ऐतिहासिक तथ्यों को प्रमाणिक रूप से प्रस्तुत करती और संवेदनशीलता की धरोहर: माँ हो जाना

समीक्षक: दिनेश पाठक ‘शशि’

28, सारंग विहार, मथुरा-6; चलभाष: +91 987 063 1805; ईमेल: drdinesh57@gmail.com


पुस्तक: माँ हो जाना (काव्य संग्रह)
लेखिका: डॉ. अमिता दुबे
पृष्ठ: 80
मूल्य: ₹ 100.00 रुपये
प्रकाशन वर्ष: 2022
प्रकाशक: नमन प्रकाशन, लखनऊ


 हिन्दी साहित्य की विविध विधाओं, समालोचना, कहानी, उपन्यास, काव्य और समीक्षा एवं बाल साहित्य आदि में साधिकार लेखनी चलाने वाली, विदुषी, साहित्यकार डॉ. अमिता दुबे का सद्यः प्रकाशित काव्य संग्रह 'माँ हो जाना' मुझे पढ़ने का सुअवसर मिला। सम्भवतया यह उनकी अढ़तीसवीं कृति है।

 उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान की पत्रिका 'साहित्य भारती' एवं 'बाल वाणी' की सम्पादक, विदुषी डॉ.अमिता दुबे जी का काव्य संग्रह- 'माँ हो जाना' एक ऐसी कृति है जो अपने धर्मग्रन्थों के गहन पठन-पाठन के द्वारा और माँ सरस्वती की विशेष अनुकम्मा होने पर ही किसी साहित्यकार की लेखनी से सृजित हो सकती है।

डॉ.अमिता दुबे जी ने स्वयं ही इस बात को स्वीकारते हुए लिखा है कि -

'माँ हो जाना' की कविताएँ कुछ प्रथक भावभूमि की कविताएँ हैं, इनमें निजी अनुभूति के साथ कुछ प्रश्न भी हैं जिनके उत्तर हमें निरन्तर ढूंढ़ते रहने होंगे भारतीय संस्कृति में पूर्ण निष्ठा के साथ।

उनका कहना है कि माँ होने के लिए यह आवश्यक नहीं है कि सन्तान को जन्म ही दिया जाय। ममत्व का भाव माँ होने की अनुभूति कराता है। 

 अस्सी पृष्ठीय इस कविता संग्रह की कविताओं को विदुषी लेखिका ने सात शीर्षकों में विभक्त किया है।

दिनेश पाठक ‘शशि’
पाँच स्त्रियाँ विवाहित होने पर भी कन्याओं के समान पवित्र मानी गई हैं। ब्रह्म पुराण के अनुसार वे पाँच कन्यायें हैं- अहल्या, द्रोपदी, तारा, कुंती तथा मंदोदरी। सर्व विदित है कि अहल्या ऋषि गौतम की पत्नी थीं तो द्रोपदी पाण्डवों की, तारा बाली की पत्नी थी तो कुंती पांडु की और मंदोदरी रावण की पत्नी थी।

ब्रह्मपुराण में उल्लखित इन पाँचों चरित्रों ने डॉ. अमिता दुबे जी के अति संवेदन शील हृदय को इतना आन्दोलित किया कि उन्होंने इन पाँचों के चरित्रों की गहराई जानने के लिए बहुत ही गहनता से कितने ही पुराण और धर्मग्रन्थों का अध्ययन, चिंतन और मनन किया और निष्कर्ष रूप में जो नवनीत निकला उसे नाम दिया-''माँ हो जाना'' 

