उपस्थिति के प्रमाण में ‘सबलोग’ नामक पत्रिका में प्रकाशित विजेंद्र प्रताप सिंह के लेख ‘वैदिक साहित्य और तृतीय लिंगी’ को देखा जा सकता है। उनके अनुसार—“विशेष शारीरिक संरचना, व्यवहार तथा मनोविज्ञान के अनुसार थर्ड जेंडर पर वैदिक साहित्य में उनकी उत्पत्ति के कारण, विविध प्रकार, व्यवहार, समस्याएँ तथा व्यवसाय आदि पर विचार किया गया है।”  रामायण-महाभारत काल में किन्नरों का अस्तित्व होना प्रमाणित ही है। साक्ष्यों के अनुसार कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी इनका उल्लेख है। राजाओं के यहाँ, विशेषतः मुस्लिम शासन-काल में, इनको राजदरबार में नौकरी दी जाती थी। ये बादशाहों की बेगमों की देखरेख के लिए हरमों में तैनात किए जाते थे। ऐसा इसलिए कि उनसे रानियों का कोई अनैतिक संबंध नहीं हो सकता था। पर उस समय भी सभी किन्नर दरबारों में नौकरी ही करते थे, ऐसा नहीं कहा जा सकता। किन्नरों को समाज ने शुरू से ही स्वीकार नहीं किया। उन्हें लगातार अपना अलग समुदाय बनाकर बधाई-आशीर्वाद, भिक्षा-वृत्ति, नाच-गाने तथा अन्य कलाओं के सहारे अपना जीवन-यापन करना पड़ा है। हाँ, रजवाड़ों के समय उन्हें जरूर राजदरबारों में कुछ मान-प्रतिष्ठा मिली थी। बाद के समय में तो उन्हें भिक्षावृत्ति या अन्य कलाओं के सहारे ही पेट पालना पड़ा है। 

रजवाड़ों के समय तक, जैसा कि कहा गया, उन्हें कुछ सम्मानजनक काम मिल जाता था। अंग्रेजों के आने से बाद रजवाड़े ख़त्म हुए। अंग्रेजों का रवैया किन्नर समाज के प्रति बहुत अच्छा नहीं था। अंग्रेजी शासन के बाद देश आजाद हुआ। देश के नागरिकों की उन्नति के लिए तमाम क़ानून बने, व्यवस्थाएँ की गयीं; पर इन नागरिकों की श्रेणी में किन्नर समुदाय को शामिल नहीं किया गया। उनकी तरफ कोई ध्यान ही नहीं दिया गया। आजादी के पचास-साठ वर्षों तक उनकी तरफ ध्यान नहीं दिया गया, उन्हें उपेक्षित रखा गया। बल्कि ये कहें कि एक तरह से उन्हें देश का नागरिक ही नहीं माना गया था। जनगणना में इन्हें पुरुष वर्ग के अंतर्गत शामिल कर लिया जाता था। वोट देने का भी अधिकार इन्हें नहीं था। यह सरकारी उपेक्षा भी एक तरह से इनके समाज-बहिष्करण के लिए ‘स्टिमुलेशन’ का काम करती थी। यही बात समाज-बहिष्करण को लेकर भी कही जा सकती है। सरकारी संस्थाओं में आखिर होते तो समाज के लोग ही हैं! सरकारी संस्थाएँ इन्हें अपनाती नहीं थीं, समाज कैसे अपनाए! फिर लगातार बहिष्कृत होते किन्नरों ने अपना अलग समुदाय विकसित कर लिया। समाज से बहिष्कृत किन्नरों को उनके यहाँ शरण मिल ही जाएगी, यह विश्वास माता-पिता को सामाजिक दबाव के बाद अपनी किन्नर संतान को बहिष्कृत करते समय या उसके खुद घर से निकलते समय एक प्रकार का संतोष प्रदान करता था, या बहिष्करण के छोटे-मोटे ‘स्टिमुलेशन’ प्रदान करता था। कुल मिलाकर किन्नर समुदाय पूरी तरह से उपेक्षित रहा, सामाजिक-संस्थाओं द्वारा भी और सरकारी संस्थाओं द्वारा भी। अपना अलग समुदाय बनाकर ट्रेनों, बसों या अन्य सार्वजनिक स्थानों पर ताली बजाकर भीख माँगना, किसी के यहाँ बच्चे होने पर या शादी-विवाह जैसे समारोहों में बधाई और आशीर्वाद देने के बदले नेग पाना, नाच-गाकर पैसे कमाना इनका पेशा रहा। पेट की आग बुझाने के लिए ये पैसों के लिए पुरुषों के साथ यौनक्रिया भी करते रहे, जिससे इनके बीच एड्स जैसी खतरनाक बीमारी भी फैलती रही। अलग तरह का शरीर होने के कारण उसे लेकर जिस मानसिक उथल-पुथल का शिकार ये होते हैं, यह इनका मानसिक शोषण है; समाज द्वारा बहिष्कृत कर दिया जाना इनका सामाजिक शोषण है और पेट की आग के लिए शरीर का सौदा करना इनका शारीरिक शोषण है। इस तरह से किन्नर समाज लगातार शोषण का शिकार होता रहा है और उसे अपनी नियति मानकर स्वीकार भी करता रहा है—सिर्फ लैंगिक रूप से अलग होने के कारण! सवाल यह उठता है कि क्या यह स्त्री-पुरुष से अलग प्रकार का लैंगिक-अस्तित्व उसका कोई अपराध है जिसके कारण उसका सामाजिक बहिष्करण किया जाता रहा है? क्या इस रूप में जन्म लेना खुद उसके हाथ में है? क्या किसी भी प्राणी के हाथ में यह है कि वह किस रूप में जन्म ले? नहीं! पर समाज की मानसिक और आध्यात्मिक प्रवृत्तियाँ कहीं भी दोषारोपण का मार्ग खोज निकालती हैं। इसी के परिणामस्वरुप किन्नरों को बहिष्करण का सामना करना पड़ता रहा है।

दरअसल काम-भावना, यौनक्रिया तथा इससे संबंधित अंग-प्रत्यंग मानव-समाज के मस्तिष्क पर सनसनीखेज वर्चस्व रखते आए हैं। मानव-समाज उनके वर्चस्व से आक्रांत रहता है, इसीलिए वह सबसे ज्यादा और कड़ा प्रतिबंध काम-भावना और यौनक्रिया पर लगाता आया है। किसी विषय या क्षेत्र पर कड़ी पाबंदी उससे आक्रांति को ही जन्म देती है, यह एक मनोवैज्ञानिक सच है। इस तरह आक्रांति और पाबंदी का अन्योन्याश्रित संबंध है। काम-भावना की खुली अभिव्यक्ति पर समाज ने कड़ा प्रतिबंध लगाया है, समाज में प्रेम इसीलिए सहज स्वीकार नहीं है। ऐसा नहीं है कि समाज काम-भावना या यौनक्रिया से बिलकुल परहेज करता है, बल्कि वह नैतिकता या इसके आवरण के चलते इन सबको गोपनीय मानता है, इन पर उपयोगितावादी नज़रिया मढ़ता है और इन्हें सामाजिक संदर्भों के अंदर ही स्वीकृति प्रदान करता है। सामाजिक संदर्भ का मतलब यहाँ विवाह-पद्धति से है। विवाह स्त्री और पुरुष के मध्य होता है, उन्हीं के बीच काम-भावना और यौनक्रिया को स्वीकृति प्रदान की गयी है। संतानोत्पत्ति द्वारा वंश-वृद्धि इस संबंध की उपयोगिता है। मतलब सामाजिक संदर्भों के अंदर संतानोत्पत्ति इसके हिसाब से काम-भावना या यौनक्रिया की मुख्य उपयोगिता है। इससे परे काम-भावना को समाज लगभग वर्जनीय मानता आया है, चाहे वह स्त्री और पुरुष के बीच ही क्यों न हो! 

