21वीं सदी के उपन्यासों में पर्यावरण संकट

उर्मिला शर्मा

सहायक प्राध्यापक, अन्नदा महाविद्यालय, हजारीबाग, झारखंड- 825301

        जन्म से ही प्रकृति के साथ हमारा साहचर्य है। हम प्रकृति का दोहन करके उसे अपना विजय नहीं मान सकते। हमारा अस्तित्व प्रकृति से जुड़ा है और उसी के मध्य यह कायम रहा सकता है। प्रकृति के पारंपरिक स्वरूप में हस्तक्षेप करने से पूर्व हमें इसके दूरगामी परिणाम के बारे में अवश्य विचारना चाहिए।
        "प्रकृति पर मनुष्य के विजय को लेकर ज्यादा खुश होने की जरूरत नहीं, क्योंकि ऐसी हर जीत अंततः हमसे बदला लेगी। पहली बार तो हमें वही परिणाम मिलता है जो हमने चाहा था, लेकिन दूसरी और तीसरी बार इसके अप्रत्याशित प्रभाव दिखाई पड़ते हैं जो पहली बार के प्रत्याशित प्रभाव का निषेध कर देते हैं। इस तरह हर कदम पर हमें चेतावनी मिलती है कि हम प्रकृति पर शासन नहीं करते,जैसे कोई विदेशी विजेता विदेशी लोगों पर शासन करता है।" - 1
               विज्ञान और टेक्नोलॉजी के सहारे मनुष्य जिस प्रकार अपनी सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ता जा रहा है और उसी रप्तार में प्रकृति के साथ अप्राकृतिक ज्यादती कर अपनी सफलता पर इतरा रहा है, उसका खामियाजा उसे विभिन्न आपदाओं व विभीषिकाओं के रूप में सामना करना पड़ रहा है। इसी कारण आज सम्पूर्ण विश्व में परिस्थितिकी संकट गम्भीर मुद्दा बन चुका है। विगत दो-तीन दशकों में परिस्थितिकीय संकट को लेकर भूमंडलीकरण एवं उदारीकरण के नाम पर विकास का तांडव मचा हुआ है। पर्यावरण असंतुलन के सम्बंध में वी.एन. एवं जनमेजय सिंह लिखते हैं-'आधुनिक भौतिकतावादी संस्कृति और सभ्यता के विकास ने देश के सम्पदा में श्रीवृद्धि की है। आद्यौगिक,नगरीकरण, यंत्रीकरण के प्रगति के साथ साथ विशालकाय मिल,फैक्टरी कारखाने भी स्थापित हुए। कृषि में विज्ञान का प्रवेश हुआ, वैज्ञानिक ढंग से खेती करने के कार्य में वृद्धि हुई। इन सबने मिलकर प्राकृतिक पर्यावरण को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया है।' 
                विश्व के समस्त देशों ने पर्यावरण-विमर्श को महत्व देकर इस असंतुलन को कम करने के लिए कई सन्धियाँ की हैं तथा उसका पालन करने के लिए वचनबद्ध हैं। किंतु "अभी कुछ दिनों पहले अमेरिका ने 'पेरिस जलवायु समझौता' से खुद यह कहते हुए अलग कर लिया कि इससे अमेरिका का अहित होगा। ....जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रति व्यक्ति गैस उत्सर्जन भारत के बीस गुना है।" - 2 
          साहित्य और समाज में गहरा सम्बंध है। अतः जीव और जगत की कोई भी समस्या या असंगति साहित्य के परिधि से बाहर नहीं है। एक सच्चा साहित्यकार अपने अनुभव से बाहर जाकर सामाजिक सरोकारों को अपने चिंतन का विषय बनाता है। एक साहित्यकार समाजविज्ञानी की तरह वर्तमान समाज की विभीषिकाओं से लड़ने के लिए वैचारिक आंदोलन शुरू करता है। गत दो-तीन दशकों में लिखे गए कुछ उपन्यास इसप्रकार हैं - मरंगगोड़ा नीलकंठ हुआ-2012 (महुआ माजी), रह गईं दिशाएँ इसी पार (संजीव) -2011, एक ब्रेक के बाद (अलका सरावगी) - 2008 तथा कुंईया जान - 2005, (नासिरा शर्मा)।
1: रह गईं दिशाएँ इसी पार - यह संजीव का एक विस्तृत फलक वाला उपन्यास है। इस उपन्यास में संजीव आद्यौगिक सभ्यता के संकटों को न केवल चिन्हित करते हैं बल्कि मनुष्य के भीतर की निरंकुश उपभोक्तावादी मानसिकता के फलस्वरूप उपजे खतरों की ओर इंगित भी करते हैं। आज बाजार ने मनुष्य की आत्मा पर कब्जा करके उसे अमानुष बना दिया है। अपनी चेतना जीवंतता और निजता से शून्य वह केवल प्रोडक्ट सा रह गया है। 
