अमर पंकज की 8 ग़ज़लें


ग़ज़ल (1)

जब जब तूने मुँह खोला है,
तब तब हँसकर ही बोला है।

मस्त कलन्दर सा बन तूने,
जीवन में हर रस घोला है।

शबनम कैसे समझें तुझको,
आग भयंकर, तू शोला है।

खतरों वतरों से क्या डरना,
सच बोला ख़तरा मोला है।

सच की राह चला कब सोचा,
रस्ते में अंधड़ ओला है।

बिखरे बाल चमक आँखों में,
काँधे पर फिर से झोला है।

ख़ूब 'अमर' ने राजा तेरी,
कथनी करनी को तोला है।


ग़ज़ल (2)

दहकती हुई रेत पर चल रहा हूँ,
बताऊँ किसे किस तरह जल रहा हूँ।

गुज़रता रहा बीहड़ों में हमेशा,
सुहाना सफ़र कह किसे छल रहा हूँ?

सहारा लिया था मेरा जिस किसी ने,
नज़र में उन्हीं की मैं अब खल रहा हूँ।

पता है मुझे क्या सही क्या गलत है,
समय की नज़ाकत समझ ढ़ल रहा हूँ।

बहे अश्क तेरे मेरे भी बहे पर,
लगी आह मुझको मैं ही गल रहा हूँ।

मिलेगी अमानत मेरी छिन गई जो,
कहो किसलिए हाथ मैं मल रहा हूँ?

सवालात उट्ठे हैं जो मेरी जानिब,
बताना है सच कर उन्हें हल रहा हूँ।

लकीरें मुक़द्दर की ख़ुद से लिखीं हैं, 
किसी की दया पर नहीं पल रहा हूँ।

जलाता हूँ ख़ुद को अँधेरा मिटाने, 
नहीं बुझ मैं सकता भले बल रहा हूँ।

'अमर' ज़िंदगी की बुझी प्यास कब है?
शजर हूँ पुराना मगर फल रहा हूँ।


ग़ज़ल (3)

आसमाँ की सैर करके फिर ज़मीं पर आ गया हूँ,
दो दिलों में रंग भरके फिर ज़मीं पर आ गया हूँ।

बादलों के पार जाकर घर बनाना चाहता था,
शून्य में दो दिन विचर के फिर ज़मीं पर आ गया हूँ।

था तकब्बुर होशियारी का बहुत मुझको मगर अब,
बेचकर असबाब घर के फिर ज़मीं पर आ गया हूँ।

राहे उल्फ़त में बहककर जब कदम सहरा में भटके,
जीते जी सौ बार मरके फिर ज़मीं पर आ गया हूँ।

आँधियों ने था उड़ाया पर्वतों ने रोक रक्खा, 
धूप बारिश में निखर के फिर ज़मीं पर आ गया हूँ।

क़ुर्बतों को चाहिए इज़हार और इक़रार तो मैं,
चाँद पर कुछ पल ठहर के फिर ज़मीं पर आ गया हूँ।

है 'अमर' टूटा सितारा मान ले अब हमसफ़र तू,
थाम मुझको मैं बिखर के फिर ज़मीं पर आ गया हूँ।


ग़ज़ल (4)

वक़्त की रफ़्तार को पहचानना होगा तुझे ही,
झुर्रियाँ क्या कह रहीं हैं जानना होगा तुझे ही।

इस अँधेरी रात के आगे खड़ी सुन्दर सहर है,
पर पहुँचने की सहर तक ठानना होगा तुझे ही।

पाँव में हैं बेड़ियाँ और दौड़ना सरपट तुझे है,
बेड़ियाँ भी टूट सकतीं मानना होगा तुझे ही।

है खुदी खाई बड़ी जाना तुझे जिस रास्ते पर,
लाँघना खाई है कैसे जानना होगा तुझे ही।

मत फिसल तू देखकर ही शक्ल की मासूमियत,
हर सहीफ़ा जो नया है चानना होगा तुझे ही।

चल रहे हो डोर पर जो जोड़ती विपरित ध्रुव को,
साधना विपरीत को है, ठानना होगा तुझे ही।

चाँद छूने की 'अमर' इच्छा हुई फिर बलवती पर,
शर हरिक अवरोध पर तो तानना होगा तुझे ही।


ग़ज़ल (5)

बता कौन मेरी तरफ़ आ रहा है,
नशा इस कदर आज क्यों छा रहा है?