किन्नर समुदाय को समाज द्वारा जो बहिष्करण झेलना पड़ा है, उसमें काम-भावना, यौनक्रिया और इससे संबंधित अंगों का मानव-मस्तिष्क पर वर्चस्व और उसी के परिणामस्वरूप इन सबसे उसकी आक्रांति मुख्य भूमिका निभाती है। किन्नरों का लिंग न तो स्त्री का होता है, न पुरुष का। वे संतानोत्पत्ति नहीं कर सकते। अतः वे समाज के ‘सामाजिक-संदर्भ’ में फिट नहीं बैठते।  ऐसी संतानें उन्हें किसी काम की नहीं लगतीं। उनका आगे क्या होगा? कोई उन्हें देखेगा तो क्या कहेगा?—इन यक्ष प्रश्नों और लैंगिक आक्रांति के चलते मानव-मस्तिष्क उन्हें स्वीकार नहीं पाता और उन्हें समाज द्वारा बहिष्कृत कर दिया जाता है। जब किसी के यहाँ ऐसे बच्चे पैदा होते हैं तो वह इस मामले को गोपनीय रखना चाहता है। यह उसके लिए बड़े शर्म की बात हो जाती है कि उसके यहाँ किन्नर पैदा हुआ। इस मामले में धार्मिक प्रवृत्तियाँ भी अहम भूमिका निभाती हैं। भारतीय परिवेश में तो विज्ञान पर धर्म सदैव हावी रहता आया है—खासकर साधारण परिवारों में। अतः जब किन्नर संतान पैदा होती है तो लोग इसके वैज्ञानिक कारणों पर ध्यान नहीं दे पाते या देना नहीं चाहते। उन्हें लगता है कि यह ईश्वरीय लीला है, ईश्वर द्वारा दिया हुआ दंड है, उनके किसी पाप का फल है या बच्चे के पूर्व जन्म के बुरे कर्मों का नतीजा है, आदि-आदि; और फिर वे उससे जल्दी छुटकारा पा लेना चाहते हैं। उसकी खबर किसी को न हो, ऐसा प्रयास करते हैं। समाज की मानसिकता भी ऐसी बना दी गयी है कि अगर किसी को इस बात की खबर हो गई तो यह आग की तरह फैलती है, और लोग चटखारे ले-लेकर खुली कानाफूसी के ज़रिए उस बच्चे या उसके माता-पिता का भूत-भविष्य सब खंगालने लगते हैं, उनका जीना मुहाल कर देते हैं। मतलब इस पर बात खूब की जाती है, इतनी कि इसके लिए लोग लालायित रहते हैं, पर खुलकर नहीं, दबी जुबान से। जाहिर है कि लोगों का मष्तिष्क इस विषय से आक्रांत रहता है।    

जिन विषयों या क्षेत्रों पर जितना ज्यादा प्रतिबंध लगाया जाता है उतनी ही ज्यादा उनके विषय में जिज्ञासा या सनसनी पैदा होती है, उतना ही ज्यादा दिमाग उससे आक्रांत रहता है। उस विषय पर बात-बहस आदि न कर पाने की विवशतावश वह विषय अवचेतन मन में चला जाता है और अवसर पाकर विकृत अवस्था में सामने आता है। यह सब मनोविज्ञान द्वारा प्रमाणित बातें हैं। इसी सिद्धांत को लेकर मनोविश्लेषणवाद चलता है। किन्नर समुदाय से इतना दूर-दूर रहने के कारण, उनकी शारीरिक और मानसिक संरचना को रहस्यमयी बना देने के कारण, उनके विषय में प्रामाणिक जानकारी न होने के कारण किन्नर और किन्नर-समुदाय से व्यक्ति और समाज आक्रांत रहता आया है। आक्रांति के कारण ही किन्नरों के पारिवारिक जीवन पर प्रतिबंध लगाया जाता रहा है। प्रतिबंध फिर इस आक्रांति को और मजबूती प्रदान करता है—इन दोनों में अन्योन्याश्रित संबंध है, यह बात ऊपर कही जा चुकी है। वह समस्या जो सार्वजनिक बहस और बात-चीत से हल हो सकती है, गोपनीय रखने के कारण जटिल समस्या का रूप ले लेती है। लगातार किसी विषय पर बात करके उसकी सामाजिक या मानसिक वर्जना को हल्का या ख़त्म किया जा सकता है—और इस तरह से उससे जुड़ी तमाम समस्याओं को भी। कहना न होगा कि ‘विमर्श’ की असली उपयोगिता इसी से जुड़ी हुई है। 

विमर्श उन्हीं चीज़ों या क्षेत्रों पर लगातार बहस करके अपना अस्तित्व सामने लाता है जिन चीज़ों या क्षेत्रों पर अभी तक बात-चीत करने से बिलकुल बचा जाता था या बात-चीत के लायक नहीं समझा जाता था। गौरतलब है कि ऐसे विषयों या क्षेत्रों पर सामाजिक-प्रतिबंध लगाकर ही सदियों से उन्हें बहिष्कृत या उपेक्षित रखा गया। जब ऐसे उपेक्षित या बहिष्कृत विषयों या क्षेत्रों को उबारने के लिए उन पर लगातार बहस या बात-चीत होने लगी तब विमर्शों का जन्म हुआ। स्पष्ट है कि विमर्श अपने आप में संघर्षशील प्रकृति का होता है। संघर्ष इसे इसलिए करना पड़ता है कि जिन विषयों को वर्जित मानने की परंपरा बना दी जाती है यह उन्हीं विषयों को बात-चीत और बहस का मुद्दा बनाता है। इन्हें बहस का मुद्दा बनाने का मतलब परंपरा को तोड़ने की कोशिश करना है, और परंपरा तोड़ने के लिए संघर्ष की आवश्यकता तो होती ही है!   

किन्नर समाज भी लगातार उपेक्षा का ही विषय रहा है। उनकी समस्याओं, अधिकारों आदि पर कभी बात करने की ज़रूरत नहीं समझी गयी। जब विमर्शों का समय आया तब हाशियागत समाज को केंद्र में लाने की मुहिम चली। इस मुहिम में स्वयं हाशियागत समाजों का रोल अहम रहा है। कहावत है कि ईश्वर उन्हीं लोगों की मदद करता है जो अपनी मदद आप करते हैं—यानी कर्म करते हैं। यह बात विमर्शकारों के विषय में भी खूब लागू होती है—दूसरे, सामाजिक कार्यकर्ता या संगठन आदि, आपका साथ तभी देंगे जब आप खुद अपने समाज की आवाज को बुलंद करेंगे। शोषित समाज जब तक अपने शोषण के खिलाफ आवाज नहीं उठाता, वह शोषित होता रहता है। आजादी के बाद भी इतने वर्षों तक किन्नरों के शोषण के पीछे भी यही बात है। उत्तर-आधुनिक समय में शोषितों ने अपने शोषण के खिलाफ जब आवाज उठानी शुरू की तब विमर्शों का युग शुरू हुआ। जैसा कि कहा गया, उत्तर आधुनिक विमर्श हाशिए के समाज को मुख्य धारा में लाने के प्रयास हैं। दलित-विमर्श, स्त्री-विमर्श, आदिवासी-विमर्श आदि इसके उदाहरण हैं। दलितों और स्त्रियों ने अपनी आवाजें कुछ पहले से ही बुलंद करनी शुरू कर दी थीं, अतः इनकी स्थितियों में कुछ सुधार पहले से होने शुरू हो गए थे। आदिवासी समाज ने ज़रूर अपनी आवाज़ कुछ देर बाद उठायी! दरअसल जंगलों में रहने और आम-समाज से दूर रहने के कारण उन्हें शिक्षा आदि से वंचित रहना पड़ा है, और आवाज उठाने में शिक्षा का रोल बड़ा अहम् होता है। अब आदिवासी भी शिक्षित हो रहे हैं और उनमें भी चेतना का विकास हो रहा है। पहले से उनकी आवाज कुछ गैरसरकारी संगठन और गैरआदिवासी सामाजिक-कार्यकर्ता या लेखक उठाते रहे हैं। अब अपनी लड़ाई वे खुद संभालने लगे हैं।
 
