पुस्तक समीक्षा: जनचेतना की संवाहक है 'गांधी दौलत देश की'

समीक्षकः प्रदीप उपाध्याय


पुस्तक: गांधी दौलत देश की (खंड काव्य)
लेखक : ओम वर्मा
प्रकाशक : श्वेतवर्णा प्रकाशन, नई दिल्ली
मूल्य: ₹150/-


महात्मा गांधी के जीवन पर आधारित खंड काव्य 'गांधी दौलत देश की' ख्यात व्यंग्यकार एवं कवि ओम वर्मा की एक महत्वपूर्ण कृति है। इसके पूर्व वर्ष 2017 में ओम जी का एक व्यंग्य संग्रह 'आपके कर कमलों से ' प्रकाशित हो चुका है। उनके व्यंग्य, दोहे, ग़ज़लें विभिन्न समाचार पत्र -पत्रिकाओं में सतत रूप से प्रकाशित होती रहती हैं, साथ ही नियमित स्तम्भों में भी उनकी उपस्थिति दर्ज होती रहती है। इस दृष्टि से भी ओम वर्मा साहित्य के क्षेत्र में एक जाना पहचाना नाम है।

वैसे महात्मा गांधी पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है और वर्तमान दौर में भी लिखा जा रहा है। गांधी की प्रासंगिकता तब भी थी यानी स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व में तथा इसके पश्चात भी रही है। वैसे यह कहना भी उपयुक्त होगा कि गांधी की प्रासंगिकता आज के दौर में और अधिक हो गई है। गांधी केवल एक व्यक्ति ही नहीं थे बल्कि कहें कि वे एक विचारधारा, एक विचार प्रवाह, एक विचार सूत्र थे, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। महात्मा गांधी को प्रत्येक व्यक्ति ने अपनी -अपनी दृष्टि से देखा है तब हो सकता है कि कहीं पूर्वाग्रह हो या कहीं दुराग्रह हो, कहीं सकारात्मक पक्ष उभरकर आता है तो कहीं कुछ नकारात्मक पक्ष भी उभरता है। बहरहाल, गांधी दर्शन मूल रूप से भारतीय दर्शन का ही प्रतिरूप परिलक्षित होता है।

प्रदीप उपाध्याय
पुस्तक पर डॉ रवीन्द्र कुमार, पूर्व कुलपति, चौधरी चरणसिंह विश्वविद्यालय, मेरठ ने अपने संदेश में लिखा भी है -"कथनी और करनी में लगभग एकरूपता से बना महात्मा गांधी का जीवन ही सजातीयों के लिए उनका संदेश था; समय और परिस्थितियों की मांग के अनुरूप अपने परिष्करण-परिमार्जन की स्थिति में वह दीर्घकाल तक अनुकरणीय और प्रासंगिक रहेगा।

आगे उन्होंने यह भी लिखा है कि -"महात्मा गांधी के मार्ग की यही विशाल स्वीकृति वह उसकी श्रेष्ठता संसार भर के प्रबुद्ध वर्ग -रचनाकारों, लेखकों, विद्वानों व साहित्यकारों के लिए आकर्षण का विषय है। प्रबुद्धजन सामान्यतः आदर के साथ, महात्मा गांधी के जीवन और कार्यों को उनके परलोक गमन के सात दशकों के बाद भी अपने-अपने ढ़ंग से प्रस्तुत करते हैं, अपने शोध का विषय बनाते हैं। यह अपने आप में अभूतपूर्व है ।”

गांधीवादी डॉ मनोज मीता ने पुस्तक में अपने शुभकामना संदेश में लिखा है कि "गांधी एक नाम, सौ अफसाने हैं। आज गांधी को बिना पढ़े बोलने वालों की बड़ी तादाद है। जबकि गांधी को पढ़ना स्वयं की खोज है। सम्पूर्ण गांधी वांग्मय के 100 खंड लगभग पचास हजार पृष्ठों में है। वे जो सोचते थे, वही बोलते थे। वे जो बोलते थे, वैसा करते थे। जैसा देखते थे, उसे लिखने में थकते नहीं थे।”