        उपन्यास में संजीव की चिंता इस बात को लेकर है कि जीव वैज्ञानिकों द्वारा क्लोनिंग और जेनेटिक्स के क्षेत्र में होनेवाली अभूतपूर्व उपलब्धियों को वे मानवीय सम्बन्धों के संसार में उत्पन्न होंने वाले विकृतियों की संज्ञा देते हैं।जीवन-मृत्यु, काम व प्रजनन,पदार्थ और अध्यात्म की रहस्यमय गुत्थियाँ सुलझाकर मनुष्य ने अनावश्यक हस्तक्षेप किया है।
"अब इस इंसानी खोल से किस महामानवी खोल में, किस महाकाश में छलांग लगाने और किस चाँद-सितारे को छू लेने का इरादा है मेरे दोस्त।" - 3 
        'रह गईं दिशाएँ इस पार' में उपन्यासकार, अतुल बिजारिया उर्फ जिम (जो एक टेस्ट टयूब बेबी है) अपने जन्म के रहस्य को जानने हेतु पागलपन के हद तक एकाग्रता के साथ वैज्ञानिक प्रयोगों में शामिल हैं। तथा कृत्रिम गर्भाधान से जुड़ी सभी खोज कर प्रकृति के खिलाफ वैज्ञानिक प्रयोगशाला में प्रजनन पर निरंकुश शासन स्थापित करना चाहता है जो एक वैज्ञानिक के अपेक्षा मनोरोगी अधिक लगता है। पीटर एक 'सिंथेटिक ह्यूमन' है जिसकी मां ने 'वीर्य बैंक' से कृत्रिम गर्भाधान के माध्यम से उसे जन्म दिया है। पीटर दस वर्ष की उम्र में मां को खोकर जीवन के प्रति आस्था व अनुराग भी खो देता है। अब वह भटकते प्रेत की भांति अपने अनदेखे पिता को ढूंढता है -"उसने मुझे जन्म क्यों दिया? माना कि स्पर्म बैंक में स्पर्म देकर वह निवृत हो गया,जैसे पेशाब-पखाना किया,फ्लश किया,निवृत्त हो गया।" - 4
एक ब्रेक के बाद: इस उपन्यास में अलका सरावगी ने यह उद्घाटित किया है कि किस प्रकार मल्टीनेशनल कंपनियाँ आद्यौगिक विकास के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों का बेतहाशा दोहन करती हैं तथा इसी क्रम में तीसरी दुनिया के देश उनके लिए 'रॉ मटेरियल' उपलब्ध कराने के बाजार हैं या कचरे के डंपिंग स्टेशन के रूप हैं। इन सबके फलस्वरूप जब दुनिया में ग्लोबल वार्मिंग के खतरे मंडराने लगे हैं तो लोगों को प्रकृति व पर्यावरण संरक्षण की चिंता सताने लगी है। इसके समाधान के लिये भी बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ तीसरी दुनिया की ओर नजर गड़ाए बैठी है। उनकी गरीबी इन कम्पनियों के लिए चारागाह है। वह इनके लिए वरदान साबित होती है। 
             "शोषण करने व कचरा फेंकने के अलावा अब वे अपने 'पाप' बेंचने का व्यापार भी यहां खूब चला सकते हैं। कार्बन क्रेडिट की खरीद-फरोख्त करके। के. वी. जैसे लोग देशी साहब इन कम्पनियों के वफादार एजेंट हैं। वे जानते है कि हवा में एक टन कार्बन डाइऑक्साइड कम करने के लिए एक काबन क्रेडिट मिलता है जिसे विदेशों में दस से तीस यूरो में बेचा जा सकता है। हींग लगे न फिटकिरी रंग चोखा हो जाय। के.वी. कार्बन क्रेडिट जमा करने के लिए कम्पनी खोलते हैं - करबोवेज सिस्टम्स इंक।" - 5 
     बड़े ही निस्संग व स्पष्ट ढंग से अलका सरावगी जी सस्टेनेबल विकास और रिन्यूएबल एनर्जी का उपयोग पृथ्वी को बचाने के लिए किये जाने वाले मानवीय प्रयत्नों के संदर्भ में नवउपनिवेशवादी शक्तियों के साम्राज्य को कायम रखने की जुगतों का पर्दाफाश करती हैं - "भई, आप फैक्टरियाँ बन्द मत कीजिए, बेशक हवा में कार्बन छोड़ते रहिये। बस, जैसे आप स्टील फैक्टरी के लिए लोहा खरीदते रहते हैं,वैसे ही कार्बन क्रेडिट खरीद लीजिए। पूरी धरती का आसमान तो एक ही है,आप कहीं हवा-पानी बिगाड़िये,पर कहीं और कि हवा- पानी सुधार दीजिए। दिक्कत क्या है?" - 6 