भारतीय संदर्भ में आदिवासियों जैसी ही स्थिति किन्नर समाज की भी रही है अपनी अस्मिता की लड़ाई के संदर्भ में। ये भी तथाकथित मुख्य धारा के समाज से अलग-थलग रहे—शिक्षा, व्यवसाय आदि के अधिकार से वंचित। अतः अपनी अस्मिता की आवाज इन्होंने भी काफी देर से उठायी। दरअसल अपने समुदाय के आंदोलन का वैश्विक संदर्भ पाकर इन्होंने अपनी अस्मिता के लिए आवाज उठानी शुरू की। वैश्विक संदर्भ में इन्हें ‘ट्रांसजेंडर’ वर्ग के अंतर्गत रखा जाता है। भारतीय आध्यात्मिक-परिवेश से अलग कुछ भौतिकतावादी देशों के ट्रांसजेंडर्स ने अपने शरीर के इतिहास और भूगोल को समझने-समझाने का लगातार प्रयास किया। अपने  समुदाय के लोगों के लिए कार्य करना शुरू किया। आंदोलन के स्तर पर अक्सर इनके साथ समलैंगिक लोग भी खड़े हुए, तब पूरे समूह को एलजीबीटी समुदाय कहा गया। तमाम गैरसरकारी संगठनों का विकास इस समुदाय ने खुद किया, एचआइवी एड्स जागरूकता संबंधी कुछ संगठनों ने भी इनकी सुरक्षा की आवाज बुलंद की। भारत में लगभग नब्बे के दशक के मध्य  से इस समुदाय ने अपने अधिकारों के लिए संघर्ष की पहल की। संघर्षों के परिणामस्वरूप भारतीय संविधान की धारा 377, जो समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी में रखती थी, को संशोधित कर दिया गया। अब आपसी सहमति से बनाया हुआ समलैंगिक संबंध अपराध की श्रेणी में नहीं आता। ‘ट्रांसजेंडर’ समुदाय को उच्चतम न्यायालय ने ‘थर्ड जेंडर’ की मान्यता देते हुए इन्हें आम नागरिकों की तरह समस्त कानूनी अधिकार दिए जाने का निर्देश केंद्र और राज्य सरकारों को दिया है। ‘किन्नर समुदाय’ को अब यहाँ भी ‘ट्रांसजेंडर’ वर्ग के अंतर्गत रखा जाता है। कुछ संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और इनके खुद जागरूक होकर आवाज उठाने के फलस्वरूप अब धीरे-धीरे किन्नर-विमर्श अपना आकार ले रहा है—सामाजिक और साहित्यिक दोनों स्तरों पर।  

‘सामयिक सरस्वती’ पत्रिका के अप्रैल-सितंबर 2018 के थर्ड जेंडर विशेषांक का संपादन; ‘जनकृति पत्रिका’ के अगस्त 2016 के किन्नर-विशेषांक में ‘थर्ड जेंडर विमर्श’ नामक लेख  और बाद में इसी शीर्षक से एक स्वतंत्र पुस्तक का लेखन करने वाली स्त्री-विमर्श और किन्नर-विमर्श विशेषज्ञ लेखिका शरद सिंह के अनुसार किन्नर विमर्श की शुरुआत उन्हीं के प्रयासों से हुई है। जनकृति वाले अपने लेख में ‘थर्ड जेंडर विमर्श की घोषणा’ नामक उपशीर्षक के अंतर्गत उन्होंने लिखा—“23-24 जुलाई 2016 को हिंदी, भवन, भोपाल में आयोजित दो दिवसीय 23 वीं पावस व्याख्यानमाला में ‘समकालीन उपन्यासों में थर्ड जेंडर की सामाजिक उपस्थिति’ विषय पर अपना व्याख्यान देते हुए मैंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ‘इस मंच से थर्ड जेंडर विमर्श को आरंभ किए जाने की मैं घोषणा करती हूँ।’ वहाँ उपस्थित बुद्धिजीवियों ने मेरी इस घोषणा का स्वागत किया।”  किन्नरों के विषय में इससे पहले ही प्रकाशित अनेक कृतियों के आलोक में यह कहा जा सकता है कि यद्यपि लेखिका के इस तरह के आत्म-प्रकाशकीय कथन में आत्म-श्रेय लेने का भाव महसूस किया जा सकता है, पर किन्नर आधारित साहित्यिक-विमर्श में उसके शुरुआती और महत्वपूर्ण योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। 

पहले कहा गया कि विमर्श की प्रकृति संघर्षशीलता की होती है। अब इसमें यह भी जोड़ दिया जाय कि इस संघर्ष की प्रकृति अस्मितापरक होती है। इसमें अतीत से हो रहे किसी वर्ग के शोषण और उसके कारणों आदि का हवाला और प्रमाण देते हुए अब उसके अधिकारों की बात की जाती है, उसके अधिकारों के समर्थन में सभाओं और गोष्ठियों में वक्तव्य दिए जाते हैं, पत्र-पत्रिकाओं में लेख आदि लिखे जाते हैं, स्वतंत्र पुस्तकें लिखी जाती हैं; उसके इतिहास, उसके शोषण, उसकी समस्याओं, उसके संघर्ष और उसके अधिकार आदि को साहित्यिक अभिव्यक्ति प्रदान की जाती है। साहित्य विमर्श को आगे बढ़ाने का बड़ा मज़बूत माध्यम है। सभी उत्तर-आधुनिक विमर्शों को साहित्य ने आधार प्रदान किया है। किन्नर-समाज पर भी अब विमर्शपरक साहित्य रचा जाने लगा है—यानी किन्नरों के साजाजिक इतिहास, उनकी समस्याओं और उनके अधिकारों को अब साहित्य भी उठाने लगा है। उपन्यास विधा सामाजिक समस्याओं को विमर्श के जरिए उठाने का सशक्त माध्यम रही है। इनकी समस्याओं को विमर्श रूप में उठाने की शुरुआत भी उपन्यासों के माध्यम से ही हुई। यमदीप: नीरजा माधव (2002), तीसरी ताली: प्रदीप सौरभ (2011), किन्नर कथा: महेंद्र भीष्म (2011), गुलाम मंडी: निर्मला भुराड़िया (2014), मैं पायल...: महेंद्र भीष्म (2016), पोस्ट बॉक्स नं. 203 नाला सोपारा: चित्रा मुद्गल (2016), जिंदगी 50-50: भगवंत अनमोल (2017), दरमियाना: सुभाष अखिल (2018) आदि उपन्यासों में किन्नरों की समस्याओं को विभिन्न दृष्टिकोणों से वाणी प्रदान की गई है। 


