कहानी: सरजू का अर्द्धशतक

चंद्र मोहन भण्डारी
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बात तब की है जब मैं राष्ट्रीय शोध-संस्थान में वैज्ञानिक की हैसियत से कार्यरत था और लगभग हर साल गर्मियों में अपने घर जाया करता, पंद्रह-बीस दिनों की छुट्टी पर। बचपन के कुछ साथी मेरी तरह वहाँ से दूर जा चुके थे पर दो-तीन ऐसे भी थे जिन्होंने वहीं पर रहने का मन बना लिया। बलवंत स्थानीय पोस्ट ग्रेजुएट कालेज में भौतिक विज्ञान का सहायक प्रोफेसर था उसने मेरे साथ ही इलाहाबाद वि वि से भौतिकी में मास्टर्स की डिग्री ली। मैंने पी. एच. डी किया और शोध-संस्थान में वैज्ञानिक का कार्यभार संभाला उधर बलवंत ने स्थानीय कालेज में अध्यापन शुरू किया। मेरा दूसरा मित्र भी वहीं पर था दीनू। दीनू इंटर तक साथ था पर उसके बाद उसका विज्ञान की पढाई में मन न लगा और बी. ए. करने के बाद अपना बिजनेस शुरू किया। दीनू ने रियल एस्टेट में काम शुरू किया और कुछ सालों में अच्छी साख बना ली। बिजनेस परिवार का होने से उसे अपने पैर जमाने में मुश्किल नहीं हुई।
घर पर समय बिताने के लिये मेरे पास विकल्प था रविवार को या स्थानीय कालेज की छुट्टियों में बलवंत होता और रही बात दीनू की जो साइट पर अक्सर ही मिल जाया करता। उस दिन रविवार होने से बलवंत मेरे घर पर आ गया और हम दोनों दीनू से मिलने चल पड़े। उस समय वह लगभग एक दर्जन आवासीय दोमंजिला मकानों के प्रोजेक्ट पर काम कर रहा था। उसने हमें अपना पूरा प्रोजेक्ट समझाया और वहीं पर अस्थाई कार्यालय में हमारे चाय नाश्ते का प्रबंध किया। वहाँ नजर आता था हमारे समाज की असमानता का यथार्थ चित्रण। सिर पर गारे का तसला लिये मजदूर निर्दिष्ट जगह पर जाते और वहाँ गारा गिराकर अगली खेप के लिये लौट जाते। कुछ अपने सिर पर ईंटों का गट्ठा बनाकर निर्दिष्ट जगह तक पहुँचाते जहाँ पर मिस्त्री कार्यरत होता उन ईंटों को जोड़ने में। शायद यह काम वे करते आ रहे थे सालों-साल, कुछ अधेड़ उम्र के थे जो बीस सालों से यही काम करते आये थे कुछ युवा थे जिन्होंने हाल ही में काम शुरू किया था। बलवंत ने मुझे बताया कि एक खास मजदूर है सरजू जो कुछ अलग है, पढ़ा लिखा है और साथ ही संवेदनशील भी। खास बात यह कि वह काफी हद तक झक्की भी है। दीनू का सुझाव था कभी मैं सरजू से बात करूँ क्योंकि वह जानता था मेरी लेखन में रुचि थी और मेरे लिये इस तरह का प्रयास रुचिकर हो सकता था। किसी लेखक के लिये सामान्य से हटकर कोई इंसान या घटना महत्वपूर्ण हुवा करती है। हम तीनों में ही दो शौक समान थे पहाड़ों की सैर, साथ में यदा-कदा हाइकिंग भी। दूसरा शौक था कथा साहित्य का। स्कूल के दिनों में हम तीनों ने काफी कुछ कथा साहित्य साथ-साथ पढ़ा था पाठक हम सभी थे पर बाद के वर्षों में मैं थोड़ा बहुत लेखन कार्य भी करने लगा था। इसी संदर्भ में दीनू का सुझाव था कि मैं सरजू से मिलूँ।
एक दिन मैंने मन बना ही लिया सरजू से बातचीत करने का; दिन के खाने के समय मैंने उसे बुलाया और कहा:
- सरजू, मैंने तुम्हारे बारे में सुना है। क्या तुमसे कुछ बात हो सकती है?
- जी, क्यों नहीं ।
- पहले तुम बैठ जाओ, कब तक खड़े रहोगे?
