कहानी: वनवास

नमिता सचान सुंदर

5/138 विकासनगर, लखनऊ - 226022

मेल: namitasachan9@gmail.com


“बिट्टो ओ बिट्टो...” की आवाज के साथ ही लाठी जमीन पर ठोंकने की ठक-ठक और लाठी के ऊपरी सिरे पर बंधे घुंघरुओं की रुन-झुन सुनते ही गीतू-सीतू ड्योढ़ी के बड़का फाटक की ओर दौड़ पड़ीं, “रंगी काका आ गए, रंगी काका आ गए।”
“हाँ बिट्टो, जैसेई पता चला कि हमारी बिट्टो हरै आय गईं हैं, हम दौड़े चले आए।”
“नमस्ते काका, कैसे हैं आप?”
“खूब खुसी रहौ, बिट्टो और काका तो तुम पंचन को देख के हरिया गए जैसे झुरान पेड़ पे बरखा पड़ गई।”
ये रंगी कौन हैं और कहाँ से आये यह तो कोई ठीक-ठीक नहीं जानता पर लोग बताते हैं कि करीब सात-आठ बरस पहले एक दिन कहीं चलते-चलाते वे गाँव बाहर के बरगद के नीचे बरम- देव की मठिया पर सुस्ताने के लिए रुके थे। और बैठे-बैठे अचानक तान छेड़ दी थी। शम्भू बप्पा गल्ला बेच के बाजार से लौट रहे थे। राम वियोग में तड़पते दशरथ महाराज की पीड़ा जैसे रंगी की आवाज में पिघल-पिघल बह रही थी। शम्भू बप्पा मंत्र बिंधे मठिया तक खिंचे चले गए और खिंचे ही नहीं चले गए वरन् रंगी काका की दर्द भरी आवाज उनके कलेजे में ऐसे उतर रही थी कि उनकी आंख से अंसुअन की धार कब बहने लगी उन्हें पता ही नहीं चला।
बहुत अनुरोध कर के बप्पा उन्हें घर तक लाए। रंगी तो बस्ती के भीतर आने को ही तैयार नहीं थे पर शायद बप्पा की उम्र और उनकी मनोदशा का सम्मान करते हुए देहरी तक आए पर गाँव में रुकने का अनुरोध उन्होंने नहीं स्वीकारा। हाँ, बप्पा ने उनसे वचन धरा लिया कि घूमते-फिरते अगर फिर इधर से निकलेंगें तो बप्पा से जरूर मिलेंगें।
फिर एक बार कुछ सालों बाद दशहरा मेला के समय रंगी अचानक प्रकट हो गये थे। उस बार बड़ी ड्योढ़ी के डा. भैया भी दिल्ली से अपने परिवार समेत आये थे। रंगी शम्भु बप्पा को ढूंढ़ते हुए ही ड्योढ़ी तक पहुंचे थे। गाँव के बहुत लोग इकट्ठा थे वहाँ भैया से मिलने के लिए। रंगी तो बप्पा से राम-राम कर, हाल-चाल ले जाने को उध्वत थे पर भैया ने कहा, “अरे त्योहार, परव के मौके पर हमरी देहरी ते कोऊ मुंह जुठारे बिना नहीं जाई सकत है।”
भैया की इन्हीं बातों पर तो सारा गाँव निहाल रहता था। इत्ता पढ़ लिख गए, जाने कबसे शहर में ठाठ-बाट से रह रहे हैं पर अपनी माटी से जुड़ाव नहीं खत्म हुआ है। रंगी को भी रुकना पड़ा और फिर सबके मनुहार और सबसे ज्यादा शम्भू बप्पा के साधिकार आग्रह के चलते रंगी को गाना पड़ा। इस बार रंगी कोई लोक गीत सुना रहे थे, जिसमें नील चिरैया घोंसले पर लौटने पर बच्चों को न पा फड़फड़ाती है और फिर कैसे दूर-दूर देश भूखी-प्यासी उड़ती रहती है। एक तो रंगी की आवाज, जिसमें भाव जैसे साक्षात पैठ जाते हैं और फिर गीत के बोल भी ऐसे कि कलपती नील चिरैया जैसे आंखों के सामने हो। जो जहाँ था, वहाँ से खिंचा चला आया। रंगी की आवाज़ ड्योढ़ी के भीतर तक भी पहुंची और बच्चे बाहर निकल आये और उन्हीं के संग बाहर आईं गीतू-सीतू, डां भैया की जुड़वां बच्चियाँ।
गीत खत्म कर अपनी स्वाभाविक अवस्था में आते ही रंगी की नजर जैसे ही गीतू-सीतू पर पड़ी तो जैसे चिपक कर रह गई।
