कहानी: मेरा इतवार

ज्योत्सना सिंह

- ज्योत्सना सिंह



सेहत से लेकर के पढ़ाई तक की छुट्टी, मैं हर इतवार तब तक रखता जब तक कि कोई बहुत ज़रूरी प्रतियोगिता या इम्तिहान न हो। 

उसे भी मेरी यह आदत पता थी। यही कारण था कि वह इतवार को अकेले ही दौड़ने चली जाती थी। मुझे स्वस्थ रहने का शौक था किंतु उसे जुनून था। यही हमारी दोस्ती का सबसे मज़बूत कारण भी था। वर्ना वह कॉलेज की सबसे तेज-तर्रार अमीर लड़की भला मुझसे क्यों दोस्ती करती? लेकिन जब हमारी दोस्ती हुई तब ऐसी हुई कि पूरा कॉलेज हमें शक़ की निगाह से देखने लगा। जबकि हमारे बीच में कोई प्यार वाली बात है भी यह मुझे कभी नहीं लगा था। वह दोस्त थी, सिर्फ़ और सिर्फ़ दोस्त। इस दोस्ती में मैं भले ही लिंगभेद का ख्याल रखता किंतु मुझे कभी भी यह एहसास नहीं हुआ कि वह भी ऐसा कुछ सोचती है। वह कैसी भी बात मुझसे बेबाक़ी से कर लेती थी, जिससे मैं कभी-कभी बहुत हैरान रह जाता था। मसलन अपने मासिक धर्म को लेकर यह कह देना कि आज मैं तेज नहीं दौड़ सकती या इसी तरह की अन्य कई बातें जिससे मैं झेंप सा जाता और उसे कोई फ़र्क ही नहीं पड़ता। 

वक्त बेवक्त वह कभी भी मेरे कमरे में आ जाती जब मैं उसे वक्त के बारे में कहता तो बड़ी बेपरवाही से कहती, “बोर हो रही थी, दोस्त के पास न आऊँ तो क्या झक मारूँ?” फिर मेरे एक बर्नर के गैस स्टोव पर कभी मैगी तो कभी चाय बनाकर खुद भी खाती और मुझे भी खिलाती-पिलाती थी। साथ ही फ़रमान सुनाती, “मैगी खाई है कल पाँच किलोमीटर ज़्यादा रन करनी है।” संडे होता तो मेरी ‘न’ सुनकर वह कहती- “यह जो तेरा संडे है न, यह हमारी दोस्ती के नमक पर पानी फेर देता है। एक दिन मैं तुम्हारे रविवार पर कहानी लिखूँगी और नाम रखूँगी-‘तेरा इतवार’!” फिर बड़ी फ़िल्मी स्टाइल में कहती, “जा सिमरन जी ले अपनी ज़िंदगी।” वह खुश होती तो कभी भी कहीं भी होती मुझे चूम लेने से न हिचकिचाती और दुःखी होती तो मेरे गले लगकर रो लेने पर ही उसे सुकून मिलता। इतनी बेपरवाह और बेफ़िक्र सी मेरी दोस्त अपने हर वादे और इरादे की पक्की थी।

स्नातक की पढ़ाई के साथ ही मैं सिविल की तैयारी कर रहा था और वह भारतीय सेना में जाने के लिए एड़ी-चोटी का जोड़ लगा रही थी। मुझे कभी नहीं भूलता वह दिन जिस दिन मेरा प्री निकला था उस दिन उसने कहा था- “ज़िंदगी में एक बार दारू पीने का मन है वह भी तेरे साथ। जिस दिन तुम सेलेक्ट हो जाओगे उस दिन पी जाएगी।” सुबह हमने वादा किया और शाम को वह एक स्कॉच की बॉटल मेरे कमरे पर रख गई। बॉटल को खुलने का इंतज़ार था और हम उसे खोलने के लिए प्रयासरत हो गए। 

उन दिनों हम दोनों ही अपने कैरियर को मुकम्मल करने के लिए अति व्यस्त हो गए थे। बस एक सवेरा ही ऐसा होता था जिस वक्त हम साथ-साथ सड़कों पर दौड़ रहे होते थे।खुद को तरोताज़ा रखने के लिए। 

उसकी प्रतियोगी परीक्षा इसी माह में थी। तभी उसका आना-जाना थोड़ा कम हो गया था। दो हफ़्ते बाद हम दोनों ही अपने-अपने  इम्तिहान से फ़ारिग़ हुए। उस रोज उसने पहली बार कहा, “चलो हम शहर के बाहर घूमने चलते हैं।” व्यंग्यात्मक हँसी हँसते हुए मैं बोला-“मेरी नौकरी नहीं लगी है जो घूमने चलूँ। यहीं कहीं चलकर किसी पार्क में घूम सकते हैं। या फिर बहुत हो तो फ़िल्म देख सकते हैं।”  उसने अपनी छोटी-छोटी आँखें मिचमिचाई और मुझे देखते हुए बोली, “हूँ! बात तो सही है।लेकिन क्या तुम यह नहीं जानना चाहते हो कि मैं कहाँ जाना चाहती हूँ?”