इस काव्य संग्रह की पहली रचना का शीर्षक है-अहल्या का माँ हो जाना।

 पद्यकथा के रूप में अहल्या की उत्पत्ति, ब्रह्मा जी की अहल्या के विवाह की शर्त, गौतम ऋषि द्वारा त्रैलोक्य की सर्वप्रथम परिक्रमा, इन्द्र की कुचेष्टा, कामवश इन्द्र का अहल्या के पास आना, उसी समय गौतम ऋषि का आश्रम में प्रवेश, इन्द्र को पहचानकर गौतम ऋषि द्वारा इन्द्र को श्राप का देना और फिर अहल्या की कोई भी बात सुने बिना ही अहल्या को भी श्राप देना जिसे सुन अहल्या का चेतना शून्य, पाषाणवत् हो जाना फिर शिलावत् अहल्या को त्रेतायुग में श्रीराम की प्रतीक्षा। गुरु विश्वामित्र के आदेश पर श्रीराम द्वारा अहल्या का स्पर्श और पुकारना- माँ ओ माँ। 

इतने तथ्यों को जुटाने में किये गये लेखिका के श्रम का अनुमान वही लगा पायेगा जो कभी इस तरह के शोधकार्य के समुद्र की गहराई में उतरा हो।

श्रीराम द्वारा स्पर्श और कहे गये माँ शब्द के श्रवणरन्ध्रों में प्रवेश के साथ ही अहल्या की संवेदना का पुनः जाग्रत होना। विश्वामित्र द्वारा पुत्र शतानन्द का राजा जनक के यहाँ कुलगुरु के रूप में होने तथा गौतम ऋषि की तपस्या पूर्ण होने पर उपस्थित होने का समाचार। सम्पूर्ण कथा पद्य रूप में पूरे तारतम्य के साथ चलचित्र की भाँति पाठक के समक्ष साकार हो उठती है जिसे विदुषी लेखिका डॉ. अमिता दुबे ने पुस्तक के 13 पृष्ठों में उकेरा है।

जब श्रीराम ने मुझे पुकारा

माँ ओ माँ.... माँ।

मुझे अब नहीं प्रतीक्षा अपने पति की

नहीं कामना किसी सुख की

मुझमें ममता हिलोरें ले रही है

मैं अहल्या से

माँ जो बन गयी हूँ

सदैव आदरणीया माँ। (पृष्ठ - 21)

अहल्या के बहाने डॉ.अमिता दुबे जी ने नारी की नियति और उसकी मर्मान्तक पीड़ा को भी बहुत ही मार्मिक शब्दों में अभिव्यक्ति दी है--

मुझे निर्दोष मानने पर भी

उन्हें अपने दण्ड का मान तो रखना ही था

अहल्या को शिलावत् ही हो जाना था

जिस स्त्री के आन्तरिक सौन्दर्य को

उसका अपना कोई बहुत अपना

अनुभव ही न करे

तो उस स्त्री का

शिलावत् हो जाना उचित है।

...........................

एक स्त्री की यही नियति है

वह या तो भोगी जाएगी

या त्यागी जायेगी। (पृष्ठ - 16)

काव्य संग्रह की दूसरी रचना का शीर्षक है-तारा का माँ हो जाना। 

अनिंद्य सुन्दरी अप्सरा माँ की पुत्री तारा जो शिवजी के शापवश कछुई बनी और आशीर्वाद से बाली की पत्नी। बाली और सुग्रीव के युद्ध में बाली की वीरगति के बाद अंगद की माँ और राजमाता के रूप में चर्चित हुई। श्रीराम ने तारा को भी माँ का सम्बोधन दिया तो वह धन्य हो गई। यही पूरी कथा पद्यकथा के रूप में ''तारा का माँ हो जाना'' रचना में डॉ. अमिता दुबे जी ने प्रस्तुत की है-

सौन्दर्य की प्रतिमूर्ति

अप्सरा पुत्री तारा को

पुत्र अंगद की माँ बनकर चर्चित होना था।

मैं धन्य हो गई

जब प्रभु श्रीराम ने मुझे

माता कहकर सम्बोधित किया

माँ होकर धन्य होना

हर स्त्री के भाग्य में कहाँ होता है। (पृष्ठ - 33)

काव्य संग्रह की तीसरी रचना का शीर्षक है-मंदोदरी का माँ हो जाना।

असुरराज मयासुर और अप्सरा हेमा की पुत्री तथा रावण की पत्नी जिसने बहुत कुछ देखा, सहा, भोगा और अन्त में अपने पति रावण को सद्मार्ग पर चलने के लिए समझाने में असफल रहने पर अपने पुत्रों को खोने के बाद मानवता के विकास की सार्थक कड़ी बनने की कामना करती हुई एक माँ बनकर अपना सौभाग्य समझती मंदोदरी।