वह जमीन पर बैठ गया पर उसकी आंखें मेरी ओर थीं।
मै़ने कहा:
- सरजू, इस कुर्सी पर बैठो; बात बराबरी पर ही होनी चाहिये।
- नहीं सर, वो मुझसे नहीं हो सकेगा।
मैंने अपनी कुरसी सरकाई और उसके पास ही जमीन पर बैठ गया।
- अरे सर, आप यह क्या कर रहे हैं?
- तुम्हें कोई ऐतराज?
वह चुप रहा। कुछ देर रुक कर बोला:
- सर, बताइये आप क्या पूछना चाहते हैं?
- वैज्ञानिक होने के साथ-साथ मैं एक लेखक भी हूँ और मुझे उन लोगों से मिलना अच्छा लगता है जो किसी न किसी मामले में थोड़ा अलग या खास होते हैं।
वह मुस्कराया, बोला:
- खास होना देखने वाले पर भी निर्भर है। आप भी कुछ अलग हो तभी मेरे साथ जमीन पर बैठ गये।
उसके बातचीत के अंदाज से जरा भी नहीं लगता था कि वह मुझसे या मेरे जैसे लोगों से अलग है और यह कि वहाँ पर सामान्य मजदूर की हैसियत से काम कर रहा है। वैसे तो कई बार उच्च शिक्षा प्राप्ति के बाद भी बेरोजगारी के चलते लोगों को अति सामान्य से काम करते सुना है। उसने जिस अंदाज में वह बात कही उसने मुझे अंदर तक प्रभावित किया। बात मैंने ही शुरू की:
- चलो, बात बराबरी पर आ गई। क्या तुम मुझे अपनी जिंदगी के बारे में बताना चाहोगे। अगर कुछ ऐसा हो जो न बता सको तब भी चलेगा।
जो उसने बताया उसका सार-संक्षेप कुछ इस प्रकार था।
उस जगह से पंद्रह मील की दूरी पर उसका गाँव था। उसने इंटर तक की पढ़ाई की थी और पढ़ने में उसकी रुचि थी। घर में खेती ज्यादा नहीं थी और पिता यहाँ शहर में एक छोटी सी फल व सब्जी की दुकान चलाते थे जो घर चलाने में मददगार थी और साथ ही सरजू की पढ़ाई भी चल रही थी। अगर सब ठीक रहता तब उसे बी. ए. तक पढाई में दिक्कत न होती। घर का खर्चा चल ही जाता था। पर पिता की तबियत खराब रहने लगी और वे काफी कमजोर भी हो गये तबियत में कुछ सुधार हुवा जरूर पर इतना नहीं कि पहले की तरह दिनभर मेहनत कर पाते। इंटर पास करने के बाद मैं बी ए की सोच रहा था पर मैंने उस बात को फिलहाल छोड़ दिया और दुकान का काम शुरू किया पर वह भी ज्यादा दिन चल ना सका।
- उसमें कमाई ज्यादा न होती होगी।
- इस मजदूरी से तो ज्यादा ही कमा लेता पर उसमें झंझट बहुत सारी थी और फिर. . . .
मैंने कहा- हाँ सरजू,फिर क्या हुवा?
- मेरा कुछ लोगों से झगड़ा हो गया और मैंने तय कर लिया कि अब यह धंधा नहीं चलेगा।
- किस बात पर?
- हफ्ता वसूलने वाले आते, वो भी एक नहीं दो-दो। मैंने मना किया तो शाम को घर लौटते वक्त चार लोगों ने घेर लिया। उन लोगों ने कहा कि या तो मैं हफ्ता देना शुरू करूँ या यह इलाका छोड़ दूं।
- तुमने पुलिस में शिकायत की?