                                                                     3. 
यहाँ से अब ‘यमदीप’ और ‘तीसरी ताली’ नामक उपन्यासों तथा लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी नामक प्रसिद्ध किन्नर की आत्मकथा ‘मैं हिजड़ा ... मैं लक्ष्मी !’ जोकि 2012 ई० में मूल रूप से मराठी में प्रकाशित हुई थी, के माध्यम से किन्नर समाज की विशेषताओं, समस्याओं और संघर्षों को समझने का उपक्रम होगा। यह उपक्रम समीक्षात्मक की अपेक्षा परिचयात्मक प्रवृत्ति का अधिक होगा। विमर्श के स्तर पर सबसे पहले नीरजा माधव ने अपने उपन्यास ‘यमदीप’ में  किन्नरों की समस्या को उठाया। इसका प्रकाशन 2002 ई० में हुआ। उपन्यास में क्योंकि पहली बार किन्नरों की समस्याओं को आधार बनाया जा रहा था अतः भूमिका में सचेत रूप से दलित-विमर्श, स्त्री-विमर्श आदि में साहित्य की भूमिका को याद किया गया है—इस संकेत के साथ कि अब किन्नरों की समस्याओं पर भी लेखनी चले—“निःसंदेह बहुत कुछ लिखा गया है अब तक और लिखा जाएगा। लाखों लोगों और वैश्विक स्तर पर करोड़ों से ऊपर के लोगों  का सत्य है यह। पर यह भी सत्य है कि कभी स्त्री-विमर्श, दलित-विमर्श, या सगुण-निर्गुण-धारा या छायावाद, प्रयोगवाद की तरह कोई पृथक साहित्यिक-राजनीतिक धारा इनके (किन्नर के) लिए न तो विकसित हुई, न इसकी आवश्यकता ही महसूस की गई। कारण स्पष्ट है—समाज में संख्या और महत्व के आधार पर न्यूनता; साथ ही शोषण और अत्याचार के हर मानवीय आक्रमण से परे हास-परिहास का विषय मात्र होना।”  और, अध्ययन के क्रम में, पूरे उपन्यास में से यह संकेत उभर सकता है कि इस कार्य की पहल स्त्रियाँ ही करें—एक शोषित दूसरे शोषित के दर्द का एहसास ज्यादा प्रामाणिक तरीके से कर सकता है। उपन्यास में किन्नरों की समस्याओं और संघर्षों के साथ-साथ महिलाओं की समस्याओं और संघर्षों को भी उभारा गया है—दो मुख्य कथाओं के माध्यम से। कथाएँ आपस में मिलती हैं—जीवन के संघर्ष में किन्नर का साथ स्त्री देती हुई दिखायी देती है और स्त्री का साथ देता हुआ किन्नर। उपन्यास का अंत भी दोनों के संघर्षों में धार आने की आशा की किरण के साथ किया गया है। मानवी द्वारा नाज़ बीबी को भ्रष्ट नेता मन्ना बाबू के खिलाफ चुनाव लड़ने की हिदायत देने पर नाज़ बीबी का यह कथन इसका संकेत है –“जैसा कहोगी, मेम साहब, वैसा ही होगा। जो भी काम होगा मैं जनता की भलाई के लिए करूँगी, क्योंकि अपने तो आगे-पीछे कोई नहीं है जिसके लिए दूसरे की रोटियाँ छीनूँगी और अपना घर भरूँगी। ज़रुरत पड़ी तो भ्रष्ट लोगों के खिलाफ हथियार भी उठाऊँगी। हर गंदगी को जड़ से साफ़ कर दूँगी। दुनिया में शांति रहे, और क्या चाहिए किसी को? बस, मेम साहब, मुझे आप अपनी तरह थोड़ी बुद्धि और कलम की ताकत भी थमा दीजिए। सहारा दिए रहिए, फिर देखिए...”  नाज़ बीबी (किन्नर) और मानवी (स्त्री) इस उपन्यास की नायिकाएँ हैं। इन्हीं के संघर्षों की गाथा है यह उपन्यास।

इस उपन्यास में यह मान्यता कि ‘किन्नर पुरुष रूप में पैदा होते हैं’ टूटी हुई है। उपन्यास की नायिका ‘नाज बीबी’ दरअसल लड़की रूप में पैदा हुई थी—नाम था नंदरानी। बड़ी होने के क्रम में उसमें किन्नरों के लक्षण प्रकट होने लगे और उसे अंततः किन्नर-समुदाय के हवाले कर दिया गया। किन्नरों की समस्याओं और संघर्षों के साथ उनकी मानवीय संवेदनाओं को स्त्री-पुरुषों की कठोरता के बरअक्स उभारना इस उपन्यास के केंद्र में है। सड़क पर लावारिश अवस्था में प्रसव-पीड़ा से बेहाल एक पागल स्त्री की मदद के लिए आगे आना और जन्म देकर उसके स्वर्ग सिधार जाने पर जन्मी बच्ची के पालन-पोषण की चिंता किन्नर समाज की संवेदना को उभारने वाला है जो पागल स्त्री को भी अपनी वासना का शिकार बनाकर गर्भवती बना देने वाले पुरुष-समाज की कुत्सित जघन्यता और प्रसव-पीड़ा में तड़पती उस स्त्री की मदद के लिए आगे न आने वाले स्त्री-समाज की कठोरता और संवेदनहीनता के परिप्रक्ष्य में और ज्यादा उजागर हो जाता है। जन्मी बच्ची को पालने के लिए किसी का आगे न आना स्त्री-पुरुषों की दुनिया से सभ्यता का नक़ाब हटाने वाला है। नाज़ बीबी उस बच्ची का पालन-पोषण करती है और उसे नाम देती है—‘सोना’। इस बच्ची के पालने-पोषने, पढ़ाने और उसे अपने साथ रख पाने की जद्दोजहद आदि के क्रम में ही नाज़ बीबी की संवेदना, समस्या और संघर्ष उभरते जाते हैं—और इस क्रम में किन्नर समुदाय के भी। दूसरी तरफ ‘मानवी’ के संघर्ष के माध्यम से स्त्री-सशक्तिकरण की ललक भी उपन्यास में प्रमुखता से स्थान बनाए हुए है। स्त्री-सशक्तिकरण की ज़मीन सहयोगी पुरुषों के सह-अस्तित्व के स्वीकार के साथ तैयार करने का उपक्रम है इसमें; और इस उपक्रम को उभारा गया है जिलाधिकारी ‘आनंद कुमार’ द्वारा मानवी के प्रति सहयोग और प्रेम की भावना से। नाज़ बीबी के संघर्ष में मानवी और मानवी के संघर्ष में आनंद कुमार का सहयोग जीवन-संघर्ष में सह-अस्तित्व की श्रृंखला का निर्माण करते हैं। यों, उपन्यास में संघर्ष को सह-अस्तित्व के ज़रिए सफलता के बिंदु तक पहुँचाने का भाव सभी जगह परिलक्षित किया जा सकता है। संघर्ष में सह-अस्तित्व की महत्ता को उपन्यास की भूमिका में हाशियागत-समाज को ऊपर उठाने में सरकारी तथा गैर-सरकारी संगठनों के सहयोगी योगदान के महत्व के माध्यम से रेखांकित किया गया है, जिसे फिर ‘सामयिक-सरस्वती’ नामक पत्रिका के थर्ड जेंडर विशेषांक में छपे अपने लेख ‘यमदीप लिखते हुए’ में लेखिका द्वारा दुहराया गया है—“उपन्यास लिखते समय ही इस समुदाय के लोगों का हठ और रहन-सहन का अध्ययन करने के पश्चात मन में एक विचार उठा था कि कुछ आदिवासी जातियों की तरह इन्हें भी विकास के प्रकाश में लाकर समाज की मुख्य धारा से जोड़ने के लिए सरकारी या गैर सरकारी कठिन श्रम की आवश्यकता है। इनमें संवेदना है, शारीरिक शक्ति है। आवश्यकता है उसे जगाने की, उसे राष्ट्रहित में नियोजित करने की।”        