पुरुष प्रधान समाज में नारी को कमतर समझने की भूल करने वालों को मंदोदरी की पीड़ा के माध्यम से लेखिका ने कैसी सहजता से चेतावनी भी दे दी है- 

स्त्री तो पुरुष के दर्प

ऐषणा, लोलुपता के लिए

सदैव से छली जाती है

विजित की जाती है

स्त्री को सुख साधन की

वस्तु मानने वाले मेरे पति

यह विस्मृत कर गये

एक स्त्री ही समाज को

करती है अनुशाषित

उसे प्रतिशोध की वस्तु

मानने वालों का अन्त

सदैव होता है दुःखदायी। (पृष्ठ - 39)

 

चौथी रचना का शीर्षक है-कुंती का माँ हो जाना। इस रचना में नारी की विवशता को शब्द दिए हैं इस प्रकार-

मातृत्व का भार

धरती वहन करती है

स्त्री भी करती है

लेकिन धरती के लिए

अनिवार्य नहीं है

यह बताना कि उसकी कोख में

 किसने बीज वपन किया है।

स्त्री को नहीं है यह स्वतंत्रता

बिना यह बताये कि

उसकी संतान का पिता कौन है।

स्त्री को बहुत कुछ छुपाना होता है। (पृष्ठ - 44)

एक नारी ही दूसरी नारी की पीड़ा को महसूस कर सकती है। कुन्ती की मर्मांतक पीड़ा की अभिव्यक्ति कुंती के ही शब्दों में कराने का प्रयास किया गया है इन पक्तियों में-

मैं राजमाता बन संतुष्ट नहीं थी 

मुझे तो बनना था

 सूर्य पुत्र कर्ण की माँ

 सूत पुत्र राधेय की माँ

मेरा माँ हो जाना

 तब ही सार्थक होता

 काश ऐसा हो पाता। (पृष्ठ - 52)

संग्रह की पांचवी रचना का शीर्षक है-द्रोपदी का माँ हो जाना।

पांच पाण्डवों की पत्नी और कृष्णा, द्रुपदसुता, पांचाली तथा यज्ञसेनी नामों से जानी जाने वाली पांचवीं माँ का नाम है द्रोपदी। द्रोपदी ने अपने जीवन में मान, अपमान, विछोह आदि बहुत से कष्ट सहे लेकिन फिर भी धैर्य नहीं खोया। वह कहती है-

जीवन कभी नहीं मरता

मरती हैं केवल आस्थाएं

मरते हैं सम्बन्ध

परन्तु जीवन फिर चलता है

नई आशाओं के साथ

माँ हो जाना सहज नहीं होता

परन्तु स्त्री का माँ हो जाने में ही

गौरव है, वैभव है। (पृष्ठ - 63)

ब्रह्मपुराण में वर्णित इन पांच कन्याओं के विस्तृत वर्णन के बाद छठी रचना-'' बड़े हो जाना'' में विद्वान लेखिका डॉ अमिता दुबे जी ने सांसारिकता में लिप्त प्राणियों को यह अनुभव कराने का प्रयास किया है कि माँ के जीवित रहते, उनकी छत्रछाया में हम अपने आप को बच्चा ही समझते है। किन्तु जब माँ बह्मलोक को पदार्पण कर जाती हैं तब अनायास ही हमारे कंधों पर बड़े होने का दायित्व आ जाता है-

हम तब बड़े हो जाते हैं

 जब माँ ब्रहमलीन हो जाती है

 उसका ममतामयी आंचल उड़ जाता है

रह जाती है संसार की माया

उस दिन हम

हाँ उस एक दिन से हम

सदा के लिए बड़े हो जाते हैं

चाहे हम कितने ही छोटे हों

या हम कितने ही बड़े हों। (पृष्ठ - 67)