रंगी की नजर का अनुसरण करते शम्भु बप्पा ने परिचय कराया, “डा. बौआ की बिटियाँ हैं। दिल्ली मा रहत हैं बौआ।”
हकबका कर बोले थे रंगी, “अच्छा-अच्छा।” फिर थोड़ा संभल कर कहा, “खूब खुश रहौ बिटिया।” और झोला टांग चल दिए थे। पर उस बार दशहरा मेला खत्म होने तक रुके थे गाँव में और बाद में तो बड़की ड्योढ़ी वाली दादी के बुलाने पर रामायण के गीत सुनाने भी कई बार गए। और उसी दौरान गीतू-सीतू से उनका बोलना-बतियाना शुरू हुआ।
इसके बाद ही रंगी का गाँव आना और रुकना बढ़ गया। रुकने का क्या, सम्पत्ति के नाम पर रंगी के पास बस एक झोला था जिसे शायद ही किसी ने कभी उनसे अलग देखा हो। बाद में एक घुंघरू बंधी लाठी और जुड़ गई थी, जो दूर से ही रंगी के आने की सूचना दे देती थी। सो रात को रंगी अपना थैला सिर के नीचे रख गाँव के मंदिर के बाहर वाले चबूतरे पर पड़ जाते थे।
गीतू-सीतू के लिए रंगी काका जैसे किसी फेयरी टेल के पन्नों से बाहर आ निकले पात्र थे। गीत ही नहीं, किस्सा कहानी कहने का भी रंगी का तरीका बहुत अनूठा था। और फिर टी.वी. के कार्टूनों  में वो रस कहाँ होता था जो रंगी काका के कथा संसार में। यह संसार बच्चियों के लिया सर्वथा नया और अदेखा था, फिर वो जंगल में भटकता राजकुमार हो, हंसिनी के रूप में श्राप की अवधि काटती राजकुमारी या कुम्हार की वो छोटी सी बेटी जिसके रंग भरने से खिलौनों में सच्ची में जान आ जाती थी।
उस साल रंगी गर्मियों की छुट्टियाँ शुरू होने से थोड़ा पहले ही गाँव आ गए थे। तबियत कुछ डांवाडोल रहने लगी थी इन दिनों। रास्ता घाट भटकते- भटकते रंगी का शरीर जैसे जवाब देने लगा था पर मन, मन तो चाबुक सटकारता रहता था और रंगी फिर भागने लगते थे, पर इतना आसान होता है क्या खुद से भागना। बस मन थोड़ा थिराता है तो गीतू-सीतू से बतियाते हुए। शरीर भले थक रहा हो रंगी की आवाज में दर्द का जादू फीका नहीं हुआ था, इसीलिए गाँव के लोग खुश थे कि अब की रंगी कुछ दिनों के लिए मंदिर के चबूतरे पर डेरा डालें हैं। पर रंगी तो एक-एक दिन गिन के काट रहे थे। दिन तो फिर भी कट जाता था पर रातें, उनकी रातें तो खुली आंखों अंधियारा बांचते ही गुजरती थीं। पलक झपकाने से भी डरते थे रंगी। सोने की कोशिश में पलक झपकाई नहीं कि उत्ते बरस पीछे की वह रात जैसे जीभ लपलपाती छाती पर सवार हो जाती थी। सब कुछ तबाह हो गया था, दुनिया उजड़ गई थी रंगी की। उजड़ क्या गई, रंगी ने खुद अपने हाथों मटियामेट कर डाला था सब। अम्मा का गरीबी का रोना, भौजी के ताने और ऊपर से उस रात दोस्तों के संग बैठ नशा करते हुए उनकी बातें, पता नहीं कौन जानवर जाग गया था रंगी के भीतर। गहराती रात में बेसुध सोती महुआ के पास से दोनों नवजात बच्चियों को उठा भागे थे। कित्ते कोस भागे, कौन दिशा में भागे ये तो उस समय रंगी को होश ही नहीं था। बस जैसे ही एक मंदिर का चबूतरा दिखा, कपड़े में लिपटी बच्चियाँ रखी और पलट पड़े। अधाधुंध कित्ती दूर भागे यह तो ठीक से याद नहीं पर वह क्षण आज भी लपलाता है रंगी की यादों में जब अचानक से दिमाग ऐसे साफ हो गया था जैसे आसमान में छाए काले गहरे बादल अचानक से छंट जाए। हक्क से रह गया था रंगी का दिल और गिरते–पड़ते वापस भागे थे पर वहाँ तब तक कुछ नहीं था। पागलों की तरह इधर- उधर दौड़े और फिर थक हार वहीं बैठ गए धम्म से।