प्रदीप सौरभ का उपन्यास ‘तीसरी ताली’ तृतीय पंथी समुदायों के रीति-रिवाज, रहन-सहन, समस्याओं आदि को केंद्र बनाकर लिखा गया है। इस ‘तीसरी ताली’ में किन्नरों के अलावा ‘गे’ और ‘लेस्बियन’ को भी ‘तृतीय लिंग’ में समेटने का उपक्रम दिखायी देता है—यद्यपि कि इसका कहीं उल्लेख नहीं हुआ है पर उपन्यास के शीर्षक और इसकी विषयवस्तु को लक्षित कर यह बात कही जा रही है। स्त्री-पुरुष की लिंग-पहचान में फिट न बैठने वालों के लिए ‘तृतीय लिंग’ नाम स्वाभाविक हो सकता है, पर यह उल्लेखनीय है कि भारतीय क़ानून में ‘एलजीबीटीक्यू’ समूह में मात्र ‘टी’ यानी ट्रांसजेंडर को ही ‘थर्ड जेंडर’ की मान्यता दी गई है। ‘ट्रांसजेंडर’ का शाब्दिक अर्थ है ‘लिंग से परे’—मतलब स्त्री और पुरुष दोनों लिंगों से परे। जो पहले दोनों लिंगों में नहीं आता है, उसके लिए उच्चतम न्यायालय ने ‘थर्ड जेंडर’ नाम दिया है। ‘थर्ड जेंडर’ और ‘किन्नर’ इस तरह से पर्यायवाची शब्द हैं, यद्यपि वैज्ञानिक शोधों द्वारा इस बात की भी पुष्टि हो चुकी है कि ‘गे’ और ‘लेस्बियन’ शौकिया तौर पर नहीं, आंतरिक ज़रूरतों के चलते ‘समलैंगिक’ होते हैं। फिर भी ‘गे’ और ‘लेस्बियन’ का लिंग पुरुष और स्त्री के रूप में पहचाना जा सकता है, अतः इन्हें ‘थर्ड जेंडर’ की परिधि से बाहर रखा गया है—यद्यपि कि अपने अधिकारों के लिए आंदोलन के स्तर पर ‘एलजीबीटीक्यू’ पूरा समुदाय प्रायः एक साथ सक्रिय रहता है। और, जैसा कि पहले ही संकेत किया गया, भारतीय संविधान की धारा 377—जो ग़ैर–प्राकृतिक शारीरिक संबंधों को आपराधिक कृत्य मानती थी—में संशोधन इस समुदाय की बड़ी जीत है। ग़ैर-प्राकृतिक शारीरिक संबंधों का दायरा समलैंगिक संबंधों तक जाता था। संशोधित क़ानून में सहमति से बनाए हुए समलैंगिक संबंध अपराध की कोटि से बाहर हैं।  

‘तीसरी ताली’ की  कथावस्तु मुख्यतः दिल्ली से संबंधित है, यद्यपि इसमें भारत देश के अधिकांश राज्यों की परिधि को समेटने का उपक्रम हुआ है। उपक्रम की प्रक्रिया में दिल्ली के किन्नर अन्य राज्यों की यात्रा करते हैं, या अन्य राज्यों के किन्नर दिल्ली की; या फिर किन्नर समुदाय में शामिल होने के लिए नए किन्नर दिल्ली आते हैं, या कुछ एक व्यक्ति काम की तलाश में दिल्ली आकर किन्नर के हाथ पड़ते हैं। इधर-उधर के किन्नरों को एक दूसरे से जुड़ा हुआ दिखाया गया है । यों, मुख्य कथा-स्थल दिल्ली ही रहता है। कॉल-गर्ल माफिया की कहानी, गे और लेस्बियन की कहानी या अन्य छोटी-मोटी कहानियाँ इसकी कथावस्तु को बिखराव देती हैं। यह किसी एक पात्र को लेकर नहीं लिखा गया है और न ही किसी एक समस्या को लेकर। इसकी परिधि में, जैसा कि संकेत किया गया, किन्नर, गे, लेस्बियन, कॉल-गर्ल, यौन-शोषित पुरुष आदि सबकी समस्याओं को समेटने की कोशिश की गयी है। 

उपन्यास के वे पात्र जिनके संघर्ष से इसकी कथावस्तु का ताना-बाना बुना गया है उनमें प्रमुख हैं विनीत (विनीता), मंजू, राजा (रानी), ज्योति और विजय। उपन्यास की संरचना में यह प्रयास भी केंद्र में है कि सामान्य पुरुष और नारी से अलग प्रकृति या प्रवृत्ति रखने वालों को उनकी एक-दूसरे से विभिन्नता के साथ प्रस्तुत किया जाय। अतः इन मुख्य कथा-रचाऊ पात्रों के अलावा भी कुछ पात्र इसमें महत्वपूर्ण हैं, यद्यपि इनकी कहानी प्रसंगवशात कथा में से उद्भूत या कथा से अलग-थलग है। ऐसे पात्रों में निकिता, सुविमल भाई और अनिल, यास्मीन और जुलेखा, सुनयना और पिंकी तथा गोपाल प्रमुख हैं। तीसरी-प्रकृति के रूप में इनकी विविधता इस प्रकार है—विनीत का जन्म लड़के के रूप में होता है, निकिता का जन्म लड़की के रूप में—दोनों ट्रांसजेंडर हैं। मंजू पूर्ण स्त्री के रूप में पैदा होती है और राजा तथा ज्योति पूर्ण पुरुष के रूप में पैदा हुए हैं। मंजू को उसके गरीब माता-पिता किन्नरों के हाथ बेच देते हैं और राजा को उसके एक कथित अपराध के कारण किन्नर समुदाय द्वारा जबरदस्ती किन्नर बना दिया जाता है। ज्योति अपनी कुछ विवशताओं के चलते खुद को किन्नर समुदाय द्वारा किन्नर में परिवर्तित करा लेता है। 

विजय किन्नर है, पर उसने किन्नर समुदाय से अपने आपको नहीं जोड़ा। संघर्ष करके जीवन में अच्छे फोटोग्राफर का मुकाम हासिल किया। सुविमल भाई और अनिल दोनों गे हैं और यास्मीन और जुलेखा दोनों लेस्बियन। कुछ संघर्ष के बाद ये लोग आपस में शादी कर लेते हैं। सुनयना और पिंकी ‘हिजड़ी’ हैं, किन्नर-समुदाय छोड़कर ये दोनों कॉल-गर्ल माफिया रेखा चितकबरी के साथ ‘सेक्स वर्कर्स’ का धंधा करती हैं। रेखा की गिरफ्तारी के बाद दोनों को पेट पालने में काफी मुश्किलात का सामना करना पड़ता है। गोपाल पूर्ण पुरुष है, किन्नर बनकर किन्नरों की गद्दी हथियाने का असफल प्रयास करता है। गोपाल के इस कृत्य का किन्नर समुदाय द्वारा इस कारण जबर्दस्त विरोध और हत्या कि दूसरी दुनिया, यानी पूर्ण स्त्री-पुरुष की दुनिया, का कोई व्यक्ति अगर उनकी गद्दी पर बैठेगा तो यह उनके समुदाय के लिए बड़ा ही अपशकुन होगा, इस बात की तरफ संकेत करता है कि किन्नरों की प्रकृति पूर्ण स्त्री-पुरुषों से अलग होती है। इसके अलावा इस उपन्यास में किन्नर-समुदाय के रहन-सहन, रीति-रिवाज, समस्याओं, अधिकारों आदि पर तथा उन्हीं के बहाने समाज की विकृत व्यवस्था, भ्रष्टाचार आदि पर भी दृष्टिपात किया गया है। किन्नर या ट्रांसजेंडर के रूप में पैदा होने के बाद तथा विकास की अवस्था से गुजरने के क्रम में लड़के या लड़कियों को और उनके माता-पिता को या परिस्थितिवश किन्नर समुदाय का अंग बने व्यक्तियों को जिन-जिन समस्याओं या अनुभवों से गुज़रना पड़ता है, उपन्यास में उन्हें उकेरने की सफल कोशिश हुई है। 