और अन्त में वह कविता जिसने विदुषी लेखिका को बाध्य किया इस पुस्तक को लिखने के लिए। अपनी स्वयं की माँ श्रीमती पुष्पलता की स्मृतियों को सहेजने और उन्हें सच्ची श्रद्धान्जलि देने का एक पवित्र उपाय। अपनी माँ की अंतिम विदाई की स्मृतियों को संजोते हुए लेखिका ने उन माँ का भी स्मरण किया है जिन्होंने अपने देश की रक्षार्थ अपने प्राणों की आहुति दी चाहे वह रानी लक्ष्मीबाई हो या कोई और, जिन्होंने जीवन के हर मोर्चे पर अपने आप को सिद्ध किया है।

मेरी माँ का जीवन

उन उतार-चढ़ाव की गाथा है

जो शायद सबके जीवन में आते हैं

कभी हम टूटते बिखरते हैं

कभी गिरते सम्भलते हैं

कभी सब कुछ भूलकर आगे बढ़ने को

विवश भी होते हैं

नयी मंजिल हमारी प्रतीक्षा में होती है। (पृष्ठ - 75)

माँ के अंतिम क्षणों की स्मृतियों को बहुत ही सहेज कर रखा है डॉ. अमिता दुबे जी ने जो उनके अति संवेदनशीलता का प्रमाण है। पल-पल का सहज रूप् से वर्णन बहुत ही बारीकी के साथ किया है उन्होंने। माँ के चले जाने के बाद उनकी सीख, उनकी जिजीविषा और धैर्य व समर्पण को जीते हुए वह अपने अन्दर भी माँ हो जाना महसूस करती हैं- 

ईश्वर पर विश्वास की डोर 

माँ ने मुझे थमाई है

यह डोर बहुत मजबूती से

पकड़े रह सकूँ बस यही कामना है

माँ कहीं नहीं गई है

वह मेरे अन्दर समा गई है

दो बच्चों की माँ बनकर भी

लगता है जैसे आज माँ बनी हूँ

माँ के स्पर्श को अपने अन्दर

समाते देखने की सुखद अनुभूति के साथ। (पृष्ठ - 79-80)

इस संग्रह की समस्त रचनाओं को पढ़ते हुए निरन्तर पद्य कथा के लेखक रामधारी सिंह दिनकर जी का स्मरण होते रहना स्वाभाविक है। दिनकर जी की पद्यकथाओं- चाँद का कुरता, मिर्च का मजा और सूरज का व्याह को पढ़ते हुए एक चलचित्र पाठक के समक्ष उपस्थित होता है उसी प्रकार डॉ. अमिता दुबे जी के इस काव्य संग्रह की सातों रचनाओं के दृश्य साक्षात पाठक के समक्ष चलचित्रवत् उपस्थित हो उठते हैं। कुल मिलाकर काव्य संग्रह की भाषा-शैलीसहज-सरल और आकर्षक है। पूरे काव्य संग्रह में प्रवाहमयता है। मुद्रण साफ-सुथरा है। हिन्दी साहित्य जगत में काव्य संग्रह-''माँ हो जाना'' एक कीर्तिमान स्थापित करेगा, ऐसा मेरा दृढ़ विश्वास है।

4 comments :

  1. वाह! विदुषी लेखिका आदरणीया डॉ अमिता दुबे जी तथा विद्वान समीक्षक डॉ दिनेश पाठक'शशि'जी को इस उत्तम समीक्षा हेतु अनंत हार्दिक बधाईयां एवं शुभकामनाएं।

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  2. अमिता दुबे जी एवं दिनेश पाठक शशि जी आप दोनों को बधाई

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  3. पौराणिक चरित्रों को नवीन मूल्यों से भावनात्मक रिश्तों को प्रस्तुत करने का निश्चय ही अभिनव प्रयोग है मां हो जाना।अमिता जी को हार्दिक बधाई

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  4. डॉ अमिता दुबे जी को उनके काव्य संग्रह' माँ हो जाना' के लिए तथा सार्थक समीक्षा के लिए दिनेश पाठक जी को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।

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