'धड़कनों का संगीत' में प्रतिरोध के स्वर की कविताएँ

समीक्षक - सुभाष पाठक 'ज़िया'

पुस्तक: धड़कनों का संगीत
प्रकाशन: अभिधा प्रकाशन
मूल्य: ₹ 250.00


कविता संस्कृति की सबसे ज़्यादा सजग और चौकस आवाज़ है। कविता में प्रतिरोध का स्वर होता है एवं संरक्षण का दायित्व भी। कविता मनुष्य को मनुष्यता की ओर ले जाने वाली एक सतत और सकारात्मक प्रक्रिया है। कविताओं में जहाँ एक ओर हिंसा, शोर, भ्रष्टाचार, अमानवीय कृत्यों के प्रतिरोध का स्वर होता है, वहीं दूसरी ओर प्रेम सद्भाव न्याय एवं सामाजिकता का संरक्षण भी होता है। कविताएँ सूचना भर नहीं होतीं बल्कि व्यापक और समग्र जीवन बोध का पर्याय होती हैं। उपर्युक्त पृष्ठभूमि में जब हम डॉ० आरती कुमारी की कविताओं पर दृष्टि डालते हैं तो पाते हैं कि कवयित्री ने कविता कर्म का निर्वाह साहस और अनुशासन के साथ बख़ूबी किया है।

सुभाष पाठक 'ज़िया'
इस संग्रह में विभिन्न विषयों पर रचनाएँ शामिल हैं। एक ओर जहाँ कवयित्री ने गाँव और संस्कृति की झलक ,गाँव का अपनापन और साझेदारी दर्शायी है, वहीं दूसरी ओर शहर का ख़ालीपन एवं विद्रुपताओं का भी सटीक चित्रण किया है। जैसे-

छत पर चाँद नहीं आता है/ चांदनी गाँव में छूट गयी
शहर के शोर शराबे में अब/ माँ की लोरी रूठ गयी
(गाँव और शहर, पृष्ठ-87)

आज का मानव एकाकीपन से जूझ रहा है और भावना शून्य होता जा रहा है। तमाम संसाधन होते हुए भी वह अवसाद से घिरा हुआ है। संवादहीनता आज के युग की सबसे बड़ी विडंबना है। लोग अपने घरों में भी अपने कमरों तक सिमट कर रह गए हैं। आधुनिक बनने की होड़ में कहीं न कहीं हमारे सामाजिक पारिवारिक मूल्य खत्म होते जा रहे हैं। कविता 'आधुनिकता ' की ये पंक्तियां देखिए-

आरती कुमारी
आधुनिकता की ओट में/ संयुक्त परिवार टूट रहे हैं../ और बूढ़े माँ-बाप / एफ. डी. के मैच्युरिटी अमाउंट की तरह/ भुनाए जा रहे हैं
(आधुनिकता, पृष्ठ 116)

कवयित्री आधुनिक मानव के मन को टटोलती हैं और पाती हैं कि वह भी अपनों का साथ चाहता है ।

बजाना चाहता है मन/शब्द लय भावों का संगीत/ बहना चाहती है / अभिव्यक्ति की निर्झरणी/ जो दिलों को जीवंतता प्रदान कर सके
(तलाश, पृष्ठ- 67)

संग्रह में शामिल कविताएँ जैसे पूछ रही है निर्भया, फिक्स्ड लाइफ, एक सवाल, वह आदिवासी लड़की, आतंकित है मन, समाज मे व्याप्त बुराईयों के प्रति आवाज़ उठाती हैं और हमें सोचने पर विवश करती हैं। जैसे-

दिल्ली सिहर रही है-/ उन हादसों से/ जो खुलेआम किये जा रहे हैं…/ आख़िर कब तक लड़कियों को लाचार बेबस समझ/ कुचलता रहेगा पुरुष
(पूछ रही है निर्भया, पृष्ठ- 117)

एक और प्रतिरोध का स्वर कविता 'चुप्पी तोड़ो ' में परिलक्षित होता है। कवयित्री कहती हैं-

तुम भी तोड़ो अपनी चुप्पी/ फूंक दो बिगुल/ प्रेम क्रांति का../ या लिखो ज़रूरी विप्लव/ कुछ करो अलग / जो जगा दें हृदय में संवेदना (पृष्ठ-125)

