हिन्दी उपन्यासों में चित्रित स्त्री विमर्श: जितेंद्र कुमार

जितेंद्र कुमार
 साहित्य समाज का दर्पण है और इस दर्पण के माध्यम से ही हम इसके विविध रूपों का अवलोकन करते हैं। आधुनिक परिवेश में स्त्री विमर्श एक नवीन अवधारणा है, जो बरबस ही लेखकों को अपनी ओर आकृष्ट कर रहा है। स्त्री विमर्श की परिभाषा देते हुए डॉ. संदीप रणभिरकर ने कहा है, "स्त्री विमर्श स्त्री के स्वयं की स्थिति के बारे में सोचने और निर्णय करने का विमर्श है। सदियों से होते आए शोषण और दमन के प्रति स्त्री चेतन ने ही स्त्री विमर्श को जन्म दिया है।"(1)

 स्त्री अस्मिता को उजागर करने वाला साहित्य स्त्री विमर्श के अंतर्गत आता है। हिंदी साहित्य में स्त्री विमर्श की शुरुआत छायावादी युग से मानी जाती है। वर्तमान समय में हिन्दी उपन्यासों पर स्त्री विमर्श का गहरा प्रभाव पड़ा है। इस संबंध में मैत्रेयी पुष्पा जी का कथन द्रष्टव्य है, "आने वाली सदी की मांग है कि पुरुष मानसिकता में परिवर्तन आए और वह बेझिझक किसी भी आशंका और असुरक्षा से मुक्त होकर आती हुई स्त्री का स्वागत करे। मेरे विचार से यह सदी स्त्री के अस्तित्व की थी, अगली शताब्दी उसके व्यक्तित्व की होगी।"(2)
 
 आगे स्त्री विमर्श को समझाती हुई मैत्रेयी पुष्पा जी ही कहती हैं, "नारीवाद ही स्त्री विमर्श है।…. नारी की यथार्थ स्थिति के बारे में चर्चा करना ही स्त्री विमर्श है।"(3)

 उपरोक्त विचारों के अध्ययनोपरांत हम कह सकते हैं कि स्त्री की दशा और उसकी मनोवृत्तियों को चित्रित करने वाले साहित्य को स्त्री विमर्श साहित्य की श्रेणी में रखा जाता है। अब हम विभिन्न उपन्यासों में चित्रित स्त्री विमर्श के विषय में जानेंगे-

 'गोदान' उपन्यास (मुंशी प्रेमचंद) में चित्रित स्त्री विमर्श

 मुंशी प्रेमचंद जी द्वारा लिखित और 1936 ईस्वी में प्रकाशित गोदान एक कालजयी उपन्यास है। जिसकी प्रमुख स्त्री पात्र धनिया है जो बेलारी गांव के किसान होरी की पत्नी है। यह एक सशक्त नारी पात्र है जो हर सुख-दु:ख में अपने पति होरी का साथ देती है। मुंशी जी ने इस उपन्यास के माध्यम से तात्कालिक समाज का जो चित्र खींचा है वह बरबस ही पाठकों को अपनी ओर आकर्षित करता है। इस उपन्यास में धनिया के साथ-साथ मिस मालती, झुनिया, गोविंदी, सिलिया, सोना और रूपा आदि अन्य स्त्री पात्र भी हैं जो उपन्यास में अपनी सशक्त भूमिका अदा करती हैं। कहीं पर भी कोई भी स्त्री पात्र अनावश्यक प्रतीत नहीं होती। इस उपन्यास में एक तरफ प्रेम विवाह है तो दूसरी और विधवा विवाह, एक तरफ प्रेम के उदात्त स्वरूप को केंद्र में रखा गया है तो वहीं दूसरी तरफ प्रेम को मर्यादाहीन करने वाले पुरुष पात्र भी हैं। उपन्यास में मालती कहती है- "क्या तुम इतना भी नहीं जानते कि नारी परीक्षा नहीं चाहती, प्रेम चाहती है। परीक्षा गुणों को अवगुण, सुंदर को असुंदर बनाने वाली चीज है, प्रेम अवगुणों को गुण बनाता है असुन्दर को सुन्दर।"(4)