"और फिर भी लोग गांधी पर प्रश्न करते हैं! तब गांधी थे तो वे जवाब देते थे, वे अकेले बोलते थे, लाखों सुनते थे। उनकी इच्छा 125 वर्ष जीने की थी। उन्होंने कहा था कि मैं अपनी कब्र से बोलूंगा। आज वह चरितार्थ हो रहा है। तब वे अकेले बोलते थे, लाखों सुनते थे। आज अनगिनत बोल रहे हैं और करोड़ों गांधी को सुन रहे हैं। आज बोलना जरूरी है, ये सबसे मारक हथियार है किसी लड़ाई का और उसी मारक हथियार को और मजबूत करता है। श्री ओम वर्मा जी के द्वारा लिखित खंड काव्य 'गांधी दौलत देश की' में लगभग सात सौ से अधिक दोहे संकलित हैं। जीवन से मरण तक विस्तृत वर्णन संकलित है। यह खंड काव्य गांधी को उसी तरह जनमानस में प्रतिष्ठापित करेगा, जिस तरह तुलसीदास ने रामचरितमानस के द्वारा गांधी के आराध्य राम को घर-घर पहुँचाया, उसी तरह यह खंड काव्य भी गांधी को आम जनमानस तक पहुँचाएगा।”

प्रमुख गांधीवादी विचारक रजनीकांत झा ने भी अपने संदेश में लिखा है कि -" आज भी गांधी जी का पथ , उनका सत्याग्रह हमारी राह देख रहा है। इसे सफल बनाना हर नागरिक का कर्तव्य है। यह कर्तव्य साहित्य का भी है, साहित्यकार का भी जिसे ओम वर्मा जी बखूबी निभा रहे हैं। गांधी जी के चेहरे को नहीं, उनके दिखाए रास्ते को दिखाना जरूरी है। ओम जी ने ऐसा ही किया है।”

यहाँ ओम वर्मा को उल्लेखित करना भी प्रासंगिक होगा। उन्होंने 'अपनी बात' में लिखा है -"पूरे खंड काव्य में कुल 786 दोहे हैं। दोहा क्रमांक 001से लेकर 774 तक मैंने उनके जीवन के घटनाक्रम वह उनके कथन तथा विचार को दोहे के रूप में ढालने का प्रयास किया है। 775 वें दोहे में गांधी के निधन पर प.जवाहरलाल नेहरू का 'जीवन से रोशनी का चले जाना ' का संदेश है। 'गांधी कल और आज 'शीर्षक से अंतिम 11 दोहे वे हैं जो मेरे विचार हैं। मेरे इस विनम्र प्रयास को अहिंसा के इस पुजारी की शान में कोई गुस्ताखी न समझते हुए श्रद्धा सुमन ही समझा जाएगा, ऐसा विश्वास है। अपने इस कार्य के लिए मेरा मानना है कि -
गांधी पर लिखने चला, हुआ मुझे अहसास।
दीप दिखाने मैं गया, खड़ा सूर्य था पास॥”

यह सही है कि गांधी पर अबतक अन्यानेक लेखकों, विचारकों, साहित्यकारों ने गद्य और पद्य रूप में बहुत कुछ लिखा है और स्वयं गांधीजी का अपना स्वयं का लिखा दर्शन भी उपलब्ध है लेकिन ओम वर्मा द्वारा दोहों में लिखा गया खंड काव्य 'गांधी दौलत देश की' अपने आप में अनुपम और पहला प्रयास है जो इसे एक अलग स्थान पर ले जाती है। हालांकि मशहूर शायर अकबर इलाहाबादी ने 'शाहनामा' की तर्ज़ पर 'गांधीनामा' लिखा, लेकिन यह उर्दू में है। इस परिप्रेक्ष्य में ओम जी का हिंदी में गांधी पर दोहों में खंड काव्य रचना पहला एवं उल्लेखनीय प्रयास है।