वह कभी भी पहेलियों में बात नहीं करती थी जो कहना होता था साफ़ सपाट शब्दों में कह देती थी। आज उसका यह तरीक़ा मुझे असमंजस में डाल गया। मैंने उसकी तरफ़ सवालिया निगाहें फेरी तो वह मेरे एकदम क़रीब आकर बोली, “मुझे तुम्हारा गाँव देखना है। माँ से मिलना है। फिर मुझे कभी मौका नहीं मिलेगा मेरा सेलेक्शन पक्का है। इतने अच्छे इंसान की माँ से मुझे मिलना ही मिलना है।” वह ज़िद्दी थी जो ठान लेती थी करके मानती थी यह मैं जानता था। फिर भी मैंने उसे टाल दिया। मैं उसके घर और उसके माता-पिता सबसे मिल चुका था। अति संपन्न परिवार होने की वजह से ही मैंने दोबारा कभी उसके घर जाना उचित नहीं समझा था। एक बार के बाद उसने भी कभी मुझसे घर चलने को नहीं कहा था।

आज यह कैसी इच्छा लेकर वह मिलने आई कि मेरी आँखों के सामने मेरा जर्जर घर और थकी हुई माँ का पीला पड़ा चेहरा घूम गया। हड़बड़ाहट में मैंने कह दिया, “नहीं यह संभव नहीं है।” उसने मेरे मना करने पर एक बार भी पलट कर यह नहीं पूछा कि आख़िर क्यों संभव नहीं है? जबकि बात की तह तक जाना उसकी आदत थी। मैंने भी सोचा चलो अचानक सामने आकर खड़े हुए इस व्यधान से बिना किसी वाद-प्रतिवाद के छुटकारा मिल गया। उसके यूँ चुप हो जाने से मैं खुद को क़सूरवार मान रहा था। उसी की भरपाई करने के लिए अपनी तरफ़ से आफ़र देकर उसे फ़िल्म दिखाने ले गया। तीन साल की दोस्ती में यह पहली बार था जब हम दोनों फ़िल्म देखने गए थे।

पुरुष वाला दंभ मेरे अंदर उठ खड़ा हुआ और अपनी जेबें टटोलने के बाद पिक्चर हाल की बालकनी के दो टिकट मैंने ही ख़रीदे फिर उससे मुस्कुरा कर कहा, “तुम्हारा सेलेक्शन पक्का है न तो चलो आज से ही थोड़ा सा सेलिब्रेट करते हैं। साथ पिक्चर देखने की तुम्हारी इच्छा पूरी करते हैं।” इतना कहते ही उसके चेहरे की उदासी रफ़ूचक्कर हो गई और वह हँसते हुए बोली, “फ़ाईनली हम मूवी देखने आ ही गए।” मैं भी अपनी जेब की उघड़ी हुई हालात को छुपाते हुए मुस्कुराकर फ़िल्म देखने लग गया।

फिर वह दिन आया जिस दिन उसका चयन हो गया और वह अपनी शारीरिक प्रतिस्पर्धा की तैयारी के लिए चंड़ीगढ़ चली गई। दिल में उसके लिए बहुत ख़ुशी थी। उसका सपना पूरा होने वाला था। लेकिन उसकी अनुपस्थित मुझे अखरने लगी थी।

मेरा रिज़ल्ट आने में अभी वक्त था। मैंने अपना बोरिया-बिस्तरा उठाया और अपने गाँव चला आया। वहाँ मुझे पता चला कि महीने भर पहले वह गाँव आई थी। माँ ने कहा, “बहुत प्यारी सी लड़की थी।बोली तुम्हारी दोस्त है। तुम पढ़ाई में व्यस्त हो तभी नहीं आ पाए और वह इधर से निकल रही थी तो मुझसे मिलने चली आई। बहुत कुछ खाने के लिए और एक धोती भी लाई थी। बोली थी कि तुम बहुत व्यस्त हो पढ़ाई के बाद खुद ही आओगे। उसके आने का ज़िक्र चिट्ठी या फोन पर न करूँ। तभी तुमको परेशान नहीं किया।” फिर थोड़ा सा ठहरकर बोली, “ऐसी ही दुल्हन लेकर आना लल्ला! बहुत मीठी बोली है। कोई जात-पात हो, हमें कुछो फर्क नहीं।” माँ को निहारते हुए मैंने कहा, “अम्मा, हम बस दोस्त हैं।” अम्मा बड़ी रहस्यमयी मुस्कान से मुस्कुराई। पहले तो मुझे बुरा लगा फिर लगा फिर लगा दोस्ती और प्यार के बीच की महीन रेखा जब खुद को आधुनिक कहने वाला आज का समाज नहीं समझ पता है तब यह तो मेरी भोली और पुराने ख़्यालों वाली अम्मा है। मैं आँगन से बाहर आ उसे फोन मिलाने लगा और जब फोन पर बात हुई तब उसने बताया, “वह पहली अगस्त का दिन था जब मैं तुम्हारे गाँव गई थी। वह दिन सब लोग मित्रता दिवस के रूप में मना रहे थे किंतु यह इतवार का दिन था। तुम्हारा इतवार तो हमारी दोस्ती की सौतन है। तो क्या करती? मैं उससे मिलने चली आई जो मेरे लिए इतना अच्छा मित्र इस दुनिया में लेकर आईं है।”