 मालती के माध्यम से मुंशी जी ने आधुनिक विचारों वाली नारी का समर्थन किया है। मुंशी प्रेमचंद नारी को पुरुष की कठपुतली ही बने रहने देना नहीं चाहते थे। अतः मालती के माध्यम से उन्होंने कहलवाया है, "ऐसी ही लौंडिया मर्दों को पसंद आती हैं जिनमें और कोई गुण हो या ना हो, उनकी टहल दौड़-दौड़कर प्रसन्न मन से करें और अपना भाग्य सराहे कि इस पुरुष ने मुझसे यह काम करने को तो कहा। मैं समझती थी वह पुरुषत्व तुममें कम से कम नहीं है लेकिन अंदर से, संस्कारों से, तुम भी वही बर्बर हो।"(5)

 उपन्यास की केंद्रीय पात्र धनिया का विवाह के विषय में मत देखें, "वर कन्या जोड़े के हों तभी ब्याह का आनंद है।"(6) अर्थात वह बेमेल विवाह की पक्षधर तो कत्तई नहीं है। इस उपन्यास में मुंशी प्रेमचंद ने तात्कालिक समाज में हो रहे कृषक समाज की व्यथा के साथ-साथ विधवा विवाह,बेमेल विवाह, प्रेम विवाह, गरीबी, भ्रष्टाचार, शोषण और अत्याचारों को उजागर किया है जिसके केंद्र में स्त्री है।

 'विराटा की पद्मिनी' (वृंदावनलाल वर्मा) उपन्यास में चित्रित नारी विमर्श
 
 18 वीं सदी के आरंभ में बुंदेलखंड के राजनीतिक अस्थिरता और सामान्य वर्ग की सामाजिक स्थिति का दर्शन कराने वाले इस उपन्यास का प्रकाशन सन् 1936 ई० में हुआ। इसके लेखक वृंदावन लाल वर्मा ने ऐतिहासिक घटना को आधार बनाकर इस उपन्यास की रचना की है। इसकी प्रमुख और केंद्रीय पात्र कुमुद है। वही उपन्यास की नायिका भी है। यह उपन्यास पूर्णतः स्त्री विमर्श पर ही आधारित है। जैसा कि इस उपन्यास के नाम से ही प्रतीत होता है। उपन्यास की पूरी कथा कुमुद पर ही आधारित है। कुमुद एक दांगी कन्या है। वह दांगी किसान नरपत सिंह की पुत्री है । इस उपन्यास में फर्रूखसियर (1713-1719) के शासन के समय की घटना और तात्कालिक समाज का चित्रण है। उस समय समाज की दशा क्या थी उसका एक उदाहरण देखें, "गाँव सूना हो गया है।केवल चलने-फिरने में अशक्त लोग और थोड़े से किसान वहाँ रह गए हैं। मुसलमानों की चढ़ाई होने वाली है। सुनते हैं, वे लोग देश को उजाड़ कर देंगे। कुछ लोग कहते हैं कि वे मंदिर का अपमान करने की भी चेष्टा करेंगे।"(7)

उपन्यास की नायिका कुमुद एक साहसी कन्या है वह कहती है, "मैं तो कभी की मरने के लिए तैयार हूँ। यदि इस युद्ध का काम पहले से ही मिट जाता तो आज विराटा के इतने शूर सामंतों का व्यर्थ बलिदान न होता। मैं न जाने क्यों जीवित रही? किसके लिए?"(8) 

 उपन्यास 'त्यागपत्र' (जैनेन्द्र कुमार) में चित्रित नारी विमर्श

 सन् 1937 में प्रकाशित और जैनेंद्र कुमार द्वारा लिखित यह उपन्यास मृणाल नामक एक अभागिन स्त्री की कहानी है जो पूरे जीवन भर कष्टमय जीवन यापन करती है। स्त्री संवेदना की एक अप्रतिम कहानी है - 'त्यागपत्र'। यह एक मनोवैज्ञानिक उपन्यास है जिसमें मृणाल की दर्द भरी कहानी है। वह स्वतंत्र विचारों वाली स्त्री है जो अपने माता-पिता के मृत्यु के उपरांत भईया-भाभी के साथ रहती है। भाभी का कठोर अनुशासन और उपेक्षापूर्ण रवैया उसको कुंठित सा बना देता है।घर में किसी से वह स्नेह करती है तो वह अपने भतीजे प्रमोद से। वह अपनी सहेली शीला के भाई से प्रेम करती है लेकिन परिवार वाले उसकी शादी अधेड़ उम्र के विधुर व्यक्ति से कर देते हैं । वह उस जीवन को भी स्वीकार कर लेती है लेकिन उसका पति उसे दुश्चरित्र समझता है और एकदिन उसे त्याग देता है। फिर वह एक कोयले वाले के साथ रहने लगती है और उसी से गर्भवती होकर मिशन अस्पताल में एक कन्या को जन्म देती है लेकिन यहाँ उसकी देखभाल करने कोई नहीं आता और लड़की मर जाती है। वह वहाँ भी अकेली हो जाती है। जीवन यापन करने के लिए वह बच्चों को पढ़ाने लगती है लेकिन वहाँ भी समाज की मान मर्यादाएँ उसका पीछा नहीं छोड़ती।