‘विनीत’ का जन्म लड़के के रूप में होता है, परंतु कुछ दिनों बाद पता चल जाता है कि बच्चा दरअसल किन्नर है—“बेटा पैदा होने के बाद गौतम साहब की चाल में जो अकड़ आयी थी, वह ढीली पड़ने लगी थी। मोटे चश्में के पीछे चमकने वाली आँखें भी झुक गयी थीं। वे हमेशा झुँझलाए-झुँझलाए से दिखते। अजीब तरह की चिंता उनके माथे पर दिखती। ...असल में गौतम साहब के घर बेटा ज़रूर हुआ था, लेकिन कुछ दिनों के अंदर ही परिवार को पता चल गया था कि वह किसी काम का नहीं है। बढ़ने के साथ उसका पुरुषांग विकसित नहीं हुआ।”  किन्नर पैदा होने पर समाज के दबाव, पारंपरिक मानसिक-सोच और इन सबके चलते बेटे के भविष्य को लेकर जो उथल-पुथल एक पिता के मन में मची हुई है उसे उपर्युक्त उद्धरण में चित्रित किया गया है। ऐसी संतानें बढ़ती उम्र के साथ अनेक प्रकार की कठिनाइयों से गुज़रती हैं। अधिकांशतः मान्यता यह है कि ‘हार्मोनल डिसऑर्डर’ के कारण ऐसे लड़के के शरीर में लड़कियों के हार्मोन्स की मात्रा ज्यादा होती है, और समयानुसार वे अपना प्रभाव दिखाना शुरू करते हैं –“समय बीतने के साथ गौतम साहब के बेटे में लड़कियों जैसे गुण पैदा होने लगे। शारीरिक बदलाव भी प्रखर हो गये। ... विनीत घर से निकलने में कतराने लगा। बाहर निकलता तो उसके साथ खेलने वाले बच्चे भी उससे किनारा कर लेते। वह अजीब मानसिकता से गुज़र रहा था। कई-कई हफ्ते घर के अंदर बंद रहता। उसे लगता कि उसके पिता उसे ज़बरिया लड़का बनाने पर तुले हुए हैं। वह अपनी बहनों की तरह ही अपने को लड़की मानता था।”  लड़के का लड़कियों की तरह व्यवहार करना घर वालों को पसंद नहीं आता और लड़के को लड़का बने रहना। काफी मानसिक उथल-पुथल से जूझने के बाद विनीत घर से बाहर निकल जाता है । उसने अपना नाम बदलकर ‘विनीता’ रख लिया। तमाम संघर्षों के बाद विनीता एक स्थापित ब्यूटीशियन बनती है। उसके पिता ने उसे ब्यूटीशियन का कोर्स करवा दिया था। बड़ी-बड़ी हस्तियों के बीच उसकी जान-पहचान बढ़ती है। शल्य-क्रिया द्वारा वह अपने आपको पूर्ण स्त्री में परिवर्तित कर तृतीय योनि से बाहर आ जाती है। टीवी पर कार्यक्रम, इंटरव्यू आदि के ज़रिए वह एक सेलिब्रिटी बन जाती है। मतलब अपने संघर्षों के चलते वह एक बड़ा मुकाम हासिल करती है। 

विनीत के विपरीत ‘निकिता’ का जन्म एक लड़की के रूप में हुआ था। पर वह भी किन्नर थी। लड़कियों में यह सब विशेषताएँ लड़कों के विपरीत विकसित होती हैं। उनमें पुरुष वाले हार्मोंस बाद में हावी होते जाते हैं। “आनंदी आंटी ने बड़े नाजों से पाला था अपनी बेटी को। निकिता नाम था उसका। सुनहरे बाल थे। आँखें हिरनी की तरह चंचल । हँसने पर गालों में गड्ढे उभर आते। रंग भी काफी साफ़ था। गोरी कह सकते थे उसे। ...बिना किसी बात की परवाह किए आनंदी आंटी निकिता को पढ़ाती रहीं। लेकिन छठीं कक्षा में दाखिले की बारी आयी तो उनके सामने धर्म संकट खड़ा हो गया। आखिर वे निकिता को लड़कों के स्कूल में दाखिला दिलाएँ या फिर लड़कियों के स्कूल में? आखिर काफी दिमागी उथल-पुथल के बाद उन्होंने उसे लड़कियों के स्कूल में डालने की कोशिश की। मगर वहाँ उन्हें निराशा हाथ लगी। ऐसा ही लड़कों के स्कूल में भी हुआ।”  सरकारी संस्थान किन्नरों की उपेक्षा करते आए हैं, ऐसा शुरू में कहा गया है। स्कूलों में समाज की तरह ही लिंगीय वर्चस्व हावी था, अभी भी यह मिट गया है ऐसा नहीं कहा जा सकता। रूढ़िवादी मानसिकता के चलते किन्नरों की जिंदगी से लगातार खिलवाड़ होता आया है समाज में। निकिता को कक्षा आठ तक प्राइवेट घर पर पढ़ाया जाता है। पर उसे नवीं कक्षा में प्राइवेट पढ़ना भी नसीब नहीं हुआ क्योंकि—“अब तक निकिता में हिजड़ों वाले गुण आकार लेने लग गये थे। कॉलोनी से लेकर रिश्तेदारों तक में निकिता का मज़ाक उड़ने लग गया था।”  निकिता की माँ ने दुनिया वालों से हारकर निकिता को किन्नरों के हवाले कर दिया। समाज की मानसिकता किन्नरों को लेकर इस तरह की बना दी गयी कि कोई साधारण सोच वाला आदमी चाहकर भी अपनी किन्नर संतान को अपने पास नहीं रख सकता। वैसे पहले सामाजिक नियम क़ानून बड़े सख्त भी हुआ करते थे। इस वैज्ञानिक सोच के समय में भी अभी मनुष्य तमाम रूढ़िवादी मान्यताओं से ऊपर नहीं उठ पाया है। निकिता किन्नर समुदाय में जाकर उनके रीति-रिवाजों, रहन-सहन को देखती है। उसे वे सारी चीज़ें नागवार लगती हैं। वह पशोपेश में रहती है कि कैसे वह इस समाज में ‘सर्वाइव’ कर पाएगी! एक दिन मौक़ा देखकर वह आत्महत्या कर लेती है।

‘मंजू’ पूरी तरह से लड़की पैदा होती है। वह किन्नर नहीं है, फिर भी उसके माँ-बाप गरीबी के चलते उसे किन्नर समुदाय में बेच देते हैं। उसे खरीदने वाली डिंपल पहले तो सोचती है कि उसे अपनी बेटी की तरह पालेगी, उसे पढ़ाएगी और एक अच्छे लड़के से उसकी शादी कर देगी। पर जल्द ही भारतीय सामाजिक-संरचना ने उसके स्वप्न को रुई की भाँति उड़ा दिया—“धीरे-धीरे उसे लगने लगा कि हिजड़े के बच्चे को कौन दाखिला देगा स्कूल में? वह क्या जवाब देगी कि उसे यह लड़की कहाँ से मिली? उसका बाप कौन है? और, सबसे बड़ा सवाल यह कि कौन शरीफजादा हिजड़े की लड़की से शादी करेगा? इन सवालों के आगे जब डिंपल हार गई, तो उसने मंजू को हिजड़ा बनाने का फैसला कर लिया। उसे नाच गाना सिखाया और मंडली के साथ ले जाने लगी।”  

‘राजा’ की कहानी मंजू से जुड़ी हुई है। राजा किन्नर नहीं, पूर्ण पुरुष था; अलीगढ़ का रहने वाला। नाच-गाने का काम करता था, इससे उसके अंदर ‘सखी-भाव’ घर कर गया था। वह कमाई की तलाश में दिल्ली आता है और ‘डिंपल’ नामक किन्नर के हाथ पड़कर उसके डेरे पर जाता है। राजा की यहीं पर मंजू से मुलाक़ात होती है। मंजू और राजा दोनों पूर्ण स्त्री और पुरुष थे। मंजू उसकी तरफ आकर्षित होती है। दोनों में शारीरिक संबंध बनते हैं। मंजू गर्भवती होती है। यह बात ‘डिंपल’ को नागवार गुजरती है और वह राजा और मंजू को इसकी सजा देने का विचार करती है। राजा का जननांग काटकर उसे किन्नर (रानी) में तब्दील कर दिया जाता है और मंजू को अस्पताल ले जाकर उसका गर्भपात कराकर बच्चेदानी निकलवा दी जाती है।  