          वर्तमान में जल संकट इतना विकराल हो गया है कि 40% जनसंख्या को न्यूनतम स्वच्छतापूर्ण पानी नहीं मिल रहा। मनुष्य की बुनियादी जरूरतों में शुद्ध वायु,स्वच्छ जल है जो कि नसीब नहीं हो रहा। वनों का निरंतर कटना जल संकट का कारण बन रहा। नासिरा शर्मा का उपन्यास 'कुईयाजान' जल संकट की गम्भीर समस्या को लेकर लिखा गया एक सशक्त उपन्यास है। बांधों के निर्माण का प्रभाव न केवल मनुष्य बल्कि पशु-पक्षियों पर भी पड़ रहा है जिसके कारण इन सबो को विस्थापित होना पड़ रहा। बांग्ला देश में बने फरक्का बांध से इस नुकसान का सजीव चित्रण नासिरा जी ने 'कुंईयाजान' में इस प्रकार किया है -'इस बैराज के बनने से बंगला देश के कुटिया सहित सात और जिलों में जलस्तर काफी नीचे चला गया जिसके कारण पेड़- पौधों पर बुरा असर पड़ा। जमीन का लवण भी जल के साथ नीचे चला गया। सुंदरी पेड़ जिसकी हमारे यहाँ बहुतायत थी,जिसके कारण जंगल का नाम सुंदरवन पड़ा ,वह पेड़ अब खोजने से ही नजर आता है। वही हाल मछलियों का हुआ। प्रवासी पक्षियों के आगमन पर असर हुआ।' प्राकृतिक संसाधन सीमित है। स्वार्थ में मनुष्य इतना अंधा हो चुका है कि आनेवाली पीढ़ी की उसे कोई चिंता नहीं।
            महुआ माजी द्वारा लिखित 'मरंगगोड़ा नीलकंठ हुआ' उपन्यास की मूल समस्या प्रदूषण, विकिरण और विस्थापन की है। आदिवासियों का प्रकृति के साथ गहरा संबंध है किंतु आज उसका अस्तित्व खतरे में नजर आता है। विकिरण की समस्या पर आधारित यह हिंदी का प्रथम उपन्यास माना जाता है। झारखंड के आदिवासी बहुल क्षेत्रों में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा किये जा रहे उत्खनन का वहां के जल,जमीन और जंगल को किस प्रकार दूषित कर रहे हैं इसका शोधपूर्वक वर्णन महुआ माजी ने अपने उपन्यास 'मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ' में किया है।  यूरेनियम उत्खनन के दुष्प्रभाव को लेकर लिखे गए इस उपन्यास में पर्यावरणीय समस्या के साथ आदिवासी समस्या तथा बाहरी लोगों के हस्तक्षेप से हो रहे परिवर्तनों को भी दर्शाया गया है। खनिज संसाधन को निकालने हेतु सरकार द्वारा लाईसेंसधारी बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ अपने विशाल मशीनों द्वारा धुंआ,कचरों द्वारा वहाँ की नदियों तथा वातावरण को प्रदूषित कर रही है। 
          मरंग गोड़ा को प्रकृति द्वारा प्राप्त वरदान यूरेनियम वहां के लोगों के लिए अभिशाप बन जाता है। यूरेनियम खनन से निकलने वाली विकिरण वहां की जनता के लिए संकट उत्पन्न कर दिया है। उनके बच्चे विकलांग जन्म ले रहे हैं। कई तरह के शारीरिक विकृतियों के साथ जन्म लेकर असमय काल के गाल में समा जा रहें। त्वचा सम्बन्धी कई बीमारियाँ हो रही हैं। पशुएँ दूध देना बंद कर दे रही हैं तथा फलों में बीज न होने की समस्या हो रही है। विकिरण के दुष्प्रभाव को उपन्यास में इस प्रकार व्यक्त किया गया है - 'विकिरण जीवित प्राणी के जीन के साथ तो छेड़छाड़ करता ही है, यह स्त्री-पुरुष की जनन क्षमता को भी प्रभावित करके उन्हें बांझ बना देने की ताकत रखता है। जो प्राणी विकिरण या रेडियो धर्मिता या रेडिएशन के जितना निकट सम्पर्क में आता है, वह उतना अधिक प्रभावित होता है। विकिरण एक ही सेल में लाखों म्युटेशन पैदा कर सकता है। मनुष्य के सेल में करीब 3.5 खरब (बिलियन) डीएनए-युग्म होते हैं।' 