कवयित्री के भीतर प्रेम है, ईश्वर के प्रति अपार श्रद्धा है, रिश्ते हैं और रिश्तों में समर्पण है। संग्रह के द्वितीय खण्ड मे एहसासों की खाद और विश्वास की धूप में पल्लवित हुए प्रेम अंकुर हैं जिनमें अनुभूति की तरंगें हैं स्वयं से संवाद है सामंजस्य है इंतज़ार है और मन्नत के धागे में पिरोए हुए विश्वास के मोती हैं तो वहीं यादों की धूप की मन की चौखट पर दस्तक है। वसन्त के आगमन पर मन के दरवाजे खोल देने का आह्वान है। अंतर्मन के भावों को स्वर देती कुछ कविताओं के अंश हैं -

अब तो/ बदलते मौसम का एहसास लिए/ तुम्हारी याद की प्रखर धूप है/ जो मेरी संवेदनाओं को लहकाती है/ और रचनाओं को और अधिक निखारती है
(यादों की धूप, पृष्ठ-58)

आज /कई दिनों बाद/ अनायास ही पलट गए /ज़िंदगी की किताब में/ स्मृतियों के कई पृष्ठ
(स्मृति, पृष्ठ-27 )

कोई गा रहा होता है/ स्नेहिल शब्दों का मधुर गीत / जहाँ सालों भर खिलते हैं फूल / जहाँ हमेशा गूँजता रहता है/ कल-कल झरनों का संगीत…
(स्वयं से संवाद, पृष्ठ -44)

इन कविताओं की भाषा सहज सरल एवं ग्राह्य है जो सीधे मन पर छाप छोड़ती है। इन कविताओं में भाषा, शिल्प, कथ्य एवं भाव सौंदर्य के साथ न्यायसंगत व्यवहार किया है। कविताओं की भाषा मे, शब्दों में, लय में, ध्वनियों में जो संगीत है उससे हम सभी के सौंदर्यबोध का विस्तार होता है एवं बहुऐंद्रिक अनुभूतियां होती हैं।

चकले पर रोटी बेलती/ स्त्री की चूड़ियों की खनक /होती हैं सारे वाद्ययंत्रों से मधुर
(मुस्कान, पृष्ठ-83 )

विश्वास की ईंटों को जोड़कर/ प्यार के गारे से सना /चलो बनाएं /संवाद का एक पुल
(पुल, पृष्ठ-32)

कवयित्री की दृष्टि बहुत सूक्ष्म है। वह जो दिखता है, उससे परे जाकर देखती हैं और अपनी रचनाओं की धरती को उर्वर करती हैं। बच्चों के चेहरे पर मुस्कान लाने के साथ-साथ वह हौसला भी देती हैं। एक कविता 'तुम कहाँ छुपे हो ईश्वर' में वह कहती हैं -

हे ईश्वर/ तुम लाना अपने साथ / खुशबू भरे मौसम से भरी/ सगुन की टोकरियाँ/ (पृष्ठ-141)

यथार्थ का चित्रण कविताओं को ठोस आधार देता है। कविता अपने समय की आवाज़ होती है। इस संग्रह में कवयित्री ने बड़े साहस के साथ यथार्थ का चित्रण किया है। बाढ़ कविता में दृश्य देखें-

बाढ़ कर जाती है/ एक बार फिर/ सबको बराबर/ धरा रह जाता है सारा दुनियावी हिसाब/ ऊंच नीच अमीर गरीब, धर्म और भाषा का/ और ढह जाती हैं सारी दीवारें (पृष्ठ-131)

इस प्रकार हम पाते हैं कि इनकी कविताओं में जीवन की लय, छंद, स्वर, शब्द, अर्थ सब निहित हैं। प्रेम का एहसास इनके संग्रह में स्वरलहरियों सा तैर रहा है
और उसमें हमें सुनाई देता है 'धड़कनों का संगीत' -

यानी एक ऐसी स्थिति/ जहाँ आकर शब्द प्रायः शेष हो जाते हैं / और रह जाता है /केवल धड़कनों का संगीत / अपनी संपूर्णता का एहसास लिए (पृष्ठ- 71)

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