- कुछ पुलिस वाले भी अपना हिस्सा मांगते थे कोई फायदा नहीं था।
- लेकिन इस काम में भी अलग तरह की समस्याऐं हो सकती हैं।
- यह आप ठीक कह रहे हैं। वैसे उन लोगों को हफ्ता देना इतना महंगा सौदा नहीं था और कमाई उसके बाद भी यहाँ से अच्छी होती पर मैं भी जिद पर आ गया कि हफ्ता नहीं दूंगा। पर इस जिद का अंजाम भी मैं जानता था। उनसे टक्कर लेना मेरे बस का नहीं था तब विकल्प एक ही था वह रास्ता ही छोड़ दूं।
आर्थिक और पारिवारिक मजबूरियों के बावजूद उसका अन्याय से समझौता न करने का निश्चय काबिले तारीफ था और मेरे मन में उसका कद बढ़ गया। इस तरह सरजू को यह काम लेना पड़ा जिसमें मेहनत अधिक थी पर उस तरह की झंझटें नहीं थीं। साथ ही दीनू एक पक्का बिजनेस मैन होते भी अपने अधीनस्थ कामगारों के प्रति संवेदनशील और सहज था और उसकी यह बात सरजू जैसों को भाती थी। सरजू ने मुझे बताया कि दीनू भाई काम लेने में काफी कड़ाई करते हैं पर पगार देने में देरी कभी नहीं करते और जरूरत पड़ने पर हम उनसे उधार भी ले सकते हैं बिना ब्याज के। सबसे बड़ी बात कि वो कभी गाली-गलौज नहीं करते। अगर बार-बार समझाने पर भी कोई नहीं सुधरता तब उसको आगे काम नहीं देते। दीनू के बारे में यह सुनकर मुझे अच्छा लगा। मैंने पूछा:
- क्या तुम कोई और काम लेना चाहोगे?
- जरूर; लेकिन अभी मैं पिता की बीमारी की वजह से ज्यादा दूर की जगह नहीं जा सकता।
मुझे यह भी पता चला कि गाँव के बच्चे उसके पास पढ़ने भी आते। हफ्ते में एक दिन शाम की कक्षा लगती और नि:शुल्क वह यह काम करता। इसका उसे लाभ यह मिला कि उसकी अनुपस्थिति में उसके माता-पिता की सामान्य जरूरत गाँव के बच्चे सहज में ही पूरी कर देते।

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सब मिलाकर सरजू से साक्षात्कार अच्छा लगा। वह मजबूरी में मजदूरी भले कर रहा हो उसमें एक विवेकशील एवं संवेदनशील इंसान साफ झलकता था। सबसे बड़ी बात कि वह खुशमिजाज था और जो भी काम दिया जाता मन लगाकर करता। उसने यह भी बताया कि वह कुछ पैसा जमा करने के बाद बी. ए. अवश्य करेगा और भाग्य ने साथ दिया तो उसके आगे भी।
छुट्टियां समाप्त हुईं और मैं वापस दिल्ली चला गया। मेरा शोध कार्य भी प्रगति पर था और अगले कई महीनों तक मुझे पूरी तरह उसमें जुटना था। देखते-देखते एक साल निकल गया मेरा शोध-पत्र भी प्रकाशन के लिये भेजा का चुका था और मैं कुछ सहज और हलका महसूस कर रहा था। गरमी के अवकाश का समय भी नजदीक था और घर जाकर कुछ समय बिताने कि बात से मैं आनन्दित था। दीनू और बलवंत की ओर से भी फोन आते कि अबकी बार दो-तीन दिनों का प्रोग्राम पहाड़ों सी सैर का बनाया जाय। मैंने उन लोगों पर ही छोड़ दिया कि जो भी उनका निर्णय होगा मेरी उसमें सहमति होगी।
दोस्तों के साथ भीमताल, मुक्तेश्वर और आसपास की पहाड़ियों की सैर में आनंद आ गया और कुछ पुराने दिनों की बातें ताजा हो आईं जब हम साथ पढ़ते और अक्सर ही आसपास की जगहों की सैर कर आते।
उस दिन बलवंत मैं और दीनू साथ ही उस साइट पर जा पहुँचे जहाँ निर्माण कार्य चल रहा था। हम लोग कुर्सियां लेकर पेड़ की छाया में बैठे ही थे कि सामने से सरजू आता दिखाई दिया। उसे देख मुझे उसके साथ हुई बातचीत की याद ताजा हो आई। सरजू कुछ डाक वगैरह देने आया था दीनू को। मैंने दीनू से कहा-
- सरजू से पिछले साल मेरी बात हुई थी। मुझे और बलवंत दोनों को ही वह समझदार, सुसंस्कृत और संतुलित इंसान लगा।
- इसमें संदेह नहीं। धीरे-धीरे मैं स्वयं उसको जरूरी सामान खरीदने और उनके प्रबंधन का काम देने लगा हूँ। उसकी पगार भी बढ़ गईं है। अब वह एक तरह से मजदूर व मैनेजर दोनों ही काम कर लेता है।
- यह अच्छा ही हुवा।
- लेकिन बड़ा झक्की इंसान है।
- कोई खास बात ?