उपर्युक्त कहानी में किन्नर समुदाय द्वारा मंजू और राजा के प्रति अमानवीयता का पक्ष उजागर होता है। उपन्यास में तमाम जगहों पर यह बात उभर कर सामने आती है कि किन्नरों में भी आपराधिक प्रवृत्ति हो सकती है, यद्यपि कि ऐसा कहा जाता है कि किन्नर ईमानदार हुआ करते हैं और उनमें ज्यादा लोभ लालच नहीं हुआ करता। किन्नर-समुदाय में गद्दियाँ हुआ करती हैं। हर गद्दी का अपना समुदाय होता है। समुदाय के किन्नर अपनी कमाई का हिस्सा गद्दी मालिक, जोकि एक किन्नर ही होता है, को देते हैं। इस उपन्यास में दिल्ली की सबसे बड़ी गद्दी को हथियाने के चक्कर में किन्नरों को आपस में लड़ते, थाना-अदालत करते और एक दूसरे की हत्या करते-करवाते भी दिखाया गया है। इससे इस बात को बल मिलता है कि सभी इंसान एक जैसे नहीं होते, और किन्नर भी अंततः होते तो इंसान ही हैं! 

‘ज्योति’ उत्तर प्रदेश के बलिया जिले का लड़का था। बलिया के जमींदार ठाकुर बाबू श्यामसुंदर सिंह का वह ‘लौंडा’ था। ‘लौंडा’ रखने का मतलब है उससे समलैंगिक संबंध बनाना। जैसे लोग औरत को ‘रखैल’ के रूप में रख लेते हैं वैसे ही पुरुष को ‘लौंडे’ के रूप में। यह सामंतीय समाज की एक विकृत और अमानवीय प्रथा थी। दोनों को रखना कभी अपनी शान में चार चाँद लगाना समझा जाता था, आज भी ऐसी मानसिकता के लोग मौजूद हो सकते हैं। जमींदार के साथ महिलाओं की तरह संबंध रखने तथा नाच-गाने में संलग्न रहने के कारण ज्योति में ‘सखी-भाव’ यानी स्त्री-भाव घर कर गया था, अतः जब जमींदार उसे कुछ मनचलों द्वारा चूम लिए जाने पर ‘अपवित्र’ समझकर घर से निकालता है तब उसके सामने अपना पेट पालने के लिए कोई दूसरा काम-धंधा नजर नहीं आता है। एक तो लोगों का उसके प्रति नज़रिया और दूसरे उसमें उपजी स्त्रियोचित प्रवृत्ति। उसे अपना पेट भरने के लिए अपने शरीर का सौदा एक मात्र विकल्प नज़र आता है। इस कृत्य से ऊबकर तथा पेट की आग से तंग आकर वह किन्नर बन जाने का संकल्प करता है। अंततः वह भी दिल्ली आकर किन्नरों के समुदाय में शामिल हो जाता है और उसी के अनुरोध पर उसका लिंगोच्छेदन कर उसे किन्नर बना दिया जाता है।  

‘मैं हिजड़ा ...मैं लक्ष्मी!’ एक किन्नर ‘लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी’ की आत्मकथा है जिसका प्रकाशन मूल रूप से मराठी भाषा में 2012 ई० में हुआ। निश्चय ही आत्मकथाओं के माध्यम से किन्नर जीवन के विविध पहलुओं को ज्यादा प्रामाणिक तरीके से जाना और समझा जा सकता है। इस आत्मकथा में न सिर्फ भारतीय किन्नरों के समुदाय, रहन-सहन, रीति-रिवाज, समस्याओं आदि के विषय में प्रामाणिक जानकारी मिलती है बल्कि विश्व के संदर्भ में भी उनके इतिहास, रहन-सहन, समस्याओं और संघर्ष आदि को समझने में मदद मिलती है—अपने समुदाय की विभिन्न समस्याओं से संघर्ष करने और उनका हल पाने के क्रम में लक्ष्मी ने विश्व के तमाम देशों की यात्राएँ की। विभिन्न देशों में एचआवी एड्स की रोकथाम संबंधी, किन्नर या पूरे एलजीबीटीक्यू समुदाय की समस्याओं से संबंधित होने वाली वर्कशॉपों, सेमीनारों और गोष्ठियों में लक्ष्मी को भारतीय ट्रांसजेंडर की प्रतिनिधि के तौर पर आमंत्रित किया जाता रहा है। यह इसलिए कि लक्ष्मी ने अपने समुदाय को तमाम समस्याओं से निजात दिलाने के लिए एक सामाजिक कार्यकर्ता की तरह काफी संघर्ष किया है। उसने संगठन बनाए हैं, उनका संचालन किया है और खुद को संघर्ष के माध्यम से एक सफल ‘किन्नर’ के रूप में स्थापित किया है। उसकी यह आत्मकथा अपने समुदाय को सफल जीवन जीने की युक्ति और प्रेरणा देने वाली है।  

लक्ष्मी का जन्म लड़के के रूप में हुआ पर ट्रांसजेंडर की प्रकृति के मुताबिक़ कुछ दिनों के बाद उसे महसूस होने लगा कि वह लड़का नहीं कुछ और है। लक्ष्मी की रुचि क्योंकि बचपन से ही नृत्य और ‘स्टेज शो’ की तरफ थी अतः उसके घर वालों को भी कई वर्षों तक इसका पता नहीं चला कि वह ट्रांसजेंडर है। किन्नर हो जाने के बाद एक दिन टीवी में उसकी ‘बाइट’ के प्रसारण के समय घर वालों को पता चलता है कि वह किन्नर हो गया है। पर लक्ष्मी के माता-पिता ने उसे घर से निकाला नहीं, और न ही उसका साथ छोड़ा। घर वालों की मदद के चलते ही लक्ष्मी समाज में एक सम्मानित स्थान बनाने में सफल रहा। 

इस आत्मकथा में में दो भूमिकाएँ और एक परिशिष्ट है। इन सबके माध्यम से किन्नरों या ट्रांसजेंडर्स की शारीरिक और मानसिक विशेषताओं के साथ-साथ उनसे जुड़ी हुई समस्याओं और समाधानों को प्रकाश में लाया गया है। आत्मकथा में लक्ष्मीनारायण ने अपने संघर्ष कर सकने और उसी के माध्यम से अपने तथा अपने समुदाय के लोगों के जीवन में तमाम सुधार लाने तथा सफलताएँ अर्जित कर लेने की अदम्य इच्छा-शक्ति को वाणी दी है। कैसे लक्ष्मी ने एक साधारण मध्यवर्गीय परिवार में जन्म लेकर निरंतर संघर्षों के जरिए वृहत्तर समाज में अपना एक बेहतर मुकाम बनाया, और इसी क्रम में कैसे वह अपने और अपने समानधर्मा अन्य समुदायों के लोगों के जीवन की बेहतरी के लिए भी बराबर प्रयासरत रहा, इन सबको उसने अपनी आत्मकथा में वाणी देने का प्रयास किया है।

