भारतीय संस्कृति और कालगणना - सामान्य अवलोकन

डॉ. धनंजय कुमार मिश्र

- धनंजय कुमार मिश्र

अध्यक्ष संस्कृत विभाग, संताल परगना महाविद्यालय, सिदो-कान्हु मुर्मू विश्वविद्यालय दुमका-814101 (झारखण्ड) चलभाष: +91 993 965 8233

        भारतीय संस्कृति विश्व की समस्त संस्कृतियों में न केवल प्राचीनतम है, अपितु समृद्धतम भी है। इस संस्कृति का आधार वैदिक पृष्टभूमि पर अवलम्बित है। वेद विश्व के प्राचीनतम ज्ञान का आदि-स्रोत है। भारतीय संस्कृति के निर्माण में ऋषियों का योगदान अन्यतम है। मन्त्रद्रष्टा ऋषियों ने कायिक, वाचिक और मानसिक शुद्धि के साथ तपोबल से समाधिस्थ होकर वेदों का साक्षात्कार किया है। भारतवर्ष की पुण्यमयी वसुधा पर ही वेद, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद्, वेदांग, षड्दर्शन, स्मृति, धर्मशास्त्र, पुराण, रामायण, महाभारत, आयुर्वेद, नीतिशास्त्र, आचारशास्त्र, कामशास्त्र तथा काव्यादि समस्त ग्रन्थों के प्रणयन व अनुशीलन ने भारतीय सस्कृति को समृद्ध बनाया है। जो पूर्णता भारतीय संस्कृति में है, वह अन्यत्र नहीं। यह कथन सर्वथा उपयुक्त है कि - ‘‘यदिहास्ति तदन्यत्र, यन्नेहास्ति न तत् क्वचित् ।’’

        वैदिक परम्परा में यज्ञ सम्पादन का अत्यधिक महत्त्व है। यज्ञों के लिए समय वा काल गणना निर्धारित है। प्रसिद्ध वैदिक ग्रन्थ तैत्तिरीय ब्राह्मण में एक प्रसंग मिलता है - वसन्ते ब्राह्मणोऽग्निमादधीत, ग्रीष्मे राजन्यः, शरदि वैश्यः। इसी प्रकार ताण्ड्य ब्राह्मण में कहा गया है - एकाष्टकायां दीक्षेरन् फाल्गुने दीक्षेरन्। आर्ष परम्परा में अन्य यज्ञों के लिए भी काल निर्धारित किए गए हैं। कालगणना के लिए ज्योतिष का ज्ञान आवश्यक जानकर ही इसे विराट् पुरुष का नेत्र कहा गया है - ज्योतिषामयनं चक्षुः। इसी प्रकार आदिकाल से ही नक्षत्र, तिथि, पक्ष, मास, ऋतु तथा संवत्सर के ज्ञान को भारतीय संस्कृति में आवश्यक और अपरिहार्य माना गया है। भारतीय संस्कृति की यह स्पष्ट मान्यता रही है कि जो व्यक्ति ज्योतिष को अच्छी तरह से जानता है वही यज्ञ को यथार्थ रूपेण जान सकता है। वेदांग ज्योतिष में स्पष्ट कहा गया है -

‘‘वेदा  हि    यज्ञार्थमभिप्रवृत्ताः

                               कालादि पूर्वा विहिताश्च यज्ञाः।

तस्मादिदं कालविधान-शास्त्रं

                                 यो ज्योतिषं वेद स वेद यज्ञम्।।’’

इतना ही नहीं इसे समस्त वेदांगों में मूर्धन्य स्वीकारते हुए उद्घोष किया गया कि -

‘‘यथा शिखा मयूराणां नागानां मणयो यथा।

तद्वद् वेदांगशास्त्राणां गणितं मूर्धनि स्थितम्।।’’