- रतन भैया की दुकान में एक मुनीम की जरूरत थी और मैं जानता था कि सरजू से बेहतर इंसान मिलना मुश्किल है और उसे जरूरत भी है। मैंने सरजू को आँफर दिया।
वह कुछ देर चुप रहा और मैं प्रश्नवाचक निगाहों से उसे देखता रहा। दीनू ने बात आगे बढ़ाई:
- सरजू बोला, अभी एक या डेढ़ साल वह ऐसा नहीं कर सकेगा। वह क्षमाप्रार्थी था। बस उसने यही कहा कि कुछ मजबूरी समझ लीजिये, सर।
दीनू ने बात जारी रखी-
मैंने सरजू से पूछा-क्या घर में जरूरी काम है तब तो तुम यहाँ भी नहीं आ सकोगे? उसने कहा कि वह साइट पर आता रहेगा पर अभी कोई और काम न ले सकेगा। यहाँ से चार गुना कमाई और काम भी इतनी मेहनत का नहीं, है न झक्की? यह बताने पर भी कि इतना तो नहीं रुक सकते हमें किसी और को रखना पड़ेगा। सरजू बोला – सर, कोई बात नहीं। जो मेरे भाग्य में नहीं उसका क्या अफसोस करूं। सर, मैं आपका आभारी हूँ कि आपने मेरा इतना खयाल रखा।

बात सोचने की थी। मुझे याद आ गया जब उसने बताया कि हफ्ता नहीं देने की जिद के कारण उसने जमी-जमाई सब्जी की दुकान छोड़ दी और मजदूरी करना मंजूर कर लिया। वह ऐसा कुछ कर सकने में सक्षम था। फिर भी मैं जानने को आतुर था। पर संभव था शायद वह न भी बताये।

उसके कुछ दिन बाद जब अकेले में मेरा उस से सामना हुवा तब मैंने फिर कुछ बातचीत की पेशकश की। बात शुरू हुई मैंने उस मुनीम की नौकरी की बात भी की। पर उसने यही कहा कि उसे सोचने के लिये कुछ समय चाहिये था। मैंने पूछा-
- सोचने के लिये दो-चार दिन का समय क्या काफी नहीं?
वह कुछ न बोला: मैंने कहा- तुमसे मेरी जो बात पिछले साल हुई थी वह मैंने किसी से साझा नहीं की अपने दोस्तों से भी नहीं। तुम्हारी बात हम दोनों तक ही रहेगी।
- अरे सर, ऐसा कोई सीक्रेट नहीं है?
- फिर भी?
- जो सुनेगा हँसेगा, मेरा मजाक उड़ाएगा।
- वादा रहा, न मैं किसी को बताऊंगा, न मजाक उड़ाऊंगा।
- मैंने दीनू सर को तक नहीं बताया। नहीं सर, मुझसे नहीं हो सकेगा।
यह कहकर वह जाने को तैयार हुवा। मैने फिर कहा:
- सरजू, मैं एक लेखक हूँ और मेरे पूछने की खास वजह बस इतनी है कि कोई भी लेखक अलग तरह के लोगों से मिलकर अपने पात्रों को चुनता है। तुम्हारा सोच सामान्य लोगों से कुछ अलग है खास है और इस सोच को पाठक तक पहुँचाना लेखक का काम होता है। मैं तुम्हारे बारे में एक शब्द भी न किसी को बताऊंगा न ही अपने किसी लेखन में तुम्हारा नाम लूंगा। अगर भरोसा करो तब मैं आखिरी बार तुमसे अनुरोध करूंगा।
- सर,मजाक नहीं उड़ाएंगे?
- बिलकुल नहीं। सवाल ही नहीं।
करीब एक मिनट तक वह अपनी उंगलियों को आँख पर रख सहलाता रहा और बोला:
- बचपन से ही मुझे क्रिकेट का शौक रहा है अपने स्कूल की टीम का एक साल कप्तान भी रहा।
मैंने पूछा- बैटिंग या बाउलिंग?
कुछ शरमाते हुए बोला:
- अरे सर, उस स्कूल का आल राउंडर कह लीजिये। हाँ, मैं मुख्य बात पर आता हूँ। मेरा सपना था कि मैं शतकीय पारियां खेलूं।
- फिर, क्या हुवा?
- अरे सर, शतक तो दूर मैं अर्द्धशतक भी ना बना पाया। दसियों बार 45 के उपर पहुँचा, कई बार 49 पर भी पहुँचा, लेकिन . . .