तब तक पौ फटने की बिरिया तो हो ही गई थी। आवा-जाही भी शुरू हो गई थी पर बच्चियों को ले कर न कहीं कोई सुगबुगाहट, न बतकही। वो पूछते भी तो क्या कहते, क्या पूछते और कैसे पूछते। आखिर को लौट पड़े थे गाँव की ओर। गाँव बाहर ही मिल गया था किसना, बोला था, “अरे रंगी भैया तुम ई तरफ से आ रहे हो और हम भौजी का तालाब की तरफ जात देखेन, अब्बे तो सौरी...” पूरी नहीं हो पाई थी किसना की बात कि रंगी दौड़ पड़े थे तालाब की ओर। कमर तक पानी में डूबी महुआ को देख जोर से आवाज लगाई थी रंगी ने। देखा था पलट कर महुआ ने और उसकी उस नजर ने रंगी को जैसे वहीं खड़े-खड़े दफन कर दिया था। फिर भी भागे थे रंगी पर ठोकर खा मुंह के बल गिर पड़े थे और फिर जब तक सिर उठाया, सामने तालाब महुआ को लील ऐसा शांत था जैसे कुछ हुआ ही न हो। लेकिन महुआ की वह हिकारत भरी आखिरी नजर रंगी के सीने में हमेशा के लिए खंजर सी घुप गई थी।
तबसे बस ऐसे ही भटक रहे हैं रंगी।
उस दिन गीतू-सीतू को देख बहुत दिनों बाद रंगी के मन में भीतर कहीं कुछ कुनमुनाया था। कैसा पाप हो गया था उनसे, यह दंश फिर से चुभा था, कित्ता कुछ खो गया का दर्द भी जागा था पर इत्ते बरस के बाद जैसे थोड़ा मोह भी जागा था। उसी रात आसमान में जैसे महुआ की छाया सी डोली थी। बरसन बाद फूट फूट के रोए थे रंगी।
तबसे रंगी की जिंदगी को एक धुरी मिल गई थी, गीतू-सीतू की छुट्टियों का इंतजार करना पर इस बार मिलने की ललक के बाद भी मन जैसे थिरा नहीं रहा।
आ गईं थी बच्चियाँ शहर से। रंगी की किस्सा कहानी और गीतों का पिटारा खुलने लगा था। उस दिन बड़की ड्योढ़ी की दादी बोली, “रंगी हो ई दफे रोज आ जावा करो अउर जित्ता खजाना है तुम्हरे पाँजर सब सुना देव बिटियन का। डा. बौआ की बदरी औरौ दूर कौनो जगह हुई गई है। अब द्याख्औ कित्ते-कित्ते दिन बाद चक्कर लागे इन लोगन केर।”
और बोझिल हो गया था रंगी का मन। उन्हें लग रहा था कि जिंदगी तो बिन पतवार की कश्ती सी ही डोल रही थी और अब तो  किनारे पर जो रौशनी की एक लौ जली थी वह भी दूर जा रही है। उस रात लेटे हुए आकाश की ओर एकटक देख वो महुआ से मन ही मन बतिया रहे थे, बतिया क्या रहे थे गिड़गिड़ा रहे थे, “महुआ अउर कित्ती सजा बाकी है हमार। अब तो बुलाए लेव अपने पांजर। बहुत थक गा है तुम्हार रंगी और भी न जाने क्या- क्या...” और फिर इत्ते बरस में पहली बार, पहली बार नहीं कौंधी महुआ की वह वितृष्णा भरी नजर। हाँ दिखा था गीतू-सीतू के गड्ड- मड्ड होते चेहरों के बीच रंगी को  आसमान की गाढ़ी नीलिमा में लहराता महुआ का ललछौंहा अचरा और दिखे महुआ के महावर रचे पैर।
सारी रात उठती-गिरती साँसों के बीच बुदबुदाते रहे थे रंगी और फिर पौ फटने के साथ ही धीरे-धीरे मुंदती पलकों को जैसे किसी ने हथेली से आहिस्ता से ढ़ांप दिया।  उधर मंदिर में पंडित जी ब्राह्म मुहुर्त का शंख फूंक रहे थे और इधर पूरी हो गई थी रंगी के वनवास की मियाद।

1 comment :

  1. रंगी का भटकना ,मन के भटकाव ,सच जीने नही देते ,गहन पीड़ा सृजित होती जाती जीवन में ....बहुत ही भावभरी

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