महर्षि लगध कृत वेदांग-ज्योतिषसम्प्रति उपलब्ध सर्वाधिक प्राचीन ग्रन्थ है, जो दो भागों में मिलता है - आर्च ज्योतिषऔर याजुष ज्योतिष। इस ग्रन्थ पर अनेक प्राच्य और पाश्चात्य विद्वानों की टीका प्राप्त होती है। सर्वप्रथम इसी ग्रन्थ में काल-विभाजन, नक्षत्र और नक्षत्र-देवता, युग के वर्ष, काल और तिथि का निर्णय, अयन और पर्व-निर्धारण, नक्षत्रों का काल-विभाजन, तिथि-नक्षत्र, नक्षत्र और पर्व का काल-निर्धारण, अधिक मास आदि का वर्णन मिलता होता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि कालगणना की भारतीय परम्परा अत्यन्त प्राचीन है तथा इसकी उपयोगिता असंदिग्ध।

    सभ्यता के विकास के साथ ही भारतीय संस्कृति का पल्लवन होता रहा। प्रारम्भ में ज्योतिष को गणितऔर फलितदो रूपों में ही स्वीकार किया गया। पुनः यह स्कन्ध-त्रयके नाम से जाना जाने लगा जिसमें सिद्धान्त’, ‘संहिताऔर होराका समावेश था। सम्प्रति यह पंचात्मक रूप धारण कर चुका है। इस पंचात्मक रूप में होरा, गणित, संहिता, प्रश्न और निमित्त मिलते हैं। वर्तमान में कालगणना का निरूपण गणित ज्योतिष में मिलता है।

    भारतीय संस्कृति में कालगणना पूर्णतः वैज्ञानिक है। कालगणना के आधार पर शुभाशुभ फल का भी विवेचन किया जाता है। सामान्यतः कालगणना के पाँच अंग सर्वमान्य हैं - तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण। यही पंचाङ्ग के रूप में प्रसिद्ध है। कालगणना के लिए पंचाङ्ग का ज्ञान रखना परम आवश्यक है।

      भारतीय कालगणना में मास तीन प्रकार के माने गये हैं - सौरमास, चान्द्रमास और सावन। एक संक्रान्ति से दूसरी संक्रान्ति तक सौरमास माना जाता है। मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ और मीन द्वादश सौरमास होते हैं। इन बारह  सौर मासों से एक सौरवर्ष होता है। एक सौरवर्ष में छः ऋतु (ग्रीष्म, पावस, शरद्, शिशिर, हेमन्त और वसन्त), दो अयन (उत्तरायण, दक्षिणायन) होते हैं। इसकी उपयोगिता मुण्डन, उपनयन, विवाह आदि विभिन्न संस्कारों तथा वर्षवृद्धि आदि में होती है। अमावास्या से लेकर दूसरी अमावास्या तक चान्द्रमास होता है। देश-विशेष (स्थान-विशेष) में चान्द्रमास पूर्णिमा से पूर्णिमा तक भी माना जाता है। चान्द्रमास भी बारह होते हैं। यह भारतीय समाज में अत्यधिक प्रचलित है। चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन्, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ और फाल्गुन चान्द्रमास के नाम हैं। भारतीय संस्कृति में अधिकांश पर्व-त्यौहार, व्रत-उपवास चान्द्रमास के अनुसार ही मनाये जाते हैं। इसके साथ ही पितृ-कार्य, जन्मदिवसोत्सव, गृहप्रवेश, गेहारम्भ आदि में चान्द्रमास का प्रयोग किया जाता है।  दो सूर्योदय के अन्तर को सावन दिन कहते हैं। इस प्रकार सावन का सम्बन्ध वार से होता है। यज्ञ, जन्मकाल के कार्य, प्रसूति-स्नान आदि कर्म तथा दैनिक कार्याें के सम्पादन में सावन का प्रयोग भारतीय संस्कृति में प्रचलित है। इस प्रकार तीनों प्रकार के मास की उपयोगिता भारतीय संस्कृति में देखी जाती है।