- लेकिन अभी तो जिंदगी पड़ी है।
- नहीं सर, घर की आर्थिक हालत और नई जिम्मेदारियों के चलते क्रिकेट तो फिलहाल छूट ही गया
और मैं इतना तो समझता ही हूँ कि मेरी जिम्मेदारी किसी भी शौक से ज्यादा महत्व की है।
- मैं तुम्हारी बात समझ रहा हूँ।
- सर, सपना ही तो है बनता है टूटता है फिर नया बन जाता है। मैंने एक नया सपना पालकर पुराने को भुला दिया।
मैं उसकी बातों में खो सा गया। एक युवा मन की सोच, जीवन की मजबूरियों के आगे पस्त हो जाती है और ऐसे उदाहरण चारों ओर भरे पड़े हैं। लेकिन खास बात यह कि एक संवेदनशील आहत मन निराश होकर टूट नहीं गया अपितु परिस्थिति के अनुसार अर्थपूर्ण समझौता कर नये रास्ते निकालने की कोशिश करने लगा। कुछ देर चुप रहकर सरजू ने शुरू किया:
- यह मेरा‍ अड़तालीसवां प्रोजेक्ट है जिसको पूरा करने में मेरा सहयोग है। यह करीब पूरा हो चुका है। बस दो और मकान और मैं पचास के आंकड़े पर जा पहुचूंगा यानि हाफ-सेन्चुरी का स्कोर - अर्द्धशतक। मैं इस उपलब्धि को नजरअंदाज नहीं करना चाहता। है ना बेवकूफी की इंतिहा?
मैं मंत्रमुग्ध सा टकटकी बांधे उसकी ओर देखने लगा। मैंने कहा-
- बिलकुल नहीं सरजू, बिलकुल नहीं। तुम बारह साल से यह काम कर रहे हो औसतन एक साल में छह मकान; यह बात समझ नहीं आती।
- यह पहला दर्जन मकानों का प्रोजेक्ट है। इस छोटे कस्बे में लोग दो से चार कमरों तक के मकान खुद ही बनवाते हैं जिसमें ज्यादा वक्त नहीं लगता।
- तुम्हारा इस रह सोचना हर एक के बस का नहीं पर मैं जानता हूँ तुम जैसे इंसान के बस का जरूर है। तुमने हफ्ता न देने का निर्णय लेकर एक दुकान छोड़ दी, अच्छे वेतन वाली मुनीम की नौकरी भी छोड़ दी। तुम इस तरह सोचने में सक्षम हो। ऐसे इंसान कम ही होते हैं जो हर चीज को पैसे या सुविधा के हिसाब से नहीं तौलते और तुम उनमें एक हो।
कुछ रुक कर मैंने कहना जारी रखा
- मुझे खुशी है मैं तुम जैसे इंसान को करीब से जानता हूँ। तुम हाफ-सेंचरी पूरी कर लो तब बताना। हम उस मौके पर कुछ खास आयोजन करेंगे और वैसी नौकरी तुम्हें बाद में भी मिल जायगी।
- सर, आप अपना वादा भूल रहे हैं। बात आपके और मेरे बीच की है आयोजन में तो सभी को पता चलेगा।
- नहीं सरजू, लोग यह जा‍नेंगे कि सरजू का अर्द्धशतक बना है पर यह नहीं पता चलेगा कि तुम्हारा मुनीम की नौकरी न स्वीकार करने का यही कारण था। पर एक बात बताओ अगर किसी को पता ही नहीं चला तो उस उपलब्धि का पूरा आनंद तो नहीं मिलेगा, है ना।
- सर, सिर्फ आपको पता है कि मुनीम वाली नौकरी मैं ने इस वजह से नहीं स्वीकारी।
- तुमने मुझपर भरोसा किया। अच्छा लगा।
- ज्यादातर इसे उपलब्धि नहीं मानते, कहते हैं तुम्हारे अपने पचास मकान बनते तो उसे उपलब्धि मानते। अब तो मैं किसी से जिक्र भी नहीं करूंगा। पर मेरे अंदर क्रिकेट वाले पुराने सपने की जगह अब यह नया सपना ले लेगा।
- सरजू, जब भी तुम्हारा काम पूरा हो जाये मुझे बताना। मुझे खुशी है कि मैं तुम जैसे इंसान से मिला।
सपने का ऐसा अद्भुत रूपांतरण मैंने कभी सोचा भी न था। तुम वास्तव में एक अलग किस्म की सोच रखते हो।
यह कहकर मैंने उसे गले लगा लिया।

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