 इस उपन्यास में पूरी कहानी का नैरेटर प्रमोद जो कि एक जज है, जिसकी समाज में इज्जत है, शोहरत है लेकिन फिर भी वह ग्लानि महसूस कर रहा है। उसे लगता है कि वह इन सुविधाओं के लायक नहीं है या इनका उसके लिए अब कोई मोल नहीं है और इसीलिए वह अपनी नौकरी से त्यागपत्र दे देता है। और अंत में एक विरक्त जीवन जीने लगता है क्योंकि उपन्यास की नायिका में मृणाल उसकी बुआ थी जो उससे बहुत ही स्नेह करती थी लेकिन बुआ की इस कारुणिक अंत को जानकर वह दुखी होता है और नौकरी से त्यागपत्र दे देता है।
 इसी प्रकार जैनेन्द्र कुमार के अधिकांश उपन्यासों में ऐसी ही स्त्री विमर्श की परिकल्पना की गई है। सुनीता (1934) नामक उपन्यास में नायिका सुनीता की दशा का चित्रण, कल्याणी (1939) में विवाह के पश्चात की समस्या का चित्रण,सुखदा (1952) में नायिका सुखदा के मनोभावों का विश्लेषण, विवर्त (1953) में भुवन मोहिनी की स्त्री संवेदना का चित्रण जैनेंद्र जी के प्रमुख वर्ण्य विषय हैं। 

 उपन्यास 'नदी के द्वीप' (अज्ञेय) में चित्रित नारी विमर्श

 सन 1951 में प्रकाशित और अज्ञेय जी द्वारा लिखित इस मनोवैज्ञानिक उपन्यास की मुख्य स्त्री पात्र रेखा और गौरा हैं। इन्हीं दोनों के इर्दगिर्द पूरा उपन्यास घूमता रहता है। यह एक व्यक्तिवादी चरित्र प्रधान उपन्यास है। इस उपन्यास में अलग-अलग पात्रों के जीवन,सुख-दु:ख,उनके आंतरिक भावावेशों को वर्णित किया गया है। इस उपन्यास के पात्र अपने भीतर ही जीते हैं, बाहर नहीं। इसकी दोनों स्त्री पात्र प्रेम की अनूठी मिसाल हैं। रेखा, जहाँ एक पढ़ी-लिखी, पति द्वारा परित्यक्त, संवेदनशील पात्र है तो वहीं गौरा एक छात्रा, संस्कारी, शिक्षित और उपन्यास के नायक भुवन से प्रेम करने वाली पात्र है। इस उपन्यास में प्रयुक्त नदी का सांकेतिक अर्थ-समाज और द्वीप का सांकेतिक अर्थ- व्यक्ति से है। उपन्यास की प्रमुख पात्र रेखा भुवन से कहती है, "मैं तो समझती हूँ हम अधिक से अधिक इस प्रवाह में छोटे-छोटे द्वीप हैं। उस प्रवाह से घिरे हुए भी, उससे कटे हुए भी, भूमि से बंधे और स्थिर भी, पर प्रभाव में सर्वदा असहाय भी, न जाने प्रवाह की एक स्वैरिणी लहर आकर मिटा दे, बहा ले जाए, फिर चाहे द्वीप का फूल पत्ते का आच्छादन कितना ही सुंदर क्यों न रहा हो?"