विकास की अवस्था से गुजरते हुए अपनी लिंग-पहचान न निर्धारित कर पाने की जद्दोजहद के क्रम में लक्ष्मीनारायण ने ‘गे’ समुदाय में प्रवेश किया, ‘बार-डांसर’ बना और अंततः ‘किन्नर-समुदाय’ में गया। इस तरह इन सभी समुदायों के बीच कुछ दिनों तक रहकर उसने इनकी समस्याओं को नजदीक से देखा और समझा, फिर उसने इन सबकी समस्याओं से लड़ने के लिए सामाजिक कार्यकर्ता की भूमिका अपनायी; संगठनों का निर्माण किया और उनके जरिए अपने समुदाय के लिए लड़ाई तेज की। देश में सेमिनार, वर्कशॉप, गोष्ठी आदि में थर्ड जेंडर का प्रतिनिधित्व करने के कारण वह प्रसिद्ध होता गया। उसे विदेशों में भी भारतीय ‘थर्ड जेंडर’ के प्रतिनिधि के रूप में आमंत्रित किया जाने लगा, जहाँ उसे विश्व के कुछ प्रसिद्ध तथा संघर्षशील ट्रांसजेंडर्स से मुलाक़ात और बात-चीत करने का अवसर मिलता। अपनी प्रसिद्धि के चलते ही उसने बड़े-बड़े अभिनेताओं के साथ टीवी के कई रियलिटी शो—बिग बॉस, दस का दम, सच का सामना आदि—में हिस्सा लिया, एलबमों में नृत्य किया, कई डाक्यूमेंट्री फिल्मों में अभिनय किया और किन्नरों पर बनी फिल्म ‘बिटवीन द लाइंस’ में मुख्य भूमिका निभायी। इस तरह उसने अपने आपको एक सशक्त किन्नर की तरह स्थापित किया—एक सेलिब्रिटी की तरह। अपनी इस प्रतिष्ठा के बारे में बात करते हुए उसे एक तरह का गर्व होता है—“आज पीछे मुड़कर देखती हूँ, तब मुझे बहुत आश्चर्य होता है। कहाँ से कहाँ पहुँची मैं ... और कहाँ तक जाने वाली हूँ ... अमेरिका, कैनेडा, यूरोप, मेक्सिको, मलेशिया, थाईलैंड ... बहुत से देश मैंने देखे हैं। सिर्फ देखे ही नहीं, वहां के लोगों का प्यार भी पाया है। भारत से बाहर पाँव रखने के बारे में मैंने कभी सोचा ही नहीं था। और मैं सीधे ‘यूएन’ जा पहुँची।”  लक्ष्मी का मत है कि किन्नर-समुदाय और आम लोगों के बीच जो यह रहस्यमयी दूरी बनी हुई है उसे खुद किन्नरों को तोड़नी चाहिए। अपने बारे में कोई सूचना आदि गोपनीय रखने का कोई फायदा उसे नज़र नहीं आता। अगर किन्नर अपनी समस्याओं के साथ समाज या मीडिया से मुखातिब होंगे, समाज के लोगों से मिलते जुलते रहेंगे तो उनके बारे में लोगों की तमाम गलतफहमियाँ दूर होंगी—“मैं तो दो जगहों पर लीक से हटकर चल रही थी। एक हमारा पूरा समाज और दूसरा हिजड़ा समाज। दोनों समाजों में बदलाव लाना चाहिए और हिजड़ों को समाज के सामने और अधिक आना चाहिए। समाज से काटकर रहने के परिणाम हिजड़ों को भोगने पड़े हैं।”  

निष्कर्ष: 
इस तरह स्पष्ट है कि किन्नर वे लोग होते हैं जो न पुरुष हैं न स्त्री। इसीलिए उनके लिए ‘थर्ड-जेंडर’ शब्द का प्रयोग किया जाता है। रूढ़िवादी मानसिकता के कारण स्त्री-पुरुषों का समाज इनके साथ सहज महसूस नहीं करता और न ये स्त्री-पुरुषों के समाज के साथ। समाज से अलग-थलग रहते हुए किन्नर लगातार शोषण का शिकार होते आए हैं। विमर्श और साहित्य के ज़रिए अब किन्नरों के पक्ष में लिखा और बोला जाने लगा है। सरकारें भी अब इनकी बेहतरी के लिए प्रयासरत हैं। यद्यपि समाज ने ही किन्नरों को बहिष्कृत कर हिजड़ा समुदाय का निर्माण किया है, पर समाज सदैव एक जैसा नहीं रहता और न समाज में हर इंसान एक जैसा होता है। अपने संघर्ष में सफलता पाने के लिए किन्नर समुदाय को समाज के सामने खुलकर आना ही चाहिए। समाज को भी अपनी रूढ़िवादी और संकुचित सोच को दरकिनार करते हुए किन्नर समुदाय के संघर्ष में उनका साथ देना चाहिए, उनके सामाजिक बहिष्कार पर रोक लगानी चाहिए और उनकी मदद की दिशा में किए जा रहे सरकारी प्रयासों के कार्यान्यवन में सहयोग करना चाहिए।    
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संदर्भ:
  1. Neither man Nor woman: the Hijras of India, Serena Nanda,  wadsworth publishing company, Belmont, second edition, Page 13 
  2. मैं हिजड़ा... मैं लक्ष्मी!: लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, आवृत्ति 2018, पृष्ठ 169 
  3. किन्नर गाथा, शीला डागा, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2020, पृष्ठ 93-94 
  4. मैं हिजड़ा... मैं लक्ष्मी!: लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, आवृत्ति 2018, पृष्ठ 20 
  5. Neither man Nor woman: the Hijras of India, Serena Nanda,  wadsworth publishing company, Belmont, second edition, Page XX  (Introduction)
  6. किन्नर गाथा, शीला डागा, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2020, पृष्ठ 9 
  7. Neither man Nor woman: the Hijras of India, Serena Nanda,  wadsworth publishing company, Belmont, CA, second edition, Page 13-14
  8. किन्नर गाथा, शीला डागा, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2020, पृष्ठ 90  
  9. मैं हिजड़ा... मैं लक्ष्मी!: लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, आवृत्ति 2018, पृष्ठ 157
  10. मैं हिजड़ा... मैं लक्ष्मी!: लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, आवृत्ति 2018, पृष्ठ 159 
  11. Neither man Nor woman: the Hijras of India, Serena Nanda,  wadsworth publishing company, Belmont, second edition, Page 18 
  12. किन्नर विमर्श: समाज के परित्यक्त वर्ग की व्यथा-कथा: (लेख) डॉ. पुनीत बिसारिया, जनकृति अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका, थर्ड जेंडर विशेषांक, वर्ष 2, अंक 18, अगस्त 2016
  13. वैदिक साहित्य और तृतीय लिंगी: (लेख) विजेंद्र प्रताप सिंह, सबलोग, अंक-7, जुलाई 2019, पृष्ठ 7 
  14. थर्ड जेंडर विमर्श: (लेख) शरद सिंह, जनकृति अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका, थर्ड जेंडर विशेषांक, वर्ष 2, अंक 18, अगस्त 2016
  15. यमदीप: नीरजा माधव, सुनील साहित्य सदन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण, 2002, पृष्ठ 7  
  16. यमदीप: नीरजा माधव, सुनील साहित्य सदन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण, 2002, पृष्ठ 288 
  17. यमदीप लिखते हुए: (लेख) नीरजा माधव, सामयिक सरस्वती, थर्ड जेंडर विशेषांक, अप्रैल-सितंबर 2018, पृष्ठ 20
  18. तीसरी ताली: प्रदीप सौरभ, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण, 2018 (पेपरबैक), पृष्ठ 40-41
  19. तीसरी ताली: प्रदीप सौरभ, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण, 2018 (पेपरबैक), पृष्ठ 82
  20. तीसरी ताली: प्रदीप सौरभ, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण, 2018 (पेपरबैक), पृष्ठ 42
  21. तीसरी ताली: प्रदीप सौरभ, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण, 2018 (पेपरबैक), पृष्ठ 43
  22. तीसरी ताली: प्रदीप सौरभ, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण, 2018 (पेपरबैक), पृष्ठ 31
  23. मैं हिजड़ा... मैं लक्ष्मी!: लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, आवृत्ति 2018, पृष्ठ 155
  24. मैं हिजड़ा... मैं लक्ष्मी!: लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, आवृत्ति 2018, पृष्ठ 146

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