      भारतीय संस्कृति धर्मप्राणान्वित है इसलिए कालगणना में तिथियों के स्वामी निर्धारित किए गए हैं। जिस तिथि के जो स्वामी निर्दिष्ट हैं उनका पूजन, प्रतिष्ठा, व्रतादि उसी तिथि में करने का विधान भारतीय संस्कृति में प्रचलित है।  प्रतिपदा के स्वामी अग्नि, द्वितीया के ब्रह्मा, तृतीया के गौरी, चतुर्थी के गणेश, पंचमी के नाग, षष्ठी के स्कन्द, सप्तमी के सूर्य, अष्टमी के शिव, नवमी के दुर्गा, दशमी के यमराज, एकादशी के विश्वेदेव, द्वादशी के विष्णु, त्रयोदशी के कामदेव, चतुर्दशी के शिव, पूर्णिमा के चन्द्रमा और अमावास्या के स्वामी पितर माने गये हैं। मुहूर्तचिन्तामणि में कहा भी गया है -

‘‘तिथीशा वह्निकौ गौरी गणेशोऽहिर्गुहो रविः।

शिवो दुर्गान्तको विश्वे हरिः कामः शिवः शशी।।’’

प्रत्येक मास को दो पक्षों में विभक्त किया गया गया - कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष। चन्द्रकलाओं का क्षय कृष्ण पक्ष में और वृद्धि शुक्ल पक्ष में होती है। जब चन्द्रकलाएँ पूर्णता को प्राप्त होती हैं वह पूर्णिमा तिथि होती है और जब पूर्णतः कलाहीन होती है वह अमावास्या तिथि होती है। पूर्णिमा के पश्चात् प्रतिपदा से अमावास्या तक पन्द्रह तिथि कृष्णपक्ष की होती हैं तथा अमावास्या के बाद प्रतिपदा से पूर्णिमा तक पन्द्रह तिथि  शुक्ल पक्ष की होती है। सामान्यतया भारतीय काल गणना में में 1 दिन-रात में 60 घटी (24 घण्टे), 1 घटी में 60 पल तथा 1 पल में 60 विपल होते हैं। वार अर्थात् दिवस सात हैं - रवि, चन्द्र, भौम, बुध, गुरू, शुक्र व शनि।

  सूर्य जिस मार्ग से भ्रमण करता है वह क्रान्तिवृत्त 360 अंश का होता है। इसका समान बारह भाग बारह राशियाँ हैं और 27 भाग नक्षत्र होते हैं। कालगणना में नक्षत्रों का भी महत्त्व है। अश्विनी, भरणी, कृतिका, रोहिणी, मृगशिरा, आद्र्रा, पुनर्वसु, पुष्य, अश्लेषा, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाती, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढा, उत्तराषाढा, अभिजित्, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद और रेवती ये 28 नक्षत्र कालगणना में सहायक हैं।

    कालगणना में योग 27 होते हैं। विष्कुम्भ, प्रीति, आयुष्मान्, सौभाग्य, शोभन, अतिगण्ड, सुकर्मा, धृति, शूल, गण्ड, वृद्धि, ध्रृव, व्याघात, हर्षण, वज्र, सिद्धि, व्यतीपात, वरीयान्, परिघ, शिव, सिद्ध, साध्य, शुभ, शुक्ल, ब्रह्म, ऐन्द्र, वैधृति। इसी प्रकार करणतिथिमान के आधे को कहते हैं। प्रत्येक तिथि में दो-दो करण होते हैं। पहला करण चर होता है जबकि दूसरा स्थिर। चर करण सात हैं। स्थिर करण चार होते हैं। कालगणना में करण का भी महनीय स्थान है।

    अन्ततः कहा जा सकता है कि भारतीय संस्कृति से समन्वित कालगणना भारतीय मनीषियों की मेधा का अनुपम प्रयोग है जो पूर्णतः गणितीय विधि के द्वारा सम्पादित होता है। तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण युक्त पंचांग निश्चय ही जीवनोपयोगी है। यह दिवस, सप्ताह, पक्ष, अयन, ऋतु, संवत्सर आदि का सम्यक् ज्ञान कराने में महती भूमिका का निर्वाह करता है।


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