जला जा रहा है जिगर ज़िस्म मेरा,
महकता बदन तेरा भरमा रहा है।

उठी तेरी पलकें गिरीं फिर अदा से,
ख़ुदा नूर ऊल्फ़त का बरसा रहा है।

धड़कता हुआ दिल चुभन बर्छियों की,
तेरा दिल जलाना गजब ढा रहा है।

तहज्जुद तसव्वुफ़ शब ए वस्ल फ़ुरक़त,
क़लन्दर कहाँ से कहाँ जा रहा है।

कभी ज़िस्म दो एक जाँ तो बनेंगे,
यही सोचकर दिल ग़ज़ल गा रहा है।

मुहब्बत बग़ावत करेगी 'अमर' तू,
बहक ले अगर इश़्क बहका रहा है।


ग़ज़ल (6)

टिमटिमाते से दिये को आज़माना चाहता हूँ,
रोशनी बुझती नहीं क्यों थाह पाना चाहता हूँ।

आधियाँ चलतीं रहेंगी पर दिया जलता रहेगा,
मैं अँधेरा चीर तम के पार जाना चाहता हूँ।

कौन कहता है कभी होगा नहीं फिर से सवेरा,
बन अरुण प्राची क्षितिज पर सूर्य लाना चाहता हूँ।

इस सियासी जंग में टूटें नहीं सपनें किसी के,
ढ़ाल बनकर इसलिए सपने बचाना चाहता हूँ।

आग बनकर तन बदन झुलसा रही है अब जुदाई,
बैठकर मैं राग फिर मलहार गाना चाहता हूँ।

मानता हूँ वक़्त का गुमनाम क़ैदी मैं रहा पर,
पास तेरे तोड़कर जंज़ीर आना चाहता हूँ।

बूंद पहली चातकी को चाहिए बरसात की तो,
मैं 'अमर' आषाढ़ का बन मेघ छाना चाहता हूँ।


ग़ज़ल (7) 

गीत फिर से दर्द के ही गा रही है ज़िंदगी,
बन अमावस रात काली छा रही है ज़िंदगी।

तू नहीं तो कह्र बन अब ढा रही है ज़िंदगी,
शख़्सियत थी क्या तेरी जतला रही है ज़िंदगी।

ज़िंदगी आसाँ नहीं कैसे जिएँ तेरे बिना,
रिक्तता का अर्थ अब समझा रही है ज़िंदगी।

दो क़दम का फ़ासला था भर न पाये हम जिसे,
सिसकियों की वज़्ह ये बतला रही है ज़िंदगी।

हर मुखोटा अब डराता रोज हमको इसलिए, 
क़द्र करना ख़ून का सिखला रही है ज़िंदगी।

शह्र में आकर तो हम रोबोट बनकर रह गये,
फिर से सपने गाँव के दिखला रही है ज़िंदगी।

सुब्ह हो या शाम तुझको हर पहर ढूँढे 'अमर',
जा बसा तू दूर पर झुठला रही है ज़िंदगी।


ग़ज़ल (8) 

ज़रा धूप में है ज़रा छाँव में है,
कि तन शह्र में है तो मन गाँव में है।

हवा शह्र की गाँव पहुँची मगर सुख,
पुराने खड़े पेड़ की छाँव में है।

सियासी अखाड़ा बना गाँव लेकिन,
मुहब्बत अभी तक मेरे गाँव में है।

बचा खेत खलिहान जंगल बचा तू,
सदी का लुटेरा भी तो दाँव में है।

वहाँ प्यार ही प्यार याँ मतलबी यार,
झुके सिर्फ़ मतलब से सर पाँव में है।

'अमर' खेत की धूल मिट्टी है चंदन,
हमेशा जो लगती तेरे पाँव में है।
***


लेखक परिचय:

साहित्यिक नाम - अमर पंकज
नाम -- डॉ अमर नाथ झा
जन्म तिथि - 9.11.1964
शिक्षा - पीएच डी
पेशा - अध्ययन-अध्यापन
(विगत 36 वर्षों से अधिक समय से दिल्ली विश्वविद्यालय के स्वामी श्रद्धानन्द महाविद्यालय में प्राचीन भारतीय इतिहास का अध्यापन।)
प्रकाशित रचनाएँ - इतिहास, संस्कृति और साहित्य से संबंधित लगभग एक दर्जन पुस्तकों, विभिन्न राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में दो दर्जन से अधिक शोधपत्र तथा अन्य पत्रिकाओं में समय-समय पर ग़ज़लों का प्रकाशन।
पेशे से शिक्षक, प्रवृत्ति से इतिहासकार और अभिरुचि से साहित्यकार डॉ अमर पंकज (डॉ अमर नाथ झा) समसामयिक हिन्दी ग़ज़लों की दुनिया का एक प्रतिष्ठित नाम है। वर्ष 2020 में प्रकाशित ग़ज़ल-संग्रह "धूप का रंग आज काला है" तथा वर्ष 2022 में प्रकाशित ग़ज़ल-संग्रह "हादसों का सफ़र ज़िंदगी" ने एक गंभीर ग़ज़लकार के रूप में डॉ अमर पंकज की ख्याति दूर-दूर तक फैलायी है।
आवासीय पता -- 207, रिचमण्ड पार्क, सैक्टर -6, वसुन्धरा, ग़ाज़ियाबाद, उत्तर प्रदेश (भारत), पिन- 201012
चलभाष: 9871603621
ईमेल: amarpankajjha@gmail.com

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