मैं क्या करता हमेशा की तरह बस मुस्कुरा दिया और वह न जाने क्या-क्या बताती रही।

कुछ दिनों के अंदर ही मेरा रिज़ल्ट आया और मैं नाकाम हो गया। यह मेरे लिए बहुत बड़ा झटका था। उस वक्त मुझे उसकी बहुत ज़रूरत थी पर वह भी मजबूर थी। वह अपना मुक़ाम हासिल कर चुकी थी और उसे छुट्टी किसी भी हालत में नहीं मिल सकती थी। वक्त मिलते ही वह मुझे फोन पर हौसला देती पर मैं बुरी तरह से हार चुका था। दिन पर दिन मैं उससे दूरी बनाने लगा। साल बीतते-बीतते मैंने दूरी की लकीर लंबी कर ली थी। वह व्यस्त रहती थी और मैं परेशान यह दोनों कारण उस लकीर को गहरा करने में अपना फ़र्ज़ बड़ी शांति से निभा रहे थे। फिर उसे किसी गुप्त मिशन पर जाना पड़ा और हमारा बचा-खुचा सम्पर्क भी टूट गया। उस टूटे हुए संपर्क को मैंने खुद ही दोबारा नहीं जुड़ने दिया। मैंने शहर छोड़ दिया नंबर बदल लिया और खुद को उससे छुपा लिया। 

पाँच वर्ष की नाकामी में कितना कुछ बदल गया है। मैं कुछ भी नहीं कर पाया। जीने की चाह भी मर गई है। लेकिन आज  ट्रेन में बैठते हुए न जाने क्यों मेरा मन मुझसे कह रहा है कि अब मेरी कामयाबी मुझसे ज़्यादा दूर नहीं है। यह नौकरी मुझे हताशा से बाहर लाएगी और फिर मैं तुमको ढूँढ़ लूँगा। तुम्हारा ग़ुस्सा और प्यार दोनों सह लूँगा। तुम्हारे साथ दारू भी पी लूँगा। रोज ही तो सोचता हूँ कि क्या वह अब भी मुझे याद करती होगी? क्या वह अभी भी मेरी दोस्त है?

***
शिमला ट्रेन एक्सीडेंट्स के रेस्क्यू आपरेशन के दौरान लाशें और बिखरे हुए सामान इकट्ठा करवाते वक्त जब मुझे एक अधफटे बैग से झाँकती स्काच की बॉटल और यह डायरी मिली तब उसके ऊपर लिखे शब्द 'मेरा इतवार' पढ़कर मेरा मज़बूत दिल धड़क उठा अपनी ड्यूटी पर तैनात होने के बावजूद भी मैंने वह बॉटल और डायरी उठा ली। मेरी आँखें आज भी तुम्हारी लिखावट को सोते हुए भी पहचान सकती हैं। डायरी पढ़कर मैं तुम्हारा वह सच जान सकी जो तुम्हारी दोस्त बनकर भी नहीं जान सकी। तुम मुझे हर पल लिखते रहे। काश! तुम्हारी डायरी की तरह तुम भी मिल जाते मैं भी तो तुम्हें बता पाती कि मैंने तुम्हें कहाँ-कहाँ नहीं ढूँढा। मैं फिर से तुम्हारे गाँव गई थी पर माँ भी दुनिया से जा चुकी थी और तुम्हारा किसी को कोई पता नहीं था। तुम एक हार से इतना हार गए तुम सच में कायर थे दोस्त!

तभी बूट की टकराहट की आवाज़ के साथ ही रंगरूट ने आकर कहा, “आपरेशन ट्रेन शिमला कम्प्लीट ऑफ़िसर! खाई से निकाली गई दो सौ लाशें दाहसंस्कार के लिए भेजी जा चुकी हैं।”

तुम्हारी डायरी और स्कॉच की बॉटल पकड़े मैं कैंप की तरफ़ बढ़ चली। मुझे लाशें नहीं तलाशनी थी क्योंकि तुम्हें मैं अपनी यादों में ज़िन्दा ही रखना चाहती थी ताकि मैं तुम्हारे साथ दारू पी कर जश्न माना सकूँ।

दूसरी तरफ़ लगे कैंप में बटालियन के बाकी लोग व्यस्त थे। कल इतवार है सोचकर मैंने तुम्हारी डायरी और बंद बॉटल अपनी दराज़ में रख दी। तुम्हारा इतवार आज भी हमारी दोस्ती का एल.ओ.सी. है।

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