 इस प्रकार हम समझ सकते हैं कि अज्ञेय जी ने इन दोनों स्त्री पात्रों के माध्यम से समाज में स्त्री के ऐसे ही अस्तित्व की कल्पना की है। जब भुवन रेखा से विवाह करने की बात कहता है तो वह नहीं चाहती कि उसका जीवन उसकी वजह से बर्बाद हो। वह प्रेम के उदात्त स्वरूप का परिचय उपस्थापित करती हुई करती है, "मैंने तुमसे प्यार मांगा था, तुम्हारा भविष्य नहीं। न मैं वह लूंगी।" 

 मैला आंचल (फणीश्वरनाथ रेणु) उपन्यास में चित्रित नारी विमर्श
 
 आंचलिक उपन्यासकारों में अग्रणी फणीश्वर नाथ रेणु जी का यह 'मैला आंचल' नामक उपन्यास 1954 में प्रकाशित हुआ, जिसमें एक अंचल विशेष (बिहार के पूर्णिया जनपद के मेरीगंज) का वर्णन है। इस उपन्यास में लगभग 275 पात्र हैं। इस उपन्यास को 'नायक-नायिका विहीन उपन्यास' भी माना जाता है। खुद इसका अंचल ही इसका नायक है। इस उपन्यास में प्रमुख पुरुष पात्र डॉ. प्रशांत ग्रामवासिनी का धूल भरा आँचल देखना चाहता है जो इस उपन्यास को सार्थकता प्रदान करता है। मानवतावाद ही इस उपन्यास का मूल संदेश है।इस उपन्यास की प्रमुख स्त्री पात्रों में कमला, लक्ष्मी, मंगला देवी, ममता, फुलिया, रामप्यारी आदि हैं जिनकी मनोस्थिति को लेखक ने बड़े ही रोचक कथा शैली में वर्णित किया है। यह उपन्यास दो भागों में विभक्त है। इसमें कुल 67 परिच्छेद हैं। इसके पहले भाग में 44 परिच्छेद तथा दूसरे भाग में 23 परिच्छेद हैं। इस उपन्यास के विषय में स्वयं रेणु जी कहते हैं, "मेरीगंज में फूल भी है, शूल भी है,धूल भी है, गुलाब भी है और कीचड़ भी है। मैं किसी से दामन बचाकर निकल नहीं पाया। इसमें गरीबी, भुखमरी, जहालत, धर्म की आड़ में हो रहे व्यभिचार, शोषण, वाह्याडम्बरों, अंधविश्वासों का चित्रण है।"(9)

 इस उपन्यास में हर स्त्री पात्रों की अपनी खुद की एक समस्या है। वह कहीं न कहीं किसी न किसी से पीड़ित अवश्य है चाहे वह लक्ष्मी दासी हो, जो मठाधीशों की वासना की शिकार बनती है, चाहे वह फुलिया या रामप्यारी हो जो यौन शोषण का शिकार बनती हैं, कमला जहाँ बीमारी से ग्रसित है वहीं ममता जो एक डॉक्टर है और डॉ. प्रशांत की महिला मित्र है, एक अलग ही उधेड़बुन में हैं। इस प्रकार इस उपन्यास में स्त्री विमर्श अपनी चरम सीमा पर है।

 बसंती (भीष्म साहनी) उपन्यास में चित्रित नारी विमर्श

 यह उपन्यास 1978 में भीष्म साहनी द्वारा लिखित कहानी संग्रह 'वांग्चू' में प्रकाशित 'राधा-अनुराधा' कहानी का विस्तार है। 'राधा-अनुराधा' कहानी को बसंती उपन्यास की पूर्व पीठिका भी कहा जा सकता है क्योंकि 2 वर्ष बाद अर्थात 1980 में यह 'बसंती' उपन्यास के रूप में सामने आया।

 इस उपन्यास की प्रमुख पात्र बसंती है, जो एक 14 वर्षीया लड़की है। यही उपन्यास की नायिका है। यह स्वच्छंद विचारों वाली लड़की है। इस उपन्यास का प्रमुख वर्ण्य विषय गांव से विस्थापित और रोजी-रोटी की तलाश में दिल्ली जैसे महानगर के झुग्गी झोपड़ियों में रहने वाले मजदूरों की है। यह स्त्री विमर्श पर आधारित एक महत्वपूर्ण उपन्यास है। इसकी नायिका बसंती को उसका पिता एक बूढ़े लगड़े टेलर को महज कुछ पैसों (1200₹) में बेच देता है ताकि वह अपना घर बनवा सके लेकिन वह वहाँ से दीनू नामक एक शादीशुदा आदमी के साथ भाग जाती है। यहाँ उसका विद्रोही स्वरूप सबके समक्ष प्रस्तुत होता है। लेखक के शब्दों में, "एक अजीब जुनून सा बसंती पर सवार था। वह बार-बार अपने माँ-बाप और संबंधियों के सामने से होकर निकलना चाहती थी, उन्हें ठेंगा दिखाने के लिए कि देखो मैं तुम्हारी आँखों के सामने भाग कर चली जा रही हूँ और तुम मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते।"(10)