रचनाकार ने गांधीजी के जन्म से लेकर मृत्यु तक हरेक प्रसंग को दोहों में समेटा है। 'गांधी दौलत देश की' की शुरुआत में उन्होंने लिखा है -
"एक महामानव हुआ, गांधी मोहनदास।
दोहों में लिखने चला, ओम आज इतिहास॥”

गांधीजी के जन्म पर लिखा दोहा दृष्टव्य है -
"सदी रही उन्नीसवीं, उनहत्तरवां साल।
अक्टूबर की दूसरी, जन्मा अद्भूत लाल॥

इसी तरह से गांधीजी के जीवन के घटनाक्रम को सिलसिलेवार उन्होंने क्रमबद्ध रूप से दोहाबद्ध किया है। इसके अलावा कुछ महत्वपूर्ण घटनाक्रमों को पृथक शीर्षक के साथ लिखा है यथा, नमक सत्याग्रह (दांडी मार्च), गोलमेज कांफ्रेंस, गांधी और सुभाष, गांधी और आइंस्टीन, बिड़ला हाउस में प्रार्थना। अंत में पूर्णाहुति के रूप में 'गांधी कल और आज 'शीर्षक देकर समापन किया गया है जिसमें कवि ने अपने आंतरिक भावों को बहुत खूबसूरती से अभिव्यक्त किया है। यहाँ कवि का व्यंग्यकार रूप स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। इसकी बानगी निम्नांकित दोहों में दृष्टव्य है -
"अक्तूबर की दूसरी, माह जनवरी तीस।
दो दिन गांधी देवता, बाकी दिन वो पीस॥”
"गांधी दौलत देश की', नंबर है फ्री टोल।
चल न सके जिसपर कभी, मोल तोल के बोल॥”
"कुछ ने गांधी नाम को, बना रखा है ढाल।
सत्य जिन्हें त्यागे हुए, गुजर चुके कुछ साल॥”
"गांधी है उनके लिए, वह सिक्का कलदार।
जिसे चलाकर वोट का, करते कारोबार॥

आज जब हिन्दुस्तान ही नहीं, सम्पूर्ण विश्व में आतंकवादी घटनाएँ हो रही हैं, हिंसा का खुला खेल खेला जा रहा है, नफ़रत की विषबेल फैल चुकी है, वहाँ गांधी और उनके दर्शन का जन-जन तक पहुँचना और भी जरूरी हो गया है। ओम वर्मा ने लिखा है -
"लाठी को अपना लिया, बिसरा दिए विचार
गांधी के घर कर रही, हिंसा फिर अधिकार॥
"प्रासंगिकता आज भी, है जिसकी मौजूद।
गांधी दर्शन है जहाँ, वहाँ फेल बारूद॥
और अंत में उन्होंने लिखा है, वह कृतध्न पीढ़ी के लिए बहुत बड़ा संदेश है -
"छापा हमने नोट पर, दिल पर बनी न छाप।
जिस दिल में यह छाप हो, वहाँ पनपे न पाप"

नि:संदेह आज के भटकाव वाले दौर में गांधी और उनका दर्शन और अधिक प्रासंगिक हो गया है। ओम वर्मा द्वारा लिखा गया खंड काव्य 'गांधी के जीवन एवं दर्शन के माध्यम से जनचेतना जगाने का एक अच्छा प्रयास है। महात्मा गांधी के जीवन, कार्यों और विचारों को जन-जन तक पहुँचाने की दिशा में ओम जी का यह प्रयास उल्लेखनीय है। इस हेतु ओम जी साधुवाद के पात्र हैं। निश्चित ही पाठक वर्ग को उनकी पुस्तक 'गांधी दौलत देश की' को बेहतर प्रतिसाद मिलेगा। हार्दिक शुभकामनाएँ।

समीक्षक का पता
डॉ. प्रदीप उपाध्याय
16, अम्बिका भवन, उपाध्याय नगर,
मेंढ़की रोड, देवास, म.प्र. 455001
मोबाइल. 9425030009

लेखक का पता
ओम वर्मा
100, रामनगर एक्सटेंशन, देवास, म.प्र.455001
मोबाइल 9302379199

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