       यूरेनियम के कचरे का पानी नदियों को भी दूषित कर रहा है। इसे उपन्यास में देखा जा सकता है -'यूरेनियम कचरे के पानी की पतली धारा आकर नाले की मार्फ़त स्थानीय नदी में गिर रही होती, उसी नदी में जो आगे जाकर झारखंड की एक प्रमुख नदी  सुवर्णरेखा से मिलती थी और बंगाल की खाड़ी तक जाते-जाते करीब दस हज़ार वर्ग किलो मीटर तक के लोगों की प्यास बुझाती थी, जिसके जल से लोग अपने खेतों में अनाज और फसल उगाते थे। नहाते-धोते थे।' 1967 में जादूगोड़ा में आरम्भ हुए यूरेनियम खनन से आसपास स्थित लगभग 15 गांवों के तीस हजार से अधिक लोग विकिरण से प्रभावित हुए थे। विकास के नाम पर मानव विनाश को निमंत्रण दे रहा है जिससे मानव अस्तित्व को बचाना मुश्किल है।
              शिक्षित व शहरी समझेजाने वाले लोगों की तुलना में अशिक्षित व ग्रामीण जनता पर्यावरण संरक्षण के प्रति अधिक जागरूक है। कुसुम कुमार का उपन्यास 'मीठी नीम' वृक्ष संरक्षण व वृक्षारोपण आंदोलन पर आधारित है। उपन्यास की नायिका अशिक्षित ओमना का पर्यावरण प्रेम समाज के लिए मिसाल बनता है। वह वृक्षों की देखभाल करने के कारण अपने बेटे के साथ अपने नवजात पौत्र को देखने नहीं जाती है। उसकी बेटी भी यह प्रण लेती है -'एक बात कसम खाकर कहती हूँ मैं जहां रहूंगी, वृक्षों की रक्षा करूँगी।' ओमना वृक्षों को पुत्रवत प्रेम करती है।
         प्राकृतिक संसाधन सीमित हैं और जिसप्रकार हम उसका अंधाधुंध दोहन कर रहे हैं उससे वह दिन दूर नहीं जब समस्त गोचर-अगोचर प्राणी संकट में पड़ जाएंगे। विकास के पूंजीवादी मॉडल पर चलने वाले देश में विकल्प मॉडल की खोज करना होगा, तभी मानव अस्तित्व कायम रहेगा। 

सन्दर्भ:
1- डायलेक्टिक्स ऑफ नेचर, फ़्रेडरिक एंगल्स, समयाँतर, फरवरी-2012
2 - www.setumag.com, अलोककुमार शुक्ल, 21वीं सदी के हिंदी उपन्यासों में पर्यावरणीय विमर्श, 2018
3 - रह गईं दिशाएँ इसी पार, संजीव, पृ० -169
4 - रह गईं दिशाएँ इसी पार, संजीव, पृ० -163
5 - रोहिणी अग्रवाल, समकालीन हिंदी उपन्यास और परिस्थितिकीय संकट,www.hindisamay.com
6 - अलका सरावगी, ब्रेक के बाद, पृ० - 151 

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परिचय: डॉ उर्मिला शर्मा, सहायक प्राध्यापक, अन्नदा कॉलेज, पी एच-डी., नेट - उत्तीर्ण, राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय सेमिनारों में आलेख प्रस्तुति, कविता व कहानी लेखन, आकाशवाणी से समय - समय पर वार्ता प्रसारित।  


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