 इस प्रकार यहाँ उसके विद्रोही और समाज को ठेंगा दिखाने को वर्ण्य विषय बनाया गया है। कुछ इसी प्रकार के मंतव्य लेखिका मैत्रेयी पुष्पा के मन में भी आता है वह कहती हैं, "स्त्री की देह को पुरुष आज भी बंधक के रूप में देखता है, जबकि स्त्री का मन तो सदा से ही मुक्त है। वह जब अपने हाथ-पाँव खोलने की इरादे करती है तो नैतिकता के ठेकेदारों का दम फूलने लगता है।"(11)

 उपन्यास 'मुझे चांद चाहिए'(सुरेंद्र वर्मा) में चित्रित नारी विमर्श

 यह उपन्यास सन् 1993 ई० में प्रकाशित हुआ और वर्ष 1996 में इसके लेखक सुरेंद्र वर्मा जी को इसके लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया । इस उपन्यास को तीन खंडों में बांटा गया है इसकी कहानी की शुरुआत शाहजहाँपुर से होती है जहाँ की इंटरमीडिएट की छात्रा यशोदा शर्मा अपने विद्रोही स्वभाव के चलते अपना नाम बदलकर वर्षा वशिष्ठ रख लेती है। पिता के एतराज करने पर कहती है, "अब हर तीसरे-चौथे के नाम में शर्मा लगा होता है। मेरे क्लास में ही सात शर्मा हैं।..…..और यशोदा? घिसा-पिटा, दकियानूसी नाम। उन्होंने क्या किया था? सिवाय कृष्ण को पालने के?" (12)

वर्षा एक अभिनेत्री बनने की ख्वाहिश रखती है और अपने जीवन में वह एक कुशल अभिनेत्री बनकर समाज की सड़ी गली और रूढ़ मान्यताओं को समाप्त करती है। इस प्रकार यह उपन्यास स्त्री संवेदनाओं का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।

 उपन्यास 'पीली आँधी' (प्रभा खेतान) में चित्रित नारी विमर्श

प्रभा खेतान द्वारा लिखित इस उपन्यास का प्रकाशन वर्ष 1996 है। इस उपन्यास में विवाहेतर प्रेम प्रसंगों का चित्रण है। इस उपन्यास की प्रमुख पात्र सोमा है जो अपने पति गौतम के व्यवहार के कारण उससे नफरत करती है क्योंकि वह समलैंगिक है और पुरुषों की ओर ही ज्यादा आकृष्ट रहता है।उसे अपने साथ के पुजारी और ड्राइवर का संग ही अच्छा लगता है। यहीं से शुरू होती है सोमा की तकलीफें। इस उपन्यास में एक नई विषय वस्तु और स्त्री संवेदना को लेखिका ने एक नई दृष्टि प्रदान की है। माता-पिता के जबरदस्ती विवाह करवाने पर सोमा का वैवाहिक जीवन सुखी ना हो सका। उसका पति गौतम समलैंगिकता को ही ज्यादा पसंद करता था। इस उपन्यास में सोमा और चित्रा दो प्रमुख स्त्री पात्र हैं और पूरा उपन्यास इन्हीं के इर्द-गिर्द घूमता रहता है। यह नारी विमर्श का प्रतिनिधित्व करने वाला एक श्रेष्ठ उपन्यास है।

