दिलीप मेहरा के ‘मकान पुराण’ कहानी संग्रह में समकालीन विमर्श

नीलम वाधवानी

नीलम वाधवानी

शोधार्थी, हिंदी विभाग, भाषा साहित्य भवन, गुजरात विश्वविद्यालय, अहमदाबाद
ईमेल: vishnukriplani36@gmail.com
चलभाष: +91 840 122 4237


पुस्तक: मकान पुराण (कहानी-संग्रह)
लेखक: डॉ. दिलीप मेहरा
ISBN 978-93-84397-70-8
प्रकाशक: उत्कर्ष पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स, कानपुर
संस्करण: द्वितीय संशोधित संस्करण-2021
मूल्य: ₹ 100.00


एक पंछी के दर्द का  फसाना था
टूटे थे पंख और उड़ते हुए जाना था
तूफान तो झेल गया पर हुआ एक 
अफसोस वहीं डाली टूटी
जिस पर उसका आशियाना था||

प्रत्येक इंसान के लिए भोजन तथा वस्त्र के बाद प्रथम आवश्यकता उस का अपना मकान होता है। किंतु मध्यम वर्गीय नौकरीपेशा लोगों के लिए अजनबी शहर में मकान खोजना आज के समय में बहुत ही कठिन हो गया है। ऐसी ही वास्तविकता को दर्शाने वाली कई नवीन समस्याएँ जो मुख्य रूप से 21वीं सदी में सामने उभर कर आ रही हैं, उन्हें आधार बनाकर मकान पुराण कहानी संग्रह लिखा गया है। यह कहानी संग्रह लेखक की मौलिक सोच को पाठक के समक्ष प्रस्तुत करता है। स्वातंत्र्योत्तर हिंदी कथा साहित्य के चर्चित एवं मेधावी प्रतिभा के धनी लेखक डॉ. दिलीप मेहरा जी का जन्म 27 दिसंबर 1968 में वीरपुर गुजरात में हुआ । एम.ए. में गुजरात यूनिवर्सिटी में समग्र हिंदी में प्रथम वर्ग में उत्तीर्ण होने पर स्वर्ण पदक प्राप्त किया। गुजरात यूनिवर्सिटी में एमफिल की पढ़ाई पूर्ण की। एम.एस. यूनिवर्सिटी बडौदा से पीएचडी की उपाधि ग्रहण की। 

दिलीप मेहरा
दिलीप जी साहित्य वीथिका पत्रिका के प्रधान संपादक तथा सरदार पटेल विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर हिंदी विभाग में आचार्य पद पर आसीन है। इक्कीस आलोचना ग्रंथ तथा संपादित पुस्तकों द्वारा हिंदी साहित्य को समृद्ध करने वाले दिलीप जी को अब तक आठ से अधिक पुरस्कार एवं उपाधियों से सम्मानित किया जा चुका है।  कुशल लेखन शैली के बल पर तत्कालीन समस्याओं पर सवाल उठाने वाले प्रतिभाशाली लेखक डॉ. दिलीप मेहरा मकान पुराण कहानी संग्रह के माध्यम से  आधुनिक समाज में व्याप्त ज्वलंत समस्याओं को हमारे सम्मुख रखते हैं।

मकान पुराण कहानी संग्रह में लेखक ने आठ कहानियों का संचयन किया है। प्रथम कहानी ‛मैं पीएच.डी. हो गया’ जहाँ पीएच.डी. की उपाधि के प्रति अध्यापकों ट्रस्टियों तथा राजनीतिज्ञों के दृष्टिकोण को स्पष्ट करती है। वहीं द्वितीय कहानी मकान पुराण एक आम इंसान द्वारा अपने लिए नए शहर में किराए का मकान ढूंढने की समस्या पर आधारित है जिसमें मकान मालिक द्वारा किराएदार के प्रति किये जाने वाले अनुचित व्यवहार का चित्रण है। मकान मालिक ना सिर्फ अपने किरायेदारों को अपने अधीन रखना चाहता है बल्कि स्वेच्छा से कोई भी बहाना बनाकर किराएदार को रातों-रात  घर भी खाली कराने की सामर्थ्य रखता  है। किराएदार हमेशा इसी भय से  भयभीत रहता है कि मकान खाली करने पर नया मकान कैसे मिलेगा । मकान पुराण संग्रहित कहानी‛ कलयुग के भगवान’ अद्यतन समय में डॉक्टरों द्वारा पैसों के लोभ में किए जाने वाले अमानवीय व्यवहार का हृदयस्पर्शी प्रस्तुतीकरण है।

‛विदाई समारोह  और शंकर की उलझन’ कहानी में अध्यापक वर्ग की आपसी बातचीत के माध्यम से यह प्रश्न उठाया गया है कि यदि कोई निंदनीय कार्य करता है तब भी विदाई के समय हम उसकी प्रशंसा क्यों करें? इसी आदर्श और यथार्थ का संघर्ष पूरी कहानी में चलता है और अंततः आदर्श जीत जाता है। ‛दापा’ कहानी किन्नर समाज के प्रति किये जाने वाले संवेदनशील तथा असंवेदनशील दोनों प्रकार के व्यवहारों की कुशल परिचायक कहानी है । किन्नर समाज की समस्याओं को इंगित करते हुए लेखक स्पष्ट करता है कि हमें उनकी मजबूरी को समझ कर उनके साथ में न्याय करना चाहिए। उनके द्वारा हमारे समाज से की जाने वाली अपेक्षाओं पर खरा उतरने की कोशिश करनी चाहिए ।क्योंकि वह हमारे ही समाज का अंश है। मकान पुराण में संग्रहित कहानी ‛सौदा’ उस पिता की कहानी है जो कहानी के आरंभ में तो पिता बना रहता है किंतु अंत में जाकर एक वहशी दरिंदा बन जाता है। जिस पुत्र के विवाह की चिंता में  रात दिन चिंतित रहता है ,विवाह करा देने पर कहानी का अंत होते-होते उसी पुत्र की पत्नी का मान मर्दन कर पुत्र एवं पुत्रवधू के भोलेपन का नाजायज फायदा उठाता है और यही पिता का मनोवृतिगत  परिवर्तन अंततः पुत्र की मृत्यु का कारण भी बन जाता है। मारफाड़ ट्रस्टी कहानी एवं शिक्षा का सच कहानी ट्रस्टीयों द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में किए जाने वाले अहंकार पूर्ण व्यवहार की द्योतक है।

लेखन शैली व्यंग्यात्मक मुहावरेदार साथ ही विषय के अनुरूप है।

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