 निर्मला उपन्यास (मुंशी प्रेमचंद) में चित्रित नारी विमर्श

 मुंशी प्रेमचंद जी का यह उपन्यास 1927 में प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास में दहेज एवं अनमेल विवाह की समस्या का चित्रण किया गया है। यह उपन्यास पूर्णत: स्त्री विमर्श पर ही आधारित है और इसके केंद्र में है इस उपन्यास की नायिका- निर्मला। निर्मला एक 15 वर्षीया सुंदर और सुशील लड़की है जिसका विवाह एक अधेड़ उम्र के आदमी से कर दिया जाता है जिसके पहले से ही तीन बेटे हैं। यहाँ मुंशी प्रेमचंद जी ने जीवन की करुण त्रासदी को अपनी लेखनी से उभार सा दिया है। निर्मला, निर्मल चरित्र की होती हुई भी समाज द्वारा अनादरित और उपेक्षित जीवन जीने को बाध्य हो जाती है। वह पति परायण है फिर भी उस पर संदेह किया जाता है और जीवन की विषम परिस्थितियों को झेलती हुई वह काल का ग्रास बन जाती है। ससुराल का धन निर्मला को रूप वृद्धि और संतोष प्रदान करता है परंतु आंतरिक रूप से वह बहुत दुखी है। ननद इस पर अपना रौब झाड़ती है। वह अपने पति मुंशी तोताराम के बड़े पुत्र मंसाराम से अंग्रेजी पढ़ती है। इस दौरान उसके बूढ़े पति उस पर संदेह करते हैं और अपने उस बेटे को छात्रालय में भेजने का निर्णय लेते हैं। निर्मला मन ही मन उसको रोकना चाहती है लेकिन वह कुछ कह नहीं पाती। वह भी ऊपरी मन से तोताराम का समर्थन करती है और मंसाराम इसे सत्य मान लेता है। फलत: विमाता के इस उपेक्षापूर्ण रवैए से दुखी होकर अधिक बीमार पड़ जाता है। निर्मला का मन पुत्र को देखने का होता है लेकिन तोताराम के मना करने से वह अकेली अस्पताल नहीं जा सकती थी। जियाराम से जब वह मंसाराम की अत्यंत दयनीय दशा के बारे में सुनती है तो निर्भीक होकर वह अस्पताल पहुंच जाती है। मंसाराम भी उसके मातृत्व प्रेम से अवगत हो चुका होता है।अतः वह उसके पैरों पर गिरकर उससे क्षमा मांगता है। तब तक मुंशी तोताराम का भी वहम नष्ट हो चुका होता है, वह बहुत पश्चाताप करते हैं लेकिन तब तक मंसाराम की मृत्यु हो चुकी होती है। मंसाराम की बीमारी के दौरान ही अस्पताल के डॉक्टर सिन्हा और उनकी पत्नी सुधा से निर्मला का परिचय होता है।ये वही डॉक्टर साहब हैं जिनका विवाह पहले निर्मला से ही होने वाला था लेकिन डॉक्टर साहब के दहेज प्रेम की वजह से निर्मला की शादी उनसे नहीं हो पाती है। जब यह सारा वृत्तांत उनकी पत्नी सुधा को मालूम पड़ता है तो वह उनको बहुत बुरा-भला कहती है। परिणामस्वरूप वे अपने छोटे भाई का विवाह निर्मला की छोटी बहन से करने को तैयार हो जाते हैं। उसके बाद भी परिस्थितियां उसका पीछा नहीं छोड़तीं। उसका घर तबाह हो जाता है। पुत्रों से विहीन होकर वह मृत्यु को प्राप्त होती है। शवयात्रा के दौरान लोगों में यह प्रश्न उठने लगा कि इनका अग्नि - दाह कौन करेगा? तभी भीड़ में से मुंशी तोताराम का आगमन होता है,जो कहीं चले गए थे। और इस प्रकार निर्मला पर आधारित इस उपन्यास का कारुणिक अंत हो जाता है।

 
सेवासदन उपन्यास(मुंशी प्रेमचंद) में चित्रित नारी विमर्श

 सन 1917 में उर्दू भाषा में लिखित 'बाजार-ए-हुस्न' का हिंदी रूपांतरण 'सेवासदन' नाम से हुआ जो 1918 में प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास में मुंशी प्रेमचंद जी ने वेश्या जीवन से सम्बद्ध समस्या का चित्रण किया है। मुंशी प्रेमचंद ने 'बाजार ए हुस्न' के विषय में जमाना पत्रिका के संपादक दयानारायण निगम को 24 फरवरी 1917में लिखा- "मैं आजकल किस्सा लिखते-लिखते नाविल लिख चला। कोई सौ सफे तक पहुंच चुका है। इसी वजह से छोटा किस्सा न लिख सका। अब इस नाविल में ऐसा जी लग गया है कि दूसरा काम करने को जी नहीं चाहता। किस्सा दिलचस्प है और मुझे ऐसा ख्याल होता है कि अबकी बार नॉवेल-नवीसी में भी कामयाब हो सकूंगा।"(13)

 इस उपन्यास का जब हिंदी में 'सेवासदन' नाम से रूपांतरण हुआ तब यह उस समय की सर्वाधिक पढ़ी जाने वाली किताब सिद्ध हुई। इस उपन्यास की नायिका सुमन है, जिसका विवाह मामूली आमदनी वाले विधुर गजाधर से हो जाता है। बेमेल विवाह और गरीबी के कारण पति-पत्नी के बीच मनमुटाव शुरू हो जाता है और एक दिन रात को देर से घर लौटने पर पति ने सुमन पर दुराचार का आरोप लगाकर उसे घर से निष्कासित कर दिया। अब सुमन को जीवन में अकेलापन, अपमान, तिरस्कार और विवशता के कांटे चुभने लगते हैं। सुमन बनारस में रहने वाली एक वेश्या भोली की शरण में जाती है और स्वयं एक वेश्या बन जाती है। इस उपन्यास पर प्रकाश डालते हुए रामविलास शर्मा जी कहते हैं, "सेवा सदन की मुख्य समस्या भारतीय नारी की पराधीनता है। नारी समाज का सबसे दलित अंग राष्ट्रीय पराधीनता और घरेलू दासता, दोनों से भी पिसती हुई नारी स्वाधीनता के लिए हाथ फैलाने लगी थी। प्रेमचंद ने सबसे पहले इस परिवर्तन को देखा था, उसका स्वागत किया और उसे बढ़ावा दिया।"

इस उपन्यास में स्त्री अस्मिता को केंद्र में रखा गया है। सुमन किस प्रकार उपेक्षित होती हुई और समाज में घृणा की पात्र बनती हुई भी अपने को उसका दोषी नहीं मानती। वह जानती है कि समाज ने ही उसे वेश्या बनने पर मजबूर किया। उपन्यास में एक जगह वह कहती है, "संसार मुझे चाहे कितना ही नीच समझे, मुझे उससे कोई शिकायत नहीं है, वह मेरे मन का हाल नहीं जानता लेकिन तुम सब कुछ देखते हुए भी मुझे नीच समझती हो, इसका आश्चर्य है। मैं तुम्हारे साथ लगभग 2 वर्ष से हूँ, इतने दिनों में तुम्हें मेरे चरित्र का परिचय अच्छी तरह हो गया होगा।"(14)

इस उपन्यास में सुमन के माध्यम से लेखक ने यह संदेश दिया है कि समाज के बुरे बर्ताव के कारण ही सुमन जैसी स्त्रियां वेश्या बनने को बाध्य होती हैं।

 हिंदी साहित्य ऐसे अनेक उपन्यासों से भरा पड़ा है जिसमें स्त्री अस्मिता का वर्णन प्राप्त होता है। सन् 1870 में प्रकाशित और गोपाल राय द्वारा प्रथम उपन्यास के रूप में स्वीकृत 'देवरानी-जेठानी की कहानी' (पं० गौरीदत्त) में दो स्त्रियों की कहानी है। किशोरी लाल गोस्वामी के अधिकांश उपन्यास यथा- लवंगलता वा आदर्शबाला (1890),स्वर्गीय कुसुम वा कुसुम कुमारी (1889),लीलावती वा आदर्श सती (1901),चपला वा नव्य समाज (1903), तरूण तपस्विनी वा कुटीर वासिनी (1906), माधवी माधव वा मदनमोहिनी (1909), अंगूठी का नगीना (1918), तारा (1902), कनक कुसुम वा मस्तानी (1903) आदि स्त्री विमर्श पर ही आधारित हैं।
 कुंवर हनुमंत सिंह कृत चंद्रकला (1893) हिंदी का ऐसा पहला उपन्यास है जिसमें स्त्रियों के बलात शोषण का चित्रांकन किया गया है। इसी प्रकार पांडेय बेचन शर्मा उग्र ने भी स्त्री अस्मिता को ध्यान में रखकर चंद हसीनों के खतूत (1927), दिल्ली का दलाल (1927) बुधुआ की बेटी (1928), जीजी जी (1937) आदि उपन्यासों की रचना की।

 इसी क्रम में आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने हृदय की परख (1918), अमर अभिलाषा (1933) उपन्यासों में स्त्रियों पर होने वाले अत्याचारों को विषयवस्तु बनाया है। निराला ने अप्सरा (1931), अलका (1933), निरूपमा (1936), प्रभावती (1936) आदि उपन्यासों के केंद्र में स्त्री को जगह दी है।

विष्णु प्रभाकर ने कोई तो (1980), अर्धनारीश्वर (1992), संकल्प (1993), आदि उपन्यासों में स्त्री के काल्पनिक, परित्यक्त और बलात्कार की शिकार स्त्रियों की समस्याओं को उभारा है।

उदय शंकर भट्ट ने नए मोड़ (1954) के माध्यम से एक सुशिक्षित एवं आत्मनिर्भर नारी का चित्र प्रस्तुत किया है। वृंदावन लाल वर्मा ने अपनी अधिकांश रचनाओं का शीर्षक स्त्रियों पर ही रखा है,यथा- विराटा की पद्मिनी (1936), झांसी की रानी (1946), कचनार (1948), मृगनयनी (1950), रामगढ़ की रानी (1961), महारानी दुर्गावती (1964), अहिल्याबाई (1955) आदि।

 नागार्जुन के रतिनाथ की चाची (1948), नई पौध (1953), पारो (1975) आदि ऐसे उपन्यास हैं जो स्त्री मूलक समस्या को उजागर करते हैं।

 इस प्रकार हम कह सकते हैं कि आज के दौर में स्त्री विमर्श लेखकों का प्रमुख वर्ण्य विषय बना हुआ है। स्त्री विमर्श पर प्रकाश डालते हुए प्रसिद्ध समीक्षक शरद सिंह का कहना है, "स्त्री विमर्श, स्त्री मुक्ति, नारी मुक्ति, नारीवादी आंदोलन आदि किसी भी दिशा से विचार किया जाए तो इन सभी के मूल में एक ही चिंतन दृष्टिगत होता है- स्त्री के अस्तित्व को उसके मौलिक रूप में स्थापित करना।"(15)


सन्दर्भ ग्रन्थ:-

1- पंचशील शोध समीक्षा पृष्ठ- 87
2- खुली खिड़कियां (मैत्रेयी पुष्पा), पृष्ठ-115
3- हंस, अक्टूबर 1996, पृष्ठ-75
4- गोदान (उपन्यास)- मुंशी प्रेमचंद, सुमित्र प्रकाशन पृष्ठ-267
5- गोदान (उपन्यास)- मुंशी प्रेमचंद, सुमित्र प्रकाशन पृष्ठ-75
6- गोदान (उपन्यास)- मुंशी प्रेमचंद, सुमित्र प्रकाशन पृष्ठ-300
7- विराटा की पद्मिनी (उपन्यास)-वृंदावन लाल वर्मा-मयूर प्रकाशन,पृष्ठ-67
8- विराटा की पद्मिनी (उपन्यास)-वृंदावन लाल वर्मा-मयूर प्रकाशन,पृष्ठ-354
9- मैला आँचल (उपन्यास) - फणीश्वरनाथ रेणु, भूमिका 1954
10-बसन्ती (उपन्यास) - भीष्म साहनी
11- कथा साहित्य में सती पूजा (मैत्रैयी पुष्पा), हंस, जुलाई 2004, पृष्ठ-39
12- मुझे चाँद चाहिए (उपन्यास) सुरेन्द्र वर्मा, भारतीय ज्ञानपीठ छठा संस्करण 2018,पृष्ठ-14
13- कलम का सिपाही (अमृतराय), हंस प्रकाशन इलाहाबाद, पृष्ठ-170
14- सेवासदन (उपन्यास)- मुंशी प्रेमचंद, हंस प्रकाशन इलाहाबाद, पृष्ठ-320
15- पत्तों में कैद औरतें (शरद सिंह) पृष्ठ-152
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शोध आलेखकर्ता-
जितेन्द्र कुमार (शोधार्थी, हिन्दी), वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय जौनपुर, उत्तर प्रदेश
चलभाष- 9452508522 ईमेल- jksir1988@gmail.com

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